gayatri mantra japne ke fayde

  

गायत्री मंत्र की शक्तियां:-

गायत्री मंत्र में इतनी शक्तियां भरी हुई है कि उसकी व्याख्या करने में कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। आचार्य पंडित श्रीराम शर्मा जी ने 2000 ग्रंथों के अध्ययन करके गायत्री महाविज्ञान को 3 खंडो रचा है।
हमारा अपना अनुभव यह कहता है कि, संसार का कठिन से कठिन कार्य भी गायत्री मंत्र के साधक के लिए अत्यंत सरल हो जाता है। यह मंत्र दो प्रकार से कार्य करता है।
१:-यह हमारे पूर्व जन्मों के किए हुए कर्मों को निरस्त करता है। इसका परिणाम यह होता है कि जो बाधाएं हमारे कर्म दोष के कारण हमारे मार्ग में आया करती हैं वे दूर होने लगती है ।और गायत्री मंत्र का यह कार्य हमारे प्रयास को सरल और सुगम बना देता है।
२:-गायत्री मंत्र का दूसरा का निर्माण करने का है यह हमें ब्रह्मांड के शक्ति से जोड़ देता है। यह साधारण व्यक्ति को देवत्व प्रदान करता है। उसमें आंतरिक शक्ति का विकास होता है। जैसे गंदा नाला जी गंगा में जाकर गंगा का रूप हो जाता है, उसी प्रकार गायत्री मंत्र हमारे शरीर का कायाकल्प कर देता है। गायत्री का जप कभी निरर्थक नहीं जाता, बीज रूप में विद्यमान रहता है। और समय पाकर पल्लवित पुष्पित और फलित होता है।
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गायत्री साधक की साधना के निम्न लक्षण हो सकते हैं, जिससे गायत्री साधक की साधना सिद्धि की परख की जा सकती है:-

१:- शरीर में हल्का बना और मन में उत्साह पैदा हो जाता है। २:- शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगंध आने लगती है।
 ३:- त्वचा पर चिकनाई और कोमलता बढ़ जाती है।
 ४: --तामसिक आहार-विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विक आहार-विहार की ओर मन लगने लगता है।
५:-स्वार्थ का कम और परमार्थ का ध्यान ज्यादा रहने लगता है।
६:-नेत्रों में तेज झलक नहीं लगता है।
७:-किसी भी व्यक्ति या कार्य के विषय में विचार करने पर उसके संबंध में बहुत सारी जानकारी स्वयं ही प्रगट होने लगती है जो परीक्षा करने पर सही निकलती है।
८:- दूसरों के मन के भाव और विचार जान लेने में देर नहीं लगती।
९:-भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास मिलने लगता है।
१०:- श्राप और आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है।
गायत्री साधना करने वालों को अनेक प्रकार की अलौकिक शक्तियों के आभास होते हैं क्योंकि यह एक विशेष प्रकार का श्रेष्ठ साधन है, साधना है, जो लाभ अन्य साधनों से होते हैं यह सभी गायत्री साधना से मिल सकते हैं। आत्मविश्वास श्रद्धा विश्वास और विनय के साथ कुछ दिनों तक उपासना करने से अतुल शक्ति की मात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती है। आत्मा की मैल छूटने लगते हैं, निर्मलता बढ़ जाती है, और आत्मा अपने असली रूप में प्रकट होने लगती है। श्रद्धा पूर्वक गायत्री साधना करने से निम्न विशेषताएं प्रकट होती हैं।
Gayatri mahima


१:- गायत्री साधना करने वालों का व्यक्तित्व आकर्षक नेत्रों में चमक, वाणी में बल, चेहरे पर प्रतिभा और गंभीरता और स्थिरता प्रकट होने लगती है। जिससे दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। जो भी व्यक्ति उसके उनके संपर्क में आ जाते हैं विभिन्न में उनसे काफी प्रभावित हो जाते हैं। और उनकी इच्छा अनुसार आचरण करते हैं।
२:- साधक को अपने अंदर एक दैवीय तेज की उपस्थिति प्रतीत होती है। वह अनुभव करता है कि, उसके अंदर अंतः करण में कोई नई शक्ति काम कर रही है।
३:- बुरे कामों से उसकी रुचि हटती जाती है और भले कामों में मन लगता है। यदि कोई गलत कार्य हो जाता है तो उसके लिए बड़ा खेद और पश्चाताप होता है। सुख के समय अधिक आनंद का ना होना और दुख और कठिनाइयों में आपत्ति में धैर्य ना खोना उसकी विशेषता होती है।
४:-भविष्य में होने वाली घटनाओं का अंदाजा उसे मन में पहले से ही होने लगता है शुरुआत में कुछ-कुछ का सही अंदाजा होता है। किंतु धीरे-धीरे भविष्य ज्ञान बिल्कुल सही होने लगता है।
५:- उसके श्राप और आशीर्वाद फलित होते हैं।यदि वह अंतरात्मा से दुखी होकर किसी को श्राप देता है तो उस व्यक्ति पर भारी विपत्तियां आती है। और प्रसन्न होकर जिसे वह सच्चे अंतः करण से आशीर्वाद देता है उसका मंगल होता है उसके आशीर्वाद भी फल  देते हैं।
६:- वह दूसरे के मनोभावों को देखते ही पहचान लेता है कोई व्यक्ति कितना ही छिपाते है उसके सामने उसके भाव छुपते नहीं है। वह किसी के भी गुण, दोष, विचार, आचरण को पारदर्शी की तरह से देख सकता है।

