ऋषि चिंतन से भाग 34





🌺 ऋषि चिंतन से 166 🌺 Rishi chintan se 166🌺


*🥀१० जुलाई २०२३ सोमवार🥀*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌚कृष्णपक्ष अष्टमी २०८०🌚*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*अपने सदगुणों को प्रकाशित होने दें*
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👉 एक पेचीदा प्रश्न पर कुछ विचार-विमर्श करें। *कई व्यक्तियों में साधारण योग्यताएँ होते हुए भी उनकी कीर्ति बहुत विस्तृत होती है और कईयों में अधिक योग्यता होते हुए भी उन्हें कोई नहीं पूछता, कोई दुर्गुणी होते हुए भी श्रेष्ठ समझे जाते हैं, कोई सद्गुणी होते हुए भी बदनाम हो जाते हैं,* आपने विचार किया कि इस अटपटे परिणाम का क्या कारण है? *शायद आप यह कहें कि- "दुनियाँ मूर्ख है, उसे भले-बुरे की परख नहीं"*, तो आपका कहना न्याय संगत न होगा क्योंकि अधिकांश मामलों में उसके निर्णय ठीक होते हैं। *आमतौर से भलों के प्रति भलाई और बुरों के प्रति बुराई ही फैलती है, ऐसे अटपटे निर्णय तो कभी-कभी ही होते हैं।*
👉 कारण यह कि वही वस्तुएँ चमकती हैं जो प्रकाश में आती हैं। सामने वाला भाग ही दृष्टिगोचर होता है। जो चीजें रोशनी में रखी हैं वे साफ-साफ दिखाई देती हैं, हर कोई उनके अस्तित्व पर विश्वास कर सकता है, परन्तु जो वस्तुएँ अंधेरे में, पर्दे के पीछे, कोठरी में बंद रखी हैं उनके बारे में हर किसी को आसानी से पता नहीं लग सकता । *इन बातों को ध्यान में रखते हुए आप अपने सदगुणों को प्रकाश में लाने का प्रयत्न कीजिए ।* जो अच्छाईयाँ, योग्यताएँ, उत्तमताएँ विशेषताएँ हैं, उन्हें छिपाया मत कीजिए वरन इस प्रकार रखा करिए जिससे वे अनायास ही लोगों की दृष्टि में आ जायें। *अपने बारे में बढ़-चढ़ कर बातें करना ठीक नहीं, शेखीखोरी ठीक नहीं, अहंकार से प्रेरित होकर अपनी बड़ाई के पुल बाँधना यह भी ठीक नहीं,* अच्छी बात को बुरी तरह रखने में उसका सौंदर्य नष्ट हो जाता है। दूसरे प्रसंगों के सिलसिले में कलापूर्ण ढंग से, मधुर वाणी से इस कार्य को सुंदरता पूर्वक किया जा सकता है। *अप्रिय सत्य को प्रिय बना कर कहने में बुद्धि-कौशल की परीक्षा है, बुराई की उसमें कुछ बात नहीं।* जो गाय पाँच सेर दूध देती है क्या हर्ज है यदि इस बात से दूसरे लोग भी परिचित हो जाएँ ?
👉 *अपने अच्छे गुणों को प्रकट होने देने में आपका भी ला और दूसरों का भी।* हानि किसी की कुछ नहीं। *यदि आपके सद्गगुणों, योग्यताओं का पता दूसरों को चलता है तो उनके सामने एक आदर्श उपस्थित होता है*, एक दूसरे की नकल करने की प्रथा समाज में खूब प्रचलित है, संभव है कि उन गुणों और योग्यताओं का अप्रत्यक्ष प्रभाव किन्हीं पर पड़े और वे उसकी नकल करने प्रयास में अपना लाभ करें। *सद्गुणी व्यक्ति के लिए स्वभावत: श्रद्धा, प्रेम और आदर की भावना उठती हैं, जिनके मन में यह उठती हैं उसे शीतल करती हैं, बल देती हैं, पुष्ट बनाती हैं।* दुनिया में भलाई अधिक है या बुराई ? इसका निर्णय करने में अक्सर लोग आसपास के व्यक्तियों को देखकर ही कुछ निष्कर्ष निकालते हैं । *आपके संबंध में यदि अच्छे विचार फैले हुए हैं तो सोचने वाले को अच्छाई का पक्ष भी मजबूत मालूम देता है और वह संसार के संबंध में अच्छे विचार बनाता है एवं खुद भी भलाई पर विश्वास कर भली दुनियाँ के साथ त्याग और सेवा सत्कर्म करने को तत्पर होता है।* 
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*आंतरिक उल्लास का विकास पृष्ठ-२९*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/DWEV_Jjwg5s

