🌺 ऋषि चिंतन से 71🌺 Rishi chintan se 71🌺
*🍁पौष कृष्णपक्ष अष्टमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*"अर्थ संयम" पर अवश्य ध्यान देंवे*
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👉 समय के सदुपयोग की भाँति ही धन का सदुपयोग अपना महत्त्व रखता है । *"धन" कमाना कितने ही लोग जानते हैं, पर उसे खरच करना किन्हीं विरलों को ही आता है ।* जो पैसा स्वास्थ्य-संवर्द्धन के उपयुक्त आहार-विहार की व्यवस्था में, मानसिक विकास के लिए ज्ञान-संवर्द्धन में, परिवार को प्रगतिशील बनाने के साधन जुटाने में, लोकहित के परमार्थकारी सत्कर्मों में खरच किया जाना चाहिए वह नशेबाजी, सिनेमा, शौक़ीनी, यारबाजी, फैशनबाजी एवं विलासिता के ठाट-बाट जमा करने जैसी निकम्मी बातों में बर्बाद होता रहता है । उपयोगी कार्य रुक जाते हैं और निरर्थक बेहूदगियाँ सारा पैसा खा जाती हैं । आर्थिक तंगी, कर्जदारी के कष्ट से हमारा समाज कराह रहा है । *इसका प्रधान कारण एक ही है - "खरच का क्रम आमदनी के अनुरूप संतुलित न रखना ।"* गरीब और कम आमदनी वाले व्यक्ति भी जब तथाकथित "स्टैंडर्ड" बनाने के फेर में न पड़कर अपनी औकात और हैसियत के अनुसार केवल उपयोगिता के लिए ही खरच करने की नीति बना लेते हैं और अपव्यय की मूर्खता छोड़ देते हैं तो *सीमित साधनों से भी उन्हें व्यवस्थित जीवन का आनंद मिलने लगता है ।*
👉 आर्थिक उन्नति के जितने भी महत्वपूर्ण उपाय हो सकते हैं, *उनमें सबसे प्रभावशाली यह है कि हर व्यक्ति पैसे का महत्त्व समझे और उसे केवल सदुद्देश्य के लिए, सद् व्यय करने की नीति का कठोरतापूर्वक पालन करने लगे ।* बेकार कामों में होने वाली धन की बरबादी को रोका जा सके और उसे जीवन विकास के कार्यों में विवेकपूर्वक प्रयुक्त किया जा सके तो वर्तमान आमदनी से भी हमें विकसित जीवन का लाभ मिल सकता है । यदि हमें अपने समाज को धनी बनाना हो तो कृषि, उद्योग, शिल्प, वाणिज्य आदि का संवर्द्धन करने के साथ ही यह और भी नितांत आवश्यक है कि *हर व्यक्ति के स्वभाव में "मितव्ययता" और "धन के सदुपयोग" की बात गहराई तक बैठा दी जाए ।*
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-१९
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 72🌺 Rishi chintan se 72🌺
*🌴१५ दिसम्बर २०२२ बृहस्पतिवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष सप्तमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*⏰समय की महत्ता समझें⏰*
*➖तथा➖*
*🔆उसका सदुपयोग करें🔆*
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👉 *"समय" मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति है ।* समय का सदुपयोग जिस भी दिशा में किया जाए उसी में आशातीत प्रगति होने लगती है । *व्यवस्था, कार्य-विभाजन, नियमितता के आधार पर पूरी दिलचस्पी एवं मनोयोग के साथ जो कार्य किये जाते हैं, वे थोड़े समय में अधिक मात्रा में एवं उत्तम स्तर के बन पड़ते हैं ।*
👉 आमतौर से जीविकोपार्जन में आठ घंटे लगते हैं । आठ घंटे सोने और आराम करने के लिए निकाल दें तो शेष आठ घंटे ऐसे बच जाते हैं जिनकी बरबादी रोककर यदि उन्हें व्यवस्थित कर लिया जाए *तो एक नया जीवन किसी भी उन्नति के लिए मिल सकता है ।* आठ घंटे के परिश्रम में आमतौर से रोजी-रोटी की इतनी बड़ी समस्या जिस पर जीवन का सारा दारोमदार निर्भर रहता है, तो *सोने के बाद बचे हुए आठ घंटे में किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति की जा सकती है ।* संसार में सभी उन्नतिशील लोगों ने इस बचे हुए समय को शिक्षा, स्वास्थ्य, उपासना, परमार्थ, कला आदि की साधना में उपयोग किया है और इतना लाभ उठाया है जितना सामान्य व्यक्ति पूरे समय उसी कार्य में लगे रहने पर उठा सकते हैं ।
