प्रेरणादायक कहानियां भाग 50 prernadayak kahaniyan part 50


💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 246 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐ढाबे वाली आंटी💐💐*

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जी...वो खाना..मिलेगा क्या" प्रमोद ने सकुचाते हुए उनसे पूछा
"नए आये हो न?...ढाबे में खाना नहीं मिलेगा तो और क्या मिलेगा" उनकी अनुभवी आँखों ने उसकी  सकुचाहट को पढ़ लिया "क्या लगाऊँ ?" उन्होंने पूछा
"जी..अ..बस ये लोग जो खा रहे हैं..मतलब दाल रोटी.. कितने की होगी ये ?" एक दो लोग और थे जो वहाँ खाना खा रहे थे उनकी थाली में दाल रोटी सब्जी चावल देख के प्रमोद ने वही खाने को उनसे कह दिया
"20 रुपैये की थाली है...चार रोटी दाल सब्जी और चावल..आराम से बैठो बेटा...लगाती हूँ" उन्होंने बड़ी ममता से कहा और रसोई में चली गईं
"ओह्ह..जी पर एक बात है...मेरे पास सिर्फ...सिर्फ..उन्नीस रूपैये हैं.." प्रमोद  बड़ी शर्मिन्दिगी से बोल पाया
"कोई नहीं..बाद में दे देना..अब खाना खाने तो रोज ही आओगे न यहाँ" उन्होंने जाते जाते मुड़के मुस्कुराते हुए वात्सल्य प्रेम में डूबी आवाज में मुझसे कहा
"जी..जी..ठीक है" वह चैन की साँस लेते हुए बोला उसके बाद  खाना खाया और पैसे देकर वह अपने  कमरे पे आ गया
एक गरीब माँ बाप का होनहार मगर बहुत शर्मीला बेटा प्रमोद यहाँ झुंझुनूं में आगे पढ़ने आया था  सेक्टर किसान कॉलोनी के पास कस्वां भवन में एक सस्ता कमरा लेकर रह रहा था  आज उसका पहला दिन है। तहसील चौराहे ,वैसे ये है तो तिराहा पर इसे चौराहा क्यों कहते हैं किसीको नहीं पता,इसी चौराहे पर  ये आंटी का ढाबा है ।

ढाबा क्या सड़क किनारे  बने एक छोटे से मकान के निचले हिस्से में एक महिला जिन्हें सब ऑन्टी कहते हैं मीनू में सिर्फ दो आइटम वाला ये ढाबा चलाती हैं ढाबे में मजबूर मगर मध्यम लोग ही खाना खाने आते हैं जो सस्ता खाना ढूँढते हैं इसलिए ढाबे की हालत और उसकी कमाई में से कौन ज्यादा खस्ताहाल है ये कहना जरा मुश्किल है।


अगले दिन प्रमोद  फिर जाता है  ढाबे में आंटी उसे  देखकर मुस्कुराती हैं वह  भी हल्का मुस्कुराता है शायद कल के बाद से थोड़ा सा आत्मविश्वास  आया है उसने कहा  "आंटी..खाना लगा दीजिये...पर आपसे एक विनती है..आप थाली से एक रोटी..कम कर दीजिये..क्योंकि मेरे पास उन्नीस रुपैये से ज्यादा खाने पे खर्च करने को नहीं हैं"।

 उसने  सोचा खाने से पहले ही साफ़ साफ़ बता दिया जाय I
हालाँकि  बजट बीस रुपैये का था पर एक रुपैया रोज बचा के जब छुट्टियों में घर जाऊँगा तो अपनी माँ के लिए कुछ उपहार ले जाऊँगा ये सोच के प्रमोद ने  यह  नीति बनाई थी 

