प्रेरणादायक कहानियां भाग 39 prernadayak kahaniyan part 39



💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 191 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐टेढ़ा💐💐*


वृंदावन का एक साधू अयोध्या की गलियों में राधे कृष्ण - राधे कृष्ण जप रहा था। अयोध्या का एक साधू वहां से गुजरा तो राधे कृष्ण राधे कृष्ण सुनकर उस साधू को बोला - अरे जपना ही है तो सीता राम जपो क्या उस टेढ़े का नाम जपते हो ।

 वृन्दावन का साधू भड़क कर बोला - जरा जबान संभाल कर बात करो हमारी जबान पान खिलाती है तो लात भी खिलाती है तुमने मेरे इष्ट को टेढ़ा कैसे बोला ।

अयोध्या वाला साधू बोला इसमें गलत क्या है ।
तुम्हारे कन्हैया तो हैं ही टेढ़े । कुछ भी लिख कर देख लो- 
उनका नाम टेढ़ा - कृष्ण
उनका धाम टेढ़ा - वृन्दावन

वृन्दावन वाला साधू बोला चलो मान लिया पर उनका काम भी टेढ़ा है और वो खुद भी टेढ़ा है ये तुम कैसे कह रहे हो ?

अयोध्या वाला साधू बोला - अच्छा अब ये भी बताना पड़ेगा ? तो सुन - 
यमुना में नहाती गोपियों के कपड़े चुराना, रास रचाना, माक्खन चुराना - ये कौन से सीधे लोगों के काम हैं ?
और बता आज तक किसी ने उसे सीधे खड़े देखा है क्या कभी ? .........

वृन्दावन के साधू को बड़ी बेईज्जती महसूस हुई
और सीधे जा पहुंचा बिहारी जी के मंदिर अपना डंडा डोरिया पटक कर बोला - इतने साल तक खूब उल्लू बनाया लाला तुमने।
ये लो अपनी लकुटी, कमरिया और पटक कर बोला ये अपनी सोटी भी संभालो  
हम तो चले अयोध्या राम जी की शरण में और सब पटक कर साधू चल दिया।

अब बिहारी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे
साधू की बाँह पकड कर बोले अरे भई तुझे किसी ने गलत भड़का दिया है।
पर साधू नही माना तो बोले अच्छा जाना है तो तेरी मरजी 
पर यह तो बता राम जी सीधे और मैं टेढ़ा कैसे ? 

कहते हुए बिहारी जी कुएं की तरफ नहाने चल दिये
वृन्दावन वाला साधू गुस्से से बोला - 
" नाम आपका टेढ़ा- कृष्ण, 
धाम आपका टेढ़ा- वृन्दावन, 
काम तो सारे टेढ़े- कभी किसी के कपडे चुरा लिए 
कभी गोपियों के वस्त्र चुरा लिए और सीधे तुझे कभी 
किसी ने खड़े होते नहीं देखा तेरा सीधा है क्या ?

अयोध्या वाले साधू से हुई सारी झैं झैं और बेइज्जती
की सारी भड़ास निकाल दी। 
बिहारी जी मुस्कुराते रहे और चुपके से अपनी बाल्टी कुएं में गिरा दी।

फिर साधू से बोले अच्छा चले जाना पर जरा मदद तो
कर तनिक एक सरिया ला दे तो मैं अपनी बाल्टी निकाल लूं।
साधू सरिया ला देता है और श्री कृष्ण सरिये से बाल्टी निकालने की कोशिश करने लगते हैं।

साधू बोला इतनी अक्ल नही है क्या कि सीधे सरिये से भला बाल्टी कैसे निकलेगी ? 
सरिये को तनिक टेढ़ा कर, फिर देख कैसे एक बार में बाल्टी निकल आएगी !

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और बोले - जब सीधेपन से इस छोटे से कुएं से एक छोटी सी बाल्टी नहीं निकाल पा रहा तो तुम्हें इतने बडे़ भवसागर से कैसे पार लगाउंगा !
अरे आज का इंसान तो इतने गहरे पापों के भवसागर में डूब चुका है कि इस से निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े के ही बस की बात है !
यह सुनकर साधु बहुत प्रसन्न हुआ और राधे कृष्ण राधे कृष्ण जपने लगा ।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 192 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐अहंकार💐💐*


बूढी मां और लाचार बाप को बिलखता छोड़ कर एक ऋषि तपस्या करने के लिए वन में चले गए।तप करने के बाद जब ऋषि उठे तो देखा कि एक कौवा अपनी चोंच में एक चिड़िया का बच्चा दबाकर उड़ रहा है।

