🌺 ऋषि चिंतन से 6 🌺 Rishi chintan se 6 🌺
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*❗०४ जुलाई २०२० शनिवार ❗*
*॥ आषाढ़ शुक्लपक्ष चतुर्दशी २०७७॥*
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*❗प्रणाम❗*
*🙏वंदे मातरम्🙏*
*‼ऋषि चिंतन ‼*
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*🌹 व्यावहारिक अध्यात्मवाद 🌹*
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👉 *हमें जो भी प्राप्त है, उसमें सुख मानें और समझें कि भगवान की बहुत भारी दया है कि उसने मुझे इन वस्तुओं का अधिकारी बनाया ।* हम अपने से ऊपर वालों की ओर नहीं, नीचे वालों की ओर देखें, तब हमें आसानी से पता चलेगा कि हम से कम सुविधा प्राप्त करके भी कुछ लोग अपना जीवनयापन कर रहे हैं । *हम तो उनसे अधिक भाग्यशाली हैं । परमेश्वर से यदि माँगना ही है, तो यह माँगे कि हे भगवान ! हमें यह शक्ति दो कि हम सुख-दुःख दोनों को धैर्यपूर्वक झेल सकें और जो कुछ हमें प्राप्त है, उसमें संतोष मानकर आगे बढ़ते चलें ।* इस प्रकार शक्ति की याचना से हम आंतरिक शांति प्राप्त करेंगे और उद्विग्नता से अपनी रक्षा कर सकेंगे ।
👉 *यदि हम सभी प्रकार की योग्यता प्राप्त कर चुके और अपने को बहुत शक्तिशाली, पटु और योग्यता सम्पन्न समझने का अहंकार आ गया तो पुनः एक-एक करके हमारे अंदर दुर्गुणों का प्रवेश होगा, हमारी शक्ति का क्षय होगा और हम तब अशांत होने लगेंगे ।* इस प्रकार की परिस्थिति से अलग रहना और अपने भीतर नम्रता का विकास करना परमावश्यक है । इस प्रकार शांत रहकर सज्जनों के निकट बैठकर उनकी शिक्षा को आसानी से हृदयंगम कर सकेंगे । अतः नम्रता की प्राप्ति के बाद हम सुरक्षित रहने की कला अपने आप सीख लेंगे और अपनी शक्ति का संरक्षण करते हुए इस संसार-यात्रा को सानंद तय कर सकेंगे ।
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*॥अखण्ड ज्योति मार्च १९५३पृष्ठ२१॥*
*💦पं.श्रीराम शर्मा आचार्य💦*
*☘संस्थापक☘*
*🍁अखिल विश्व गायत्री परिवार🍁*
*🇮🇳भारतमाता की जय🇮🇳*
*🇮🇳जयहिंद🇮🇳*
*🙏🙏🙏सुप्रभात🙏🙏🙏*
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🌺 ऋषि चिंतन से 7 🌺 Rishi chintan se 7 🌺
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*❗०५ जुलाई २०२० रविवार ❗*
*॥आषाढ़ शुक्लपक्ष पूर्णिमा२०७७॥*
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*👉आज ..............................*
*🌸🙏गुरु पूर्णिमा 🙏🌸* है ।
*❗बहुत बहुत शुभकामना ❗*
*‼बहुत बहुत बधाई‼*
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*❗प्रणाम❗*
*🙏वंदे मातरम्🙏*
*‼ऋषि चिंतन ‼*
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*❌ किसी का बुरा मत सोचिए ❌*
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👉 आग जहाँ रखी जाती है, पहले उस स्थान को गरम करती और जलाती है । तेज़ाब यदि साधारण धातु के बरतन में रखा गया है, तो पहले उसे ही नष्ट करेगा । *इसी प्रकार "द्वेष" और "दुर्भाव", "पाप" और "कुविचार"जिसके मन में रहते हैं, पहले उसी का अनिष्ट करते हैं ।* जब तक वे जमे रहते हैं, तब तक निरंतर वहाँ हानि पहुँचाते हैं । *जिसके लिए दुर्भाव रखे जाते हैं, उसको तो उसकी शतांश हानि भी नहीं पहुँच पाती, जितनी कि अपनी होती है ।* इसीलिए जिससे जहाँ मतभेद हो, विरोध हो, उसे प्रकट में तो कहना ही चाहिए, परंतु उसके निवारण के लिए उचित उपाय भी तत्परतापूर्वक करना चाहिए । मन में उसकी गाँठ बांधने और ईर्ष्या द्वेष रखने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है । महात्मा गाँधी इस सिद्धांत का सफल प्रयोग करके दिखा चुके हैं - - *"विरोधी के प्रति बिना दुर्भाव रखे हुए भी बुराई का प्रतिरोध करना संभव है ।"* हम भी आवश्यकतानुसार उसी मार्ग का अवलम्बन करें ।
