🌺 ऋषि चिंतन से 36 🌺 Rishi chintan se 36🌺
*🥀//२२ मार्च २०२३ बुधवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष प्रतिपदा२०८०🔆*
*👉 नव संवत्सर ("पिंगल")*
*➖की➖*
*🙏हार्दिक शुभकामनाएँ🙏*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*वाणी को प्रभावकारी बनाएँ*
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👉 तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है -
*"जिह्वा मधुमत्तमा" अर्थात् हे ईश्वर ! मेरी यह जिह्वा सदा मधुर वचन बोले । मैं कभी कटु, कर्कश और कुवचन द्वारा अपनी वाणी को कलंकित न करूँ ।* अतः हम सदा अपने जीवन में, घर में, समाज में प्रत्येक व्यवहार के समय ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करें जो मधुर, शिष्ट, उत्साहप्रद और हितकारी हों ।
👉 *मीठे और हितकारी वचन वास्तव में ऐसे वशीकरण मंत्र हैं, जिनसे हमारे इष्ट-मित्र, स्वजन-परिजन ही नहीं सारे संसार के लोग हमारी ओर आकर्षित होकर हम पर अपना स्नेह लुटा सकते हैं ।* फिर क्यों व्यर्थ ही हम कटु, अभद्र एवं अशिष्ट शब्दों के उच्चारण द्वारा अपने चारों ओर के वातावरण को कलुषित और अमंगल जनक बनाकर अपने तथा दूसरों के जीवन को कष्टप्रद एवं अशांत बनाने की चेष्टा करें ।
👉 *"मन" में सदा अच्छे संकल्प करते रहिए और वाणी से सदा मधुर एवं हितकारी वचन ही बोलिए ।* अपने मन को हमेशा सत्संकल्प पूर्ण वाणी से संबोधित करते हुए उसे सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहें । मन को एकाग्र और शांत कर एकांत में ऐसे शब्दों का उच्चारण कीजिए जिससे उसे नई चेतना और नई प्रेरणा मिले । जैसे कहिए कि -- *"मेरा "मन" असीम शक्ति का भंडार है, मैं उससे अपनी इच्छानुकूल कार्य ले सकता हूँ । मेरा "मन" इंद्रियों का दास नहीं, पर मैं उनका स्वामी है ।* वह इंद्रियों को विषयों की ओर कदापि नहीं बढ़ने देगा । *"मन" इंद्रियों का स्वामी है पर मैं "मन" का भी स्वामी हूँ अर्थात मन पूर्णत: मेरे वश में है ।* मैं उसे हर प्रलोभन से बचाए रखने की क्षमता रखता हूँ और उसे कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर चलाने की भी मुझमें पू्र्ण शक्ति है । *सारी इंद्रियाँ और "मन" मेरे आज्ञाकारी हैं और मैं उन्हें हरदम ठीक रास्ते से चलने की ही प्रेरणा दिया करता हूँ ।* आप इस प्रकार के आत्म-निर्देशपूर्ण शब्दों द्वारा अपनी मानसिक शक्ति और आत्मबल को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाकर जीवन को पवित्र, सुखी और संपन्न बना सकते हैं ।
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*सिद्धिदात्री वाक्-साधना- पृष्ठ- ९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 37 🌺 Rishi chintan se 37🌺
*🥀०६जनवरी २०२३ शुक्रवार🥀*
*🍁पौष शुक्लपक्ष पूर्णिमा २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖व्यापक बुराइयों की चर्चा➖*
*〰️🥀नहीं🥀〰️*
*👉!! समाधान पर कार्य करें !!👈*
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👉 *व्यापक बुराइयों की अधिक चर्चा करने से कुछ लाभ नहीं नहीं ।* वस्तुस्थिति को हम सब जानते ही हैं । इस चर्चा से चित्त में क्षोभ और संताप ही उत्पन्न होता है । *यों भले मनुष्यों का भी अभाव नहीं है वे प्रत्येक क्षेत्र में, बदनाम क्षेत्रों में भी मौजूद रहते हैं,* पर उनकी संख्या नगण्य है । असुरता का व्यापक विस्तार अपने कैसे कड़वे और विषैले प्रतिफल उत्पन्न कर रहा है, सो सामने प्रस्तुत ही है । सर्वत्र अशांति, असंतोष, विक्षोभ, संताप, द्वेष क्लेश, रोग, शोक, दैन्य, अभाव,एवं संघर्ष का उद्वेग भरा वातावरण मौजूद है । *कहीं भी शांति नहीं, किधर भी चैन नहीं, जो प्रगति हम करते जाते हैं, वही विपत्ति बनकर गले में फाँसी के फंदे की तरह जकड़ती चली जाती है ।* विज्ञान की उन्नति ने एटम युग लाकर हमें खड़ा कर दिया है । जहाँ मानव सभ्यता सर्वनाश के कगार पर खड़ी-खड़ी त्राहि-त्राहि पुकार रही है ।
