🌺 ऋषि चिंतन से 121🌺 Rishi chintan se 121🌺
*🥀//२५ मई २०२३ गुरुवार//🥀*
*💐ज्येष्ठ शुक्लपक्ष षष्ठी २०८०💐*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*--मन के दास नहीं, स्वामी बनें--*
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👉 *"मन" शरीर का स्वामी है, इंद्रियों का प्रवाह मन के आदेशानुसार काम करता है ।* बलवान मन शरीर को ड्राइवर की भांति जिधर चाहे उधर हाँका करता है । *"मन" ही अपने नियमित जीवन का साफ़- सुथरा निष्कंटक मार्ग तैयार करता है और मृत्यु का रास्ता भी "मन" ही बनाता है ।* विचार उस मार्ग की सीमा को निश्चित करते हैं ।
👉 *हमारे मानसिक संकल्प, मनोबल और दृढ़ इच्छाशक्ति में वह कार्योत्पादक शक्ति प्रस्तुत है जो सदैव कार्योत्पादक फलों को ही उत्पन्न करती है ।* जब-जब हम अपने मन को दुर्बल, अहितकर भावों से भरते हैं, अपनी बुराई, बीमारी, हानि, मृत्यु या बुढ़ापे की बात सोचते हैं, तब-तब हम अपनी शक्तियों को पंगु कर लेते हैं । स्वयं अपना गला अपने ही हाथों घोंटते हैं ।
👉 प्रत्येक मनुष्य में ऐसी ईश्वर प्रदत्त शक्ति अंतर्निहित है, जिससे वह आयु को बढ़ा सकता है, अपनी आयु दीर्घ कर सकता है किंतु इसके लिए यह आवश्यक है कि वह अपने मन पर काबू करे, चित्त संयम का अभ्यास करें और दूसरों के बुरे संकेतों का दास न बने । *जब तक हमें अपने ऊपर विश्वास है, जब तक हम दुर्भाग्य का रोना नहीं रोते हैं, दूसरों का अंधानुकरण नहीं करते हैं, तब तक हम अपने भावी के सृष्टा रह सकते हैं ।*
👉 एक प्राचीन ऋषि का कथन है - *मनुष्य मरता नहीं, प्रत्युत वह अपने को स्वयं ही मारता है ।* यह कथन अनेकों के विषयों में सत्य है । अपने मन द्वारा वे वैसा विकृत काल्पनिक चित्र तैयार करते हैं कि दीर्घायु नहीं हो पाते । मनुष्य अपने ही विचारों से अल्प या दीर्घजीवी बनता है । चाहे गुप्त रूप से मन के किसी आंतरिक कोने में कोई कल्पना करते रहें तो भी परमेश्वर उसे देखते हैं और उसका फल देते हैं । *’मन एवं मनुष्याणां कारण बंध मोक्षयो:"* यह अटल सिद्धांत है ।
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*दीर्घ जीवन के रहस्य - पृष्ठ-२०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 122 🌺 Rishi chintan se 122 🌺
*🥀//२६ मई २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्ष सप्तमी२०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*"धैर्य" -- एक महत्वपूर्ण गुण है*
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👉 *संसार में रहते हुए विपरीत परिस्थितियों अथवा आपत्तियों का आना स्वाभाविक है ।* विशेषकर यदि हम कोई महत्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं तो उसमें अनेक कठिनाइयों का मुकाबला करना अनिवार्य ही समझना चाहिए । *अनेक व्यक्ति ऐसे ही भय के कारण किसी भारी काम में हाथ नहीं डालते ।* संभव है वे इस जीवन में आपत्तियों से बच जाये पर वे किसी प्रकार की प्रगति, उन्नति भी नहीं कर सकते और एक तत्वदर्शी की निगाह में उनका जीवन कीड़े-मकोड़ों से बढ़कर नहीं होता ।