👉 *"समय" का मूल्य और महत्व ठीक तरह से न समझने के कारण हम उसका सदुपयोग नहीं कर पाते ।* घड़ी तो कितने ही व्यक्ति बाँधे फिरते हैं, पर एक-एक मिनट का कार्य-विभाजन और सदुपयोग करने वाले लोग उनमें से बहुत ही कम होते हैं । *घड़ी का वास्तविक लाभ वही उठाता है जो अपने एक-एक क्षण का सदुपयोग करने की व्यवस्था ठीक रखने के लिए घंटे-मिनटों पर ध्यान रखे रहता है ।* आलस्य और प्रमाद ही हमारे दारिद्रय और पतन का प्रमुख कारण है । जब तक उन्हें न छोड़ा जाएगा, श्रमशीलता, फुर्ती,नियमितता, समय की पाबंदी, अपने काम में दिलचस्पी रखने की आदत हम न डालेंगे तब तक इसी हीन अवस्था में पड़े रहना पड़ेगा । *व्यवस्थित पुरुषार्थ ही भौतिक जीवन की समस्त सफलताओं का प्रधान कारण है ।* समय देवता का अनुष्ठान करने से लोग तुच्छ परिस्थितियों से ऊँचे उठकर महानता का गौरव प्राप्त करने में समर्थ हुए हैं ।
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-१८
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 73🌺 Rishi chintan se 73🌺
*🥀//०६ अप्रैल २०२३ गुरुवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष पूर्णिमा २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*आत्मा के कल्याण को समझिये*
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👉 शरीर को सुख साधन मिलते रहें, उसे पद और यश का लाभ मिला सो सही, पर शरीर ही तो सब कुछ नहीं है । *"आत्मा" तो उससे भिन्न है । आत्मा की उपेक्षित स्थिति में पड़े रहने की दयनीय स्थिति ही बनी रहे, तो यह तो ऐसा ही हुआ जैसा मालिक को भूखा रखकर मोटर की साज-सज्जा में ही सारा समय, धन और मनोयोग लगा दिया जाए ।* इस भूल का दुष्परिणाम आज तो पता नहीं चलता, पर तब समझ में आता है जब जीवन संपदा छिन जाती है ।
👉 भगवान के दरबार में उपस्थित होकर यह जवाब देना पड़ता है कि इस सुर दुर्लभ उपहार को जिस सद्प्रयोजन के लिए दिया गया था वह पूरा किया गया या नहीं । *यदि नहीं तो इसका दंड एक ही हो सकता है कि फिर भविष्य में वह उत्तरदायित्व पूर्ण अवसर न दिया जाए और पहले की ही तरह तुच्छ योनियों के लंबे चक्र में भटकने दिया जाए ।* मनुष्य में से अनेकों को इसी लंबी दुर्गति में फँसना पड़ता है और अपनी भूल पर पश्चाताप करना पड़ता है कि, *जब अवसर था तब हम गहरी नींद में पड़े रहे-- इंद्रियों की वासना और मन की तृष्णा के नशे में इस कदर खोये रहे कि लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझ ही नहीं पड़ा .* यदि समय रहते आँख खुली होती तो कृमि-कीटकों का सा पेट और प्रजनन के लिए समर्पित जीवन जीने की भूल न की गई होती । *शरीर के अतिरिक्त आत्मा भी जीवन का एक पक्ष है और उसकी भी कुछ आवश्यकताएँ हैं, जिस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के लिए जो समय निकाला जाता है प्रयत्न किया जाता है, 'उसी को "उपासना प्रक्रिया" कहते हैं ।'* आत्मा का स्वार्थ ही वास्तविक स्वार्थ है । *उसी को "परमार्थ" कहते हैं ।* परमार्थ का चिंतन -- उसके लिए बुद्धि का उद्बोधन, प्रशिक्षण जिन क्षणों में किया जाता है, वस्तुतः वही सौभाग्य भरे और सराहनीय क्षण हैं । *यदि इस दृष्टि का उदय हो सके तो "उपासना" को नित्य कर्मो में सबसे अधिक आवश्यक अनिवार्य स्तर का माना जाएगा । वास्तविक "स्वार्थ" साधना के क्षण वही तो होते हैं ।*
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*आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-२४*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 74🌺 Rishi chintan se 74🌺
*🌴१४ दिसम्बर २०२२ बुधवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष षष्ठी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*शक्तियों का अपव्यय रोका जाए*
