प्रेरणादायक कहानियां भाग 26 prernadayak kahaniyan part 26






💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 126 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐गुरु – शिष्य💐💐*


एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा- ‘गुरु जी,कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं | इनमें कौन सही है?’

गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-

पुत्र,जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं|

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था| गुरु जी को इसका आभास हो गया |वे कहने लगे-‘लो, तुम्हें इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ|ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे |’
उन्होंने जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-

एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे क्या चाहिए |गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |सूखी पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा |’

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अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा | वे सोच में पड़ गये कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया |वे उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे |


अब उस किसान ने उनसे क्षमायाचना करते हुए, उन्हें यह बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था | अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में उनकी कोई सहायता कर सके |

वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी|

पर भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया करती थी |अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये |गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो,ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया |गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये |हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं

’गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो ?प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो |’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये |


वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था,अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है |

गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र,मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना,सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके |

दूसरे,यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप,स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें |’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था |

*💐💐शिक्षा💐💐*

दोस्तों,यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी |सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है |वस्तुतः,हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है-ऐसा विद्वानों का मत है |

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 127 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐दिव्य दर्पण💐💐*


एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा से बहुत प्रभावित हुए । विद्या पूरी होने के बाद जब शिष्य विदा होने लगा तो गुरू ने उसे आशीर्वाद के रूप में एक "दर्पण" दिया... 

वह साधारण दर्पण नहीं था । उस दिव्य दर्पण में किसी भी व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी

शिष्य,गुरू जी के इस आशीर्वाद से बड़ा प्रसन्न था । उसने सोचा कि चलने से पहले क्यों ना दर्पण की क्षमता की जांच कर ली जाए....

परीक्षा लेने की जल्दबाजी में उसने दर्पण का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया.... 

शिष्य को तो सदमा लग गया । दर्पण यह दर्शा रहा था कि गुरुजी के हृदय में मोह, अहंकार, क्रोध आदि दुर्गुण स्पष्ट नजर आ रहे हैं.... 

मेरे आदर्श,मेरे गुरू जी इतने अवगुणों से भरे हैं , यह सोचकर वह बहुत दुखी हुआ. दुखी मन से वह दर्पण लेकर गुरुकुल से रवाना तो हो गया लेकिन रास्ते भर मन में एक ही बात चलती रही कि जिन गुरुजी को समस्त दुर्गुणों से रहित एक आदर्श पुरूष समझता था लेकिन दर्पण ने तो कुछ और ही बता दिया..... 
उसके हाथ में दूसरों को परखने का यंत्र आ गया था, इसलिए उसे जो मिलता उसकी परीक्षा ले लेता... 

उसने अपने कई इष्ट मित्रों तथा अन्य परिचितों के सामने दर्पण रखकर उनकी परीक्षा ली । सब के हृदय में कोई ना कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया.... 

जो भी अनुभव रहा सब दुखी करने वाला,वह सोचता जा रहा था कि संसार में सब इतने बुरे क्यों हो गए हैं , सब दोहरी मानसिकता वाले लोग हैं।

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जो दिखते हैं दरअसल वे हैं नहीं....
इन्हीं निराशा से भरे विचारों में डूबा दुखी मन से वह किसी तरह घर तक पहुंचा.... 
उसे अपने माता पिता का ध्यान आया । उसके पिता की तो समाज में बड़ी प्रतिष्ठा है । उसकी माता को तो लोग साक्षात देवतुल्य ही कहते हैं,इनकी परीक्षा की जाए

उसने उस दर्पण से माता पिता की भी परीक्षा कर ली...उनके हृदय में भी कोई ना कोई दुर्गुण देखा । ये भी कि दुर्गुणों से पूरी तरह मुक्त कोई नहीं है । संसार सारा मिथ्या पर चल रहा है.... 
अब उस के मन की बेचैनी सहन के बाहर हो चुकी थी, 
उसने दर्पण उठाया और चल दिया गुरुकुल की ओर.....

शीघ्रता से पहुंचा और सीधा जाकर अपने गुरूजी के सामने खड़ा हो गया... 

गुरुजी उसके मन की बेचैनी देखकर सारी बात का अंदाजा लगा चुके थे... 

