*🥀//०४ जून २०२३ रविवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष पूर्णिमा२०८०🍁*
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*‼️ऋषि चिंतन‼️*
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*➖बाहर की सृष्टि कैसी➖*
*〰️हमारी दृष्टि जैसी〰️*
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👉 *भलाई, उत्कृष्टता, स्वच्छता आदि सब ईश्वर प्रकृति, नैतिक विधान की धरती पर मिलती हैं; वे अनादि हैं, स्थिर हैं, अनंत हैं।* सृष्टि की रचना में कहीं भी गंदगी बुराई, अपवित्रता नहीं है। संसार के तत्त्व चितकों, दर्शनिकों हमारे ऋषियों ने यह सब अनुभव किया और कहा- *"मगलमय भगवान की मंगलमय कृति यह सृष्टि है" फिर भला दूषित अपवित्र तत्त्व कहाँ से आए ?*
👉 *हम अपने भीतरी दृष्टिकोण को बदलें तो बाहर जो कुछ भी दिखाई पड़ता है वह सब कुछ बदला-बदला दिखाई देगा।* आँखों पर जिस रंग का चश्मा पहना होता है बाहर की वस्तुएँ उसी रंग की दिखाई पड़ती हैं। अनेक लोगों को इस संसार में केवल पाप और दुर्भाव हो दिखाई पड़ता है। सर्वत्र उन्हें गंदगी ही दीख पड़ती है। इसका प्रधान कारण अपनी आंतरिक मलिनता ही है। *इस संसार में अच्छाइयों की कमी नहीं श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति भी सर्वत्र भरे पड़े हैं।* फिर हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई तो होती है। *छिद्रान्वेषण छोड़कर यदि हम गुण अन्वेषण करने का अपना स्वभाव बना लें तो घृणा और द्वेष के स्थान पर हमें प्रसन्नता प्राप्त करने लायक भी बहुत कुछ इस संसार में मिल जाएगा।* बुराइयों के सुधारने के लिए भी हम घृणा का नहीं, सुधार और सेवा का दृष्टिकोण अपनाएँ तो वह कटुता और दुर्भावना उत्पन्न न होगी जो संघर्ष और विरोध के समय आमतौर से हुआ करती है।
👉 *दूसरों को सुधारने से पहले हमें अपने सुधार की बात सोचनी चाहिए।* दूसरों से सज्जनता की आशा करने से पूर्व हमें अपने आप को सज्जन बनाना चाहिए। *दूसरों की दुर्बलताओं के प्रति एक दम आगबबूला हो उठने से पहले हमें यह भी देखना उचित है कि अपने भीतर कितने दोष-दुर्गुण भरे पड़े हैं।* बुराइयों को दूर करना एक प्रशंसनीय प्रवृत्ति है। *अच्छे काम का प्रयोग अपने से ही आरंभ करना चाहिए। हम सुधरें, हमारा दृष्टिकोण सुधरे तो दूसरों का सुधार होना कुछ भी कठिन न रह जाएगा ।*
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*अपना दृष्टिकोण ठीक रखें पृष्ठ ०६*
*🪴पं. श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/Sa_zivO1f6I
🌺 ऋषि चिंतन से 132🌺 Rishi chintan se 132 🌺
*🥀//०५ जून २०२३ सोमवार//🥀*
*➖आषाढ़ कृष्णपक्ष २०८०➖*
*〰️//प्रतिपदा-द्वितीया//〰️*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*अपना दृष्टिकोण दूरदर्शितापूर्ण रहे*
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👉 *मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी "दूरदर्शिता" के कारण होती है।* जीवन के जिस क्षेत्र में *"दूरदर्शिता"* से काम लेते हैं, उसी में सफलता की संभावनाएँ बढ़ने लगती हैं। गृहस्थ को ही लीजिए। तत्काल सुख के आकर्षण में जो लोग अपने लिए अधिक अच्छा भोगने की लालसा रखते हैं, उनके परिवार में सौहार्द्र नहीं रह पाता । *गृहस्थी के सुख और उनकी समुन्नति इस बात पर निर्भर है कि परिजनों में "दूरदर्शिता" की पर्याप्त मात्रा हो ।*