https://youtu.be/EkQlsqsiyt8





🌺 ऋषि चिंतन से 167 🌺 Rishi chintan se 167🌺


*🥀११ जुलाई २०२३ मंगलवार🥀*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
     *🌚कृष्णपक्ष नवमी २०८०🌚*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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       *➖गंभीरता से विचार करें➖*
*आत्मकल्याण के लिए समय क्यों नहीं*
     
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👉 अगणित तृष्णाएँ मनुष्य के प्राण खाती रहती हैं और उनकी पूर्ति के लिए इतने विशाल ताने-बाने बुनने पड़ते हैं कि जाल में फंसी हुई मछली की तरह, जाल में जकड़े हुए पक्षी की तरह अपने को हम सब प्रकार से विवश पाते हैं। *अनावश्यक वासनाओं और तृष्णाओं से भी पहले शारीरिक स्वाभाविक आवश्यकताएँ, नित्यकर्म, आहार-विहार, रोजी-रोटी, परिवार - पोषण जैसे आवश्यक कार्यों की पूर्ति इस जमाने में इतनी विषम हो रही है कि उनकी पूर्ति में भी बहुत समय लगता है।* फिर शत्रुओं द्वारा, मित्रों द्वारा कोई न कोई परेशानी भी समय-समय पर उत्पन्न की जाती रहती है। सामाजिक रीति-रिवाजों का बोझा रहता है और यदाकदा आकस्मिक-अप्रत्याशित आपत्तियाँ भी सामने आ खड़ी होती हैं। इनमें समय लगाना पड़ता है। *अधिकांश लोग सचमुच ही बहुत व्यस्त रहते हैं।* उनके पास समय का वास्तव में ही अभाव रहता है। *आत्म-कल्याण के कार्यों के लिए जब वे यह कहते हैं कि "क्या करें, हमें फुरसत नहीं मिलती" तो उनकी सचाई पर अविश्वास नहीं होता।* वस्तुतः हमारी आज की समस्याओं का जो रूप बन गया है वह ऐसा ही पेचीदा है कि उससे किसी मनुष्य का आध्यात्मिक कार्यों के लिए समय निकाल सकना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है।
👉 *इतना होते हुए भी एक बात अत्यंत गम्भीरता के साथ विचार करने की है कि यदि आज ही हमारा जीवन समाप्त हो जाए और मृत्यु सामने आ खड़ी हो तो फिर वे समस्याएँ, आकांक्षाएँ और चिंताएँ किस प्रकार सुलझेंगी जो हमें अब निरंतर परेशान करती रहती हैं।* जीवन को पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक कहा गया है। सो असत्य नहीं है। भरी जवानी में, उठती उम्र के नौजवानों की लाशें रोज ही आँखों के आगे से गुजरती हैं। फूल से कोमल बच्चे देखते-देखते मुरझा जाते हैं, *फिर हमारे ही बारे में क्या निश्चय है कि सौ वर्ष की आयु तक जीवित रहने का अवसर मिलेगा ही।* दिन जिस तेजी में गुजरते हैं उसे देखते हुए सौ वर्ष भी कुछ ही दिनों में बीत सकते हैं। हम लोग इतनी आयु पूरी कर चुके, लगता है अभी कल-परसों तक बचपन के खेल खेलते थे पर आज अधेड़ हो चले। यही क्रम कुछ दिन चलते रहने पर बुढ़ापा भी सामने आ पहुँचा और मृत्यु भी दूर नहीं है। जिस दिन इस शरीर को त्याग कर हमारा प्राण आकाश में विचरण कर रहा होगा, वह दिन अब बहुत दूर नहीं है। *सोचने की बात है कि यदि वह दुःखद घड़ी कल ही सामने उपस्थित हो जाए तो जिन व्यस्तताओं में से घड़ी भर भी हमें परमार्थ के लिए समय नहीं मिलता, वे सुलझ जावेंगी या उलझी ही पड़ी रहेंगी ?*
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*मन की तुष्टि-आत्मा की दुर्गति पृष्ठ-०५*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/llB1w30Bqg0