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गायत्री साधक की साधना के  लक्षण :-


१:- शरीर में हल्का बना और मन में उत्साह पैदा हो जाता है। २:- शरीर में से एक विशेष प्रकार की सुगंध आने लगती है।
 ३:- त्वचा पर चिकनाई और कोमलता बढ़ जाती है।
 ४: --तामसिक आहार-विहार से घृणा बढ़ जाती है और सात्विक आहार-विहार की ओर मन लगने लगता है।
५:-स्वार्थ का कम और परमार्थ का ध्यान ज्यादा रहने लगता है।
६:-नेत्रों में तेज झलक नहीं लगता है।
७:-किसी भी व्यक्ति या कार्य के विषय में विचार करने पर उसके संबंध में बहुत सारी जानकारी स्वयं ही प्रगट होने लगती है जो परीक्षा करने पर सही निकलती है।
८:- दूसरों के मन के भाव और विचार जान लेने में देर नहीं लगती।
९:-भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास मिलने लगता है।
१०:- श्राप और आशीर्वाद सफल होने लगते हैं। अपनी गुप्त शक्तियों से वह दूसरों का बहुत कुछ लाभ या बुरा कर सकता है।
गायत्री साधना करने वालों को अनेक प्रकार की अलौकिक शक्तियों के आभास होते हैं क्योंकि यह एक विशेष प्रकार का श्रेष्ठ साधन है, साधना है, जो लाभ अन्य साधनों से होते हैं यह सभी गायत्री साधना से मिल सकते हैं। आत्मविश्वास श्रद्धा विश्वास और विनय के साथ कुछ दिनों तक उपासना करने से अतुल शक्ति की मात्रा दिन-ब-दिन बढ़ती है। आत्मा की मैल छूटने लगते हैं, निर्मलता बढ़ जाती है, और आत्मा अपने असली रूप में प्रकट होने लगती है। श्रद्धा पूर्वक गायत्री साधना करने से निम्न विशेषताएं प्रकट होती हैं।
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१:- गायत्री साधना करने वालों का व्यक्तित्व आकर्षक नेत्रों में चमक, वाणी में बल, चेहरे पर प्रतिभा और गंभीरता और स्थिरता प्रकट होने लगती है। जिससे दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। जो भी व्यक्ति उसके उनके संपर्क में आ जाते हैं विभिन्न में उनसे काफी प्रभावित हो जाते हैं। और उनकी इच्छा अनुसार आचरण करते हैं।
२:- साधक को अपने अंदर एक दैवीय तेज की उपस्थिति प्रतीत होती है। वह अनुभव करता है कि, उसके अंदर अंतः करण में कोई नई शक्ति काम कर रही है।
३:- बुरे कामों से उसकी रुचि हटती जाती है और भले कामों में मन लगता है। यदि कोई गलत कार्य हो जाता है तो उसके लिए बड़ा खेद और पश्चाताप होता है। सुख के समय अधिक आनंद का ना होना और दुख और कठिनाइयों में आपत्ति में धैर्य ना खोना उसकी विशेषता होती है।
४:-भविष्य में होने वाली घटनाओं का अंदाजा उसे मन में पहले से ही होने लगता है शुरुआत में कुछ-कुछ का सही अंदाजा होता है। किंतु धीरे-धीरे भविष्य ज्ञान बिल्कुल सही होने लगता है।
५:- उसके श्राप और आशीर्वाद फलित होते हैं।यदि वह अंतरात्मा से दुखी होकर किसी को श्राप देता है तो उस व्यक्ति पर भारी विपत्तियां आती है। और प्रसन्न होकर जिसे वह सच्चे अंतः करण से आशीर्वाद देता है उसका मंगल होता है उसके आशीर्वाद भी फल  देते हैं।
६:- वह दूसरे के मनोभावों को देखते ही पहचान लेता है कोई व्यक्ति कितना ही छिपाते है उसके सामने उसके भाव छुपते नहीं है। वह किसी के भी गुण, दोष, विचार, आचरण को पारदर्शी की तरह से देख सकता है।

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गायत्री मंत्र क्यों सिध्द नहीं होते ? :-