👉 *जिसने शरीर धारण किया है उसे सुख-दु:ख दोनों का ही अनुभव करना होगा ।* शरीर धारियों को केवल सुख ही सुख या केवल दु:ख कभी प्राप्त नहीं हो सकता । *जब यही बात है कि शरीर धारण करने पर सुख-दु:ख दोनों का ही भोग करना है तो फिर दु:ख में अधिक उद्विग्न क्यों हो जाँय ? दुख-सु:ख तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं । हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें । जिन्होंने इस रहस्य को समझ कर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है, संसार में वही सुखी समझे जाते हैं ।* दु:खों की भयंकरता को देखकर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है *किंतु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता वहीं पुरुषसिंह "धैर्यवान" कहलाता है ।* आखिर हम अधीर क्यों होते हैं ? इसका कारण हमारे हृदय की कमजोरी के सिवा और कुछ भी नहीं है । इस बात को सभी जानते हैं कि आज तक संसार में ब्रह्मा से लेकर कृमि कीट पर्यंत संपूर्ण रुप से सुखी कोई भी नहीं हुआ है । सभी को कुछ न कुछ दु:ख अवश्य हुए हैं । फिर भी मनुष्य दु:खों के आगमन से व्याकुल होता है तो यह उसकी कमजोरी ही कही जा सकती है । *महापुरुषों के सिर पर सींग नहीं होते ।* वह भी हमारी तरह दो हाथ और दो पैर वाले साढ़े तीन हाथ के मनुष्याकार जीव होते हैं । किंतु उनमें विशेषता यह होती है कि दु:खों के आने पर वह हमारी तरह अधीर नहीं हो जाते । *उन्हें प्रारब्ध कर्मों का भोग समझकर वे प्रसन्नता पूर्वक सहन करते हैं ।* पांडव दु:खों से कातर होकर अपने भाइयों के दास बन गए होते तो, मोरध्वज पुत्र शोक से दु:खी होकर मर गए होते तो, राजा हरिश्चंद्र राज्य के लोभ से अपने वचनों से फिर गए होते तो, श्री रामचंद्र वन के दु:खों की भयंकरता से घबराकर अयोध्यापुरी में रह गए होते तो, शिबी राजा ने यदि शरीर के कटने के दु:खों से कातर होकर कबूतर को बाज के लिए दे दिया होता तो ? तो इनका नाम तक कौन जानता ? *यह भी असंख्य नरपतियों की भांति काल के गाल में चले गए होते, किंतु इनका नाम अभी तक ज्यों का त्यों ही जीवित है इसका एकमात्र कारण उनका "धैर्य" ही है ।*
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*➖आपत्तियों में धैर्य➖ पृष्ठ-१२*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 123🌺 Rishi chintan se 123 🌺
*🥀//२७ मई २०२३ शनिवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष अष्टमी२०८०🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*प्रत्येक परिस्थिति में आगे बढिये*
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👉 *मनुष्य जीवन उन्नति करने के लिए है ।* कहने के लिए संसार में अनेक शक्तिशाली प्राणी मौजूद हैं, पर अन्य किसी प्राणी में वह विवेक शक्ति नहीं पाई जाती जिससे भलाई-बुराई, लाभ-हानि का निर्णय करके उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हुआ जा सके । यह विशेषता केवल मनुष्य को ही प्राप्त है कि वह इच्छानुसार नए-नए मार्ग खोज कर अगम्य स्थलों पर जा पहुंचता है और महत्वपूर्ण कार्यों को संपादित करता है ।
👉 *"अगर मुझे अमुक सुविधाएं मिलती तो मैं ऐसा करता"* इस प्रकार की बातें करने वाले एक झूठी आत्मप्रवंचना किया करते हैं । अपनी नालायकी को भाग्य के ऊपर, ईश्वर के ऊपर थोप कर खुद निर्दोष बनना चाहते हैं । *यह एक असंभव मांग है कि यदि मुझे अमुक परिस्थिति मिलती तो मैं ऐसा करता ।* जैसी परिस्थिति की कल्पना की जा रही है यदि वैसी मिल जाए तो वह भी अपूर्ण मालूम पड़ेगी और उससे अच्छी स्थिति का अभाव प्रतीत होगा । *जिन लोगों को धन, विद्या, मित्र, पद आदि पर्याप्त मात्रा में मिले हुए हैं, देखते हैं उनमें से भी अनेकों का जीवन बहुत अस्त-व्यस्त और असंतोषजनक स्थिति में पड़ा हुआ है ।* धन आदि का होना उनके आनंद की वृद्धि न कर सका वरन् जी का जंजाल बन गया । *जिसे जीवनकला का ज्ञान नहीं, उसे गरीबी में, अभावग्रस्त अवस्था में थोड़ा बहुत आनंद तब भी है, यदि वह संपन्न होता तो उन संपत्तियों का दुरुपयोग करके अपने को और भी अधिक विपत्ति ग्रस्त बना लेता ।*
