प्रेरणादायक कहानियां भाग 48 prernadayak kahaniyan part 48


💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 236💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐धैर्य💐💐*


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एक बार एक व्यक्ति अकेला उदास बैठा कुछ सोच रहा था कि उसके पास भगवान आये. भगवन को अपने समक्ष देख उस व्यक्ति ने पुछा मुझे ज़िन्दगी में बहुत असफलताएं मिली, अब मैं निराश हो चूका हूँ. हे भगवन, मुझे बताओ कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?

भगवान ने उस व्यक्ति को एक लाल रंग का चमकदार पत्थर दिया और कहा “जाओ इस पत्थर की कीमत का पता लगा लो, तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कीमत का भी पता चल जाएगा. लेकिन ध्यान रहे कि इस पत्थर को बेचना नहीं है”

वो व्यक्ति उस लाल चमकदार पत्थर को लेकर सबसे पहले एक फल वाले के पास गया और कहा नवनीत“भाई..ये पत्थर कितने का खरीदोगे?”

फल वाले ने पत्थर को ध्यान से देखा और कहा “मुझसे 10 संतरे ले जाओ और ये पत्थर मुझे दे दो।

उस व्यक्ति ने कहा कि नहीं मैं ये पत्थर बेच नहीं सकता. फिर वो आदमी एक सब्ज़ी वाले के पास गया और उसे कहा “भाई …ये लाल पत्थर कितने का खरीदोगे?”

सब्ज़ी वाले ने कहा कि मुझसे एक बोरी आलू की ले जाओ और ये पत्थर मुझे बेच दो लेकिन भगवान् के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने कहा कि नहीं मैं ये बेच नहीं सकता।

फिर वो व्यक्ति उस पत्थर को लेकर एक सुनियार की दूकान में गया जहाँ कई तरह-तरह के आभूषण पड़े हुए थे. उस व्यक्ति ने सुनियार को वो पत्थर दिखाया और उस सुनियार ने बड़े गौर से उस पत्थर को देखा और फिर कहा “मैं तुम्हे 1 करोड़ रुपये दूंगा, ये पत्थर मुझे बेच दो.” फिर उस व्यक्ति ने सुनियार से माफ़ी मांगी और कहा कि ये पत्थर मैं बेच नहीं सकता। सुनियार ने फिर कहा “अच्छा चलो ठीक है, मैं तुम्हे 2 करोड़ दूंगा, ये पत्थर मुझे बेच दो।

सुनियर की बात सुनकर वो व्यक्ति चौंक गया लेकिन सुनियार को मना कर वो आगे बढ़ गया और एक हीरे बेचने वाले की दूकान में गया।

हीरे के व्यापारी ने उस लाल चमकदार पत्थर को पूरे 10 मिनट तक देखा और फिर एक मलमल का कपडा लिया और उस पत्थर को उस पे रख दिया। फिर उस व्यापारी ने अपना सर उस पत्थर पर लगा कर माथा टेका और कहा “तुम्हे ये कहा मिला, ये इस दुनिया में सबसे अनमोल रत्न है. अगर इस दुनिया की पूरी दौलत भी लगा दी जाए तो इस पत्थर को नहीं खरीद सकता।

ये सुन वो व्यक्ति बहुत हैरान हुआ और सीधा भगवान के पास गया और उन्हें आप बीती बताई और फिर उसने भगवान से पुछा “हे भगवन अब मुझे बताईये कि मेरे इस जीवन की क्या कीमत है?”

भगवान ने कहा “फल वाले ने, सब्ज़ी वाले ने, सुनियार ने और हीरे के व्यापारी ने तुम्हे जीवन की कीमत बता दी थी. हे मनुष्य, किसी के लिए तुम एक पत्थर के टुकड़े सामान हो और किसी के लिए बहुमूल्य रत्न समान। 

हर किसी ने अपनी जानकारी के अनुसार तुम्हे उस पत्थर की कीमत बताई लेकिन उस हीरे के व्यापारी ने इस पत्थर को पहचान लिया। ठीक उसी तरह कुछ लोग तुम्हारी कीमत नहीं पहचानते इसलिए ज़िन्दगी में कभी निराश मत हो।

इस दुनिया में हर मनुष्य के पास कोई ना कोई ऐसा हुनर होता है जो सही वक़्त पर निखार कर आता है लेकिन उसके लिए परिश्रम और धैर्य की ज़रूरत है।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 237💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*