माधवाचार्य गायत्री उपासक थे। वृंदावन मे उन्होंने 13 वर्ष तक गायत्री अनुष्ठान विधिपूर्वक किये, लेकिन उन्हे इससे लाभ नही दिखा, वो निराश हो कर काशी चले गये। वहां देवदास बैठे हुए थे तभी उन्हें एक आवधूत मिला जिसने पूजा यहां पर उदास क्यों बैठे हो तब माधवाचार्य जी ने अपनी बातों को बताया। उस अवधूत ने कहा मुझे तो गायत्री उपासना के बारे में नहीं मालूम लेकिन उपासना का फल मिलता है । आप 1 वर्ष तक काल भैरव की उपासना करके देख सकते । तब माधवाचार्य जी ने  एक वर्ष से अधिक ही कालभैरव की आराधना की। एक दिन उन्होंने आवाज सुनी मै प्रस्ंन्न हूं। वरदान मांगो । उन्हें लगा कि ये उनका भ्रम हे क्योंकि सिर्फ आवाज सुनायी दे रही थी कोइ दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन वही आवाज फिर से उन्हें तीन बार सुनायी दी तब माधवाचार्य जी ने कहा आप सामने आ कर अपना परिचय दे।  सामने से आवाज आयी तूं जिसकी उपासना कर रहा है वो मै ही काल भैरव हूँ । माधवाचार्य जी ने कहा तो फिर आप प्रगट क्यो नहीं हो रहे है। काल भैरव जी ने कहा माधवाचार्य तुमने 13 वर्षों तक गायत्री मंत्रों का  जप किया है, उसके तेज को मै सहन नहीं कर सकता हूँ । इसीलिए  प्रगट नहीं हो सकता हूँ। माध्वाचार्य ने कहा जब आप उस तेज का सामना नहीं कर सकते है तब आप मेरे किसी काम के नहीं आप वापस जा सकते है। लेकिन मै तुम्हारा समाधान किये बिना नहीं जा सकता हूं। तब फिर ये बताइये कि मेने पिछले तेरह वर्षों से जो गायत्री अनुष्ठान किया वह क्यों फलित क्यो नही  हुआ। काल भैरव ने कहा आपके अनुष्ठान निष्फल नहीं हुए है उससे तुम्हारे कई जन्मो के पाप नष्ट हुए है। तो अब मै क्या करू? तुम फिर से वृंदावन जा कर और एक वर्ष गायत्री का अनुष्ठान करो इस से इस जन्म के भी पाप नष्ट हो जायेंगे। फिर गायत्री मां प्रसन्न होगी।
 अलग रुपों मे ये मंत्र जप, जाप और कर्म कांड तुम्हें हमे देखने की शक्ति, सिध्दि देते है । जिन्हें आप साक्षात्कार कहते हो ।माधवाचार्य वृंदावन लौट गए ,और फिर से अनुष्ठान शुरु किया। एक दिन बृह्म मूहुर्त मे अनुष्ठान मे बैठने ही वाले थे कि उन्होंने आवाज सुनी मै आ गयी हूँ ।माधव वरदान मांगो। मां माधवाचार्य फूटफूटकर रोने लगे मां पहले बहुत लालसा थी कि वरदान मांगू लेकिन अब् कुछ मांगने की इच्छा रही नही। मां आप जो मिल गयी हो माधव तुम्हें मांगना तो पडेगा ही। मां ये देह,शरीर भले ही नष्ट हो जाये लेकिन इस शरीर से की गयी भक्ति अमर रहे। इस भक्ति की आप सदैव साक्षी रहो। यही वरदान दो ।तथास्तु। आगे तीन वर्षों मै माधवाचार्य जी नै माधवनिदान नाम की  पुस्तक लिखी । याद रखिये आपके द्वारा शुरू किये गये मंत्र जाप पहले दिन से ही काम करना शुरू कर देतै है। लेकिन सबसे पापों को नष्ट करते है । जैसे ही ये पाप नष्ट होते है ,आपको एक आलौकिक तेज एक आध्यायात्मिक शक्ति और सिध्दि प्राप्त होने लगती है ।
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 प्रार्थना

*" हे प्रभु जाने -अनजाने हमसे या हमारे पूर्वजों से जो कुछ अपराध हुए हो। उनको क्षमा करे। हमारी दैहिक दैविक भौतिक आध्यात्मिक और आर्थिक स्थिति सुधारे। हमारे परिवार को स्वस्थ रखे। हमे शाप और ऋण से मुक्त करें"*

*रात को सोने के पहले बिस्तर पर और सो कर उठते समय बिस्तर पर ही प्रार्थना करे। फिर गायत्री मंत्र,संजीवनी महामृत्युंजय मंत्र,विष्णु गायत्री मंत्रों को तीन बार पढ़े! *


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        *!!संजीवनी महामृत्युंजय!!*

*ऊँ तत्सवितुर्वरेण्यं त्रयंम्बकंयजामहे भर्गोदेवस्य धीमहि सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् धियो यो नः प्रचोदयात् ऊर्वारूकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !! !!*

इस इस संजीवनी महामृत्युंजय गायत्री मंत्र के जपने से सभी लोगो कष्ट कारी भव बंधन कटते हैं और र्दीर्घजीवी होते हैं!! !!
        