ऋषि ने क्रोध से कौवे की ओर देखा।ऋषि की आंखों से अग्नि की ज्वाला टूट पड़ी और कौवा जलकर वही खत्म हो गया।

अपनी इस सिद्धि को देकर ऋषि फूले नहीं समा रहे थे।अहंकार से भरे हुए ऋषि मठ की ओर चल पड़े और रास्ते में ऋषि एक दरवाजे पर जाकर भिक्षा के लिए खड़े हो गए।उनके बार-बार पुकारने पर कोई बाहर नहीं आया तो ऋषि क्रोधित हो गए।

उन्होंने फिर पुकारा, पर इस बार आवाज आई, स्वामी जी ठहरिए, मैं अभी साधना कर रही हूं। जब साधना पूरी हो जाएगी तब मैं आपको भिक्षा दूंगी। अब ऋषि की क्रोध की सीमा पार हो गई थी।

ऋषि क्रोध में आकर आकर बोले, दुष्टा! तुम साधना कर रही हो या एक ऋषि का अपमान कर रही हो। जानते नहीं कि इस अवहेलना का परिणाम क्या हो सकता है। भीतर से उतर आया, मैं जानती हूं आप शाप देना चाहेंगे किंतु मैं कोई कौवा नहीं जो आप के प्रकोप से जलकर नष्ट हो जाऊंगी।

जिसने जीवन भर पाला है मैं उस मां को छोड़ कर कर तुम्हें भिक्षा कैसे दे सकती हूं। ऋषि का सिद्धि का अहंकार चूर चूर हो गया| कुछ देर बाद वह महिला बाहर आई तो ऋषि ने आश्चर्य पूर्वक महिला से पूछा। अब कौन सी साधना करती है जिससे तुम मेरे बारे में सब कुछ जानती हो।

उस महिला ने कहा, महात्मन, मैं अपने पति, बच्चे, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती हूं। यही मेरी सिद्धि है..!!


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 193 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐निंदा का फल💐💐*


राजा पृथु एक दिन सुबह सुबह घोड़ों के तबेले में जा पहुंचे। तभी वहां एक साधु भिक्षा मांगने आ पहुंचा। सुबह सुबह साधु को भिक्षा मांगते देख पृथु क्रोध से भर उठे। उन्होंने साधु की निंदा करते हुए बिना विचार किये ही तबेले से घोडे की लीद उठाई और उस के पात्र में डाल दी, साधु भी शांत स्वभाव का था।
 साधु भिक्षा ले कर वहाँ से चला गया और वह लीद कुटिया के बाहर एक कोने में डाल दी। कुछ समय उपरान्त राजा पृथु शिकार के लिए जंगल में गए। राजा पृथु ने जब जंगल में देखा कि एक कुटिया के बाहर घोड़े की लीद का बड़ा सा ढेर लगा हुआ है। उन्होंने देखा कि यहाँ तो न कोई तबेला है, और न ही दूर-दूर तक कोई घोडे दिखाई दे रहे हैं। वह आश्चर्य चकित हो कुटिया में गए और साधु से बोले। "महाराज! आप हमें एक बात बताइए यहाँ कोई घोड़ा भी नहीं है, ना ही यहां कोई तबेला है तो यह इतनी सारी घोड़े की लीद कहां से आई!