"ठीक है..बैठ जाओ..अभी लगाती हूँ..." कहकर वो रसोई में चली गईं 
एक तरफ की दीवार से लगीं मेज कुर्सियां पड़ी थीं और दूसरी ओर एक दीवार पे जमीन से करीबन ढाई फुट ऊँचा एक प्लेटफॉर्म बना था जिसपे चूल्हा बर्तन इत्यादि रखे थे बस वही रसोई थी ।

आंटी का कद बहुत छोटा है जिसकी वजह से रसोई का प्लेटफॉर्म उनसे थोड़ी ज्यादा ऊँचाई पे पड़ता है और उन्हें खाना बनाने के काम में काफी कठिनाई आ रही है ...थोड़ी देर बाद वो खाने की थाली ले आईं।

"अरे...आपतो इसमें चार रोटी ले आईं.. मैंने आपसे कहा..." मैं आगे कुछ कहता कि वो बोल पड़ीं " देखो बेटा.. मैं एक बूढ़ी अकेली औरत बस इसलिए ढाबा चलाती हूँ..कि तुम लोगों के साथ... मेरी भी दो रोटी का इंतजाम हो जाए... अब एक रुपैये के लिए क्या तेरा पेट काटूँगी" कहकर उसके  सर पे हाथ फेरकर वो चली गईं
ऐसे ही रोज ये क्रम चलता रहा प्रतिदिन वह  ऑन्टी को ऊँचे प्लेटफॉर्म पे बड़ी मुश्किल से काम करते देखता,घुटनो में तकलीफ के कारण बैठ के कोई काम उनसे हो नहीं पाता था,खाना खाता ,उन्नीस रुपये देता कुछ हल्की फुल्की बातें उनसे होती बस ऐसे ही कुछ महीने बीत गए और फिर आज के दिन वह काफी देर से ढाबे पे आया ।

"अरे..आज बड़ी देर कर दी तूने...सब ठीक तो है..बैठ मैं खाना लगाती हूँ" ऑन्टी की आँखों में चिंता थी, प्रमोद ने  कहा "सब ठीक है और हाँ खाना तो खाऊंगा ही..पर पहले आप रसोई में आओ मेरे साथ..."
उनका हाथ पकड़ के वह  रसोई वाले हिस्से में उन्हें ले आया और उन्हें रसोई के प्लेटफॉर्म की ओर खड़ा किया और फिर उनके पैरों के नीचे पूजापाठ वाली दुकान से खरीदी लकड़ी की एक मजबूत चौकी रखने लगा तो वो आश्चर्य से भर गईं,उसपे खड़ी हुईं और उनकी आँखों ने न जाने कितने वर्षों के बंधे बाँध खोल दिए..
प्रमोद ने  उनके पैर छुए और कहा "हैप्पी मदर्स डे.....ऑन्टी"
आंटी ने प्रमोद को गले लगा लिया, और रोते हुए बोली- ऐसा बेटा भगवान सभी को दे!

दोस्तो ,हमें भी जहाँ तक सम्भव हो ऐसे लोगों की मदद जरूर करनी चाहिए जिससे समाज मे प्रेरणा मिले और समाज आगे की और अग्रसर रहे।


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 247 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐मान का पान💐💐*

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भैया का फोन सुनते ही बिना समय गंवाये रिचा पति के संग मायके पहुंच गई। मम्मी की सबसे लाडली बेटी थी वो। इसलिए अचानक मां की गम्भीर हालत को देख कर रेखा की आंखों से आंसुओं की झड़ी लग गयी। मां का हाथ अपने हाथों में थाम कर ” मम्मी sss ” सुबकते हुए बस इतना ही कह पायी रिचा।”


बेटी की आवाज कानों में पड़ते ही मां ने धीरे से आँखें खोल दीं। लाडली बेटी को सामने देकर उनके चेहरे पर खुशी के भाव साफ झलक रहे थे। ” तू.. आ.. गयी.. बिटिया!.. कैसी है तू!, देख. मेरा.. अब.. जाने का.. वक्त.. आ. गया.. है , बस तुझ से.. एक ही बात.. कहनी थी बेटा ! ”

