ऋषि चिंतन से भाग 26



🌺 ऋषि चिंतन से 126🌺 Rishi chintan se 126🌺

*🥀//३० मई २०२३ मंगलवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशमी २०८०🍁*
*👉आज.............................*
       *🙏"गायत्री जयंती"🙏*
        *➖गंगा दशहरा➖* है ।        
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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  〰️ *"फैशन" हमारी नासमझी* 〰️
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👉 यों तो जीवन की आवश्यकताएँ कितनी हैं, इसकी कोई सीमा या कसौटी नहीं है। मनुष्य की कुछ आवश्यकताएँ अनिवार्य होती हैं, कुछ साधारण और कुछ बहुत ही आवश्यक। *अपनी आर्थिक स्थिति को देखकर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति पहले हो और फिर दूसरी आवश्यकताएँ पूरी हों।*

👉 बहुत से लोग धन की उपयोगिता झूठी शान-शौकत, दिखावा, फैशन परस्ती एवं दुर्व्यसनों की पूर्ति में ही समझते हैं। *ऐसा करना उनके लिए तो हानिकारक है ही, समाज के लिए भी हानिकारक होता है, क्योंकि गरीब लोग जिनके पास अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन नहीं होता, वे ऐसे शान-शौकत, दिखावे और फैशन- परस्ती को बड़प्पन समझते हैं और पर्याप्त साधन न होने पर दूसरों से ईर्ष्या रखते हैं ।* अपव्यय के कारण बरबाद हुए समृद्ध परिवारों के भी अनेक उदाहरण है। *अपव्यय का एक मात्र कारण हमारी अदूरदर्शिता है।* धन को हमने झूठी शान-शौकत की पूर्ति का साधन मान लिया है जो केवल मनुष्य का थोथापन ही है। *अच्छा तो यह है कि अपने पास इतना पैसा हो कि आवश्यकता पूर्ति के बाद कुछ बचे तो आड़े वक्त काम आए या किसी और कार्य में लगाया जा सके।*
👉 यह मानना भूल है कि जितनी शान-शौकत का प्रदर्शन करेंगे, जितने ठाठ-बाट से रहेंगे और अपनी आवश्यकताओं को जितना अधिक बढ़ा लेंगे, लोग हमें उतना ही सुखी समझेंगे। *लोग भले ही समझने लगें कि आप सुखी हैं, पर इन व्यर्थ की आवश्यकताओं को बढ़ा लेने से जो आर्थिक परेशानियाँ खड़ी हो जाती हैं, वे हमें बड़ी बुरी तरह दुःखी और संत्रस्त करके रख देती हैं।* ये कृत्रिम आवश्यकताएँ ऐसा दुर्गुण हैं, जिससे मनुष्य अपने पैरों पर अपने आप कुल्हाड़ी मारता है। इससे आर्थिक कठिनाइयाँ तो आती ही हैं साथ ही व्यक्तिगत और परिवार की उन्नति में भी बाधा पड़ती है।

👉 फैशन के व्यसन से आज सभी ग्रस्त हैं। फैशन बढ़ाने के कारण न केवल अपव्यय हो रहा है, बल्कि अंग-प्रदर्शन फैशन का अंग बन गया है और हमारे नैतिक मूल्यों पर इसका बड़ा गहरा असर पड़ रहा है। *परिवार में झगड़े, कटुता आदि बुराइयाँ इस धन के लालच और लालसा के कारण पनपती जा रही हैं।* विद्यार्थी वर्ग इससे अछूता नहीं बचा है, बल्कि उनमें फैशन और दिखावे की लालसा बड़ी विकृत होती जा रही है। माँ-बाप जो अपने बच्चों के लिए फैशन की पूर्ति नहीं कर सकते, उनकी बुरी आदतों की पूर्ति के लिए पैसा नहीं दे सकते, वे बच्चों की निगाह में गिरे हुए हैं या फिर आर्थिक संकट उठा रहे हैं ।
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*संतुलित जीवन के व्यावहारिक सूत्र पृष्ठ-११*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/XT7z7pWQYg0