            

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गायत्री की दैनिक साधनाएं

श्रद्धा पूर्वक इस मंत्र की उपासना करने पर
मनुष्य तेजस्वी और विवेक शील बनता है। 

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  • साधारणतः जप में प्रतिदिन का नियम यह होना चाहिये
कि कम से कम एक माला का नित्य किया
जाय।
  •  जप के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है। 
  • शौच स्नान से निवृत्त होकर कुश के आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठना चाहिये। 
  • धोती के अतिरिक्त शरीर पर और कोई वस्त्र न रहे। 
  • ऋतु अनुकूल न हो तो कम्बल या चादरओढ़ा जा सकता है। 
  • जल का एक छोटा पात्र पास में रखकर शान्त चित्त से जप करना चाहिये। 
  • होठ हिलते रहें,कंठ से उच्चारण भी होता रहे परन्तु शब्द इतने मन्द स्वरमें रहे कि पास बैठा हुआ मनुष्य भी उन्हें न सुन सके।
  • तात्पर्य यह है कि जप चुपचाप भी हो और कंठ ओष्ठ तथा जिह्वा को भी कार्य करना पड़े।
  •  शान्त चित्त सेएकाग्रता पूर्वक जप करना चाहिए। 
  • मस्तिष्क में त्रिकुटी स्थान पर सूर्य जैसे तेजस्वी प्रकाश का ध्यान करना चाहिये।
  • और भावना करनी चाहिये कि उस प्रकाश की तेजस्वी किरणें मेरे मस्तिष्क तथा समस्त शरीर को एक दिव्य विद्युत शक्ति से भरे दे रही हैं। 
  • जप और ध्यान साथ साथ आसानी से हो सकते हैं। आरम्भ में कुछ ऐसी कठिनाईआती है कि जप के कारण ध्यान टूटता है और ध्यान कीतल्लीनता से जप में विक्षेप पड़ता है यह कठिनाई कुछदिनों के अभ्यास से दूर हो जाती है।
  • गायत्री वेद मन्त्र है। वेद का उच्चारण अशुद्ध स्थान पर अपवित्र अवस्था में करना निषिद्ध है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि पवित्र होकर ही जप किया जाय।
  • स्नान यदि संभव न हो तो हाथ पैर मुंह अवश्य ही धो लेने चाहिये। कपड़े धुले हुए न हों तो धोती को छोड़कर अन्यवस्त्र उतार देने चाहिए। जप के लिए यदि कुश का आसनन हो तो चौकी आदि लकड़ी की किसी चीज का प्रयोगकिया जा सकता है। 
  • ऊनी आसन भी किसी हद तक ठीकहै। रेशम मृगछाला आदि के आसन भी वैसे शास्त्र सम्मतहैं परन्तु इनमें जीव हिंसा होती है इस लिये जहां तक होसके चमड़े के आसन काम में न लाने चाहिये।
  •  कपड़े पर या जमीन पर बैठकर जप नही करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से जप के द्वारा प्राप्त हुई शक्ति जमीन में  चली जाती है। 
  • रोग में अशुद्ध अवस्था में आकस्मिक आपत्ति में जब मन्त्र जप की आवश्यकता हो तो मन ही मन जप करना चाहिए कंठ,ओष्ठ या जिह्वा का जरा भी प्रयोग न होना चाहिए। इसप्रकार का जप रास्ता चलते काम करते या बिस्तर पर पड़ेपड़े भी किया जा सकता है। ऐसे जप में माला का प्रयोगन करना चाहिए।
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उपरोक्त रीति से नित्य जप करना चाहिये। इससे शरीर का
स्वास्थ्य ठीक रहता है। रक्त की शुद्धि और बल वीर्य की
वृद्धि होती है। चेहरे की चमक बढ़ जाती है। वाणी मे 
प्रभाव डालने वाली शक्ति बढ़ने लगती है.
स्मरण शक्ति तीव्र होती है सही और झूठ को समझने वाली विवेक -बुद्धि का विकास होता है, धैर्य और साहस बढ़ता है, चित्त-मन
में प्रसन्नता और शान्ति रहती है ईश्वर और धर्म की ओर
मन झुकने लगता है व्यसन व्यभिचार और दुष्कर्मों से घृणा
होने लगती है। यह लाभ पूर्णतया निश्चित हैं। हमने अब
तक अनेक व्यक्तियों को गायत्री का जप सिखाया है उन
सब का अनुभव है कि इन नियमों के साथ कुछ दिन
लगातार श्रद्धा पूर्वक जप करने से उपरोक्त सभी लाभ
प्राप्त होते हैं।
यह दैनिक जप का साधारण क्रम है। आधा घण्टा समय
नित्य लगाकर उपरोक्त रीति से गायत्री के कम से कम
108 मंत्र आसानी से जपे जा सकते हैं। जिन्हें वह मन्त्र
सिद्धि करना हो वे सवालक्ष गायत्री का विधि पूर्वक जप
करके उसे सिद्ध कर सकते हैं। इस सिद्धि से ऐसी अद्भुत
शक्तियां प्राप्त होती हैं जिनकी शक्ति की कोई तुलना नहीं।
मन्त्र शास्त्र के समस्त मन्त्रों से गायत्री का बल अनेक गुना
है। जो कार्य किसी मन्त्र अन्य से होता है वह गायत्री से भी
अवश्य हो सकता है।