” पहले आप ठीक हो जाओ मम्मी!! बात बाद में कह लेना ” रिचा नेआंखों से हो रही बरसात पर काबू पाने की असफल कोशिश करते हुए कहा।


” नहीं बेटा!.. मेरे पास.. वक्त नहीं है,.. सुन!.. मां बाप किसी.. के हमेशा.. नहीं रहते,.. उनके बाद.. मायका. भैया भाभियों से बनता है.. “। मां की आवाज कांप रही थी।


रिचा मां की स्थिति को देख कर अपना धैर्य खो रही थी। और बार बार एक ही बात कह रही थी ऐसा न कहो मम्मा!सब ठीक हो जायेगा “।

मां ने अपनी सारी सांसों को बटोर कर फिर बोलने की हिम्मत जुटाई-

मैं तुझे एक ही… सीख देकर जा.. रही हूं बेटा!…मेरे बाद भी.. रिश्तों की खुशबू यूं ही… बनाये रखना, भैया भाभियों के… प्यार.. को कभी लेने -देने की.. तराजू में मत तोलना.. बेटा!.. मान का.. तो पान ही.. बहुत.. होता है…

मां ने जैसे तैसे मन की बात बेटी के सामने रख दी। शरीर में इतना बोलने की ताकत न थी, सो उनकी सांसें उखड़ने लगीं।

” हां मम्मा! आप निश्चिंत रहो, हमेशा ऐसा ही होगा, अब आप शान्त हो जाओ, देखो आप से बोला भी नहीं जा रहा है “, रेखा ने मां को भरोसा दिलाया और टेबल पर रखे जग से पानी लेकर, मां को पिलाने के लिए जैसे ही पलटी, तब तक मां की आंखें बन्द हो चुकी थीं। उनके चेहरे पर असीम शान्ति थी, मानों उनके मन का बोझ हल्का हो गया था।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 248 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐मैले कपड़े💐💐*

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एक दिन की बात है। एक मास्टर जी अपने एक अनुयायी के साथ प्रातः काल सैर कर रहे थे कि अचानक ही एक व्यक्ति उनके पास आया और उन्हें भला-बुरा कहने लगा। उसने पहले मास्टर के लिए बहुत से अपशब्द कहे, पर बावजूद इसके मास्टर मुस्कुराते हुए चलते रहे। मास्टर को ऐसा करता देख वह व्यक्ति और भी क्रोधित हो गया और उनके पूर्वजों तक को अपमानित करने लगा। पर इसके बावजूद मास्टर मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते रहे। मास्टर पर अपनी बातों का कोई असर ना होते हुए देख अंततः वह व्यक्ति निराश हो गया और उनके रास्ते से हट गया।

उस व्यक्ति के जाते ही अनुयायी ने आश्चर्य से पुछा, “मास्टर जी आपने भला उस दुष्ट की बातों का जवाब क्यों नहीं दिया और तो और आप मुस्कुराते रहे, क्या आपको उसकी बातों से कोई कष्ट नहीं पहुंचा ?”

मास्टर जी कुछ नहीं बोले और उसे अपने पीछे आने का इशारा किया।

कुछ देर चलने के बाद वे मास्टर जी के कक्ष तक पहुँच गए। मास्टर जी बोले, “तुम यहीं रुको मैं अंदर से अभी आया।”

मास्टर जी कुछ देर बाद एक मैले कपड़े को लेकर बाहर आये और उसे अनुयायी को थमाते हुए बोले, “लो अपने कपड़े उतारकर इन्हें धारण कर लो ?”