🌺 ऋषि चिंतन से 168 🌺 Rishi chintan se 168🌺


*🥀१२ जुलाई २०२३ बुधवार🥀*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
     *🌚कृष्णपक्ष दशमी २०८०🌚*
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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    *असफलता से विचलित न होइए*
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👉 *हर काम में सदा सफलता ही मिलती रहे तब तो मनुष्य,मनुष्य न रहकर देवताओं की श्रेणी में गिना जाने लगे।* यह सोचकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले अपना साहस समेटकर रह सकते हैं और उस खिन्नता को भुलाकर दूने उत्साह से अगली तैयारी में लग सकते हैं। इस बार नौकरी न मिली, इस जगह पर नियुक्ति न हुई, तरक्की का अबकी बार अवसर न मिला तो आगे मिलेगा। इसमें हतोत्साह होने की कौन- सी बात है ? *उन्नति के लिए प्रयत्न करना चाहिए, पर जो परिणाम सामने आवे उसे संतोष और धैर्यपूर्वक हँसते, मुस्कराते हुए शिरोधार्य ही करना चाहिए।*
👉 आर्थिक घाटा हो गया तो हैरानी की क्या बात है ? *अपने पास यदि क्षमता, प्रतिभा, साहस, पुरुषार्थ और कौशल मौजूद है तो आज न सही चार दिन बाद फिर आवश्यक साधन जुट जाएँगे।* न भी जुट जाएँ तो थोड़ा स्तर (स्टेण्डर्ड) घटाकर कम खरच में भी अच्छा-खासा जीवन जिया जा सकता है। गरीब लोग भी तो आनंद और उल्लास की जिंदगी जीते हैं, फिर हम भी वैसा क्यों न कर सकेंगे ? *खरचों में कमी कर डालने से गरीबी अखरने वाली नहीं रहती।* समय ने हमारी आमदनी पर कुल्हाड़ा चलाया तो हम अपने खरचों में काट-छाँटकर आसानी से उस असंतुलन को पूरा कर सकते हैं। *समय के अनुरूप अपने स्तर को घटा लेने का साहस जिसमें मौजूद है, जिसे हल्के दरजे की मजदूरी में अपना गौरव नष्ट होते नहीं दीखता, उसके लिए घाटे की स्थिति में भी परेशानी का कोई कारण नहीं।*
👉 परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेने का जीवन विज्ञान जिनने सीखा है उनके लिए अमीरी की तरह गरीबी में भी हँसने और प्रसन्न रहने का कारण मौजूद है। *जिन्हें श्रम करने में शरम नहीं आती, जिनने प्रयत्न, पुरुषार्थ, साहस और उल्लास को नहीं खोया है वे आजीविका का उपयुक्त मार्ग आज नहीं तो कल प्राप्त कर लेंगे।* कल बंगला देश एवं पंजाब में सब कुछ खोकर आए हुए और आज ठीक प्रकार जीवनयापन करने वाले शरणार्थी भाइयों का उदाहरण हमारे सामने है। *अधीरता तो कायर का चिह्न है।* मुफ्त की मौज उड़ाने वाले हरामखोर हानि का रोना रोएँ यह तो बात समझ में आती है, पर जिनकी नसों में पुरुषार्थ मौजूद है वह तो जमीन में लात मारकर कहीं से भी पानी निकाल लेगा। वह क्यों निराश होगा, वह क्यों सिर धुनेगा ? *लक्ष्मी पुरुषार्थ की चेरी है। जिसके पास पुरुषार्थ है उसको लक्ष्मी के चले जाने की चिंता क्यों करनी चाहिए ?*
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*निर्भय बनें, शांत रहें पृष्ठ-०८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://www.youtube.com/live/Q02wg16f-F4?feature=share