गायत्री महामंत्र की विलक्षण शक्ति


गायत्री महामंत्र के जप से उत्पन्न पराध्वनि सारे वातावरण
के परमाणुओं को कँपा देने की शक्ति से ओत-प्रोत है। इस
महामंत्र की अपार शक्ति का लाभ कोई भी उठा सकता है।
शर्त एक ही है कि वह उन शिक्षाओं पर, उस आचरण पर
भी चले, जिसका इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में संकेत
है। उन आदर्शों पर चले बिना उल्लेखनीय सफलता के द्वार
अवरुद्ध ही पड़े रहेंगे। गायत्री महामंत्र के जप द्वारा ऐसी
चेतन शक्ति का उद्भव होता है, जो जपकर्ता के शरीर एवं
मन में विचित्र प्रकार की हलचलें उत्पन्न करती है और
अनंत आकाश में उड़कर विशिष्ट व्यक्तियों को, विशेष
परिस्थितियों को तथा समूचे वातावरण को प्रभावित करती
है। मंत्र का लाभ वे ही उठा सकते हैं, जिन्होंने व्यक्तित्व को
भीतर और बाहर से, विचार और आचार से परिष्कृत कर
लिया हो। साधक का अंत:करण और व्यक्तित्व जितना निर्मल
होगा, उपासना उतनी ही सफल होगी।
Gayatri mahavigyaan


परिवार में आस्तिकता का वातावरण बनायें।

*************
माता-पिता का आचरण-व्यवहार एवं घर का
वातावरण बच्चे को सहज ही आस्तिक जीवन की ओर प्रेरित करता है । अच्छी और बुरी बातें सीखता है। यदि
इनमें श्रेष्ठता एवं उदारता का समावेश है तो बच्चों का
बेहतरीन विकास होता है और यदि हम निकृष्ट एवं तनाव
भरा वातावरण देते हैं तो बालक का विकास कुंठित एवं
सामान्य होता है, जिसका खामियाजा संतान जीवनपर्यंत
भुगतने के लिए अभिशप्त होती है। परिवारजनों की
समझदारी पीढ़ियों को इस अभिशाप से मुक्त रखने में
सहायता कर सकती है। यह कार्य विद्यालयों के भरोसे नहीं छोड सकते है। ऐसा कुछ उपलब्ध
भी है तो इसे आज के युग में एक वरदान ही माना जाएगा।
परिवार में आस्तिकता का वातावरण महत्वपूर्ण है। सुबह-
शाम पूजा-पाठ, आरती आदि का नित्यक्रम एक दिव्य
वातावरण निर्माण करता है। यदि यह क्रियाएं सामूहिक हो
तो और भी अच्छा है। गायत्री परिवार के लिए तो गायत्री-
उपासना का वरदान सहज रूप में उपलब्ध है। इसके साथ
गायत्री मंत्र लेखन या मंत्रों के उच्चारण के साथ भोजन,
अध्ययन, शयन-जागरण यात्रा आदि क्रियाएं अपना
प्रभाव डालती है। इसी तरह साप्ताहिक यज्ञों का
आयोजन घर में किया जा सकता है, जो परिवेश की शुद्धि
के लिए सभी के साथ वातावरण में सात्विकता का
समावेश करता है। साथ ही यह प्रतिभागियों में संस्कारों के
रोपण की एक ऋषिप्रणीत समर्थ विधा है। इसके साथ
उपयुक्त अवसर पर किए गए संस्कारों का अपना महत्व है,
जो गायत्री परिवार के सदस्यों के लिए सहज-स्वाभाविक
है। इनमें घर-परिवार के सदस्यों के साथ पड़ोस के बच्चों
को भी शामिल किया जा सकता है। बच्चों को अच्छी
शिक्षा के साथ संस्कारवान भी बनाना है- यह माता-पिता
एवं अभिभावकों की प्राथमिकता में होनी चाहिए। इसे
भाग्य के भरोसे या परिस्थितियों के हवाले नहीं छोड़ा जा
सकता। इसके लिए सजग एवं सुनियोजित प्रयास की
आवश्यकता है।