कपड़ों से अजीब सी दुर्गन्ध आ रही थी और अनुयायी ने उन्हें हाथ में लेते ही दूर फेंक दिया।

मास्टर जी बोले, “क्या हुआ तुम इन मैले कपड़ों को नहीं ग्रहण कर सकते ना ? ठीक इसी तरह मैं भी उस व्यक्ति द्वारा फेंके हुए अपशब्दों को नहीं ग्रहण कर सकता।

*💐💐शिक्षा:-💐💐*

इतना याद रखो कि यदि तुम किसी के बिना मतलब भला-बुरा कहने पर स्वयं भी क्रोधित हो जाते हो तो इसका अर्थ है कि तुम अपने साफ़-सुथरे वस्त्रों की जगह उसके फेंके फटे-पुराने मैले कपड़ों को धारण कर रहे हो।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 249 💮


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*💐💐श्री गणेश और किसान💐💐*

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प्राचीन समय की बात है समस्त स्वर्ग लोक उत्साहित था। भगवान नारायण स्वयं माता लक्ष्मी के साथ अपने विवाह में सभी को आमंत्रित कर रहे थे। माता लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु का विवाह कुंदनपुर नामक स्थान पर हो रहा था, जो माता लक्ष्मी का निवास स्थान है। 

सभी देव भगवान विष्णु की शादी में सबसे अच्छे दिखना चाहते थे, जिसके लिए वह जोरों-शोरों से तैयारी कर रहे थे। सभी देवों में सर्वश्रेष्ठ कपड़े पहनने की होड़ लग रही थी। जैसे ही सभी देव तैयार होकर बारात में शामिल होने के लिए भगवान विष्णु के घर पर इकट्ठा हुए, तो उन्होंने देखा कि भगवान गणेश घर में प्रवेश कर रहे हैं। 

भगवान गणेश को वहा देखकर सभी देव काफी परेशान हो गए, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि गणपति जी उनके साथ कुंदनपुर आए। इसके पीछे कारण यह था कि वे असामान्य दिखते थे और खाना भी अधिक मात्रा में खाते थे। 

देवताओं ने यह भगवान विष्णु से कहा कि वे सभी लोग बहुत अच्छे दिख रहे हैं, लेकिन गणेश उनके साथ सही नहीं लग रहे हैं। हालाँकि, जगतपिता भगवान नारायण भगवान गणेश को पीछे नहीं छोड़ना चाहते थे। लेकिन देवताओं के दबाव के कारण उन्हें यह स्वीकार करना पड़ा। 

इसलिए, वे एक योजना के साथ आए, और भगवान विष्णु से गणपति को यह बताने के लिए कहा कि उन्हें स्वर्गलोक की देखभाल करनी है, क्योंकि वे सभी लोग जा रहे हैं। विवाह में न जाने की बात सुनकर गणपति जी थोड़ा दुखी तो हुए, लेकिन भगवान नारायण द्वारा सौंपे गए कार्य को वे मना नहीं कर पाए। 

यह सब होने के पश्चात नारद मुनि वहां आये और उन्होंने युवा श्री गणेश को सब कुछ बताया। साथ ही, उन्होंने देवताओं के पास वापस जाने के लिए एक विमान भी तैयार किया। 

देवर्षि नारद मुनि ने भगवान गणेश को सलाह दी कि वह चूहों की एक सेना तैयार करें। यह चूहों की सेना देवताओं के मार्ग के नीचे खुदाई करने का कार्य कर सकती है। मार्ग की खुदाई करने से सड़कें खोखली बन जाएगी और खोखली सड़कें रथों, हाथियों, गाड़ियों और अन्य वस्तुओं के वजन को संभाल नहीं पाएगी। फिर जब वे सभी मार्ग पर चलेंगे तो सब डूब जाएगा, और वे सब भीतर गिर जाएंगे। 

भगवान गणेश इस योजना से बहुत खुश हुए और उन्होंने वैसा ही किया। और सब कुछ योजना के अनुसार हुआ। जैसे ही भगवान विष्णु का रथ सड़क पर चढ़ा, पहिए सड़क में गहरे धंस गए और बारात रुक गयी। 