 
 *💐💐कुंदन काका की कुल्हाड़ी💐💐* 

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कुंदन काका एक फैक्ट्री में पेड़ काटने का काम करते थे. फैक्ट्री मालिक उनके काम से बहुत खुश रहता और हर एक नए मजदूर को उनकी तरह कुल्हाड़ी चलाने को कहता। यही कारण था कि ज्यादातर मजदूर उनसे जलते थे।

एक दिन जब मालिक काका के काम की तारीफ कर रहे थे तभी एक नौजवान हट्टा-कट्टा मजदूर सामने आया और बोला, “मालिक! आप हमेशा इन्ही की तारीफ़ करते हैं, जबकि मेहनत तो हम सब करते हैं… बल्कि काका तो बीच-बीच में आराम भी करने चले जाते हैं, लेकिन हम लोग तो लगातार कड़ी मेहनत करके पेड़ काटते हैं।”

इस पर मालिक बोले, “भाई! मुझे इससे मतलब नहीं है कि कौन कितना आराम करता है, कितना काम करता है, मुझे तो बस इससे मतलब है कि दिन के अंत में किसने सबसे अधिक पेड़ काटे….और इस मामले में काका आप सबसे 2-3 पेड़ आगे ही रहते हैं…जबकि उनकि उम्र भी हो चली है.”
मजदूर को ये बात अच्छी नहीं लगी।

वह बोला-
अगर ऐसा है तो क्यों न कल पेड़ काटने की प्रतियोगिता हो जाए. कल दिन भर में जो सबसे अधिक पेड़ काटेगा वही विजेता बनेगा।

मालिक तैयार हो गए।

अगले दिन प्रतियोगिता शुरू हुई. मजदूर बाकी दिनों की तुलना में इस दिन अधिक जोश में थे और जल्दी-जल्दी हाथ चला रहे थे।

लेकिन कुंदन काका को तो मानो कोई जल्दी न हो. वे रोज की तरह आज भी पेड़ काटने में जुट गए।

सबने देखा कि शुरू के आधा दिन बीतने तक काका ने 4-5 ही पेड़ काटे थे जबकि और लोग 6-7 पेड़ काट चुके थे. लगा कि आज काका हार जायेंगे.
ऊपर से रोज की तरह वे अपने समय पर एक कमरे में चले गए जहाँ वो रोज आराम करने जाया करते थे।

सबने सोचा कि आज काका प्रतियोगिता हार जायेंगे।

बाकी मजदूर पेड़ काटते रहे, काका कुछ देर बाद अपने कंधे पर कुल्हाड़ी टाँगे लौटे और वापस अपने काम में जुट गए।

तय समय पर प्रतियोगिता ख़त्म हुई.

अब मालिक ने पेड़ों की गिनती शुरू की।

बाकी मजदूर तो कुछ ख़ास नहीं कर पाए थे लेकिन जब मालिक ने उस नौजवान मजदूर के पेड़ों की गिनती शुरू की तो सब बड़े ध्यान से सुनने लगे…।

1..2…3…4…5…6..7…8…9..10…और ये 11!


सब ताली बजाने लगे क्योंकि बाकी मजदूरों में से कोई 10 पेड़ भी नहीं काट पाया था।

अब बस काका के काटे पेड़ों की गिनती होनी बाकी थी…।

मालिक ने गिनती शुरू कि…1..2..3..4..5..6..7..8..9..10 और ये 11 और आखिरी में ये बारहवां पेड़….मालिक ने ख़ुशी से ऐलान किया…।

कुंदन काका प्रतियोगिता जीत चुके थे…उन्हें 1000 रुपये इनाम में दिए गए…तभी उस हारे हुए मजदूर ने पूछा, “काका, मैं अपनी हार मानता हूँ..लेकिन कृपया ये तो बताइये कि आपकी शारीरिक ताकत भी कम है और ऊपर से आप काम के बीच आधे घंटे विश्राम भी करते हैं, फिर भी आप सबसे अधिक पेड़ कैसे काट लेते हैं?”