गायत्री की दैनिक साधनाएं

श्रद्धा पूर्वक इस मंत्र की उपासना करने पर
मनुष्य तेजस्वी और विवेक शील बनता है। 

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  • साधारणतः जप में प्रतिदिन का नियम यह होना चाहिये
कि कम से कम एक माला का नित्य किया
जाय।
  •  जप के लिए सूर्योदय का समय सर्वश्रेष्ठ है। 
  • शौच स्नान से निवृत्त होकर कुश के आसन पर पूर्वाभिमुख होकर बैठना चाहिये। 
  • धोती के अतिरिक्त शरीर पर और कोई वस्त्र न रहे। 
  • ऋतु अनुकूल न हो तो कम्बल या चादरओढ़ा जा सकता है। 
  • जल का एक छोटा पात्र पास में रखकर शान्त चित्त से जप करना चाहिये। 
  • होठ हिलते रहें,कंठ से उच्चारण भी होता रहे परन्तु शब्द इतने मन्द स्वरमें रहे कि पास बैठा हुआ मनुष्य भी उन्हें न सुन सके।
  • तात्पर्य यह है कि जप चुपचाप भी हो और कंठ ओष्ठ तथा जिह्वा को भी कार्य करना पड़े।
  •  शान्त चित्त सेएकाग्रता पूर्वक जप करना चाहिए। 
  • मस्तिष्क में त्रिकुटी स्थान पर सूर्य जैसे तेजस्वी प्रकाश का ध्यान करना चाहिये।
  • और भावना करनी चाहिये कि उस प्रकाश की तेजस्वी किरणें मेरे मस्तिष्क तथा समस्त शरीर को एक दिव्य विद्युत शक्ति से भरे दे रही हैं। 
  • जप और ध्यान साथ साथ आसानी से हो सकते हैं। आरम्भ में कुछ ऐसी कठिनाईआती है कि जप के कारण ध्यान टूटता है और ध्यान कीतल्लीनता से जप में विक्षेप पड़ता है यह कठिनाई कुछदिनों के अभ्यास से दूर हो जाती है।
  • गायत्री वेद मन्त्र है। वेद का उच्चारण अशुद्ध स्थान पर अपवित्र अवस्था में करना निषिद्ध है। इसलिए इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि पवित्र होकर ही जप किया जाय।
  • स्नान यदि संभव न हो तो हाथ पैर मुंह अवश्य ही धो लेने चाहिये। कपड़े धुले हुए न हों तो धोती को छोड़कर अन्यवस्त्र उतार देने चाहिए। जप के लिए यदि कुश का आसनन हो तो चौकी आदि लकड़ी की किसी चीज का प्रयोगकिया जा सकता है। 
  • ऊनी आसन भी किसी हद तक ठीकहै। रेशम मृगछाला आदि के आसन भी वैसे शास्त्र सम्मतहैं परन्तु इनमें जीव हिंसा होती है इस लिये जहां तक होसके चमड़े के आसन काम में न लाने चाहिये।
  •  कपड़े पर या जमीन पर बैठकर जप नही करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से जप के द्वारा प्राप्त हुई शक्ति जमीन में  चली जाती है। 
  • रोग में अशुद्ध अवस्था में आकस्मिक आपत्ति में जब मन्त्र जप की आवश्यकता हो तो मन ही मन जप करना चाहिए कंठ,ओष्ठ या जिह्वा का जरा भी प्रयोग न होना चाहिए। इसप्रकार का जप रास्ता चलते काम करते या बिस्तर पर पड़ेपड़े भी किया जा सकता है। ऐसे जप में माला का प्रयोगन करना चाहिए।
Gayatri mahavigyaan


उपरोक्त रीति से नित्य जप करना चाहिये। इससे शरीर का
स्वास्थ्य ठीक रहता है। रक्त की शुद्धि और बल वीर्य की
वृद्धि होती है। चेहरे की चमक बढ़ जाती है। वाणी मे 
प्रभाव डालने वाली शक्ति बढ़ने लगती है.
स्मरण शक्ति तीव्र होती है सही और झूठ को समझने वाली विवेक -बुद्धि का विकास होता है, धैर्य और साहस बढ़ता है, चित्त-मन
में प्रसन्नता और शान्ति रहती है ईश्वर और धर्म की ओर
मन झुकने लगता है व्यसन व्यभिचार और दुष्कर्मों से घृणा
होने लगती है। यह लाभ पूर्णतया निश्चित हैं। हमने अब
तक अनेक व्यक्तियों को गायत्री का जप सिखाया है उन
सब का अनुभव है कि इन नियमों के साथ कुछ दिन
लगातार श्रद्धा पूर्वक जप करने से उपरोक्त सभी लाभ
प्राप्त होते हैं।
यह दैनिक जप का साधारण क्रम है। आधा घण्टा समय
नित्य लगाकर उपरोक्त रीति से गायत्री के कम से कम
108 मंत्र आसानी से जपे जा सकते हैं। जिन्हें वह मन्त्र
सिद्धि करना हो वे सवालक्ष गायत्री का विधि पूर्वक जप
करके उसे सिद्ध कर सकते हैं। इस सिद्धि से ऐसी अद्भुत
शक्तियां प्राप्त होती हैं जिनकी शक्ति की कोई तुलना नहीं।
मन्त्र शास्त्र के समस्त मन्त्रों से गायत्री का बल अनेक गुना
है। जो कार्य किसी मन्त्र अन्य से होता है वह गायत्री से भी
अवश्य हो सकता है।