👉 *"दूरदर्शिता" का अर्थ है-संकीर्णता का परित्याग।* जब तक मनुष्य के सोचने, करने का क्षेत्र संकुचित और स्वार्थपूर्ण रहता है तब तक वह असीम की अनुभूति से वंचित ही रहता है। छोटे दायरे में विचार करने का अर्थ यह होता है कि मनुष्य की चेतन प्रवृत्तियाँ विकसित नहीं हो रही हैं। वह जड़ता के दुःखपूर्ण अंधकार में ही चक्कर लगाता रहता है। पारलौकिक ज्ञान से लोग वंचित रह जाते हैं। इसका कारण यह नहीं होता कि उन्हें साधन और परिस्थितियाँ नहीं मिली होती। *प्राकृतिक उपहार और दैवी अनुदान सभी को एक जैसे मिले हैं।* दिन-रात सबके लिए, निकलते हैं, उसी से हमें प्रकाश मिलता है। वायु, जल, आकाश आदि की नैसर्गिक सुविधाएँ सबके लिए एक जैसी ही होती हैं। पर एक मनुष्य इन्हें देखकर भी नहीं देखता। वह अपने छोटे-छोटे उद्योगों में ही लगा रहता है। सवेरे उठना, काम पर चले जाना, खाना, पहनना आदि बाह्य सुख और सुविधाओं तक ही सीमित रहने वालों को ये घटनाएँ सामान्य- सी प्रतीत होती हैं, किंतु *"दूरदर्शी" पुरुष इन विलक्षणताओं पर गंभीरता से विचार करते हैं।* उनके मर्म-भेद जानने का प्रयत्न करते हैं। ऊपर से दोनों व्यक्तियों के कार्यों में भले ही समानता दिखाई दे, पर इसमें संदेह नहीं कि *एक अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण क्षुद्र बनता जा रहा है और दूसरा जा रहा है अनंत की अनुभूति प्राप्त करने ।*
👉 *भारतीय संस्कृति के पतन का कारण यहाँ सशक्त लोगों की "अदूरदर्शिता" ही माना गया है।* जयचंद ने व्यक्तिगत हितों के प्रवाह में इतना भी विचार नहीं किया कि बाह्य शक्ति और संस्कृति का हमारे धर्म और समाज पर कैसा असर पड़ेगा ? *एक व्यक्ति की संकुचित वृत्ति से संपूर्ण भारत हजार वर्षों तक परतंत्र बना रहा।* इस अवधि में उसका धन, धर्म, संस्कृति और गौरव सब कुछ नष्ट हो गया। अदूरदर्शिता के कारण व्यक्ति और समाज सभी को दुःखमय परिणाम भोगने पड़ते हैं इसके एक नहीं अनेक उदाहरण हम देख चुके हैं। *व्यक्तिगत जीवन में भी ऐसी अनेक घटनाएँ आए दिन हुआ करती हैं। फिर भी लोग अपनी संकुचित वृत्तियों का परित्याग नहीं करते।* दुःख, कलह और क्लेश का कारण मनुष्य की विचार-निर्णय की अक्षमता ही है।
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*अपना दृष्टिकोण ठीक रखें पृष्ठ-१६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/vusmaNnF9eU
🌺 ऋषि चिंतन से 133🌺 Rishi chintan se 133 🌺
*🥀०६ जून २०२३ मंगलवार 🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष तृतीया२०८०//*
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*📖 ➖स्वाध्याय➖ 📖*
*दिनचर्या का अनिवार्य अंग बने*
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👉 *मानव जीवन में सुख की वृद्धि करने के उपायों में "स्वाध्याय" एक प्रमुख उपाय है।* स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है; मन में महानता, आचरण में पवित्रता तथा आत्मा में प्रकाश आता है।
👉 स्वाध्याय के अभाव में पढ़ी हुई विद्या भी विस्मृत हो जाती हैं, तब नूतन ज्ञान प्राप्त करने का प्रश्न ही नहीं उठता। कहीं भी और कभी भी देखा जा सकता है कि कक्षा पास कर लेने और उपाधि पा लेने के बाद जो विद्यार्थी, वकील अथवा डॉक्टर आदि अपना स्वाध्याय बंद कर देते हैं, वे आगे चलकर सफल नहीं हो पाते। संसार की विचारधारा को मोड़ देने वाले लेखक अथवा पत्रकार प्रतिदिन अनेक घंटों स्वाध्याय में लगाते हैं। *जो स्वाध्यायशील रहता है उसका ज्ञान आधुनिक और विद्या जाग्रत रहती है।* प्रतिदिन कुछ न कुछ पढ़ते रहने वाले अपने ज्ञान-कोष में बूँद-बूँद इकट्ठा करके उसे अक्षय बना लिया करते हैं।