🌺 ऋषि चिंतन से 127🌺 Rishi chintan se 127 🌺


*🥀//३१ मई २०२३ बुधवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्ष एकादशी२०८०//*
   *👉आज.....................*
     *〰️निर्जला एकादशी〰️* है ।           
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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    *➖ ❗"शिष्टाचार"❗ ➖*
     *〰️‼️सच्ची संपत्ति‼️〰️*
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👉 एक प्राचीन कहावत है कि *मनुष्य का परिचय उसके "शिष्टाचार" से मिल जाता है।* उसका उठना, बैठना, चलना, फिरना, बातचीत करना, दूसरों के घर जाना, रास्ते में परिचितों से मिलना, ऐसे प्रत्येक कार्य एक अनुभवी को यह बतलाने के लिए पर्याप्त हैं कि वास्तव में व्यक्ति किस हद तक सामाजिक, शिष्ट एवं शालीन है।
👉 *"सभ्यता" और "शिष्टाचार" का पारस्परिक संबंध काफी घनिष्ट है।* इतना कि एक के बिना दूसरे को प्राप्त कर सकने का ख्याल निरर्थक है। *जो सभ्य होगा, वह अवश्य ही शिष्ट होगा और जो शिष्टाचार का पालन करता है, उसे सब कोई सभ्य बतलाएँगे।* ऐसा व्यक्ति सदैव ऐसी बातों से बचकर रहता है, जिससे किसी के मन को कष्ट पहुँचे या किसी प्रकार के अपमान का बोध हो। ऐसे व्यक्ति अपने विचारों को नम्रतापूर्वक प्रकट करते हैं और दूसरों के कथन को भी आदर के साथ सुनते हैं। *ऐसा व्यक्ति आत्मप्रशंसा के दुर्गुण से दूर रहता है। वह अच्छी तरह जानता है कि अपने मुख से अपनी तारीफ करना "ओछे" व्यक्तियों का लक्षण है ।* सभ्य और शिष्ट व्यक्ति को तो अपना व्यवहार और बोलचाल ही ऐसा रखना चाहिए कि उसके संपर्क में आने वाले स्वयं उसकी प्रशंसा करें। *"प्रशंसा" सुनने की लालसा व्यक्तित्व निर्माण में घातक है।* शिष्टाचार में ऐसी शक्ति है कि मनुष्य किसी को बिना कुछ दिए-लिए अपने और परायों का श्रद्धाभाजन और आदर का पात्र बन जाता है, पर जिनमें शिष्टाचार का अभाव है, जो चाहे जिसके साथ अशिष्टता का व्यवहार कर बैठते हैं, ऐसे लोगों के घर के आदमी भी उनके अनुकूल नहीं होते।

👉 बहुत से लोग शिक्षा और अच्छे फैशन वाले वस्त्रों के प्रयोग को ही सभ्यता और शिष्टाचार का मुख्य अंग समझते हैं, पर यह धारणा गलत है। *महँगी और बढ़िया पोशाक पहनने वाला व्यक्ति भी अशिष्ट हो सकता है और गाँव का एक हल चलाने वाला अशिक्षित किसान भी शिष्ट कहा जा सकता है।* इस दृष्टि से जब हम अपने पास-पड़ोस पर दृष्टि डालते हैं और आधुनिक शिक्षा प्राप्त नवयुवकों को देखते हैं, तो हमें खेद के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि इस समय हमारे देश में से शिष्टाचार की प्राचीन भावना का ह्रास हो रहा है। आज के पढ़े-लिखे युवक प्रायः शिष्टाचार को शून्य और उच्छृंखलता को आश्रय दे रहे हैं। कॉलेज और स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश विद्यार्थी रास्ते में और विद्यालय में भी आपस की बातचीत में अकारण ही गालियों का प्रयोग करते हैं, अश्लील भाषा का प्रयोग करते हैं और धक्का-मुक्की करते दिखाई देते हैं। इन सबके उठने-बैठने का तरीका भी सभ्य नहीं कहा जा सकता।
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*संतुलित जीवन के व्यावहारिक सूत्र पृष्ठ-२०*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 128🌺 Rishi chintan se 128 🌺