🌺 ऋषि चिंतन से 169 🌺 Rishi chintan se 169🌺


*🥀१३ जुलाई २०२३ गुरुवार🥀*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌚कृष्णपक्ष एकादशी २०८०🌚*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *समस्त समस्याओं का समाधान*
*➖❗भारतीय संस्कृति में❗➖*
     
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👉 *हमारे जन-जीवन में भ्रष्टाचार, बेईमानी, धोखाधड़ी की ये घटनाएँ खेदजनक अवश्य हैं और उनसे हमारी हर तरह से हानि भी हो रही है, पर ऐसी बात नहीं है जिससे हम हताश होकर बैठ जाएँ।* हम जानते हैं कि भारत सदा से एक आध्यात्मिक देश रहा है और उसकी आध्यात्मिकता की प्रवृत्तियाँ अब भी सर्वथा नष्ट नहीं हो गई हैं। यद्यपि विशेष परिस्थितियों के वशीभूत होकर हम भौतिकवाद की ओर आकृष्ट हो रहे हैं और उसकी ऊपरी चमक-दमक से मोहित होकर सन्मार्ग से च्युत भी हो जाते हैं, पर हमारे अंतस्तल में अब भी प्राचीन सदाचरण का बीज निहित है, जो अवसर आने पर प्रस्फुटित हो जाता है। *इसलिए असत्य व्यवहार की वृद्धि को देखकर उसके प्रति आत्म समर्पण कर देना नामरदी और मानवता को कलंकित करने वाली बात ही होगी।* हमको प्रभावशाली उपायों से परिस्थितियों को बदलने तथा सत्प्रवृत्तियों के पुनः स्थापन का प्रयत्न कभी शिथिल नहीं होने देना चाहिए। *हमको अपने मन में यह दृढ़ श्रद्धा रखनी चाहिए कि हम उन्हीं लोगों की संतान हैं जिन्होंने उच्च स्वर से "परद्रव्येषु लोष्ठवत्" की घोषणा की और जो राज्य के धन या किसी भी अन्यायोपार्जित द्रव्य को दानस्वरूप ग्रहण करना भी हलाहल विष के समान समझते थे।* जो खेतों से दाने बीनकर जीवन निर्वाह करने को बहुत बड़े आत्म-सम्मान का चिह्न मानते थे और बड़े-बड़े सम्राट भी उन संपत्तिहीन व्यक्तियों के सम्मुख नतमस्तक होते थे। सम्राट सिकंदर का उदाहरण भी जो इतिहास में मौजूद है, इस तथ्य की पुष्टि करता है। वह एक भारतीय ऋषि की प्रशंसा सुनकर उनके पास गया और उनसे कुछ भी माँग लेने को कहा। ऋषि ने कहा- *"मैं यही माँगता हूँ कि तुम मेरे सामने से हटकर बगल में खड़े हो जाओ, जिससे सूर्य की धूप मुझ पर पड़ती रहे।"* इस अनोखी त्यागवृत्ति को देखकर सिकंदर का सारा गर्व जाता रहा। *इस प्रकार देश की सामान्य जनता में अभी तक ईमानदारी की भावना का अभाव नहीं हुआ है और वह आए दिन उसका परिचय देती रहती है ।*
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*धन बल से मनुष्यता रौंदी न जाए पृष्ठ-३३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/WG1N2Ji5ASA