 "साधु ने कहा" राजन्! यह लीद मुझे एक राजा ने भिक्षा में दी है, अब समय आने पर यह लीद उसी को खानी पड़ेगी। यह सुन राजा पृथु को पूरी घटना याद आ गई, वह साधु के पैरों में गिर कर क्षमा मांगने लगा। उन्होंने साधु से प्रश्न किया हम ने तो थोड़ी-सी लीद दी थी, पर यह तो बहुत अधिक हो गई है? साधु ने कहा "हम किसी को जो भी देते है, वह दिन-प्रतिदिन प्रफुल्लित होता जाता है और समय आने पर हमारे पास लौट कर आ जाता है, राजन! यह उसी का परिणाम है।" यह सुन कर पृथु की आँखों में अश्रु भर आये। वह साधु से विनती कर बोला "महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए। आइन्दा मैं ऐसी गलती कभी नहीं करूँगा।" मुझे कृपया कोई ऐसा उपाय बताए जिस से मैं अपने दुष्ट कर्मों का प्रायश्चित कर सकूँ!" राजा की ऐसी दुख मयी हालात देख कर साधु बोला "राजन्! एक उपाय है, आप को कोई ऐसा कार्य करना है, जो देखने मे तो गलत हो पर वास्तव में गलत न हो। जब लोग आप को गलत देखेंगे, तो आप की निंदा करेंगे। जितने ज्यादा लोग आप की निंदा करेंगे, आप का पाप उतना ही हल्का होता जाएगा। आप का अपराध निंदा करने वालों के हिस्से में आ जायेगा। यह सुन राजा पृथु ने महल में आ कर काफी सोच विचार किया और अगले दिन सुबह ही उस ने शराब की बोतल ली और चौराहे पर बैठ गया। सुबह सुबह राजा को इस हाल में देख कर सब लोग आपस में राजा की निंदा करने लगे कि कैसा राजा है, कितना निंदनीय कृत्य कर रहा है। क्या यह शोभनीय है आदि! पर निंदा की परवाह किये बिना राजा पूरे दिन शराबियों की तरह अभिनय करता रहा। इस पूरे कृत्य के पश्चात जब राजा पृथु पुनः साधु के पास पहुंचे तो लीद का ढेर के स्थान पर एक मुट्ठी लीद देख कर आश्चर्य से बोला "महाराज! यह कैसे हुआ? इतना बड़ा ढेर कहाँ गायब हो गया!" 
साधू ने कहा "राजन! यह आप की अनुचित निंदा के कारण ही हुआ है। जिन जिन लोगों ने आप की अनुचित निंदा की है, आप का पाप उन सब मे बराबर बराबर बट गया है। 

*💐💐शिक्षा💐💐*

जब हम किसी की बेवजह निंदा करते है। तो हमें उस के पाप का बोझ भी उठाना पड़ता है तथा हमे अपने किये गए, कर्मो का फल तो भुगतना ही पड़ता है। अब चाहे हँस के भुगतें या रो कर, हम जैसा किसी को देंगें, वैसा ही लौट कर उस से वापिस भी आएगा! इस लिये सदेव अच्छे कर्म करें और किसी की निंदा से बचें। साध संगत की सेवा करें, सत्संग सुने और सत्संग में फरमाए गए वचनों को अपने हृदय में बिठाए। किसी की यूं ही निंदा कर के अपने कर्मों को मत बढ़ाइए। दुनिया में जो करता है, उसे उस का फल जरूर मिलता है। इस लिए हम अपने आप को देखे, अपने अंदर झांके ना कि दूसरों की निदा करें, चुगली करें। अगर हम किसी की निंदा चुगली करने से नहीं हटते है, तो हमारे कर्मों का ढेर भी उस लीद के ढेर की तरह बढ़ता जाएगा। इस लिए अच्छे कर्म करें, अच्छे कर्म करना ही जीव का कर्त्तव्य है और इसी से जीवन सफल हो सकता है।


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 194 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐इच्छापूर्ति वृक्ष💐💐*


एक घने जंगल में एक इच्छा पूर्ति वृक्ष था, उसके नीचे बैठ कर कोई भी इच्छा करने से वह तुरंत पूरी हो जाती थी। यह बात बहुत कम लोग जानते थे क्योंकि उस घने जंगल में जाने की कोई हिम्मत ही नहीं करता था।

एक बार संयोग से एक थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी नींद लग गयी। जागते ही उसे बहुत भूख लगी, उसने आस पास देखकर सोचा- काश कुछ खाने को मिल जाए!'

तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई। व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शांत होने के बाद सोचने लगा.. काश कुछ पीने को मिल जाए..

तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए।
 
शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा- कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ। हवा में से खाना पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा न ही सुना..जरूर इस पेड़ पर कोई भूत रहता है जो मुझे खिला पिला कर बाद में मुझे खा लेगा।

ऐसा सोचते ही तत्काल उसके सामने एक भूत आया और उसे खा गया।

इस प्रसंग से आप यह सीख सकते है कि हमारा मस्तिष्क ही इच्छापूर्ति वृक्ष है आप जिस चीज की प्रबल कामना करेंगे वह आपको अवश्य मिलेगी।

अधिकांश लोगों को जीवन में बुरी चीजें इसलिए मिलती हैं.....क्योंकि वे बुरी चीजों की ही कामना करते हैं।

इंसान ज्यादातर समय सोचता है- कहीं बारिश में भीगने से मै बीमार न हों जाँऊ.. और वह बीमार हो जाता हैं..!
                    
इंसान सोचता है - मेरी किस्मत ही खराब है .. और उसकी किस्मत सचमुच खराब हो जाती हैं ..!
        