शिष्य ने गुरुजी से विनम्रतापूर्वक कहा:- 
गुरुदेव,मैंने आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में तरह तरह के दोष हैं,कोई भी दोषरहित सज्जन मुझे अभी तक क्यों नहीं दिखा... 

क्षमा के साथ कहता हूं कि स्वयं आपमें और अपने माता पिता में मैंने दोषों का भंडार देखा । इससे मेरा मन बड़ा व्याकुल है... 

तब गुरुजी हंसे और उन्होंने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया....
शिष्य दंग रह गया.....
उसके मन के प्रत्येक कोने में राग-द्वेष, अहंकार, क्रोध जैसे दुर्गुण भरे पड़े थे, ऐसा कोई कोना ही न था जो निर्मल हो... 

गुरुजी बोले:- 
बेटा,यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था नाकि दूसरों के दुर्गुण खोजने के लिए... 
जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो.....अब तक तुम्हारा व्यक्तित्व बदल चुका होता... !!

*💐💐शिक्षा💐💐*

दोस्तों, जीवन मे दूसरों को सुधारने से पहले खुद को बदलना चाहिए ताकि समाज में बदलाव लाया जा सकें।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 128 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐जाग उठा परोपकार💐💐*


एक समय की बात है। नयासर गांव में राजू नामक एक व्यक्ति रहता था। गांव में आपसी भाईचारा और प्रेम बहुत था। इसलिए वहां के सभी समुदाय के लोग आपस में मिलजुल कर रहा करते थे।

राजू नामक व्यक्ति अधेड़ उम्र होने के कारण ‘चाचा नम्बरदार’ के नाम से पहचाने जाते थे। सभी उनका मान-सम्मान और आदर सत्कार किया करते थे।

उनका अपना मकान गांव की चौपाल पर छोटा-सा था। उसके अंदर आम का एक पुराना पेड़ था जिनके फल गांव के बच्चे, बूढ़े और जवान सभी खाया करते थे।

राजू चाचा का स्वभाव कुछ इस प्रकार का था कि वे बच्चों को कुछ ज्यादा ही प्यार किया करते थे।

राजू चाचा हर साल बरसात के मौसम में जब आम पक जाते थे, तो गांव के सभी बच्चों को विशेष तौर पर आम की दावत दिया करते थे।

किसी कारणवश पिछले दौ वर्षों से यह परंपरा टूट गई थी। बच्चे उनकी इस बात पर बहुत नाराज रहने लगे थे। परंतु वे कर कुछ नहीं सकते थे, क्योंकि राजू चाचा का रौब भी बच्चों पर कम नहीं था।

पहले साल तो बच्चे उनकी इस हरकत पर – कि चाचा ने एक बार उनको आम की दावत नहीं दी – आम की फसल बर्बाद कर गये।

लेकिन दूसरे साल जब आम के पेड़ पर बोर आया और आमिया छोटी-छोटी बनने लगी, तो बच्चों ने देखा कि चाचा राजू आज गांव में नहीं है। तब सब बच्चों ने मिलकर आम के पेड़ पर पथराव कर दिया। उनकी सारी आमिया झाड़ दी। आमिया उठा-उठाकर बच्चे अपने अपने घर ले गये। कुछ ने खायी और कुछ ने बर्बाद की।

राजू चाचा को जब इस बात का पता चला तो इन्हें गुस्सा तो बहुत आया, मगर वे अपने गुस्से को पी गये। किंतु फिर वे किसी अच्छे से मौके की तलाश में रहने लगे।

फिर तिसरे साल आम का मौसम आया। राजू चाचा ने अपने पेड़ के आमों के अलावा कुछ आम बाजार से भी मंगवाये और फिर गांव में ऐलान कर दिया- आज पूरे गांव के बच्चों की उनके घर पर आम की दावत है।

इस ऐलान को सुनकर बच्चे बड़े खुश हुए। लेकिन वे जितना खुश थे, उससे कहीं ज्यादा हैरान भी थे। उस दिन हल्की वर्षा हो रही थी।

कुछ बच्चे तो डर के मारे नहीं गये थे और कुछ इस डर के मारे चले गए थे कि कहीं चाचा उनके न जाने पर नाराज न हो जायें। फिर भी गांव के लगभग आधे से अधिक बच्चे चाचा राजू के घर आम की दावत पर उपस्थित हुए।

