साधना और तपश्चर्या क्या है
ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
*साधना और तपश्चर्या*
साधना और तपश्चर्या दो भिन्न वस्तुएँ हैं, दोनों की शक्ति और मर्यादाएँ भी भिन्न-भिन्न है। साधना सामूहिक परिस्थितियों में हो सकती है, इससे मनुष्य के सूक्ष्मशरीर में सन्निहित अन्नमय कोष और मनोमय कोष की शुद्धि, पुष्टि और अभिवृद्धि हो सकती है और साधक के गुण, कर्म, स्वभाव में सात्त्विक परिवर्तन हो सकता है, इस परिवर्तन से उत्पन्न हुई आंतरिक निर्मलता के कारण ईश्वरीय प्रकाश की दिव्य किरणें साधक के अन्त: प्रदेश में आतीं और उसे आलोकित करती हैं। वह आत्म कल्याण के मार्ग पर बढ़ता है और शांति भी प्राप्त करता है।अन्नमय कोष को साधना द्वारा परिपुष्ट कर लेने पर शरीर नीरोग और दीर्घजीवी, कष्टसहिष्णु और तितिक्षाशील बन सकता है उसकी प्रतिभा निखर सकती है और कठिनाइयों से लड़कर सफलता का मार्ग प्रशस्त करने योग्य पुरुषार्थ उत्पन्न हो सकता है।मनोमय कोष की साधना से मानसिक विकारों, कुविचारों और दुर्गुणों का शमन होता है, स्मरण शक्ति एवं बुद्धिबल में अभिवृद्धि होती है, चंचलता नष्ट होती और चित्त की एकाग्रता में सफलता मिलती है। साहस, धैर्य, निर्भयता, श्रद्धा बढ़ती है और इन्द्रिय विषयों के लिए उठती रहने वाली लिप्सा एवं वासना पर नियन्त्रण स्थापित होता है। मन के प्रवाह को कुमार्ग में से रोककर सन्मार्ग पर अग्रसर करना एवं जन्म-जन्मान्तरों के संग्रहीत कुसंस्कारों का परिशोधन किया जा सकता है। शरीर का सर्वोपरि संचालक, मनोवृत्तियों का प्रधान निर्माणकर्ता मन ही है। मनोमय कोष की साधना करके मन जब काबू में आ जाता है, तो आत्म-निर्माण का कार्य सरल हो जाता है । फिर मनुष्य अपने आपको अभीष्ट परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकता है। अपने में मनोवांछित विशेषताएँ उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार वह अपने भाग्य का निर्माता आप बन सकता है।
*पं श्री राम शर्मा आचार्य*