🌺 ऋषि चिंतन से 170 🌺 Rishi chintan se 170🌺





*🥀 १४ जुलाई २०२३ शुक्रवार 🥀*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
 *🌚---कृष्णपक्ष द्वादशी २०८०---🌚*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *〰️सकारात्मक चिंतन करिए〰️*
*➖❗बुढ़ापे को दूर भगाइए❗➖*
     
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👉 *योग्यता, प्रतिभा एवं अनुभव की दृष्टि से आयु का उत्तरार्द्ध पक्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है,* पर देखा जाए तो अधिकांश की आयु का यह पक्ष यों ही बेकार चला जाता है । कारण स्पष्ट है अनावश्यक चिंताओं एवं आशंकाओं के कारण असमय बुढ़ापा हावी हो जाता है ।
👉यह सच है कि अवस्था के अनुरूप शारीरिक चिह्न प्रकट होते हैं। बालों का पकना, आँखों से कम दिखाई देना, कानों से कम सुनाई देना जैसे चिह्न असमर्थता के नहीं आयु के अनुरूप परिवर्तन के लक्षण हैं। जिनको एक सीमा तक ही रोका जा सकता है, पर इनको ही बुढ़ापे का, असमर्थता का लक्षण मान लेना भारी भूल है। *संसार के परदे पर सैकड़ों व्यक्ति हुए हैं जो जीवन पर्यंत युवा उमंगों से भरपूर बने रहे। आयु के अनुरूप शारीरिक परिवर्तन तो उनमें भी दिखाई पड़े, किंतु इन लक्षणों को उन्होंने अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।* हर क्षण का उसी उत्साह एवं उमंग के साथ उपयोग किया जितना कि युवावस्था में ।
👉 *मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में यह मान्यता जोर पकड़ती जा रही है, यौवन का संबंध आयु से नहीं, मनः स्थिति से हैं।* वह संतुलित प्रसन्नचित बनी रहे तो मनुष्य सदा बुढ़ापे से बचा रह सकता है। गांधीजी ८० वर्ष की आयु में भी अपने को युवक मानते थे। इस अवस्था में भी उनकी स्फूर्ति देखते बनती थी। इसका रहस्योद्घाटन करते हुए उन्होंने एक बार कहा- *मैंने कभी भी परिस्थितियों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया।* अपने समय के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना एवं अनावश्यक चिंताओं से मन को विमुक्त रखना ही मेरे चिरयौवन का रहस्य है। *"चर्चिल"* बुढ़ापे को एक गाली मानते थे, उनका यही कहना था- *कि "वृद्धावस्था पके हुए फल के समान है, जिसमें मिठास अधिक है। इस आयु में मनुष्य समाज के लिए सर्वाधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है।"* जार्ज बर्नार्डशा का कहना है कि *"प्रकृति का वास्तविक आनंद जीवन के उत्तरार्द्ध में ही उठाया जा सकता है। भूत के अनुभवों से प्रेरणा लेकर मनुष्य संसार का आनंद लेते हुए समाज के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है"* वे कहते हैं कि *बुढ़ापे को मैं जीवन का अभिशाप मानता हूँ।''*
👉 *मनःस्थिति निराशा एवं आशंकाओं से ग्रस्त हो तो असमय ही वृद्धावस्था के चिंह प्रकट होने लगते हैं और मनुष्य अपने को असमर्थ, असहाय अनुभव करने लगता है ।* इस स्थिति से बचने के लिए शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुरूप सतत रचनात्मक कार्यों में संलग्न रहना श्रेयस्कर है । *सत्कार्यों में निरत रहने पर आत्म-संतोष की अनुभूति होती है, जो स्वयं जीवन को और भी अधिक श्रेष्ठता से जीने की प्रेरणा देती रहती है ।*
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*चिरयौवन का रहस्योद्घाटन पृष्ठ-२८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/iot9nxuHmtU

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