कोई भी देव रथ को पृथ्वी से बाहर नहीं खींच सकें। देवताओं को इस तरह संघर्ष करते देख पास से गुजर रहे एक किसान ने मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया। किसी को विश्वास नहीं था कि वह कार्य कर पाएगा, लेकिन फिर भी उसे मौका देने का फैसला किया। 

किसान ने पहिया पकड़ लिया और “जय गणपति’’ चिल्लाया, और पहिया एक झटके में जमीन से बाहर हो गया। हर कोई चौंक गया और देवताओं ने उससे पूछा कि उसने श्री गणपति का नाम क्यों लिया। किसान ने उत्तर दिया कि भगवान गणेश सभी समस्याओं को दूर करने वाले हैं, वे प्रथम पूजनीय देव हैं। 

इसलिए, वह हमेशा कोई भी काम शुरू करने से पहले भगवान गणेश का नाम लेते हैं। यह सुनकर सभी देवता लज्जित हुए और स्वयं को दोषी महसूस किया। उन्हें इस बात का आभास हुआ कि अच्छे दिखने से कोई फर्क नहीं पड़ता, जो वास्तव में मायने रखता है वह है किसी व्यक्ति की महानता और अच्छाई। 

सभी देवता वापस श्री गणपति के पास गए और क्षमा मांगी। तब वे सभी उन्हें बारात में ले आए, और सब कुछ ठीक हो गया।


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*💐💐बुजुर्ग आवास💐💐*

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पत्नी के अंतिम संस्कार व तेरहवीं के बाद रिटायर्ड पोस्टमैन मनोहर गाँव छोड़कर मुम्बई में अपने पुत्र सुनील के बड़े से मकान में आये हुए हैं। सुनील बहुत मनुहार के बाद यहाँ ला पाया है। यद्यपि वह पहले भी कई बार प्रयास कर चुका था किंतु अम्मा ही बाबूजी को यह कह कर रोक देती थी कि 'कहाँ वहाँ बेटे बहू की ज़िंदगी में दखल देने चलेंगे। यहीं ठीक है। सारी जिंदगी यहीं गुजरी है और जो थोड़ी सी बची है उसे भी यहीं रह कर काट लेंगे। ठीक है न!' 

बस बाबूजी की इच्छा मर जाती। पर इस बार कोई साक्षात अवरोध नहीं था और पत्नी की स्मृतियों में बेटे के स्नेह से अधिक ताकत नहीं थी , इसलिए मनोहर बम्बई आ ही गए हैं।

सुनील एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कम्पनी में इंजीनियर है। उसने आलीशान घर व गाड़ी ले रखी है।

घर में घुसते ही मनोहर ठिठक कर रुक गए। गुदगुदी मैट पर पैर रखे ही नहीं जा रहे हैं उनके। दरवाजे पर उन्हें रुका देख कर सुनील बोला - "आइये बाबूजी, अंदर आइये।"

- "बेटा, मेरे गन्दे पैरों से यह कालीन गन्दी तो नहीं हो जाएगी।"

- "बाबूजी, आप उसकी चिंता न करें। आइये यहाँ सोफे पर बैठ जाइए।"

सहमें हुए कदमों में चलते हुए मनोहर जैसे ही सोफे पर बैठे तो उनकी चीख निकल गयी - अरे रे! मर गया रे!

उनके बैठते ही नरम औऱ गुदगुदा सोफा की गद्दी अन्दर तक धँस गयी थी। इससे मनोहर चिहुँक कर चीख पड़े थे।

चाय पीने के बाद सुनील ने मनोहर से कहा - "बाबूजी, आइये आपको घर दिखा दूँ अपना।"

- "जरूर बेटा, चलो।"

- "बाबू जी, यह है लॉबी जहाँ हम लोग चाय पी रहे थे। यहाँ पर कोई भी अतिथि आता है तो चाय नाश्ता और गपशप होती है। यह डाइनिंग हाल है। यहाँ पर हम लोग खाना खाते हैं। बाबूजी, यह रसोई है और इसी से जुड़ा हुआ यह भण्डार घर है। यहाँ रसोई से सम्बंधित सामग्री रखी जाती हैं। यह बच्चों का कमरा है।"

- "तो बच्चे क्या अपने माँ बाप के साथ नहीं रहते?"

