🌺 ऋषि चिंतन से 41 🌺 Rishi chintan se 41 🌺
*🥀//२५ मार्च २०२३ शनिवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष चतुर्थी २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*कष्टों से कैसा घबराना ?*
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👉 *कष्टों का स्वरूप अप्रिय है ।* उनका तात्कालिक अनुभव कड़वा होता है । *अंततः वे जीव के लिए कल्याणकारी और आनंददायक सिद्ध होते हैं ।* उनसे दुर्गुणों के शोधन और सद्गुणों की वृद्धि में असाधारण सहायता मिलती है । *आनंद स्वरूप, आत्मप्रकाशमय जीवन और सुखमय संसार में कष्टों का थोड़ा स्वाद परिवर्तन इसलिए लगाया गया है कि प्रगति में बाधा न पड़ने पाए ।* घड़ी में चाबी भर देने से उसकी चाल फिर ठीक हो जाती है । हारमोनियम में हवा धोंकते रहने से उसके स्वर ठीक तरह से बजते रहते हैं । पैडल चलाने से साइकिल ठीक तरह घूमती है । अग्नि की गर्मी से सूख कर भोजन पक जाते हैं । *थोड़ा सा कष्ट भी जीवन की सुखवृद्धि के लिए आवश्यक है ।* संसार में जो कष्ट है वह इतना ही है और ऐसा ही है, *किंतु स्मरण रखिए जितना भी थोड़ा बहुत दु:ख है, वह हमारे अन्याय का, अधर्म का, अनर्थ का फल है ।* आत्मा दु:ख रूप नहीं है, जीवन दु:खमय नहीं है और न संसार में ही दु: ख है ।
👉 *आप दु:खों से डरिए मत ।* घबराइए मत, काँपिए मत, उन्हें देखकर चिंतित या व्याकुल मत होइए, वरन् सहन करने को तैयार रहिए । *कटु भाषी किंतु सच्चे सह्रदय मित्र की तरह उससे भुजा पसार कर मिलिए ।* वह कटु शब्द बोलता है, अप्रिय समालोचना करता है, तो भी *जब जाता है तो बहुत सा माल खजाना उपहार स्वरूप दे जाता है ।* बहादुर सिपाही की तरह सीना खोल कर खड़े हो जाइए और कहिए कि *"ऐ आने वाले दु:खों ! आओ !! ऐ मेरे बालकों, चले आओ !! मैंने ही तुम्हें उत्पन्न किया है, मैं ही तुम्हें अपनी छाती से लगाऊँगा । मैं कायर नहीं हूँ , जो तुम्हें देख कर रोऊँ ! मैं नपुंसक नहीं हूँ, जो तुम्हारा भार उठाने से गिड़गिड़ाऊँ ! मैं मिथ्याचारी नहीं हूँ, जो अपने कर्म का फल भोगने से मुँह छुपाता फिरूँ !* मैं सत्य हूँ, शिव हूँ, सुंदर हूँ ! आओ ! मेरे अज्ञान के कुरूप मानस पुत्रों !! मेरी कुटी में तुम्हारे लिए भी स्थान है । मैं शूरवीर हूँ , इसलिए हे कष्टों ! तुम्हें स्वीकार करने से मुँह नहीं छुपाता और न तुमसे बचने के लिए किसी की सहायता चाहता हूँ । *तुम मेरे साहस की परीक्षा लेने आए हो, मैं तैयार हूँ, देखो गिड़गिड़ाता नहीं हूँ, साहसपूर्वक तुम्हें स्वीकार करने के लिए छाती खोले खड़ा हूँ ।*
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*गहना कर्मणोगति:- पृष्ठ- २५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/RpT6kP6nuZo
🌺 ऋषि चिंतन से 42 🌺 Rishi chintan se 42 🌺
*🥀//२६ मार्च २०२३ रविवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष पंचमी २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*हम भी सज्जन व सभ्य बनें*
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👉 *एक सज्जन, शालीन, संभ्रांत, सुसंस्कृत नागरिक का स्वरुप क्या होना चाहिए ?* उसके गुण, कर्म, स्वभाव में किन शालीनताओं का समावेश होना चाहिए ? इसका एक ढाँचा सर्वप्रथम अपने मस्तिष्क में खड़ा किया जाए । मानवी मर्यादा और स्थिति क्या होनी चाहिए ? इसका स्वरुप निर्धारण कुछ कठिन नहीं है । *दिनचर्या की दृष्टि से "सुव्यवस्थित", श्रम की दृष्टि से "स्फूर्तिवान", मानसिक दृष्टि से "सक्षम", व्यवहार की दृष्टि से "कुशल", चिंतन की दृष्टि से "दूरदर्शी विवेकवान" आत्मानुशासन की दृष्टि से "प्रखर", व्यक्तित्व की दृष्टि से "आत्मावलंबी" और "आत्मसम्मानी" हर श्रेष्ठ मनुष्य में यह विशेषताएँ होनी चाहिए ।