👉 *जीवन को सफल, उच्च एवं पवित्र बनाने के लिए "स्वाध्याय" की बड़ी आवश्यकता है।* किसी भी ऐसे व्यक्ति का जीवन क्यों न देख लिया जाए, जिसने उच्चता के सोपानों पर चरण रखा है। उसके जीवन में *"स्वाध्याय"* को विशेष स्थान मिला होगा। स्वाध्याय के अभाव में कोई भी व्यक्ति महान अथवा ज्ञानवान नहीं बन सकता। प्रतिदिन नियमपूर्वक सद्ग्रंथों का अध्ययन करते रहने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अंतःकारण की शुद्धि होती है । *इसका स्वस्थ एवं व्यावहारिक कारण हैं, वह यह कि सद्ग्रन्थों के अध्ययन करते समय मन उनमें रमा रहता है और ग्रंथ के सदवाक्य उस पर संस्कार डालते रहते हैं ।*
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*स्वाध्याय में प्रमाद न करें पृष्ठ- ०३*
*‼️पं. श्रीराम शर्मा, आचार्य‼️*
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🌺 ऋषि चिंतन से 134🌺 Rishi chintan se 134🌺
*🥀//०७ जून २०२३ बुधवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष चतुर्थी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*असफलताओं से विचलित न हों*
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👉 *"असफलता" के समय दिल छोटा करने और निराश होने की क्या बात है।* प्रथम प्रयास अवश्य ही सफल होना चाहिए, यह कोई जरूरी नहीं। *संसार में प्रयत्नशील व्यक्ति भी दो तिहाई असफलता और एक तिहाई सफलता का अनुमान लगाकर काम करते हैं।* उसी पर संतोष करते और उतना ही पर्याप्त भी मानते हैं। एक परीक्षा में एक बार फेल हो जाना कोई ऐसी विपत्ति नहीं है जिसके लिए अत्यधिक चिंतित और निराश हुआ जाए। अब की बार फेल होने पर दो वर्ष की तैयारी में अच्छा डिवीजन मिल सकता है और आगे की नींव पक्की हो सकती है। *जिंदगी इतनी लंबी है कि उसमें दो-चार असफलताओं के लिए भी जगह रखनी पड़ती है।*
👉 *हर काम में सदा सफलता ही मिलती रहे तब तो मनुष्य, मनुष्य न रहकर देवताओं की श्रेणी में गिना जाने लगे।* यह सोचकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले अपना साहस समेटकर रह सकते हैं और उस खिन्नता को भुलाकर दूने उत्साह से अगली तैयारी में लग सकते हैं। इस बार नौकरी न मिली, इस जगह पर नियुक्ति न हुई, तरक्की का अबकी बार अवसर न मिला तो आगे मिलेगा। *इसमें हतोत्साह होने की कौन- सी बात है ?* उन्नति के लिए प्रयत्न करना चाहिए, पर जो परिणाम सामने आवे उसे संतोष और धैर्यपूर्वक हँसते, मुस्कराते हुए शिरोधार्य ही करना चाहिए।
👉 *आर्थिक घाटा हो गया तो हैरानी की क्या बात है ?* अपने पास यदि क्षमता, प्रतिभा, साहस, पुरुषार्थ और कौशल मौजूद है तो आज न सही चार दिन बाद फिर आवश्यक साधन जुट जाएँगे। न भी जुट जाएँ तो थोड़ा स्तर (स्टेण्डर्ड) घटाकर कम खरच में भी अच्छा-खासा जीवन जिया जा सकता है। *गरीब लोग भी तो आनंद और उल्लास की जिंदगी जीते हैं, फिर हम भी वैसा क्यों न कर सकेंगे ?* खरचों में कमी कर डालने से गरीबी अखरने वाली नहीं रहती। समय ने हमारी आमदनी पर कुल्हाड़ा चलाया तो हम अपने खरचों में काट-छाँटकर आसानी से उस असंतुलन को पूरा कर सकते हैं। *समय के अनुरूप अपने स्तर को घटा लेने का साहस जिसमें मौजूद है, जिसे हल्के दरजे की मजदूरी में अपना गौरव नष्ट होते नहीं दीखता, उसके लिए घाटे की स्थिति में भी परेशानी का कोई कारण नहीं।*
👉परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेने का जीवन विज्ञान जिनने सीखा है उनके लिए अमीरी की तरह गरीबी में भी हँसने और प्रसन्न रहने का कारण मौजूद है। *जिन्हें श्रम करने में शरम नहीं आती, जिनने प्रयत्न, पुरुषार्थ, साहस और उल्लास को नहीं खोया है वे आजीविका का उपयुक्त मार्ग आज नहीं तो कल प्राप्त कर लेंगे ।*