हल्की हल्की बारिश पड़ रही थी । ठंडी ठंडी हवा चल रही थी। बच्चे मजे लेकर आम खा रहे थे ।

जब आम समाप्त हो गए और बच्चे को अंगड़ाई आने लगी, तो अनायास ही एक बच्चे की नजर चाचा के घर के एक कोने की तरफ उठ गयी जहां छप्पर के नीचे एक बहुत बड़ा किसी वस्तु का ढ़ेर पुआल से ढका हुआ था। उस बच्चे ने यह बात अन्य बच्चों को इशारे से बतायी।

तब अंत में एक बच्चे ने डरते-डरते चाचा राजू से पूछ ही लिया- “चाचा जी, इस ढ़ेर में आपने किसके लिए क्या छुपा रखा है?”

राजू चाचा उसकी बात सुनकर खिलखिलाकर हंस पड़े और फिर उन्होंने अपनी पिछली गलती पर बच्चों के सामने पश्चाताप किया।

फिर वे बोले- “सुनो बच्चों… आम तो तुम्हें हर साल मिलेंगे ही, लेकिन अगर तुम मेरे मरने के बाद भी आम खाना चाहते हो तो मेरे पीछे आओ।” चाचा उठकर छप्पर पर बने ढ़ेर की ओर चल पड़े। बच्चे भी उनके पीछे-पीछे चल दिये।

चाचा ने ढ़ेर के ऊपर से पुआल हटाई और बच्चों से कहा- “बच्चों ! अपने दोनों हाथों में भरकर जितने भी आम ले जा सको, ले जाऔ।” बच्चों ने खुशी-खुशी ढ़ेर से आम उठाकर अपने दोनों हाथों में ले लिये।

उनकी खुशी को देखकर चाचा राजु की आंखों में आंसू छलक आये। वे बोले- “सुनो बच्चों ! अपने-अपने घर जाकर इन आमों को खाओ और इनकी गुठलियों को अपने-अपने घरों में और गांव भर में बो दो।”

“और आम के लिए कितने दिनों तक इंतजार करना होगा ?” बच्चों के बीच से एक धीमा स्वर उभरा। परंतु उस धीमे स्वर को चाचा राजू ने सुन लिया था।

तब उन्होंने जाते बच्चों को रोका और अपने बेटे के कंधों पर हाथ रख कर बोले- “जब तक तुम्हारे द्वारा बोये गये पेड़ों पर आम आयें, तब तक तुम हमारे पेड़ से हर साल आम खाना, मेरा बेटा तो यही पर तुम्हारे बीच रहेगा। यह तुम्हें हर साल अपने पेड़ के इसी प्रकार आम खिलायेगा। फिर जब तुम्हारे पेड़ों पर फल आने लगेंगे तो तुम जिंदगी भर अपने पेड़ों से आम खाना।”

चाचा राजू की बात सुनकर बच्चे खुश हुए। वे हल्ला-गुल्ला करते उनके घर से बाहर निकल गये। कई ने ‘चाचा जिंदाबाद’ की आवाज बुलंद की और फिर अपने-अपने घरों को रवाना हो गये।

*शिक्षा:-*
मित्रों! परोपकारी व्यक्ति का स्वभाव यदि कुछ समय के लिए सो जाए तो जल्द ही पुन: जाग जाता है। स्वभाव से मजबूर आदमी अपने स्वभाव को त्याग नहीं पाता। जैसे कि चाचा राजू ने बच्चों को इस बात की भी सीख दी कि यदि तुम यदि भविष्य में सुखी रहना चाहते हो, तो उसके लिए प्रयास आज से शुरू करो।


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 129 💮




*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*



*💐💐पत्नी की चिकचिक💐💐*


किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गयी ! वह बड़बड़ाते हुए घर से बाहर निकला! सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा।


 पता नहीं,समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा,सुकून से रहने नहीं देती!
नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर,चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया!