*🥀//०१ जून २०२३ गुरुवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष द्वादशी२०८०🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *➖सच्चे मित्र बनें - बनाएँ➖*
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👉 सच्ची मित्रता कैसी हुआ करती है, इस संबंध में संस्कृत के नीतिशास्त्र की एक प्रसिद्ध पंक्ति है कि *"राजद्वारे च श्मशाने यो तिष्ठति सः बान्धवः' "* अर्थात राजद्वार और श्मशान घाट में जो साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़ा होता है, वही सच्चा मित्र हुआ करता है। यहाँ राजद्वार वास्तव में सुख-संपत्ति का प्रतीक है और श्मशान विपत्ति का। *केवल सुख-संपत्ति के दिनों में मौजमस्ती करके दुःख-विपत्ति पड़ने पर आँखें चुराकर मुँह फेर लेने वाले मित्रता के नाम पर कलंक हैं।*
👉 *"मित्रता" तो विशुद्ध हृदय की अभिव्यक्ति है।* उसमें छल-कपट या मोह - भावना नहीं। जिसके हृदय में मैत्री भावना विराजमान रहती है, उसके हृदय में प्रेम, सहानुभूति, दया, करुणा आदि दैवी गुणों का विकास होता रहता है। *जिसने मैत्री भावनाएँ प्राप्त कर लीं उसके लिए संसार परिवार हो गया।* स्वामी रामतीर्थ अमेरिका की यात्रा कर रहे थे। उनके पास अपने शरीर और उस पर पड़े हुए थोड़े से वस्त्रों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। किसी सज्जन ने उनसे पूछा- *आपका अमेरिका में कोई संबंधी नहीं है, आपके पास धन भी नहीं है, वहाँ किस तरह निर्वाह करेंगे?* रामतीर्थ ने आगंतुक की ओर देखकर कहा— *मेरा एक मित्र है।* *वह कौन है ?* उस व्यक्ति ने पूछा । *आप हैं वो मित्र, जिनके यहाँ मुझे सारी सुविधाएँ मिल जाएँगी* और सचमुच रामतीर्थ की वाणी और उनकी आत्मीयता का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह व्यक्ति स्वामी रामतीर्थ का घनिष्ठ मित्र बन गया ।
👉 *मित्रता की चाह प्रत्येक मनुष्य को होती है, पर वह ठहरती उन्हीं के पास है, जिनका हृदय शुद्ध होता है ।* जिसे सच्ची मैत्री उपलब्ध हुई, उसे सौभाग्यशाली ही कहेंगे ।
👉 मित्रता जितनी बहुमूल्य है, उतना ही इसे पैदा करना, स्थिर रखना, सदा-सदा कायम रखना भी कठिन है । *मित्रता को स्थिर रखने के लिए एक दूसरे के व्यक्तिगत, स्वाभाविक दोषों को गौण समझना पड़ेगा अन्यथा दोष -दर्शन, आपसी छींटाकशी, आरोप-प्रत्यारोप से तो मित्रता की मूर्ति ही टूट-फूट जाएगी ।* मित्रता को स्थिर रखने का पूर्ण आधार है, *मित्र के सद्गुणों की खोज करना, उन्हें प्रोत्साहन देना और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है, सहिष्णुता और उदारता की ।*
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*संतुलित जीवन के व्यावहारिक सूत्र पृष्ठ-४५*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 129🌺 Rishi chintan se 129 🌺


*🥀//०२ जून २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्षत्रयोदशी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*आहार पोषक ही नहीं, शुद्ध भी हो*
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👉 मोटे तौर पर आहार में पाए जाने वाले रसायन अथवा पोषक तत्व केवल शरीर तक ही अपना प्रभाव दिखाते हैं, परंतु वस्तुस्थिति यह है नहीं। *अध्यात्म शास्त्र के अनुसार "आहार" मानवी चेतना को भी प्रभावित करता है।* उसकी मान्यता है कि वस्तुओं में स्थूल, सूक्ष्म और कारण ये तीन शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं। अध्यात्म विदों के अनुसार अन्न का स्थूल स्वरूप माँस बनता है। उसके सूक्ष्म रूप से मस्तिष्क एवं विचार बनते हैं और कारण रूप भावनाओं का निर्माण करता है। *यदि आहार में इनका अभाव होगा तो उससे पोषण तो दूर रहा उलटे रोग ही उत्पन्न होंगे।*
👉 अन्न के स्वरूप की भाँति ही यह बात भी मनुष्य को प्रभावित करती है कि वह किस प्रकार अर्जित किया गया है। *यदि दुष्वृत्तियों के साथ अनीति पूर्वक उपार्जित किया गया है तो इससे मस्तिष्क में दुर्बुद्धि ही उत्पन्न होगी।* इसी प्रकार उसे यदि प्रसाद भावना से पकाया और औषधि भावना से खाया न गया होगा, बनाने और खिलाने वाले की स्नेहसिक्त सद्भावनाओं का इसमें समन्वय न होगा तो उससे खाने वाले का अंतःकरण विकसित न होगा, उसकी विचारणा एवं भावना के विकास में कोई सहायता न मिलेगी।
👉 *"आहार" न केवल स्थूल दृष्टि से पौष्टिक और स्वल्प होना चाहिए बल्कि उसके पीछे न्यायानुकूल उपार्जन और सद्भावनाओं का समावेश भी होना चाहिए तभी वह अन्न मनुष्य के तीनों आवरणों का समुचित पोषण कर सकेगा और स्थूल, कारण तथा सूक्ष्म शरीर को विकसित कर सकेगा।* तभी उससे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वांगीण विकास का अवसर प्राप्त हो सकेगा।