इस पर काका बोले-
बेटा बड़ा सीधा सा कारण है इसका जब मैं आधे दिन काम करके आधे घंटे विश्राम करने जाता हूँ तो उस दौरान मैं अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज कर लेता हूँ, जिससे बाकी समय में मैं कम मेहनत के साथ तुम लोगों से अधिक पेड़ काट पाता हूँ।

सभी मजदूर आश्चर्य में थे कि सिर्फ थोड़ी देर धार तेज करने से कितना फर्क पड़ जाता है।

*💐💐शिक्षा💐💐*

दोस्तों, आप जिस क्षेत्र में भी हों…. आपकी योग्यता आपकी कुल्हाड़ी है जिससे आप अपने पेड़ काटते हैं… यानी अपना काम पूरा करते हैं…. शुरू में आपकी कुल्हाड़ी जितनी भी तेज हो…समय के साथ उसकी धार मंद पड़ती जाती है…

उदाहरण के लिए- भले ही आप कम्प्यूटर विज्ञान के अग्रणी रहे हों…लेकिन अगर आप नयी तकनीक, नयी भाषा नहीं सीखेंगे तो कुछ ही सालों में आप पुराने हो जायेंगे आपकी आपकी धार मंद पड़ जायेगी।

इसीलिए हर एक को कुंदन काका की तरह समय-समय पर अपनी धार तेज करनी चाहिए…अपने कार्य क्षेत्र से जुड़ी नयी बातों को सीखना चाहिए, नयी कला को प्राप्त करना चाहिए और तभी सैकड़ों-हज़ारों लोगों के बीच अपनी अलग पहचान बना पायेंगे, आप अपनी क्षेत्र के विजेता बन पायेंगे।


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 238 💮


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*💐💐सोने का सिक्का💐💐*

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किसी दूर राज्य में एक राजा शासन करता था। राजा बड़ा ही परोपकारी स्वभाव का था, प्रजा का तो भला चाहता ही था। इसके साथ ही पड़ोसी राज्यों से भी उसके बड़े अच्छे सम्बन्ध थे। राजा किसी भी इंसान को दुःखी देखता तो उसका ह्रदय द्रवित हो जाता और वो अपनी पूरी श्रद्धा से जनता का भला करने की सोचता।

 एक दिन राजा का जन्मदिन था। उस दिन राजा सुबह सवेरे उठा तो बड़ा खुश था। राजा अपने सैनिकों के साथ वन में कुछ दूर घूमने निकल पड़ा। आज राजा ने खुद से वादा किया कि मैं आज किसी एक व्यक्ति को खुश और संतुष्ट जरूर करूँगा।
           
यही सोचकर राजा सड़क से गुजर ही रहा था कि उसे एक भिखारी दिखाई दिया। राजा को भिखारी की दशा देखकर बड़ी दया आई। उसने भिखारी को अपने पास बुलाया और उसे एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी सिक्का लेके बड़ा खुश हुआ, अभी आगे चला ही था कि वो सिक्का भिखारी के हाथ से छिटक कर नाली में गिर गया। भिखारी ने तुरंत नाली में हाथ डाला और सिक्का ढूंढने लगा।

राजा को बड़ी दया आई कि ये बेचारा कितना गरीब है, राजा ने भिखारी को बुलाकर एक सोने का सिक्का और दे दिया। अब तो भिखारी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उसने सिक्का लिया और जाकर फिर से नाली में हाथ डाल के खोया सिक्का ढूंढने लगा।

राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने फिर भिखारी को बुलाया और उसे एक चांदी का सिक्का और दिया क्यूंकि राजा ने खुद से वादा किया था कि एक इंसान को खुश और संतुष्ट जरूर करेगा। लेकिन ये क्या? चांदी का सिक्का लेकर भी उस भिखारी ने फिर से नाली में हाथ डाल दिया और खोया सिक्का ढूंढने लगा।

राजा को बहुत बुरा लगा उसने फिर भिखारी को बुलाया और उसे एक और सोने का सिक्का दिया। राजा ने कहा – अब तो संतुष्ट हो जाओ….

भिखारी बोला – महाराज, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूँगा जब मुझे वो नाली में गिरा सोने का सिक्का मिल जायेगा।

दोस्तों हम भी उस भिखारी की ही तरह हैं और वो राजा हैं भगवान। अब भगवान हमें कुछ भी देदे हम संतुष्ट हो ही नहीं सकते। ये मेरी या आपकी बात नहीं है बल्कि पूरी मानव जाति कभी संतुष्ट नहीं होती। पैसा चाहिए, पैसा मिले तो अब कार चाहिए, कार मिले तो और बड़ी चाहिए और यही क्रम चलता जाता है

भगवान ने हमें ये अनमोल शरीर दिया है लेकिन हम जिंदगी भर नाली वाला सोने का सिक्का ही ढूंढते रहते हैं। आप चाहे कितने भी अमीर हो जाओ, चाहे कितना भी धन कमा लो आप संतुष्ट नहीं हो सकते। इस अनमोल पावन शरीर को पाकर भी हम संसार रूपी नाली से सिक्के ही ढूढ़ते रहते हैं। दोस्तों भगवान के दिए इस शरीर रूपी धन का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करें, भिखारी ना बनें..!!