* चरित्र की दृष्टि से उदार और स्वभाव की दृष्टि से मृदुल हँसते-हँसाते रहने वाला होना चाहिए । *"सादगी" और "सज्जनता" मिले जुले तत्व हैं ।* आंतरिक विभूतियों और बाह्य साधन संपत्तियों का सुव्यवस्थित सदुपयोग कर सकने वालों को *"सुसंस्कृत"* कहते हैं । *अपने "कर्तव्यों" और "उत्तरदायित्वों" को समझने वाले और उनके पालन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर चलने वालों को "सभ्य" कहा जाता है ।*
👉 ऐसी विशेषताओं से संपन्न व्यक्ति को सच्चे अर्थों में *"मनुष्य"* कहा जा सकता है । *"मानवता" से, मानवी "सद्गुणों" से विभूषित व्यक्ति ही मानव समाज का "सभ्य" सदस्य कहला सकता है ।* ऐसे सद्गुण सम्पन्न मनुष्य को मापदंड मानकर उसके साथ तुलनात्मक समीक्षा करने से ही आत्म-चिंतन का उद्देश्य पूर्ण होता है । मानदण्ड न हों तो अपने दोषों और गुणों का कुछ भी पता नहीं चलेगा । दुष्टों से अपनी तुलना की जाए तो जो कुछ हम हैं, वह भी आत्मिक श्रेष्ठता की अनुभूति होगी और यदि अत्यधिक उच्च स्थिति के महामानवों से तुलना की जाए तो सामान्य स्थिति रहते हुए भी अपनी स्थिति असंतोषजनक और गई-गुजरी प्रतीत होती रहेगी । नाप-तौल के लिए बाट, गज, मीटर आदि की जरुरत पड़ती है । *तुलनात्मक आधार अपनाने पर ही समीक्षा संभव होती है अन्यथा वस्तुस्थिति का निरुपण संभव ही न हो सकेगा । शरीर का तापमान कितना रहना चाहिए यह विदित रहने पर ही बुखार चढ़ने का, शीत के दबाने की बात जानी जा सकती है । मध्यवर्ती रक्तचाप का ज्ञान रहने पर ही नापने वाला यह बता सकता है कि "ब्लड प्रेशर" घटा हुआ है या बढ़ा हुआ*" इसी प्रकार एक सज्जनता एवं मानवतावादी मनुष्य का जीवन स्तर निर्धारित करने और उसके साथ अपने को तौलने में ही अपनी हेय, मध्यम एवं उत्तम स्थिति का विवेचन, विश्लेषण, निर्धारण संभव हो सकेगा ।
👉 *हम जिन दुष्प्रवृत्तियों के लिए दूसरों की निंदा करते हैं, उनमें से कोई अपने स्वभाव में सम्मिलित तो नहीं है , जिनके लिए हम दूसरों से घृणा करते हैं वैसी दुष्प्रवृत्तियाँ अपने में तो नहीं हैं ? जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने लिए नहीं चाहते, वैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ तो नहीं करते ? जैसे उपदेश हम आए दिन दूसरों को दिया करते हैं, वैसे आचरण अपने है या नहीं ? जैसी हम प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा चाहते हैं, वैसी विशेषताएँ अपने में हैं या नहीं ? ऐसे प्रश्न अपने आप से पूछने और सही उत्तर पाने की चेष्टा की जाए तो अपने गुण-दोषों का वर्गीकरण ठीक तरह सकना संभव हो जाएगा ।*
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*😌साधना से सिद्धि😌- पृष्ठ- ३५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/2GkYPdLZZvE
🌺 ऋषि चिंतन से 43 🌺 Rishi chintan se 43🌺
*🥀०४ जनवरी २०२३ बुधवार🥀*
*🍁पौष शुक्लपक्ष त्रयोदशी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖सत्कर्म करने के लिए➖*
*!!-उच्च स्तर की मनोभूमि चाहिए- !!*