तभी पीछे से एक आवाज सुनाई दी इतनी सर्दी में घर से बाहर चाय पी रहे हो?
गर्दन घुमा कर देखा तो पीछे के स्टूल पर बैठे एक बुजुर्ग थे।
आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं बाबा.... बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा :- मैं निपट अकेला,न कोई गृहस्थी,न साथी,तुम तो शादीशुदा लगते हो बेटा"।

पत्नी घर में जीने नहीं देती बाबा !! हर समय चिकचिक..., बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ। जिंदगी नरक बना कर रख दी है।

बुजुर्ग : पत्नी जीने नहीं देती?
बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है।आठ बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए। जब ज़िंदा थी,कभी कद्र नहीं की,आज कम्बख़्त चली गयी तो भुलाई नहीं जाती,घर काटने को दौडता है। बच्चे अपने अपने काम में मस्त, आलीशान घर,धन-दौलत सब है..., पर उसके बिना कुछ मज़ा नहीं। यूँ ही कभी कहीं,कभी कहीं,भटकता रहता हूँ! कुछ अच्छा नहीं लगता, उसके जाने के बाद पता चला, वह धड़कन थी! मेरे जीवन की ही नहीं, मेरे घर की भी। सब बेजान हो गया है... लेकिन तुम तो समझदार हो बेटा, जाओ !! अपनी जिंदगी खुशी से जी लो। वरना बाद में पछताते रहोगे, मेरी तरह। बुज़ुर्ग की आँखों में दर्द और आंसुओं का समंदर भी।

चाय वाले को पैसे दिए। नज़र भर बुज़ुर्ग को देखा,एक मिनट गंवाए बिना घर की ओर मुड़ गया...
उसे दूर से ही देख लिया था, डबडबाई आँखो से निहार रही पत्नी,चिंतित दरवाजे पर ही ख़डी थी....कहाँ चले गए थे? जैकेट भी नहीं पहना, ठण्ड लग जाएगी तो ?, तुम भी तो "बिना स्वेटर के दरवाजे पर खड़ी हो!" कुछ यूँ, दोनों ने आँखों से,एक दूसरे के प्यार को पढ़ लिया था! उसके बाद फिर से कभी झगड़ा नही करने का वादा किया और दोनों हमेशा खुश रहने लगे।

*💐💐शिक्षा💐💐*

कई बार हम लोग भी अपने जीवन में इसी तरह की गलतियां कर बैठते है। सिर्फ पत्नी ही नही,माँ-बाप,चाचा-ताऊ,भाई
बहिन या अज़ीज़ दोस्तोँ के साथ ऐसा क्रोध कर देते है जो सिर्फ हम को ही नही,उनको भी कष्ट देता है।

छोटा सा जीवन है, कहीं क्षमा करके कहीं क्षमा मांगकर हँस कर गुजार दे।
जिंदगी के सफर मे गुजर जाते है, जो मकाम,वो फिर नही आते।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 130 💮