👉 *प्रश्न यह है कि क्या इस बढ़ती हुई असुरता को इसी रूप में बढ़ने दिया जाये और सर्वनाश की घड़ी के लिए निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते रहा जाए ? अथवा स्थिति को सुधारने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाए ? विवेक, कर्तव्य, धर्म और पुरुषार्थ की चुनौती यह है कि निष्क्रियता उचित नहीं ।* शांति का संतुलन बनाए रखने के लिए धर्म और कल्याण की रक्षा के लिए हमें कुछ करना ही चाहिए । जिस दिशा में अपने कदम अब तक तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं, उसी सर्वनाश की ओर अब इस दौड़ को बंद किया ही जाना चाहिए । *असुरता के विरुद्ध विवेक की इसी प्रतिक्रिया का नाम है ---"युग निर्माण योजना" ।*
👉 प्रस्तुत योजना के अंतर्गत हमें मानव जीवन का उद्देश्य, आदर्श, तत्वज्ञान और व्यवहार सीखना पड़ेगा । फूहड़पन से जिंदगी जीना कोई बुद्धिमानी नहीं । चौरासी लाख योनियों में, करोड़ों वर्षों बाद मिले हुए इस अवसर को यूँ ही गंदे-संदे ढंग से जी डालना, यह भी कोई समझदारी की बात है । जब थोड़ी भी उपयोगी और कीमती चीजों को संभाल कर रखने और ठीक उपयोग करने की बात सोची जाती है, *तो "मानव जीवन" जैसे सुर दुर्लभ अवसर को ऐसी उपेक्षा अस्त-व्यस्तता के साथ क्यों जिया जाना चाहिए ? उचित यही है कि हम "जीवन विद्या" को सीखें और जिंदगी का स्वरूप समझने और उसके सदुपयोग का प्रयत्न करें ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-२७*
*🍁पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍁*
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🌺 ऋषि चिंतन से 38 🌺 Rishi chintan se 38🌺
*🥀०५जनवरी२०२३बृहस्पतिवार🥀*
*🍁पौषशुक्लपक्षचतुर्दशी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*🍂 लोकमानस में श्रेष्ठता। 🍂*
*➖❌वाणी से नहीं❌➖*
*✅〰️आचरण से आती है〰️✅*
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👉 *लोकमानस में "सद्ज्ञान" की प्रतिष्ठापना करने का कार्य हमें अपने व्यक्तिगत जीवन में सुधार एवं परिवर्तन करके ही संपन्न करना होगा ।* प्रवचन और लेख इस कार्य में सहायक तो हो सकते हैं, पर केवल उन्हीं के आधार पर अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति संभव नहीं । *दूसरों पर वास्तविक प्रभाव डालने के लिए हमें अपना "अनुकरणीय आदर्श" उनके सामने उपस्थित करना होगा ।* संसार में बुराइयाँ इसलिए बढ़ रही हैं, कि बुरे आदमी अपने बुरे आचरणों द्वारा दूसरों को ठोस शिक्षण देते हैं । उन्हें देखकर यह अनुमान लगा लिया जाता है कि इस कार्य पर इनकी गहरी निष्ठा है । जुआरी जुआ खेलते हुए भारी हानि उठाने को तैयार रहते हैं, नशेबाज अपना स्वास्थ्य होम देते हैं, व्यभिचारी अपने धन और प्रतिष्ठा से हाथ धोते हैं, चोर डाकू राजदंड का त्रास भोगते हैं । इसी प्रकार अन्य बुरे लोग भी भारी खतरे उठाकर भी अपने प्रिय विषय में संलग्न रहते हैं । *यही "निष्ठा" दूसरों पर प्रभाव डालती है और देखा-देखी अन्य व्यक्ति उनका अनुकरण करने लगते हैं ।*
