भय का कारण और निवारण । ऋषि चिंतन से भाग 28



🌺 ऋषि चिंतन से 136🌺 Rishi chintan se 136 🌺


*🥀//०९ जून २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष षष्ठी २०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *भय का कारण और निवारण*
     
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👉 *"डर" का सबसे बड़ा कारण है "अज्ञान"।* जिसे हम ठीक तरह नहीं जानते उससे प्रायः डरा करते हैं। सृष्टि के आरंभ में आदिम मनुष्य सूर्य, चंद्र, समुद्र, बादल, बिजली, नदी, पर्वत, आँधी, आग, सर्प का स्वरूप ठीक तरह समझ न पाया था, इसलिए चेतना विकास के प्रथम चरण में उनकी स्थिति, शक्ति और मर्यादा की समुचित जानकारी न थी, फलस्वरूप उनसे डर लगा। *देवता के रूप में उन्हें कल्पित किया गया और अनेक पूजा विधानों से उन्हें संतुष्ट करने का प्रयत्न किया गया ताकि वे अपना कोई अहित न करें।* मृत्यु के उपरांत का जीवन अभी भी रहस्यमय है पर पूर्वकाल में और भी रहस्यमय बना हुआ था। इस अज्ञान ने प्रत्येक मृतक को भूत-प्रेत की मान्यता प्रदान कर दी और आकस्मिक दुर्घटनाओं, विपत्तियों एवं बीमारियों का मूल कारण विदित न होने से उन्हें भूत की करतूत समझ लिया गया। *प्रायः ऐतिहासिक काल में मनुष्य की मनोभूमि का अधिकांश भाग इन देवताओं और भूतों का संतोष समाधान करने में व्यतीत होता था ।*

👉 ज्ञान का जैसे-जैसे विकास हुआ वे भय छूट गए। बीमार होते ही भूत को बलि चढ़ाने की तैयारी ही जिनके मस्तिष्क में एकमात्र उपाय सूझता हो ऐसे लोग अब बहुत थोड़े हैं, वे सभ्य समाज में उपहासास्पद माने जाते हैं। इसी प्रकार अलग-अलग सत्ता वाले, एक दूसरे से लड़ने-झगड़ने और ईर्ष्या, द्वेष करने वाले देवताओं के स्थान पर अब इन्हें एक ही ईश्वरीय शक्ति के विभिन्न काम माना जाने लगा है। ग्रह- नक्षत्रों की विद्या की सही जानकारी जैसे-जैसे बढ़ रही है वैसे-वैसे शनि और राहु की अनिष्टकर ग्रह दशा का आतंक समाप्त होता चला जा रहा है।
👉 *उचित-अनुचित का विवेक जाग्रत होने पर भी मनुष्य निश्चिंत हो सकता है।* उसके सामने लक्ष्य और मार्ग स्पष्ट रहने से न तो उलझन रहती है और न परेशानी। हवा में उड़ते हुए पत्ते की तरह जो चारों ओर मन डुलाता है उसे सफलता असफलता का भय बना रहता है। *सच्ची निर्भयता उसे ही मिलती है जिसके सामने अपना कर्त्तव्य ही प्रधान है।* परिणाम को अधिक महत्त्व देने वाला व्यक्ति असफलता को न तो अधिक महत्त्व देता है और न उससे डरता है।
👉 *ईश्वर-विश्वास निर्भयता का सर्वोपरि उपाय है।* पुलिस गारद के पहरे में रहने वाले को जब आक्रमणकारी शत्रुओं से निश्चितता मिल जाती है. सुरक्षा अनुभव होती है तो सर्वशक्तिमान परमात्मा को अपना साथी-सहचर बना लेने वाले के लिए डरने की गुंजाइश कहाँ रह जाती है। *जिसने धर्म को अपना आधार बना लिया उसका भविष्य अंधकारमय हो ही नहीं सकता, फिर किसी से भी डरने की ऐसे व्यक्ति के लिए बात ही क्या रह जाती है।*
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*➖निर्भय बनें, शांत रहें➖ पृष्ठ-२१*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/W3Zun9aeqFo