 गायत्री महामंत्र की विलक्षण शक्ति


गायत्री महामंत्र के जप से उत्पन्न पराध्वनि सारे वातावरण
के परमाणुओं को कँपा देने की शक्ति से ओत-प्रोत है। इस
महामंत्र की अपार शक्ति का लाभ कोई भी उठा सकता है।
शर्त एक ही है कि वह उन शिक्षाओं पर, उस आचरण पर
भी चले, जिसका इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में संकेत
है। उन आदर्शों पर चले बिना उल्लेखनीय सफलता के द्वार
अवरुद्ध ही पड़े रहेंगे। गायत्री महामंत्र के जप द्वारा ऐसी
चेतन शक्ति का उद्भव होता है, जो जपकर्ता के शरीर एवं
मन में विचित्र प्रकार की हलचलें उत्पन्न करती है और
अनंत आकाश में उड़कर विशिष्ट व्यक्तियों को, विशेष
परिस्थितियों को तथा समूचे वातावरण को प्रभावित करती
है। मंत्र का लाभ वे ही उठा सकते हैं, जिन्होंने व्यक्तित्व को
भीतर और बाहर से, विचार और आचार से परिष्कृत कर
लिया हो। साधक का अंत:करण और व्यक्तित्व जितना निर्मल
होगा, उपासना उतनी ही सफल होगी।
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परिवार में आस्तिकता का वातावरण बनायें।

*************
माता-पिता का आचरण-व्यवहार एवं घर का
वातावरण बच्चे को सहज ही आस्तिक जीवन की ओर प्रेरित करता है । अच्छी और बुरी बातें सीखता है। यदि
इनमें श्रेष्ठता एवं उदारता का समावेश है तो बच्चों का
बेहतरीन विकास होता है और यदि हम निकृष्ट एवं तनाव
भरा वातावरण देते हैं तो बालक का विकास कुंठित एवं
सामान्य होता है, जिसका खामियाजा संतान जीवनपर्यंत
भुगतने के लिए अभिशप्त होती है। परिवारजनों की
समझदारी पीढ़ियों को इस अभिशाप से मुक्त रखने में
सहायता कर सकती है। यह कार्य विद्यालयों के भरोसे नहीं छोड सकते है। ऐसा कुछ उपलब्ध
भी है तो इसे आज के युग में एक वरदान ही माना जाएगा।
परिवार में आस्तिकता का वातावरण महत्वपूर्ण है। सुबह-
शाम पूजा-पाठ, आरती आदि का नित्यक्रम एक दिव्य
वातावरण निर्माण करता है। यदि यह क्रियाएं सामूहिक हो
तो और भी अच्छा है। गायत्री परिवार के लिए तो गायत्री-
उपासना का वरदान सहज रूप में उपलब्ध है। इसके साथ
गायत्री मंत्र लेखन या मंत्रों के उच्चारण के साथ भोजन,
अध्ययन, शयन-जागरण यात्रा आदि क्रियाएं अपना
प्रभाव डालती है। इसी तरह साप्ताहिक यज्ञों का
आयोजन घर में किया जा सकता है, जो परिवेश की शुद्धि
के लिए सभी के साथ वातावरण में सात्विकता का
समावेश करता है। साथ ही यह प्रतिभागियों में संस्कारों के
रोपण की एक ऋषिप्रणीत समर्थ विधा है। इसके साथ
उपयुक्त अवसर पर किए गए संस्कारों का अपना महत्व है,
जो गायत्री परिवार के सदस्यों के लिए सहज-स्वाभाविक
है। इनमें घर-परिवार के सदस्यों के साथ पड़ोस के बच्चों
को भी शामिल किया जा सकता है। बच्चों को अच्छी
शिक्षा के साथ संस्कारवान भी बनाना है- यह माता-पिता
एवं अभिभावकों की प्राथमिकता में होनी चाहिए। इसे
भाग्य के भरोसे या परिस्थितियों के हवाले नहीं छोड़ा जा
सकता। इसके लिए सजग एवं सुनियोजित प्रयास की
आवश्यकता है।