👉 हमें चाहिए कि दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझें, उनके अनिष्ट को अपना अनिष्ट मानें, तभी संसार में शांति का साम्राज्य हो सकेगा । *हमें "द्वेष भाव" त्यागकर सभी के प्रति "प्रेमभाव" रखना होगा, "स्वार्थ भाव" त्यागकर "परमार्थ भाव" का सहारा लेना होगा, तभी सबका कल्याण हो सकेगा ।*
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*॥अखण्ड ज्योति जून १९५३पृष्ठ१९॥*
*💦पं.श्रीराम शर्मा आचार्य💦*
*☘संस्थापक☘*
*🍁अखिल विश्व गायत्री परिवार🍁*
*🇮🇳भारतमाता की जय🇮🇳*
*🇮🇳जयहिंद🇮🇳*
*🙏🙏🙏सुप्रभात🙏🙏🙏*
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🌺 ऋषि चिंतन से 8 🌺 Rishi chintan se 8 🌺
*❗०१ जनवरी २०२१ शुक्रवार ❗*
*‼पौष कृष्णपक्ष द्वितीया २०७७‼*
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*❗प्रणाम❗*
*🙏वंदे मातरम्🙏*
*‼ऋषि चिंतन‼*
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*॥शांति तो अंदर ही खोजनी पड़ती है ॥*
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👉 *"शांति" की खोज में चलने वाले पथिक को यह जान लेना चाहिए कि अकेले रहने या जंगल, पर्वतों में निवास करने से "शांति" का कोई संबंध नहीं ।* यदि ऐसा होता तो अकेले रहने वाले जीव-जंतुओं को *"शांति"* मिल गई होती और जंगल पर्वतों में रहने वाली अन्य जातियाँ कब की शांति प्राप्त कर चुकी होती ।
👉 अशांति का कारण है, *"आंतरिक-दुर्बलता ।"* स्वार्थी मनुष्य बहुत चाहते हैं और उसमें कमी रहने पर खिन्न होते हैं । *"अहंकारी" का क्षोभ ही उसे जलाता रहता है ।* कायर मनुष्य हिलते हुए पत्ते से भी डरता है और उसे अपना भविष्य अंधकार से घिरा दीखता है । *"असंयमी" की तृष्णा कभी शांत नहीं होती ।* इस कुचक्र में फँसा हुआ मनुष्य सदा विक्षुब्ध ही रहेगा, भले ही उसने अपना निवास सुनसान एकांत में बना लिया हो ।
👉 नदी या पर्वत सुहावने अवश्य लगते हैं । विश्राम या जलवायु की दृष्टि से वे स्वास्थ्यकर हो सकते हैं, *पर "शांति" का उनमें निवास नहीं ।* चेतन आत्मा को यह जड़ पदार्थ भला *"शांति*" कैसे दे पाएँगे ? *"शांति" अंदर रहती है और जिसने उसे पाया है, उसे अंदर ही मिली है ।* अशांति उत्पन्न करने वाली विकृतियों को जब तक परास्त न किया जाए, तब तक शांति का दर्शन नहीं हो सकता, भले ही कितने सुरम्य स्थानों में कोई निवास क्यों न करता रहे ।
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*॥ अखण्डज्योतिअक्टूबर१९६४पृष्ठ१॥*
*💦पं.श्रीराम शर्मा आचार्य💦*
*☘संस्थापक☘*
*🍁अखिल विश्व गायत्री परिवार🍁*
*🇮🇳भारतमाता की जय🇮🇳*
*🇮🇳जयहिंद🇮🇳*
*🙏🙏🙏सुप्रभात🙏🙏🙏*
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🌺 ऋषि चिंतन से 9 🌺 Rishi chintan se 9 🌺
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*❗०९ जनवरी २०२१ शनिवार ❗*
*‼पौषकृष्णपक्षएकादशी २०७७‼*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*🌸जीवन-संग्राम में 🌸*
*‼पुरुषार्थ की आवश्यकता‼*
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👉 जो यह चाहते हैं कि कोई हमारी सहायता करे, हमें जीवन-पथ पर चलने की दिशा दिखाए, जो सोचते हैं, कैसे करें, *वे अंधकार में ही निवास करते हैं ।* ऐसी स्थिति से समाज में दासवृत्ति को जीवन और पोषण मिलता है, क्योंकि तब हम दूसरों का मुँह ताकते हैं, दूसरों से आशा रखते हैं । *ऐसे परावलंबी व्यक्ति कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, न अपनी स्वतंत्रता की रक्षा ही कर सकते हैं ।* हमें अपने ही पैरों पर आगे बढ़ना होगा । अपने आप ही अपनी मंजिल का रास्ता खोजना होगा । अपने पुरुषार्थ से ही अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी ।