👉 *यदि आपके पास आज मनचाही वस्तु नहीं है, तो निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है ।* टूटी फूटी चीजें हैं उन्हीं की सहायता से अपनी कला को प्रदर्शित करना प्रारंभ कर दीजिए । *जब चारों और घोर घना अंधकार छाया होता है तो वह दीपक, जिसमें छदाम का दिया, आधे पैसे का तेल और दमड़ी की बत्ती है । कुल मिलाकर एक पैसे की भी पूंजी नहीं है, "चमकता" है ।* अपने प्रकाश से लोगों के रुके हुए कामों को चालू कर देता है जबकि हजारों पैसे के मूल्य वाली वस्तुएं चुपचाप पड़ी होती है । यह एक पैसे की पूंजी वाला दीपक प्रकाशमान होता है, अपनी महत्ता प्रकट करता है, लोगों का प्यारा बनता है, प्रशंसित होता है और अपने अस्तित्व को धन्य बनाता है । *क्या दीपक ने कभी ऐसा रोना रोया कि मेरा मेरा आकार बड़ा होता तो ऐसा बड़ा प्रकाश करता ? दीपक को कर्म हीन नालायकों की भांति बेकार शेखचिल्लियों के से मंसूबे बांधने की फुर्सत नहीं है । वह अपनी आज की परिस्थिति, हैसियत, औकात को देखता है । उसका आदर करता है और अपनी केवल मात्र एक पैसे की पूंजी से कार्य आरंभ कर देता है ।* उसका कार्य छोटा है बेशक पर उस छोटेपन में भी में भी सफलता का उतना ही अंश है जितना कि सूर्य और चंद्र के चमकने की सफलता में है । यदि आंतरिक संतोष, धर्म, परोपकार की दृष्टि से तुलना की जाए तो अपनी अपनी मर्यादा के अनुसार दोनों का ही कार्य एक सा है दोनों का ही महत्व समान है दोनों की सफलता एक सी है
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*➖आपत्तियों में "धैर्य"➖ पृष्ठ-१५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/H09kJ-NcPjA
🌺 ऋषि चिंतन से 124🌺 Rishi chintan se 124 🌺
*🥀-२८ मई २०२३ रविवार-🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष अष्टमी२०८०🍁*
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*‼️ऋषि चिंतन‼️*
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*➖❗आशावाद❗➖*
*〰️अमृतोपम औषधि〰️*
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👉 *आशावाद मनुष्य के लिए अमृत तुल्य है ।* जैसे तृषित को शीतल जल से, रोगी को औषधि से, अन्धकार को प्रकाश से, वनस्पति को सूर्य से लाभ होता है, उसी भांति आशावाद की संजीवनी बूटी से मृत प्राय: मनुष्य में जीवन शक्ति का प्रादुर्भाव होता है । *आशावद वह दिव्य प्रकाश है जो हमारे जीवन को उत्तरोत्तर परिपुष्ट, समृद्धशाली और प्रगतिशील बनाता है ।* सुख सौन्दर्य एवं अलौकिक छटा से उसे विभूषित कर उसका पूर्ण विकास करता है । उसमें माधुर्य का संचार कर विघ्न बाघा, दु:ख, क्लेशों और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने वाली गुप्त मनः शक्ति जाग्रत करता है ।
👉 *आत्मा की शक्ति से देदीप्यमान आशावादी उम्मीद का पल्ला पकड़े प्रलोभनों को रौंदता हुआ अग्रसर होता है ।* वह पग-पग पर विचलित नहीं होता, उसे कोई पराजित नहीं कर सकता, संसार की कोई शक्ति उसे नहीं दबा सकती, क्योंकि *सब शक्तियों का विकास करने वाली 'आशा' की शक्ति सदैव उसकी आत्मा को तेजोमय करती है ।*