👉 *"सद्विचारों के प्रचारक" वैसे उदाहरण अपने जीवन में प्रस्तुत नहीं कर पाते । वे कहते तो बहुत कुछ हैं, पर ऐसा कुछ नहीं करते जिससे उनकी निष्ठा की सच्चाई प्रतीत हो ।* प्राचीन काल में साधु-ब्राह्मण धर्मोपदेश करने से पूर्व अपना जीवन उसी प्रकार का बनाते थे, जिससे संपर्क में आने वालों को उनकी निष्ठा की गहराई का पता चल जाए और वे यथासंभव अनुकरण का प्रयत्न करते हुए अपनी बुराइयों को छोड़ने के लिए अंतःप्रेरणा विकसित कर सकें । बुराई त्यागने और अच्छाई ग्रहण करने का कठिन कदम कोई तब उठाता है, जब वैसे ही दूसरे उदाहरण भी सामने उपस्थित हों और उनसे आवश्यक प्रेरणा प्राप्त हो । *गांधी, बुद्ध, ईसा के उपदेशों ने संसार में बहुत काम किया है, पर उनके प्रवचनों के पीछे उनका उज्ज्वल चरित्र भी प्रकाशवान था ।*
👉 *हमें अपने आप का सुधार करने का कार्यक्रम आरंभ करते हुए लोकसेवा की महान प्रक्रिया का आरंभ करना होगा । "युग परिवर्तन" का पहला कार्य है --- "अपना परिवर्तन" । "हम बदलेंगे" तो हमारी "दुनिया भी बदलेगी" । शुभ कार्य अपने घर से आरंभ होते हैं । समाज सुधारने के लिए, संसार को सुधारने के लिए, हमें अपना व्यक्तिगत जीवन सुधारने के लिए अग्रसर होना होगा ।*
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*हम बदलें तो दुनियाछफC Gबदले पृष्ठ-२२*
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 39 🌺 Rishi chintan se 39🌺
*🥀//२३ मार्च २०२३ गुरुवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्षद्वितीया२०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*दैविक दु:ख व उनके कारण*
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👉 *"दैविक दु:ख" वे कहे जाते हैं, जो मन को होते हैं, जैसे चिंता, आशंका, क्रोध, अपमान, शत्रुता, बिछोह, भय, शोक आदि ।* इन्हें मानसिक कष्ट भी कहते हैं । ये वे पाप हैं, जो स्वेच्छा पूर्वक तीव्र भावनाओं से प्रेरित होकर किए जाते हैं, जैसे ईर्ष्या, कृतघ्नता, छल, दंभ, घमंड, क्रूरता, स्वार्थपरता आदि । इन कुविचारों के कारण जो वातावरण मस्तिष्क में घुटता रहता है उससे अंत:चेतना पर उसी प्रकार प्रभाव पड़ता है जिस प्रकार धुएँ के कारण दीवार काली पड़ जाती है या तेल से भीगने पर कपड़ा गंदा हो जाता है । *"आत्मा" स्वभावत: पवित्र है, वह अपने ऊपर इन पाप-मूलक कुविचारों, प्रभावों को जमा हुआ नहीं रहने देना चाहती, वह इस फिक्र में रहती है कि किस प्रकार इस गंदगी को साफ करूँ ?* पेट में हानिकारक वस्तुएंँ जमा हो जाने पर पेट उसे उल्टी या दस्त में निकाल बाहर करता है । उसी प्रकार तीव्र इच्छा से जानबूझकर किए गए पापों को निकाल बाहर करने के लिए आत्मा आतुर हो उठती है । हम उसे जरा सा भी जान नहीं पाते, किंतु आत्मा भीतर ही भीतर उसके भार को हटाने के लिए अत्यंत व्याकुल हो जाती है । बाहरी मन, स्थूल बुद्धि को उस अदृश्य प्रक्रिया का कुछ भी पता नहीं लगता, पर अंतर्मन चुपके ही चुपके ऐसे अवसर एकत्रित करने में लगा रहता है, जिससे वह भार हट जाए । *अपमान, असफलता, बिछोह, शोक, दु:ख आदि यदि प्राप्त होते हो़ंं तो ऐसे अवसरों को मनुष्य कहीं से एक न एक दिन किसी प्रकार खींच ही लाता है, ताकि उन दुर्भावनाओं का, पाप संस्कारों का इन अप्रिय परिस्थितियों में समाधान हो जाए ।*
👉 *शरीर द्वारा किए हुए चोरी, डकैती, व्यभिचार, अपहरण, हिंसा आदि में मन ही प्रमुख है ।* हत्या करने में हाथ का कोई स्वार्थ नहीं है वरन् मन.के आवेश की पूर्ति है, *इसलिए इस प्रकार के कार्य जिनके करते समय इंद्रियों को सुख न पहुंँचता हो, मानसिक पाप कहलाते हैं ।* ऐसे पापों का फल मानसिक दु:ख होता है । स्त्री पुत्र आदि प्रिय जनों की मृत्यु, धन-नाश, लोक निंदा, अपमान, पराजय, असफलता, दरिद्रता आदि मानसिक दु:ख हैं, उनसे मनुष्य की मानसिक वेदना उमड़ पड़ती है, शोक संताप उत्पन्न होता है, दु:खी होकर रोता-चिल्लाता है,आँसू बहाता है,सिर धुनता है । *इससे वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं और भविष्य में अधर्म न करने एवं धर्म में प्रवृत्त रहने की प्रवृत्ति बढ़ती है ।