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*➖निर्भय बनें, शांत रहें➖ पृष्ठ-०८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 135🌺 Rishi chintan se 135 🌺
*🥀//०८ जून २०२३ गुरुवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष पंचमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*चिंता में डूबे रहने से क्या लाभ ?*
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👉 *"चिंता" एक विनाशक वृत्ति है, जो मनुष्य की शक्ति और समय का अनावश्यक मात्रा में क्षरण करती रहती है।* जिस शक्ति के द्वारा मनुष्य अपना स्वास्थ्य सुधार सकता था, आजीविका कमा सकता था, विद्याध्ययन अथवा कोई उपयोगी कला सीख सकता था वह व्यर्थ ही बरबाद हो जाती है। *जितने समय को वह शारीरिक, मानसिक, आर्थिक अथवा किसी अन्य प्रयोजन में, विकास के काम में लगा सकता था, उसे छोटी-छोटी बातों की चिंताओं में ही गँवाता रहता है।* मनुष्य-जीवन किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए मिलता है, इसे छोटी-छोटी बातों की चिंताओं में गँवा देना समझदारी की बात नहीं। *अपने जीवन लक्ष्य को समझना और उसमें अंत तक तत्परतापूर्वक लगे रहना तभी संभव हो सकता है जब चिंताओं से छुटकारा पाएँ, इनसे दूर रहें और इनसे क्षरित होने वाली शक्तियों को बचाकर अपने निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में लगाएँ।*
👉 चिंताओं से मनुष्य की रचनात्मक क्रियाशक्ति में थोड़ी कमी हो जाती अथवा थोड़ा समय ही बरबाद होकर रह जाता तो भी विशेष हानि न थी। दैनिक कार्यों में चलने, उठने, बैठने और अन्य कई ऐसे कार्य होते हैं जिनमें निष्प्रयोजन कुछ शक्ति भी लग जाती है, कुछ समय भी। किंतु उसकी हानि भी वहाँ समाप्त हो जाती है। *पर "चिंताएँ" अपने पीछे भी एक विषाक्त वातावरण बना देती हैं जो मनुष्य की जीवन- शक्ति का चिरकाल तक शोषण करती रहती हैं।* इनसे जितना ही बचाव किया जाता है ये शहद की मक्खी की तरह उतना ही पीछा करतीं और अपने विषदंश चुभोती रहती हैं। *मनुष्य चिंताओं के जाल में फँसकर अपनी मौत के ही सरंजाम जुटाता रहता है।* जीवन-मृत्य अकाल-मृत्यु की ओर तेजी से ले जाने वाली यह चिंताएँ ही होती है। किसी कवि ने लिखा है-
*चिंता चगुल ही पर्यो, तो न चिता को शङ्क ।*
*यह सोखेँ बूँदन जियत, मुए जात वा अङ्क।।*
चिता तो मुरदा को जलाती है, किंतु चिंता तो जीवित मनुष्य को तिल-तिल घुला कर मारती है।
👉 चिंताओं से मस्तिष्क के अंतराल में काम करने वाली सेल व फाइवर शक्तियों से किस प्रकार जीवन-शक्ति का तड़ित क्षरण होता है। इसका पता जर्मनी के डॉक्टरों ने एक प्रयोग से लगाया। किसी पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति को अचानक चिंताजनक समाचार सुनाया गया। इससे घबराकर वह उठने लगा तो उसे चक्कर आ गया और वह गिर गया। डॉक्टरों ने शारीरिक परीक्षा के बाद देखा कि उसकी इतनी शक्ति एक ही झटके में समाप्त हो गई जिससे वह एक सप्ताह तक लगातार श्रम कर सकता था। *चिंताएँ मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं जिससे शक्ति का बुरी तरह अपव्यय होता रहता है। इससे मनुष्य के सौंदर्य, शारीरिक बल और ज्ञान का नाश होता रहता है।*
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*➖निर्भय बनें, शांत रहें➖ पृष्ठ-११*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/6xG6yJOgpns