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👉 *"सत्कर्म" अनायास नहीं बन पड़ते । उनके पीछे एक प्रबल दार्शनिक पृष्ठभूमि का होना आवश्यक है ।* सस्ती नामवरी लूटने के लिए या किसी आवेश में आकर कभी-कभी घटिया स्तर के लोग भी बड़े काम कर बैठते हैं, पर उनमें स्थिरता नहीं होती । यश कामना की पूर्ति भी हर घड़ी नहीं होती रह सकती । न आवेश ही स्थिर रखा जा सकता है । ऐसी दशा में निम्न मनोभूमि के लोग श्रेष्ठ कार्य भी निरंतर नहीं कर सकते । यदि जीवन में दो चार बार ऊपरी मन से कुछ अच्छे काम कर दिए जाएँ और भीतर ही भीतर दुष्प्रवृतियाँ काम करती रहें, तो जीवन में बुराइयाँ ही अधिक होती रहेंगी । *"सत्कर्मों" का निरंतर होते रहना और कठिनाई आने पर भी दृढ़ बने रहना तभी संभव है, जब मनोभूमि को उत्कृष्ट स्तर पर विकसित एवं परिपक्व किया जाये ।* श्रेष्ठ कार्यों और श्रेष्ठ परिस्थितियों से परिपूर्ण वातावरण इन्हीं परिस्थितियों में बन सकता है ।
👉 घृणा, द्वेष, निराशा, चिंता, विक्षोभ, आवेश में आकर कई बार मनुष्य दु:साहस्सपूर्ण कार्य कर डालते हैं । लोभ और मोह के वशीभूत मनुष्य भी कभी-कभी प्राणों की बाजी लगा डालते हैं, पर वे कार्य होते निकृष्ट कोटि के पापपूर्ण ही हैं । प्रतिशोध, हत्या, फौजदारी, आत्महत्या, घर छोड़कर भाग निकलना, अपना सब कुछ लुटा देना जैसे उद्धत कार्य आवेश ग्रस्त लोग करते देखे गए हैं, पर उनका लक्ष्य दूसरों को परेशान करना ही होता है । *द्वेषवश ही ऐसे कदम उठाए जा सकते हैं और उनका प्रतिफल अपने एवं दूसरों के लिए हानिकारक ही होता है ।*
👉 संसार में शांति और श्रेष्ठता उत्पन्न करने के लिए त्यागपूर्ण, श्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत करने वाले साहस पूर्ण बड़े काम करने की आवश्यकता रहती है । *उन की संभावना तभी बनती है जब व्यक्ति का उद्देश्य उच्च कोटि के आदर्शवाद की प्रेरणाओं से ओतप्रोत बन सके ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-१९*
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
🌺 ऋषि चिंतन से 44 🌺 Rishi chintan se 44🌺
*🥀०३ जनवरी २०२३
मंगलवार 🥀*
*🍁पौष शुक्लपक्ष द्वादशी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*◆भाव संवेदना का स्रोत भरा रहे◆*
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👉 *"मनुष्य" का दर्जा इसलिए नहीं है कि वह अपनी विशिष्टता को संग्रह एवं उपभोग की आतुरता पर विसर्जित करता रहे ।* उसके लिए कुछ बड़े कर्तव्य निर्धारित हैं । *उसे "संयम" साधना द्वारा ऐसा "आत्म परिष्कार" करना होता है, जिसके आधार पर विश्व उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके ।* जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आन पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ संपादित करते फिरना पड़े ।
👉 गहरी डुबकी लगाने पर उल्टी रीति का निमित्त कारण भी समझ में आ जाता है । *"भाव-संवेदनाओं" का स्रोत सूख जाने पर सूखे तालाब जैसी शुष्कता ही शेष बचती है ।* इसे चेतना क्षेत्र की निष्ठुरता या नीरसता भी कह सकते हैं । इस प्रकार उत्पन्न संकीर्ण स्वार्थपरता के कारण मात्र अपना ही वैभव और उपभोग सब कुछ प्रतीत होता है । उससे आगे भी कुछ हो सकता है, यह सूझता नहीं । *दूसरों की सेवा सहायता करने में भी "आत्मसंतोष" और "लोकसम्मान" जैसी उपलब्धियाँ संगृहीत हो सकती हैं, इसका अनुमान लगाना, आभास पाना तक कठिन हो जाता है ।* आँख खराब हो जाने पर दिन में भी मात्र अंधकार ही दीख पड़ता है । कान के पर्दे जवाब दे जाएँ, तो कहीं से कोई आवाज आती सुनाई ही नहीं पड़ती । ऐसी ही स्थिति उनकी बन पड़ती है, जिनके लिए अनर्थ स्तर की स्वार्थ पूर्ति ही सब कुछ बन कर रह जाती है ।
