🌺ऋषि चिंतन से भाग 2🌺 🌺 गृहस्थ योग - एक उत्कृष्ट साधना🌺
*🍁फाल्गुनकृष्णपक्षपंचमी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*गृहस्थ योग - एक उत्कृष्ट साधना*
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👉 *"गृहस्थ" योग के साधक मन में यह विचारधारा चलती रहनी चाहिए कि यह परिवार मेरा "साधना" क्षेत्र है ।* इस वाटिका को सब प्रकार सुंदर, सुरभित और पल्लवित बनाने के लिए सच्चे हृदय से सदा शक्ति भर प्रयत्न करते रहना *यह मेरा "कर्मकांड" है ।* भगवान ने जिस वाटिका को सींचने का भार मुझे दिया है उसे ठीक तरह सींचते रहना *यह मेरी 'ईश्वर परायणता" है ।* घर का कोई भी सदस्य हीन दर्जे का नहीं है, जिसे मैं तुच्छ समझूँ, उपेक्षा करूँ या सेवा से जी चुराऊँ । मैं मालिक, नेता, मुखिया या कमाऊ होने का अहंकार नहीं करता, *यह मेरा "आत्म निग्रह' है ।* हर एक सदस्य के विकास में अपनी सेवाएँ लगाते रहना, *यह मेरा "परमार्थ" है ।* बदले की जरा सी इच्छा न रखकर विशुद्ध कर्तव्य भाव से सेवा में तत्पर रहना *यह मेरा "आत्मत्याग" है ।* अपनी सुख-सुविधाओं की परवाह न करते हुए औरों की सुख-सुविधा बढ़ाते रहने का प्रयत्न करना *यह मेरा "तप" है ।*
👉 घर के हर सदस्य को सद्गुणी, सत् स्वभाव का, सदाचारी एवं धर्म परायण बनाकर विश्व की सुख शांति में वृद्धि करना *यह मेरा "यज्ञ" है ।* सबके हृदय पर जिसका मौन उपदेश हो, अनुकरण से सुसंस्कार बनें, *अपना आचरण ऐसा पवित्र एवं आदर्शमय रखना यह मेरा "व्रत" है ।* धर्म से उपार्जित अन्न से जीवन निर्वाह करना और कराना *यह मेरा "संयम" है ।* प्रेम, उदारता, सहानुभूति की भावना से ओत-प्रोत रहना और रखना, प्रसन्नता, आनंद और एकता की वृद्धि करना *यह मेरी "आराधना" है ।* मैं अपने गृह मंदिर में भगवान की चलती फिरती प्रतिमाओं के प्रति अगाध भक्ति भावना रखता हूँ । सद्गुण, सत् स्वभाव और सत् आचरण के दिव्य श्रृंगार से *इन प्रतिमाओं को सुसज्जित करने का प्रयास हीं मेरी 'पूजा" है ।* मेरा साधन सच्चा है, साधन के प्रति मेरी भावना सच्ची है, अपनी आत्मा के सम्मुख में सच्चा हूँ । *सफलता-असफलता की जरा भी परवाह न करके सच्चे निष्काम कर्मयोगी की भाँति मैं अपने कर्तव्य की सच्चाई में संतोष अनुभव करता हूँ । मैं सत्य हूँ, मेरी साधना सत्य है, मैंने सत्य का आश्रय ग्रहण किया है, उसे सत्यता पूर्वक निभाने का प्रयत्न करूँगा ।*
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*"गृहस्थ"-एक सिद्ध योग पृष्ठ-११*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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