🌺 ऋषि चिंतन से 137🌺 Rishi chintan se 137 🌺


*🥀//१० जून २०२३ शनिवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष सप्तमी २०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *"धर्म" जीतेगा - अधर्म हारेगा*
     
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👉 दीपक बुझने को होता है तो एक बार वह बड़े जोर से जलता है, प्राणी जब मरता है तो एक बार बड़े जोर से हिचकी लेता है। चींटी को मरते समय पंख उगते हैं, *पाप भी अपने अंतिम समय में बड़ा विकराल रूप धारण कर लेता है।* युग परिवर्तन की संधिवेला में पाप का इतना उग्र और भयंकर रूप दिखाई देगा जैसा कि सदियों से देखा क्या, सुना भी न गया था। दुष्टता हद दर्जे को पहुँच जाएगी। एक बार ऐसा प्रतीत होगा कि अधर्म की अखंड विजयदुंदुभि बज गई और धर्म बेचारा दुम दबाकर भाग गया, किंतु ऐसे समय भयभीत होने का कोई कारण नहीं । अधर्म की भयंकरता अस्थायी होगी, उसकी मृत्यु की पूर्व सूचना मात्र होगी। अवतार प्रेरित धर्म-भावना पूरे वेग के साथ उठेगी और अनीति को नष्ट करने के लिए विकट संग्राम करेगी । रावण के सिर कट जाने पर भी फिर नए उग आते थे, फिर भी अंततः रावण मर ही गया।

👉 अधर्म से धर्म का, असत्य से सत्य का, दुर्गंध से मलयानिल का, सड़े हुए कुविचारों से नवयुग निर्माण की दिव्य भावना का घोर युद्ध होगा। *इस धर्मयुद्ध में ईश्वरीय सहायता न्याय पक्ष को मिलेगी।* पांडवों की थोड़ी-सी सेना कौरवों के मुकाबले में, राम का छोटा-सा वानर दल, विशाल असुर सेना के मुकाबले में विजयी हुआ था। अधर्म-अनीति की विश्वव्यापी महाशक्ति के मुकाबले में सतयुग निर्माताओं का दल छोटा-सा मालूम पड़ेगा, *परंतु भली प्रकार नोट कर लीजिए, हम भविष्यवाणी करते हैं कि निकट भविष्य में, सारे पाप-प्रपंच ईश्वरीय अग्नि में जलकर भस्म हो जाएँगे और संसार में सर्वत्र सद्भावों की विजयपताका फहराएगी ।*
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*अखण्ड ज्योति जनवरी१९४३ पृष्ठ-१६*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/RoS0bFqSyaA







🌺 ऋषि चिंतन से 138🌺 Rishi chintan se 138🌺



*🥀//११ जून २०२३ रविवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष अष्टमी २०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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       *➖❗अहंकार❗➖*
   *〰️अत्यंत घातक मनोविकार〰️*
     