गायत्री मंत्र क्यों सिध्द नहीं होते ? :-

माधवाचार्य गायत्री उपासक थे। वृंदावन मे उन्होंने 13 वर्ष तक गायत्री अनुष्ठान विधिपूर्वक किये, लेकिन उन्हे इससे लाभ नही दिखा, वो निराश हो कर काशी चले गये। वहां देवदास बैठे हुए थे तभी उन्हें एक आवधूत मिला जिसने पूजा यहां पर उदास क्यों बैठे हो तब माधवाचार्य जी ने अपनी बातों को बताया। उस अवधूत ने कहा मुझे तो गायत्री उपासना के बारे में नहीं मालूम लेकिन उपासना का फल मिलता है । आप 1 वर्ष तक काल भैरव की उपासना करके देख सकते । तब माधवाचार्य जी ने  एक वर्ष से अधिक ही कालभैरव की आराधना की। एक दिन उन्होंने आवाज सुनी मै प्रस्ंन्न हूं। वरदान मांगो । उन्हें लगा कि ये उनका भ्रम हे क्योंकि सिर्फ आवाज सुनायी दे रही थी कोइ दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन वही आवाज फिर से उन्हें तीन बार सुनायी दी तब माधवाचार्य जी ने कहा आप सामने आ कर अपना परिचय दे।  सामने से आवाज आयी तूं जिसकी उपासना कर रहा है वो मै ही काल भैरव हूँ । माधवाचार्य जी ने कहा तो फिर आप प्रगट क्यो नहीं हो रहे है। काल भैरव जी ने कहा माधवाचार्य तुमने 13 वर्षों तक गायत्री मंत्रों का  जप किया है, उसके तेज को मै सहन नहीं कर सकता हूँ । इसीलिए  प्रगट नहीं हो सकता हूँ। माध्वाचार्य ने कहा जब आप उस तेज का सामना नहीं कर सकते है तब आप मेरे किसी काम के नहीं आप वापस जा सकते है। लेकिन मै तुम्हारा समाधान किये बिना नहीं जा सकता हूं। तब फिर ये बताइये कि मेने पिछले तेरह वर्षों से जो गायत्री अनुष्ठान किया वह क्यों फलित क्यो नही  हुआ। काल भैरव ने कहा आपके अनुष्ठान निष्फल नहीं हुए है उससे तुम्हारे कई जन्मो के पाप नष्ट हुए है। तो अब मै क्या करू? तुम फिर से वृंदावन जा कर और एक वर्ष गायत्री का अनुष्ठान करो इस से इस जन्म के भी पाप नष्ट हो जायेंगे। फिर गायत्री मां प्रसन्न होगी।
 अलग रुपों मे ये मंत्र जप, जाप और कर्म कांड तुम्हें हमे देखने की शक्ति, सिध्दि देते है । जिन्हें आप साक्षात्कार कहते हो ।माधवाचार्य वृंदावन लौट गए ,और फिर से अनुष्ठान शुरु किया। एक दिन बृह्म मूहुर्त मे अनुष्ठान मे बैठने ही वाले थे कि उन्होंने आवाज सुनी मै आ गयी हूँ ।माधव वरदान मांगो। मां माधवाचार्य फूटफूटकर रोने लगे मां पहले बहुत लालसा थी कि वरदान मांगू लेकिन अब् कुछ मांगने की इच्छा रही नही। मां आप जो मिल गयी हो माधव तुम्हें मांगना तो पडेगा ही। मां ये देह,शरीर भले ही नष्ट हो जाये लेकिन इस शरीर से की गयी भक्ति अमर रहे। इस भक्ति की आप सदैव साक्षी रहो। यही वरदान दो ।तथास्तु। आगे तीन वर्षों मै माधवाचार्य जी नै माधवनिदान नाम की  पुस्तक लिखी । याद रखिये आपके द्वारा शुरू किये गये मंत्र जाप पहले दिन से ही काम करना शुरू कर देतै है। लेकिन सबसे पापों को नष्ट करते है । जैसे ही ये पाप नष्ट होते है ,आपको एक आलौकिक तेज एक आध्यायात्मिक शक्ति और सिध्दि प्राप्त होने लगती है ।
Gayatri mahima


 प्रार्थना

*" हे प्रभु जाने -अनजाने हमसे या हमारे पूर्वजों से जो कुछ अपराध हुए हो। उनको क्षमा करे। हमारी दैहिक दैविक भौतिक आध्यात्मिक और आर्थिक स्थिति सुधारे। हमारे परिवार को स्वस्थ रखे। हमे शाप और ऋण से मुक्त करें"*

*रात को सोने के पहले बिस्तर पर और सो कर उठते समय बिस्तर पर ही प्रार्थना करे। फिर गायत्री मंत्र,संजीवनी महामृत्युंजय मंत्र,विष्णु गायत्री मंत्रों को तीन बार पढ़े! *


Gayatri mahavigyaan


                
        *!!संजीवनी महामृत्युंजय!!*

*ऊँ तत्सवितुर्वरेण्यं त्रयंम्बकंयजामहे भर्गोदेवस्य धीमहि सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम् धियो यो नः प्रचोदयात् ऊर्वारूकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् !! !!*

इस इस संजीवनी महामृत्युंजय गायत्री मंत्र के जपने से सभी लोगो कष्ट कारी भव बंधन कटते हैं और र्दीर्घजीवी होते हैं!! !!
        
            

Gayatri mahavigyaan

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