इस तरह आप देखेंगे कि आपका अवचेतन मन इच्छापूर्ति वृक्ष की तरह आपकी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण करता है..! इसलिए आपको अपने मस्तिष्क में विचारों को सावधानी से प्रवेश करने की अनुमति देनी चाहिए।

यदि गलत विचार अंदर आ जाएगे तो गलत परिणाम मिलेंगे। विचारों पर काबू रखना ही अपने जीवन पर काबू करने का रहस्य है..!

आपके विचारों से ही आपका जीवन या तो स्वर्ग बनता है या नरक उनकी बदौलत ही आपका जीवन सुखमय या दुख:मय बनता है।
विचार जादूगर की तरह होते है, जिन्हें बदलकर आप अपना जीवन बदल सकते है..इसलिये सदा सकारात्मक सोच रखें।



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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 195.  💮





*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*



*💐💐जोरू का गुलाम💐💐*


एक सेठ जी थे उनके घर में एक गरीब आदमी काम करता था जिसका नाम था रामलाल जैसे ही राम लाल के फ़ोन की घंटी बजी रामलाल डर गया। तब सेठ जी ने पूछ लिया ??

"रामलाल तुम अपनी बीबी से इतना क्यों डरते हो?"

"मै डरता नही सर् उसकी कद्र करता हूँ उसका सम्मान करता हूँ।"उसने जबाव दिया।

मैं हँसा और बोला-" ऐसा कया है उसमें।ना सुरत ना पढी लिखी।"

जबाव मिला-" कोई फरक नही पडता सर् कि वो कैसी है पर मुझे सबसे प्यारा रिश्ता उसी का लगता है।"

"जोरू का गुलाम।"मेरे मुँह से निकला।"और सारे रिश्ते कोई मायने नही रखते तेरे लिये।"मैने पुछा।

उसने बहुत इत्मिनान से जबाव दिया-
"सर् जी माँ बाप रिश्तेदार नही होते।
वो भगवान होते हैं। 
उनसे रिश्ता नही निभाते उनकी पूजा करते हैं।

भाई बहन के रिश्ते जन्मजात होते हैं , 
दोस्ती का रिश्ता भी मतलब का ही होता है।

आपका मेरा रिश्ता भी जरूरत और पैसे का है पर,
पत्नी बिना किसी करीबी रिश्ते के होते हुए 
भी हमेशा के लिये हमारी हो जाती है 
अपने सारे रिश्ते को पीछे छोडकर। 
और हमारे हर सुख दुख की सहभागी बन जाती है 
आखिरी साँसो तक।"

मै अचरज से उसकी बातें सुन रहा था।
वह आगे बोला-"सर् जी, पत्नी अकेला रिश्ता नही है, 
बल्कि वो पुरा रिश्तों की भण्डार है।

जब वो हमारी सेवा करती है हमारी देख भाल करती है , 
हमसे दुलार करती है तो एक माँ जैसी होती है।

जब वो हमे जमाने के उतार चढाव से आगाह करती है,
और मैं अपनी सारी कमाई उसके हाथ पर रख देता हूँ 
क्योकि जानता हूँ वह हर हाल मे मेरे घर का भला करेगी 
तब पिता जैसी होती है।

जब हमारा ख्याल रखती है हमसे लाड़ करती है, 
हमारी गलती पर डाँटती है, 
हमारे लिये खरीदारी करती है तब बहन जैसी होती है।

जब हमसे नयी नयी फरमाईश करती है, 
नखरे करती है, रूठती है , 
अपनी बात मनवाने की जिद करती है तब बेटी जैसी होती है।

जब हमसे सलाह करती है मशवरा देती है ,
परिवार चलाने के लिये नसीहतें देती है, 
झगडे करती है तब एक दोस्त जैसी होती है।

जब वह सारे घर का लेन देन , खरीददारी , घर चलाने की जिम्मेदारी उठाती है तो एक मालकिन जैसी होती है।

और जब वही सारी दुनिमा को यहाँ तक 
कि अपने बच्चो को भी छोडकर हमारे पास मे आती है 

तब वह पत्नी, प्रेमिका, प्रेयसी, अर्धांगिनी , हमारी प्राण 
और आत्मा होती है जो अपना सब कुछ 
सिर्फ हम पर न्योछावर करती है।"

मैं उसकी इज्जत करता हूँ तो क्या गलत करता हूँ सर्।"

उसकी बाते सुनकर सेठ जी के आखों में पानी आ गया 

इसे कहते है पति पत्नी का प्रेम। 👈  
ना की जोरू का गुलाम। ✍

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