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👉 *जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में "अहंकार" एक प्रबल शत्रु है क्योंकि सभी भेद अहं भावना से ही उत्पन्न होते हैं,* जिनके उत्पन्न होते ही काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार उठ खड़े होते हैं इन्हें बाहर से बुलाना नहीं पड़ता । अहंकार स्वत: भेद बुद्धि के प्रसंग से इन्हें अंत:स्थल में पैदा कर देता है । मनुष्य परिस्थितियों को दोष देता है या किसी दूसरे व्यक्ति के मत्थे दोष मढ़ने का प्रयत्न करता है, किंतु यह दोष अपने अहंकार का है, जो अन्य विकारों की तरह आपको साधन-भ्रष्ट बना देता है । *अतः आप इसे ही मारने का प्रयत्न कीजिए ।*
👉 अहंकार का नाश करने में मनुष्य को सर्वप्रथम निरपेक्ष होना चाहिए क्योंकि यही सारे अनर्थ का मूल है । समस्त दु:ख और विनाश के ही परिणाम इससे प्राप्त होते हैं रावण की शक्ति का कुछ ठिकाना न था, कंस का बल और पराक्रम जगत विख्यात है । दुर्योधन, शिशुपाल, नेपोलियन, हिटलर आदि की शक्तियों के आगे संसार भयभीत था, किंतु उनका अहंकार ही उन्हें खा गया । *मनुष्य को पतन की ओर ले जाने में अहंकार का ही हाथ रहता है ।* श्रेय के साधकों इससे दूर ही रहना चाहिए । *भगवान सबसे पहले अभिमान ही नष्ट करते हैं ।* अहंकारी व्यक्ति को कभी उसका प्रकाश नहीं मिल सकता ।
👉 *"अहंकार"* एक प्रकार की संग्रह वृत्ति है । अहं के योग से मनुष्य जगत की प्रत्येक वस्तु पर एकाधिकार चाहता है । उसका लाभ केवल स्वयं ही उठाना चाहता है । *किसी दूसरे को हस्तक्षेप करते या लाभ उठाते देखकर वह जल भुन उठता है और प्रतिकार के लिए तैयार हो जाता है ।* जब तक यह पाप पराकाष्ठा तक नहीं पहुंच जाता तब तक भले ही कोई शोषण दमन अपहरण तथा अनैतिक भोग भोगता रहे किंतु अंततः सभी लोग उसका साथ छोड़ देते हैं 
 *साधन और परिस्थितियां शीघ्र ही विपरीत हो जाती हैं , तब मनुष्य को हार माननी पड़ती है । मुंह की खानी पड़ती है और कभी-कभी तो सर्वनाश के ही दर्शन करने पड़ते हैं ।*
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*अहंकार में डूब मत जाइए पृष्ठ-०३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/YTAUNQ9xwdY





🌺 ऋषि चिंतन से 139🌺 Rishi chintan se 139 🌺


*🥀//१२ जून २०२३ सोमवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्षनवमी २०८०//*
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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       *➖पाप मूल अभिमान➖*
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👉 *जब मनुष्य अपने आप को सामान्य स्तर का न समझ कर असाधारण, विशेष बड़ा, महत्त्वपूर्ण समझने लगता है तभी "अभिमान" का अंकुर फूट निकलता है जो दिनोंदिन बढ़ता हुआ विशाल रूप धारण कर लेता है।* झूठी प्रशंसा, उद्दंडता, स्वेच्छाचार, शेखीखोरी से भी मनुष्य अपनी वस्तुस्थिति को न समझकर अभिमान के परों से उड़ने लगता है। ऐसे लोगों के दिमाग की बागडोर अभिमान  और इसे पोषण करने वाले तत्त्वों के हाथों में होती है। *अविवेकी, अज्ञानी, अदूरदर्शी, मोटी बुद्धि के लोग ही "अभिमान" से ग्रस्त होते देखे जाते हैं।* कुछ भी हो अभिमान वह विषबेल है, जो जीवन की हरियाली, सौंदर्य, बुद्धि, विस्तार-विकास को रोक कर उसे सुखा देती है। *यह ऐसी विषबुझी दुधारी तलवार है, जो अपने तथा दूसरों के जीवन में विनाश का सूत्रपात कर देती है।* अभिमान का स्वभाव ही दमन, शोषण, पतन, क्रूरता आदि है, जिससे स्वयं व्यक्ति और उससे संबंधित समाज प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
👉 *किसी भी विषय तथा क्षेत्र में अभिमान हो जाने पर मनुष्य की प्रगति, विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।* विद्या का अभिमान हो जाने पर विद्या नहीं बढ़ती वरन वह घटती ही जाती है। प्रशंसा, प्रसिद्धि जिससे अभिमान को पोषण मिलता है, विकास-उन्नति का पथ भुला देती है। एक बार न्यूटन से किसी ने कहा था- *"आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया।"* इस पर उस निरभिमानी वैज्ञानिक ने कहा- *"मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ ही रज-कण मैं उठा पाया हूँ।"* एक ओर ऐसे व्यक्तियों की स्थिति पर तरस आता है जो बेचारे कहीं से कुछ पढ़-सुनकर, थोड़ा-बहुत अध्ययन कर अभिमानवश अपने आपको विद्या का धनी, पंडित, विद्वान मान बैठते हैं। *अपनी विद्वत्ता, पांडित्य की दुहाई देने वालों की स्थिति एक खोखले, पोले ढोल की तरह ही होती है।* अपनी होशियारी, अध्ययनशीलता का अभिमान रखने वाले विद्यार्थी दूसरों से पिछड़ जाते हैं। कला, विद्या, शक्ति, सामर्थ्य सभी क्षेत्रों में अभिमान, सफलता और प्रगति का मार्ग बंद कर देता है।
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*अहंकार में डूब मत जाइए  पृष्ठ-०७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/YrSouG22GI4