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 *💐💐कबूतर का घोंसला💐💐*

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एक बार शिक्षक नवनीत शाम के समय विद्यालय के बाहर शिष्यों के साथ बेठे थे। तभी वहां एक कबूतर का जोड़ा उड़ता हुआ आ गया। उन्हें देख कर शिक्षक नवनीत को एक कहानी याद आई और उन्होंने शिष्यों को कहानी सुनाना शुरू किया।

एक पेड़ पर एक कबूतर और कबूतरी रहते थे। कुछ समय बाद कबूतरी ने उसी पेड़ की टहनी पर तीन अंडे दिए। एक दिन कबूतर और कबूतरी दोपहर के समय खाना ढूंढते हुए कुछ दूर निकल गये। तभी कहीं से एक लोमड़ी आ गयी। वह भी भोजन की तलाश में पेड़ पर चढ़ी। जहां उसे कबूतर के अंडे मिल गये और वो अंडों को खा गयी।
जब कबूतर का जोड़ा वापस आया तो अंडे न पा कर बहुत परेशान हो गया। दोनों को बहुत बुरा लग रहा था। उनका मन टूट सा गया। तभी कबूतर ने निश्चय किया कि अब वह घोंसला बनाएंगा। ताकि फिर कभी उसके अंडे कोई न खा जाए।
कबूतर ने अपने निर्णय अनुसार तिनके इकट्ठे कर के घोंसला बनाना शुरू किया। पर उसे एहसास हुआ कि उसे तो घोंसला बनाना आता ही नहीं है। तब उसने मदद के लिए जंगल के दूसरे पक्षियों को बुलाया।
सभी पक्षी उसकी मदद के लिए आ गये आर उन्होंने कबूतर के लिए घोंसला बनाना शुरू किया। पक्षियों ने अभी कबूतर को सिखाना शुरू ही किया था कि कबूतर ने बोला कि अब वो घोंसला बना लेगा। उसने सब सीख लिया है।
सभी पक्षी यह सुन कर वापस चले गए। अब कबूतर ने घोंसला बनाना शुरू किया। उसने एक तिनका इधर रखा एक तिनका उधर। उसे समझ आया कि वह अभी भी कुछ नही सीखा है। उसने फिर से पक्षियों को बुलाया। पक्षियों ने आ कर फिर घोंसला बनाना शुरू किया। अभी आधा घोंसला बना ही था कि कबूतर जोर से चिल्लाया, तुम सब छोड़ दो अब मैं समझ गया हूं यह कैसे बनेगा।
इस बार पक्षियों को बहुत गुस्सा आया। सारे पक्षी तिनके वहीं छोड़ कर चले गये। कबूतर ने फिर कोशिश की पर उस से घोंसला नहीं बना।
कबूतर ने तीसरी बार पक्षियों को बुलाया, लेकिन इस बार एक भी पक्षी मदद के लिए नहीं आया और आज तक कबूतर को घोंसला बनाना नहीं आया।


*💐💐शिक्षा💐💐*

 बच्चों, इस कहानी ने बताया कि हमें जो काम नहीं आता हो, उसे किसी की मदद से पूरी तरह सीख लेना चाहिए। जो काम नहीं आता हो उसे जबरदस्ती करने का दिखावा नहीं करना चाहिए, क्योंकि मदद करने वाला व्यक्ति एक या दो बार तो आपकी मदद करेगा, लेकिन हर बार नहीं। इसलिए, किसी की मदद का सम्मान करते हुए वह काम पूरी निष्ठा के साथ सीखना चाहिए।



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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 240 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐स्वयं के धर्म की चिंता💐💐*