👉 शरीर से चेतना निकल जाने पर मात्र लाश ही पडी़ रह जाती है, जिसे ठिकाने न लगाया जाए तो स्वयं सड़ने लगेगी, घिनौना वातावरण उत्पन्न करेगी । जब तक कि शरीर में चेतना विद्यमान थी वह जीवित शरीर को समर्थ एवं सुंदर बनाए हुए थी । निर्जीव तो नीरस और निष्ठुर ही हो सकता है । मुर्दा तो समीप बैठे आश्रितों या स्वजनों का विलाप भी नहीं सुनता, उस पर कुछ ध्यान भी नहीं देता । मानो उन सब से उसका दूर का संबंध भी नाश रहा हो । *"भाव-संवेदना" का स्रोत सूख जाने पर मनुष्य भी ऐसा ही घिनौना हो जाता है । अपना हित-अनहित तक उसे नहीं सूझता, तो दूसरों की सेवा सहायता करने की उत्कंठा उठने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है ।*
👉 *जीवितों और मृतकों की अलग अलग दुनिया है । मुर्दे श्मशान, कब्रिस्तान में जगह घेर कर जा बैठते हैं और उधर से निकलने वालों को भूत प्रेतों की तरह डराते-भगाते रहते हैं ।* जीवितो में से भला कोई ऐसी हरकत करता है ? उन्हें तो आवश्यक प्रयासों में ही निरत देखा जाता है । इन दिनों *"संवेदनाहीनों"* को *"प्रेतों"* जैसी और *"संवेदनशीलों"* को *"जीवितों"* जैसी गतिविधियाँ अपनाए हुए प्रत्यक्ष देखा जा सकता है ।
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*★"सतयुग" की वापसी -पृष्ठ-१४★*
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
🌺 ऋषि चिंतन से 45 🌺 Rishi chintan se 45 🌺
*🥀०२ जनवरी २०२३ सोमवार🥀*
*🍁पौषशुक्लपक्षएकादशी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*💰अनावश्यक धन संग्रह💰*
*➖☝️एक.मूर्खता☝️➖*
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👉 *वैभव को कमाया तो असीम मात्रा में भी जा सकता है, पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता ।* मनुष्य के पेट का विस्तार थोड़ा सा ही है । यदि बहुत कमा लिया गया है तो उस सब को उदरस्थ कर जाने की *"ललक-लिप्सा" कितनी ही प्रबल क्यों न हो, पर वह संभव नहीं हो सकेगी । नियत मात्रा से अधिक जो भी खाया गया है, वह दस्त,उल्टी, उदर-शूल जैसे संकट खड़े करेगा, भले ही वह कितना ही स्वादिष्ट क्यों न लगे ?*
👉 शारीरिक और मानसिक दोनों ही क्षेत्र, भौतिक पदार्थ संरचना के आधार पर विनिर्मित हुए हैं । उनकी भी अन्य पदार्थों की तरह एक सीमा और परिधि है । जीवित रहने और अभीष्ट कृत्यों में निरत रहने के लिए सीमित ऊर्जा, सक्रियता एवं साधन सामग्री ही अभीष्ट है । इसका उल्लंघन करने की ललक तटबंधों को तोड़कर बहने वाली बाढ़ की तरह अपनी उच्छृखंलता के कारण अनर्थ ही अनर्थ करेगी । उस उन्माद के कारण पानी तो व्यर्थ जाएगा ही, खेत खलिहानों, बस्तियों आदि को भी भारी हानि उठानी पड़ेगी । यों चाहे तो नदी इसे अपने स्वेच्छाचार और अहंकार दर्प-प्रदर्शन के रूप में भी बखान कर सकती है, पर जहाँ कहीं, जब कभी इस उन्माद की चर्चा चलेगी तब उसकी भर्त्सना ही की जाएगी ।
👉 उपयोग की दृष्टि से थोड़े साधनों में भी भली प्रकार काम चल सकता है । *पर "अपव्यय" की कोई सीमा मर्यादा नहीं ।* कोई चाहे तो लाखों के नोट इकट्ठे करके उनमें माचिस लगाकर होली जलाने जैसा कौतूहल करते हुए प्रसन्नता भी व्यक्त कर सकता है, पर इस अपव्यय को कोई भी समझदार न तो सराहेगा और न उसका समर्थन करेगा । बेहद चाटूकार तो कुल्हाड़ियों से अपना पैर काटने के लिए उद्यत अतिवादी की भी हाँ में हाँ मिला सकते हैं ।
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*"सतयुग" की वापसी, पृष्ठ-६-७*
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*