👉 संसार के कितने ही व्यक्ति अपने जीवन को उचित, श्रेष्ठ और श्रेय के मार्ग पर नहीं लगाते । वे किसी एक उद्देश्य को स्थिर नहीं करते, न वे अपने-अपने मानसिक संकल्प को इतना दृढ़ ही बनाते हैं कि निज प्रयत्नों में सफल हो सकें । सोचते कुछ और हैं, काम किसी एक पदार्थ के लिए करते हैं, आशा किसी दूसरे की ही करते हैं। करील के वृक्ष बोकर आम खाने की अभिलाषा रखते हैं। हाथ में लिए हुए कार्य के विपरीत मानसिक भाव रखने से हमें अपनी निर्दिष्ट वस्तु कदापि प्राप्त नहीं हो सकती । बल्कि हम इच्छित वस्तु से और भी दूर जा पड़ते हैं । तभी तो नाकामयाबी लाचारी. तंगी, क्षुद्रता प्राप्त होती है। *अपने को भाग्य हीन समझ लेना, बेबसी की बातों को लेकर झींकना और दूसरों की इष्ट सिद्धि पर कुढ़ना हमें सफलता से दूर ले जाता है ।* विरोधी भाव रखने से मनुष्य उन्नत अवस्था में कदापि नहीं पहुँच सकता । *संसार के साथ अविरोधी रहो, क्यों कि विरोध संसार की उत्कृष्ट वस्तुओं को अपने निकट नहीं आने देता और अविरोध उत्कृष्ट वस्तुओं का आकर्षक बिन्दु है।*
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*➖मानसिक संतुलन➖ पृष्ठ-२१*
*💦पं. श्रीराम शर्मा, आचार्य💦*
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🌺 ऋषि चिंतन से 125🌺 Rishi chintan se 125 🌺
*🥀//२९ मई २०२३ सोमवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष नवमी२०८०🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖समय का महत्व समझिए➖*
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👉 *मनुष्य का "समय" मनोयोग एवं परिश्रमपूर्वक किसी दिशा में भी लग जाए, उसी में चमत्कार उत्पन्न हो जाएगा।* संसार के महापुरुषों की प्रधान विशेषता यही रही है कि उन्होंने अपने जीवन का एक-एक क्षण निरंतर काम में लगाए रखा है। वह भी पूरी दिलचस्पी और श्रमशीलता के साथ। यह रीति-नीति जो आदमी अपनाले और अपने जीवन-क्रम की दिशा निर्धारित कर ले, वह हर क्षेत्र में सफलता की ऊँची मंजिल पर सहज ही पहुँच सकता है। *मनुष्य की सामर्थ्य का अंत नहीं, पर कठिनाई इतनी ही है कि वह चारों तरफ बिखरी और अस्त-व्यस्त पड़ी रहती है। उसका एकीकरण, केंद्रीकरण जो व्यक्ति कर लेगा, अपनी प्रचुर शक्ति का परिचय सहज ही दे सकेगा।*
👉 योजनाबद्ध कार्य-निर्धारण करने और उसका तत्परतापूर्वक निर्वाह करने से ही विज्ञजन अनेकानेक सफलताएँ अर्जित करते हैं। *"समय" ईश्वर-प्रदत्त संपदा है, उसे श्रम में मनोयोगपूर्वक नियोजित करके विभिन्न प्रकार की संपदाएँ, विभूतियाँ अर्जित की जा सकती हैं।* जो समय गँवाता है, उसे जीवन गँवाने वाला कहा जाता है। कौन कितने दिन जिया, इसका लेखा-जोखा जन्मदिन से लेकर मरणपर्यंत के दिन गिनकर नहीं, वरन इस आधार पर लगाया जाना चाहिए कि किसने अपने समय का उपयोग महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया। *"समय" के सच्चे पुजारी एक क्षण भी नष्ट नहीं होने देते, अपने एक- एक क्षण को हीरे-मोतियों से तोलने लायक बनाकर उसका सदुपयोग करते हैं और सफल और श्रेयाधिकारी महामानव बनते हैं ।*
👉 *जो "समय" का सुदपयोग नहीं कर पाते, वे जीवन जीते नहीं, काटते हैं, नष्ट करते हैं। कोई कितने वर्ष जिया यह जीवन नहीं, किसने कितने "समय" का सदुपयोग कर लिया, वही जीवन की लंबाई है।"*
👉 *"समय" की बरबादी का अर्थ है-अपने जीवन को बरबाद करना।* जीवन के जो क्षण मनुष्य यों ही आलस्य अथवा प्रमाद में खो देता है, वे फिर कभी लौटकर वापस नहीं आते। जीवन प्याले की जितनी बूँद गिर जाती हैं, प्याला उतना ही खाली हो जाता है। प्याले की वह रिक्तता फिर किसी भी प्रकार भरी नहीं जा सकती। *मनुष्य जीवन के जितने क्षणों को बरबाद कर देता है, उतने क्षणों में वह जितना काम कर सकता था, उसकी कमी फिर वह किसी प्रकार भी पूरी नहीं कर सकता।*
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*संतुलित जीवन के व्यावहारिक सूत्र पृष्ठ-०४*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/D5_1Dv_0YGw