- बाबूजी, यह शहर है और शहरों में मुंबई है। यहाँ बच्चे को जन्म से ही अकेले सोने की आदत डालनी पड़ती है। माँ तो बस समय समय पर उसे दूध पिला देती है और उसके शेष कार्य आया आकर कर जाती है।"

थोड़ा ठहर कर सुनील ने आगे कहा,"बाबूजी यह आपकी बहू और मेरे सोने का कमरा है और इस कोने में यह गेस्ट रूम है। कोई अतिथि आ जाए तो यहीं ठहरता है। यह छोटा सा कमरा पालतू जानवरों के लिए है। कभी कोई कुत्ता आदि पाला गया तो उसके लिए व्यवस्था कर रखी है।"

सीढियां चढ़ कर ऊपर पहुँचे सुनील ने लम्बी चौड़ी छत के एक कोने में बने एक टीन की छत वाले कमरे को खोल कर दिखाते हुए कहा - "बाबूजी यह है घर का कबाड़खाना। घर की सब टूटी फूटी और बेकार वस्तुएं यहीं पर एकत्र कर दी जाती हैं। और दीवाली- होली पर इसकी सफाई कर दी जाती है। ऊपर ही एक बाथरूम और टॉइलट भी बना हुआ है।"

मनोहर ने देखा कि इसी कबाड़ख़ाने के अंदर एक फोल्डिंग चारपाई पर बिस्तर लगा हुआ है और उसी पर उनका झोला रखा हुआ है। मनोहर ने पलट कर सुनील की तरफ देखा किन्तु वह उन्हें वहां अकेला छोड़ सरपट नीचे जा चुका था। 

मनोहर उस चारपाई पर बैठकर सोचने लगे कि 'कैसा यह घर है जहाँ पाले जाने वाले जानवरों के लिए अलग कमरे का विधान कर लिया जाता है किंतु बूढ़े माँ बाप के लिए नहीं। इनके लिए तो कबाड़ का कमरा ही उचित आवास मान लिया गया है। नहीं.. अभी मैं कबाड़ नहीं हुआ हूँ। सुनील की माँ की सोच बिल्कुल सही था। मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।'

अगली सुबह जब सुनील मनोहर के लिए चाय लेकर ऊपर गया तो कक्ष को खाली पाया। बाबू जी का झोला भी नहीं था वहाँ। उसने टॉयलेट व बाथरूम भी देख लिये किन्तु बाबूजी वहाँ भी नहीं थे। वह झट से उतर कर नीचे आया तो पाया कि मेन गेट खुला हुआ है। उधर मनोहर टिकट लेकर गाँव वापसी के लिए सबेरे वाली गाड़ी में बैठ चुके थे। उन्होंने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर देखा कि उनके 'अपने घर' की चाभी मौजूद थी। उन्होंने उसे कस कर मुट्ठी में पकड़ लिया। चलती हुई गाड़ी में उनके चेहरे को छू रही हवा उनके इस निर्णय को और मजबूत बना रही थी।और घर पहुँच कर चैन की सांस ली।

*💐💐शिक्षा💐💐*

दोस्तों,जीवन मे अपने बुजुर्ग माता पिता का उसी प्रकार ध्यान रखे जिस प्रकार माता पिता बचपन मे आपका ध्यान रखते थे,क्योकि एक उम्र के बाद बचपन फिर से लौट आता है।इसलिए उस पड़ाव पर व्यस्त जिंदगी में से समय निकाल कर उन्हें भी थोड़ा समय दीजिये,अच्छा लगेगा।



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