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👉 *"शक्तियों के अपव्यय को रोकने से उनका संग्रह होता है और वह संचय बढ़ते-बढ़ते कुछ ही समय में समृद्धि का रूप धारण कर लेता है ।* उन्नतिशील लोगों के कार्य-क्षेत्र भिन्न-भिन्न भले ही रहे हों पर तरीका सभी ने एक ही अपनाया है -- *"अपनी क्षमता को "दुरुपयोग" से बचाकर "सदुपयोग" में लगाना ।* इस मंत्र की साधना को जो कोई भी कर सकेगा उसे सिद्धियाँ मिले बिना रहेंगी नहीं । *लक्ष्य भौतिक हो या आध्यात्मिक, तरीका यही अपनाना पड़ता है ।* जिन्हें भौतिक प्रगति अभीष्ट है, वे अपनी भौतिक क्षमताओं का अपव्यय रोककर उस कार्य में संलग्न करते है, जिससे लाभ होने की आशा हो । इसी प्रकार आध्यात्मिक लक्ष्य वाले व्यक्ति निरंतर यह ध्यान रखते हैं कि उनकी सामर्थ्य का प्रतिकूल दिशा में तनिक भी प्रयोग हो रहा हो तो उसे रोककर अभीष्ट मार्ग पर लगाए जाने में पूरी-पूरी सावधानी बरती जाए ।
👉 *संसार के प्रगतिशील देशों ने जो प्रगति की है, उसमें किसी देवता का वरदान नहीं, वरन उनकी यह सतर्कता ही प्रधान कारण बनी हुई है कि अपनी सामर्थ्य का उचित उपयोग किया जाए ।* इन सतर्कताओं से समय का सदुपयोग, धन का सदुपयोग, वाणी का सदुपयोग, विचारों का सदुपयोग, व्यवहार का सदुपयोग, इंद्रियों का सदुपयोग, भावनाओं का सदुपयोग आदि का जिनने जितना ध्यान रखा है उन्हें उतनी ही मात्रा में प्रगति के पथ पर बढ़ चलने में , सफलता प्राप्त कर सकने में सुविधा हुई है ।
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-१७
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 75🌺 Rishi chintan se 75🌺
*🌴१३ दिसम्बर २०२२ भौमवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष पंचमी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖"मनोयोग" और "संयम"➖*
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*👍➖ महत्ता समझिए➖👍*
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👉 *यह ठीक है कि आज अपनी दशा अच्छी नहीं, कोई विशेष गुण भी दिखाई नहीं देता फिर भी निराशा का कोई कारण नहीं ।* एक शक्ति अभी भी अपने पास है और वह अंत तक पास रहेगी । *वह है "मन"* । मन की शक्ति जानने का प्रयत्न करें । छोटे-छोटे कामों में मनोयोग का प्रयोग किया करें । *एक दिन मनोबल इतना बढ़ जाएगा जब ऊँचे से ऊँचा कार्य करने में भी हिचक नहीं होगी और उत्साह पूर्वक, दृढ़तापूर्वक सफलता की मंजिलें पार करते हुए आगे बढ़ सकें ।* श्रेष्ठताए अंदर छिपी पड़ी हैं,उनका समर्थन और अभिवर्द्धन करें, दूसरों की ओर देखें वे कैसे आगे बढ़े हैं ? *दूसरों से उदाहरण लें कि उन्होंने कैसे सफलताएँ पाई हैं ।* बिना हाथ-पाँव डुलाए किसी के भाग्य देवता ने साथ नहीं दिया । चुपचाप बैठे रहेंगे तो उन्नति का अवसर पास से गुजरकर चला जाएगा, आपको केवल हाथ मसलकर रह जाना पड़ेगा ।
👉 *आत्म-संयम करें, इससे बिखरा हुआ मानसिक संस्थान जागेगा ।* निश्चेष्ट मनुष्य इसलिए होता है कि उनकी शक्तियाँ इधर-उधर बिखरी हुई होती हैं । मामूली सी शक्ति से कोई काम भी नहीं बनता । बिखरी हुई सूर्य की किरणें सारे शरीर पर असंख्य मात्रा में गिरती हैं, तो भी उनसे कुछ विशेष हलचल उत्पन्न नहीं होती, पर यदि एक-डेढ़ इंच जगह की किरणों को आतिशी शीशे से एक जगह पर एकत्रित कर दिया जाए तो इससे दावानल का रूप धारण कर एकता की क्षमता से सम्पन्न आग पैदा हो जाएगी । हम अपनी शक्तियों को इधर-उधर के बेकार के कार्यों में खर्च करते रहते हैं, जिससे जीवन में कोई विशेषता नहीं बन पाती । *"आत्म-संयम" से बिखरी हुई शक्तियाँ एक स्थान पर एकत्रित होकर अभीष्ट परिणाम के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार करती हैं ।* मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियों का जागरण *"आत्म-संयम"* के द्वारा ही होता है ।
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-१५
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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