🌺 ऋषि चिंतन से 140 🌺 Rishi chintan se 140 🌺


*🥀//१३ जून २०२३ मंगलवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्ष दशमी २०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *असफलता से निराश मत होइए*
     
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👉 *संसार की हर वस्तु में अच्छाई के साथ-साथ बुराई की मिली रहती है ।* कोई व्यक्ति या वस्तु यहाँ ऐसी नहीं बनी जिसमें न्यूनाधिक मात्रा में गुण दोषों का समावेश न हो । *प्रत्येक अच्छाई अपने साथ कुछ बुराई छुपाए रहती है और प्रत्येक बुराई के पीछे अच्छाई का भी सत्व छुपा रहता है ।* सफलता और असफलता के बारे में भी यही बात लागू होती है । यों आमतौर से हर आदमी सफलता चाहता है और उसे प्राप्त कर प्रसन्न होता है । असफलता में हानि एवं खिन्नता अनुभव होती है । यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इच्छापूर्ति में सुख और उस में पड़ी हुई बाधा को दु:ख माना गया है ।
👉 *इतना होते हुए भी सफलता में कुछ हानि और असफलता का कुछ लाभ भी होता है ।* असफलता हमें अपनी भूलों पर विचार करने का मौका देती और यह सिखाती है कि हम जहाँ गलती करते रहे हैं वहाँ अधिक ध्यान दें और उसमें सुधार करें । *असावधानी बरतने और अधूरे मन से काम करने पर आमतौर से सब काम बिगड़ते हैं ।* श्रम से जी चुराने, आलस्यमें पड़े रहने, समय-कुसमय का ध्यान न रखने से भी असफलता की संभावना बढ़ जाती है । कटु स्वभाव और अशिष्ट व्यवहार से भी दूसरे लोग चिढ़ते और असहयोगी बनते हैं । ऐसी दशा में भी अपनी इच्छा पूर्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है । *असफलता मिलने पर आमतौर से मनुष्य दूसरों पर उसका उत्तर दायित्व डालकर स्वयं निर्दोष बनना चाहता है, पर बुद्धिमता का अंश जब जागृत रहता है, तब यह भी सोचता है कि मेरी भूल कहाँ-कहाँ रही और उसे कैसे सुधारा जाए ?*
👉 जिस प्रकार उधम मचाने और बताया हुआ काम न करने पर बच्चे को धमका देने पर वह रुकता सोचता और बदलता है उसी प्रकार असफलता रूपी देवी की फटकार पड़ने पर मनुष्य को यह भी सोचना पड़ता है कि उसके लिए क्या करना उचित और क्या करना अनुचित था ? अपनी गतिविधियों को सुधार लेने पर जहां बिगड़े काम के बनने की संभावना बढ़ जाती है वहां सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि मनुष्य को अपनी आदतों और गतिविधियों में सुधार करने का अवसर मिलता है । यह सुधार उस अमुक बिगड़े काम को बनाने में ही सहायक नहीं होता वरन् भविष्य के लिए सफलताओं का एक व्यवस्थित शिक्षण देकर प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त कर देता है । *इस प्रकार असफलता कष्ट कारक होते हुए भी बहुत लाभदायक सिद्ध होती है ।*
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*अहंकार में डूब मत जाइए पृष्ठ-११*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/XT7z7pWQYg0L



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