*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐सरहद के बिना दुनिया💐💐*


राजस्थान के झुंझुनूं जिले का छोटा सा गांव था नयासर । शहर के कोलाहल से बहुत दूर , यहां शान्ति ही शान्ति थी । नंदाराम कस्वां अपने माता पिता और दो बडे भाईयो के साथ रहता था । बचपन मे उसने अपनी दादी जी से अपने दादा जी के फौज के बहुत से किस्से सुने हुए थे । बचपन मे मन बहुत कोमल होता है जो भी बात बैठ जाये , वह आजीवन नही निकलती । 
उसने भी बचपन मे ही प्रण ले लिया था कि वह भी अपने दादा जी की तरह फौज मे जाकर सेवा करेगा । उसका वह जोश उम्र के साथ साथ बढता गया । 
जबकि अन्य दोनो बडे भाई अपने पिता के साथ खेती करते थे ।
नंदाराम कस्वां का सपना पूरा हो गया , वह कठिन परीक्षा मे पास होकर फौज मे भर्ती हो गया और देश की सेवा करने लगा । फौज मे छुट्टी तो यदा कदा ही मिलती है ।
बडे दोनो भाई अपनी घर ग्रहस्थी मे लग गये । दोनो भाईयो के बच्चे भी हो गये । एक बार नंदाराम कस्वां मात्र पन्द्रह दिन की छुटटिया लेकर घर आ पाया , क्योंकि उसकी माता की तबियत बहुत खराब थी । 
उसकी मां ने पहले से उसके लिए एक रिश्ता देख रखा था । उन्हे अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था कि नंदाराम कस्वां मना नही करेगा । उसके आने के अगले ही तीन दिन मे उसका विवाह एक सुशील लडकी इमरती देवी के साथ कर दिया । दस दिन ही दोनो ने साथ बिताये थे कि ड्युटी पर जाने का समय हो गया ।
वह खुशी खुशी अपने परिवार से विदा ले चला गया । दो महीने बाद वही उसे पता चला कि वह पिता बनने वाला है । परंतु सरहद पर गम्भीर स्थिति के कारण वह नही आ पाया ।
उसने सोचा कि बच्चे के जन्म के समय चला जायेगा ,परन्तु उस समय भी दुश्मनो के हमले की आशंका के कारण छुटटी नही मिल पायी ।
जब उसका बालक रघुवीर सिंह छः महीने का हुआ तो वह उसके लिए बहुत से खिलौने और कपडे लिए, एक महीने की छुट्टी लेकर घर आया । अभी तीन दिन ही हुए थे , वह तो अपने बालक को अच्छे से प्यार करके अपने अरमान भी पूरे नही कर पाया था कि इमर्जेंसी के कारण नंदाराम कस्वां को पुनः जाना पडा ।
इसके बाद वह दो साल बाद एक हफ्ताह की छुटटी लेकर घर आया । बच्चे बहुत मासूम होते है जब घर मे वह अपने दोनो ताऊ जी के बेटो को लाड लडाते देखता तो उसका मन भी करता कि उसके पिता जी हर समय उसके साथ रहकर उसे प्यार करे । जब वह अपनी मां के अलावा अन्य स्त्रियो को सजे सवंरे और चहकते हुए , मगंलगीत गाते दगाता तो उसका मन करता कि काश उसकी मां भी ऐसे ही चहकती रहे । उसे भी अपनी मां और पिता का प्यार एक साथ मिले । वह छः वर्ष का हो चुका था , पिता का स्नेह और गोद उसे न के बराबर ही मिली थी । एक दिन जब उसने सीमा पर हमले के कारण अपने दादा- दादी और मां के मुख पर चिंता देखी तो वह रात को घबराकर छत पर चला गया । उसने अपनी दादी से सुन रखा था कि टूटते तारो को देखकर कुछ भी मांगों वह पूरा हो जाता है । 
वह लगातार आकाश की तरफ देखता रहा फिर अचानक खुद से ही बोलने लगता है कि काश एक अनोखी दुनिया हो जाये । न कोई सरहद हो , न सीमा , सारी दुनिया मे प्यार हो जाये । जब ऐसा हो जायेगा तो सब आराम से रहेंगे। न लडाई होगी , न झगडा । उसके पिता भी घर पर होगे । वह भी अपने पिता की उगंली पकड खेतो मे जाया करेगा । जब भी घर के बाहर से उसके पिता आयेगे , उसे बाहों मे भर लेगें उसे फिर कंधे पर बैठा , पूरा गांव घुमायेगे । उसकी मां भी सज सवंर हर समय मंगलगीत गायेगी । दादा - दादी भी फिर चैन से सो पायेगे । 
फिर अगले दिन खबर मिली कि बेटा फ़ौज में शहीद हो गया।जब गांव में पार्थिव देह पहुँची तो बेटे ने देखा पूरा शहर उसके पिता नंदाराम कस्वां की पार्थिव देह के चारों तरह इक्कट्ठे होकर जयकारे लगा रहे है।अंतिम संस्कार के समय जब पिता को अग्नि देने का समय आया तो बेटे ने पिता को सेल्यूट करके जोर से जय हिंद कहकर शपथ ली कि वो भी बड़ा होकर देश की सेवा करेगा और पापा की तरह फौजी बनेगा।पूरा गांव ,शहर बच्चें की बहादुरी की तारीफ करते हुए आंसुओ की नदियां बहा रहे थे।

*💐💐शिक्षा💐💐*


काश एक ऐसी अनोखी दुनिया सच मे बन जाये , चारों ओर हो अमन और शान्ति। हर बेटे रघुवीर को मिले सके पिता नंदाराम कस्वां और माता इमरती देवी का प्यार एक साथ। 

ऐसे परिवारो को कोटि नमन जो अपने घर के चिरागो को बारूद के ढेर पर भेजकर , देशसेवा मे अपना योगदान देते है ।

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