👉 आज के युग में जीवन-संघर्ष और भी अधिक बढ़ गया है । आज मनुष्य के लिए दो ही मार्ग रह गए हैं, *एक ठेलने वाला और दूसरा ठेले जाने वाला ।* क्या हम दूसरों की ठोकरों में लुढ़कने के लिए अपने आपको छोड़ दें ? *हम दृढ़प्रतिज्ञ होकर कुछ करें, कर दिखाएँ या फिर उदासीन होकर भाग्य और दूसरों की आशा लगाए जिंदगी के दिन पूरे करते रहें ।* पराधीनता के रूप में जीवित मृत्यु की यंत्रणा भुगतते रहें । *"पुरुषार्थ" ही हमारी स्वतंत्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है,* जिसे कोई भी बेध नहीं सकता । हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, *"पुरुषार्थ" के बल पर जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना होगा ।*
👉 *यदि हमें कुछ करना है, स्वतंत्र रहना है, जीवित रहना है, तो एक ही रास्ता है, "पुरुषार्थ" की उपासना का । "पुरुषार्थ" ही हमारे जीवन का मूल-मंत्र होना चाहिए ।*
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*॥ अखण्डज्योति जनवरी१९६५पृष्ठ३५॥*
*💦पं.श्रीराम शर्मा आचार्य💦*
*☘संस्थापक☘*
*🍁अखिल विश्व गायत्री परिवार🍁*
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🌺 ऋषि चिंतन से 10 🌺 Rishi chintan se 10 🌺
*🥀०५ फरवरी २०२३ रविवार🥀*
*🍁माघ शुक्लपक्ष पूर्णिमा२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*सावधान ! समय का मूल्य समझें*
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👉 अपने स्वभाव में अनेक ऐसी आदतें सम्मिलित हो सकती हैं, जो अखरती तो नहीं; पर लकड़ी में लगे घुन की तरह निरंतर खोखला करने में अनवरत रूप से लगी रहती हैं । इनसे निपटने के लिए मोर्चाबंदी यहीं से आरंभ करनी चाहिए । *सबसे बुरी किंतु सर्वाधिक प्रचलित "कुटेव" एक है -- वह है "आलस्य" । "चोरी" अनेक तरह की होती है, किंतु अपने आपको और अपने सगे संबंधियों को सबसे अधिक हानि पहुँचाने वाली है "कामचोरी" ।* इसमें प्रतीत भर ऐसा होता है कि हम आराम से रह रहे हैं, मजे के दिन काट रहे हैं, पर सच बात यह है कि इस कुटेव के कारण आदमी दिन-दिन अनुपयोगी, अनगढ़, अयोग्य, अक्षम, अशक्त होता जाता है । *प्रगति की समस्त संभावनाएँ आलसी को दूर से नमस्कार करके उल्टे पैरों लोट जाती हैं ।*
👉 *यह समझा जाना चाहिए कि पसीने की हर बूँद मोती होती है ।* जीवन की बहुमूल्य श्रृंखला क्षणों के छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी है । *समुन्नत वे रहे हैं, जिन्होंने समय का मूल्य समझा और उसकी हर इकाई का श्रेष्ठतम एवं क्रमबद्ध व्यस्त उपयोग करने का तारतम्य बिठाया ।* जो आलस्य-प्रमाद में उसे गँवाते रहते हैं धीमी गति और ढीले तारतम्य से उसे ज्यों-त्यों करके काटते रहते हैं, वे किसी प्रकार अपनी मौत के दिन पूरे भर कर पाते हैं । उन्हें और तो कुछ मिलना है क्या था, प्रतिभा परिवर्तन के सहज लाभ तक से वे वंचित रह जाते हैं । *यह दुर्घटना अपने या अपने किसी प्रिय पात्र के जीवन में घटने न पाए; इसका विशेष सतर्कता पूर्वक ध्यान रखे जाने की आवश्यकता है ।*
👉 लंबे समय के भारी और कठिन काम करने वालों को बीच-बीच में थोड़ा सुस्ताने की आवश्यकता पड़ती है, पर उसकी पूर्ति थोड़ी देर के लिए काम या मन बदलने भर से पूरी हो जाती है । *ह्रदय जन्म के दिन से लेकर मृत्यु पर्यंत धड़कता रहता है । इस अवधि में वह कुछ क्षणों का विश्राम भी ले लेता है । हमारे भी काम और विश्राम के बीच इसी प्रकार का तालमेल बिठाया जाना चाहिए ।* अपने दायित्व की क्रमबद्ध व्यवस्था बना लेना इस बात का प्रमाण है कि *व्यक्ति की "दूरदर्शिता", "विवेकशीलता" और "कार्यकुशलता" उच्च स्तर की है ।*
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*युग की माँग-प्रतिभा परिष्कार पृष्ठ-४७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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