* देखा गया है कि मरघट में स्वजनों की चिता रचते हुए ऐसे भाव उत्पन्न होते हैं कि *जीवन का सदुपयोग करना चाहिए ।* धन नाश होने पर *मनुष्य भगवान को पुकारता है ।* पराजित और असफल व्यक्ति का घमंड चूर हो जाता है । *नशा उतर जाने पर वह उसकी बात करता है ।* मानसिक दु:खों का एकमात्र उद्देश्य मन में जमे हुए ईर्ष्या, कृतघ्नता, स्वार्थपरता, क्रूरता, निर्दयता, छल, दंभ, घमंड की सफाई करना होता है । *दु:ख इसलिए आते हैं कि आत्मा के ऊपर जमा हुआ प्रारब्ध कर्मों का पाप संस्कार निकल जाए । पीड़ा और वेदना की धारा उन पूर्व कृत्य, प्रारब्ध कर्मों के निकृष्ट संस्कारों को धोने के लिए प्रकट होती है ।*
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*गहना कर्मणोगति:- पृष्ठ- ९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/fqDbqEaKvcs
🌺 ऋषि चिंतन से 40 🌺 Rishi chintan se 40 🌺
*🥀//२४ मार्च २०२३ शुक्रवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष तृतीया२०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*समाज में बढ़ती दुष्प्रवृत्तियाँ*
*👩🎤हमारी जिम्मेदारी कितनी ?*
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👉 *संपूर्ण मनुष्य जाति एक ही सूत्र में बंधी हुई है ।* विश्वव्यापी जीव तत्व एक है । आत्मा सर्वव्यापी है । जैसे एक स्थान पर यज्ञ करने से अन्य स्थानों का भी वायुमंडल शुद्ध होता है और एक स्थान पर दुर्गंध फैलने से उसका प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ता है । *इसी प्रकार एक मनुष्य के कुत्सित कर्मों के लिए दूसरा भी जिम्मेदार है ।* एक दुष्ट व्यक्ति अपने माता-पिता को लज्जित करता है, अपने घर और कुटुंब को शर्मिंदा करता है । *वे इसलिए शर्मिंदा होते हैं कि उस व्यक्ति के कामों से उनका कर्तव्य भी बँधा हुआ है । अपने पुत्र, कुटुंबी या घर वाले को सुशिक्षित, सदाचारी न बनाकर दुष्ट क्यों हो जाने दिया ? इसकी आध्यात्मिक जिम्मेदारी कुटुंब की भी है ।* कानून द्वारा अपराधी को ही सजा मिलेगी, परंतु कुटुंबियों की आत्मा स्वयमेव शर्मिंदा होगी, क्योंकि उनकी गुप्त शक्ति यह स्वीकार करती है कि हम भी किसी हद तक इस मामले में अपराधी हैं । *सारा समाज एक सूत्र में बँधा होने के कारण आपस में एक दूसरे की हीनता के लिए जिम्मेदार है ।* पड़ोसी का घर जलता रहे और दूसरा पड़ोसी खड़ा खड़ा तमाशा देखे तो कुछ देर बाद उसका भी घर जल सकता है । मोहल्ले के एक घर में हैजा फैले और दूसरे लोग उसे रोकने की चिंता न करें तो उन्हें भी हैजा का शिकार होना पड़ेगा । *कोई व्यक्ति किसी की चोरी, बलात्कार, हत्या, लूट आदि होती हुई देखता रहे और समर्थ होते हुए भी उसे रोकने का प्रयास न करे, तो समाज उससे घृणा करेगा एवं कानून के अनुसार यह भी दंडनीय समझा जाएगा ।
👉 *ईश्वरीय नियम है कि हर मनुष्य स्वयं सदाचारी जीवन बिताए और दूसरों को अनीति पर न चलने देने के लिए भरसक प्रयत्न करें ।* यदि कोई देश या जाति अपने तुच्छ स्वार्थों में संलग्न होकर दूसरों के कुकर्मों को रोकने और सदाचार बढ़ाने का प्रयास नहीं करती, तो उसे भी दूसरों का पाप लगता है । *उसी स्वार्थपरता के सामूहिक पाप से सामूहिक दंड मिलता है ।* भूकंप, अतिवृष्टि, दुर्भिक्ष, महामारी, महायुद्ध के कारण ऐसे ही सामूहिक दुष्कर्म होते हैं, *जिनमें स्वार्थपरता को प्रधानता दी जाती है और परोपकार की उपेक्षा की जाती है ।*
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*गहना कर्मणोगति: - पृष्ठ- १८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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