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एक आदमी तालाब के किनारे बैठ कर कुछ सोच रहा था | तभी उसने एक पानी में किसी के डूबने की आवाज सुनी और उसने तालाब की तरफ देखा तो उसे एक बिच्छू तालाब में डूबता दिखाई दिया | अचानक ही वह आदमी उठा और तालाब में कूद गया | उस बिच्छु को बचाने के लिए उसने उसे पकड़ लिया और तालाब के बाहर लाने लगा | इससे घबराकर बिच्छू ने उस आदमी को डंक मारा | आदमी का हाथ खून से भर गया वो जोर-जोर से चिल्लाने लगा  ,उसका हाथ खुल गया और बिच्छू फिर पानी में गिर गया |
आदमी फिर उसके पीछे गया | उसने बिच्छु को पकड़ा | लेकिन  बिच्छू ने फिर से उसे काट लिया | यह बार-बार होता रहा |
यह पूरी घटना दूर बैठा एक आदमी देख रहा था | वो उस आदमी के पास आया और बोला – अरे भाई ! वह बिच्छू तुम्हे बार- बार काट रहा हैं | तुम उसे बचाना चाहते हो, वो तुम्हे ही डंक मार रहा हैं |  तुम उसे जाने क्यूँ नहीं देते ? मर रहा हैं अपनी मौत, तुम क्यूँ अपना खून बहा रहे हो ?
तब उस आदमी ने उत्तर दिया – भाई ! डंक मरना तो बिच्छू की प्रकृति हैं | वह वही कर रहा हैं लेकिन मैं एक मनुष्य हूँ, और मेरा धर्म हैं दुसरो की सेवा करना और मुसीबत में उनका साथ देना | अतः बिच्छू अपना धर्म निभा रहा हैं और मैं मेरा ।

*💐💐शिक्षा💐💐*

सभी को अपने धर्म और कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिये | दूसरा चाहे जो कर रहा हो, आपके धर्म में उसकी करनी से कोई असर नहीं होना चाहिये | हर व्यक्ति का अपना- अपना धर्म हैं जो नियति और परिस्थती ने तय किया हैं जिसका निर्वाह उसे करना हैं और निर्वाह करना चाहिये | फल की चाह से कर्म करना व्यर्थ हैं क्यूंकि केवल आपके कर्मो का प्रभाव आप पर नहीं पड़ता | संसार के सभी लोगो के कर्मो का प्रभाव एक दुसरे पर पड़ता हैं | आपके हाथ में केवल आपका कर्म और धर्म हैं | आपको केवल उसकी चिंता करना चाहिये |
अगर सभी एक दुसरे को देख कर अपने धर्म का निर्वाह करेंगे तो जहाँ धूर्त ज्यादा हैं वहाँ धूर्त बढ़ेंगे |
शायद आज के समय में यही हो रहा हैं | तभी रिश्ते नाते किसी से सँभलते ही नहीं क्यूंकि सबका अपना अहम् हैं | कोई आगे बढ़कर रिश्तों का निर्वाह करना ही नहीं चाहता | जिसका फल यह हैं कि परिवार बस दो से चार लोगो के बीच सिमट गया हैं और यही हाल मित्रता का भी हो गया हैं |
लोग अपने कर्मो की चिंता ना करते हुए , दूसरों के कर्मो की चिंता में घुले जा रहे हैं और स्वयं पर व्यर्थ का भार बढ़ा रहे हैं | अगर हर व्यक्ति केवल अपने धर्म और कर्म की चिंता करे, तो सारी परेशानी ही ख़त्म हो जाए | लेकिन आज मानव समाज की यह प्रकृति रही ही नहीं हैं | सभी खुद को महान बनाते हैं और दुसरो में कमी निकालते हैं और खुद में छिपी बुराई उन्हें नजर ही नहीं आती | अगर अच्छे बुरे के तराजू में इंसान निष्पक्ष होकर पहले खुद को तौले , तो आधी दिक्कत तो उसी वक्त खत्म हो जाए लेकिन आज का इंसान डरपोक हैं | उसमे खुद की बुराई देखने और उसे मानने का साहस ही नहीं हैं इसलिए आज रिश्ते चवन्नी के भाव हो गये हैं | एक नाजुक धागे की तरह टूट-टूट कर गाँठ में बंध रहे है |और बस दिखावे के हो गये हैं |
स्वयं के धर्म की चिंता कर यह आज के वक्त के लोगो के गुणों को बता रही हैं कैसे व्यक्ति का धर्म दुसरो के कर्म के हिसाब से बदल जाता हैं |और एक दुसरे को देख सभी कर्तव्य को छोड़ देते हैं ।

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