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*चिरयौवन का रहस्योद्घाटन पृष्ठ-३७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 130🌺 Rishi chintan se 130 🌺


*🥀//०३ जून २०२३ शनिवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्षचतुर्दशी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖वाणी शिष्ट और शालीन हो➖*
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👉 *अव्यवस्थित वाणी सबसे अधिक खतरनाक है।* निंदा-चुगली से अन्य लोगों के प्रति तो विद्वेष पैदा होता ही है, साथ ही लोगों को यह भी अनुभव होने लगता है कि अपनी कही बात इसके पेट में पड़ जाने पर इधर-उधर फैले बिना रहेगी नहीं। इस आशंका के कारण उसे अविश्वासी बनकर रहना पड़ता है और कोई स्वजन भी उसके सामने पेट खोलकर बात नहीं करता ।
👉 क्रोध, आवेश के द्वारा होने वाली क्षति का हाथों-हाथ दुष्परिणाम देखा जा सकता है। *कटु वचन कहते देर नहीं होती कि प्रत्युत्तर और भी बड़े रूप में सामने आने लगता है।* कई बार तो कटु वचनों का प्रभाव इतना भयंकर होता है कि वह स्थायी जड़ जमा लेता है और समय आने पर प्रतिशोध का सर्प बनकर डसता रहता है। द्रौपदी द्वारा दुर्योधन को कहे गए व्यंग्य वचन, कालांतर में महाभारत जैसे महाविनाश के निमित्त कारण बने।
👉 *अपना अहंकार और दूसरों का असम्मान ही मिलकर, कटु वचन और अशिष्ट व्यवहार के रूप में प्रकट होता है।* यह दोनों ही परस्पर एकदूसरे से बढ़कर हैं। *इनके योग से मिला हुआ कटु भाषण यों दृश्य रूप में तो कोई बड़ी बात प्रतीत नहीं होता, पर उसकी परिणति ऐसी होती हैं, जिसके कारण खोदी गई खाई कदाचित कभी न पाटी जा सके।*
👉 *"शिष्टता" और "शालीनता" का ध्यान रखकर बोली गई वाणी सदा नम्रता और मधुरता से भरी-पूरी ही होती है।* उसका प्रभाव बदले हुए तेवरों को यथा स्थान लाने में समर्थ होता है। *मधुरभाषी लोग वैमनस्य को शांत करते और सद्भावना का नए सिरे से शुभारंभ करते देखे गए हैं।* इस बुराई को छोड़ देना और उसे अच्छाई के रूप में बदल लेना यह कुछ ही दिनों के अभ्यास पर निर्भर है। *अपने आप पर नम्रता का आरोपण करते हुए, दूसरों को मानवोचित सम्मान प्रदान करते हुए, सोच-समझकर बिना उतावली अपनाए बोला जाए, तो उसका सत्परिणाम सुखद प्रतिक्रिया के रूप में परिलक्षित होता देखा जा सकेगा।* शिष्टता, सज्जनता, मधुरता जैसी विशेषताओं से संभाषण कर सकना थोड़े दिनों के अभ्यास पर निर्भर है। *कटु वचनों को सर्प के दाँत और बिच्छु के डंक के समतुल्य माना जाए, तो कुछ अत्युक्ति न होगी।* जिनमें यह दुर्गुण थोड़े अंशों में भी स्वभाव का अंग बन गया हो, उन्हें उसका निराकरण करने के लिए तत्काल प्रबल प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए । *यह कौए और कोयल में, बगुले का हंस में कायाकल्प हो जाने जैसी कहावत का प्रत्यक्ष दर्शन है ।*
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*व्यवस्था बुद्धि की गरिमा पृष्ठ-२४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/heiCiW3CyBU


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