ऋषि चिंतन से भाग 36





🌺 ऋषि चिंतन से 176🌺 Rishi chintan se 176🌺

*🥀२० जुलाई २०२३ गुरुवार🥀*
      *🍀〰️अधिकमास〰️🍀*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌜शुक्लपक्ष तृतीया २०८०🌛*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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  *➖अनगढ़ आदतों का सुधार➖*
*‼️〰️सबसे बड़ा पराक्रम〰️‼️*
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👉 *"विचार" दिशा देते हैं, पर सामर्थ्य "आदतों" से बनती है।* मनुष्य को किसी निर्धारित दिशा में चलने के लिए न केवल प्रेरणा देती हैं, वरन कई बार तो उसे वे अपने अनुरूप करा लेने के लिए विवश तक कर देती हैं, भले ही परिस्थितियां अनुकूल न हों, नशेबाजी जैसी आदतें इनका उदाहरण हैं। आदतें आसमान से नहीं टपकतीं। *विचारों को कार्यान्वित करते रहने का लंबा क्रम चलते रहने पर वह अभ्यास "आदत" बन जाती है और उसे अपनाए रहने में जितना समय बीतता है, उतना ही वह ढर्रा सुदृढ़ होता चला जाता है और उसी पटरी पर गाड़ी लुढ़कती रहती है। "आदतें" बनाई जाती हैं, भले ही उनका अभ्यास योजना बनाकर किया गया हो अथवा रुझान, संपर्क, वातावरण, परिस्थिति आदि कारणों से अनायास ही बनता चला गया हो। वे "आदतें" ही मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व या चरित्र होता है।* मनुष्य क्या सोचता है, क्या चाहता है, इसका अधिक मूल्य नहीं। परिणाम तो उन गतिविधियों के ही निकलते हैं जो आदतों के अनुरूप क्रियान्वित होती रहती हैं। *प्रतिफल तो कर्म ही उत्पन्न करते हैं और वे कर्म अन्य कारणों के अतिरिक्त प्रधानतया "आदतों" से प्रेरित होते हैं।* जिस क्रम से आदतें अपनाई जाती हैं, उसी रास्ते उन्हें छोड़ा या बदला जा सकता है। *रुझान, संपर्क, वातावरण, अभ्यास आदि बदला जा सके तो कुछ दिन हैरान करने के बाद "आदतें" बदल भी जाती हैं।* कई बार प्रबल मनोबल के सहारे उन्हें संकल्पपूर्वक एक झटके से भी उखाड़ा जा सकता है, पर ऐसा होता बहुत ही कम है। बाहर की अवांछनीयताओं से जूझने के तो अनेक उपाय हैं, *पर आंतरिक दुर्बलताओं से एक बार ही गुथ जाना और उन्हें पछाड़कर ही पीछे हटना, किन्हीं मनस्वी लोगों के लिए ही संभव होता है।* दुर्बल मन वाले तो छोड़ने-पकड़ने, आगे बढ़ने-पीछे हटने के कुचक्र में ही फँसे रहते हैं। अभीष्ट परिवर्तन न होने पर उनका दोष जिस-तिस पर मढ़ते रहते हैं, किंतु वास्तविकता इतनी ही है कि आत्मपरिष्कार के लिए सत्प्रवृत्तियों के अभ्यस्त बनने के लिए सुदृढ़ निश्चय के अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं। *जिन्हें पिछड़ेपन से उबरने और प्रगतिशील जीवन अपनाने की वास्तविक इच्छा हो, उन्हें अपनी "आदतों" का पर्यवेक्षण करना चाहिए और उनमें से जो अनुपयुक्त हों, उन्हें छोड़ने-बदलने का सुनिश्चित निर्धारण करना चाहिए।* सौभाग्य निर्माता, प्रगतिशील महामानवों में से प्रत्येक को यही उपाय अपनाना पड़ता है।
👉 *पराक्रम में सबसे अधिक महत्त्व का यह है, जिसमें अपनी अनगढ़ आदतों को सुधारने का श्रेय पाया जा सके।* बाहरी संघर्षों से जूझने और कठिनाइयों को हटाने में दूसरे लोग भी सहायता कर सकते हैं और परिस्थितिवश श्रेय भी मिल सकता है, किंतु *अपनी अनुपयुक्त आदतों को बदलना मात्र अपने निजी पुरुषार्थ के ऊपर ही रहता है, इसलिए उसे "प्रबल पराक्रम" की संज्ञा दी गई है और ऐसे लोगों को सच्चे अर्थों में शूरवीर कहा गया है।*
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*सफल जीवन की दिशा-धारा पृष्ठ-४३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 177🌺 Rishi chintan se 177🌺


*🥀२१ जुलाई २०२३ शुक्रवार🥀*
       *‼️➖अधिकमास➖‼️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌜शुक्लपक्ष चतुर्थी २०८०🌛*
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*कठिनाइयों की कसौटी से कतरावें नहीं*
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👉 *कठिनाइयों की कसौटी से कतराइए मत ।* सृष्टि संचालन के सार्वभौम नियमों के अनुसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होते रहना एक स्वाभाविक बात है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है। वर्षा के बाद शरद और इसके पश्चात ग्रीष्म ऋतु का आगमन भी निश्चय ही होता है। सूर्य, चंद्र एवं अन्य ग्रह भी एक नियमबद्ध गति में चलते हैं। इसी तरह मानव जीवन भी इन सार्वभौम नियमों के अंतर्गत सदैव एकसा नहीं रहता। *मनुष्य की इच्छा हो या न हो, जीवन में भी परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आती रहती हैं।* आज उतार है तो कल चढ़ाव । चढ़े हुए गिरते हैं और गिरे हुए उठते हैं। आज उँगली के इशारे पर चलने वाले अनेक अनुयायी हैं तो कल सुख-दुःख की पूछने वाला एक भी नहीं रहता। रंक कहाने वाला एक दिन धनपति बन जाता है तो धनवान निर्धन बन जाता है। *जीवन में इस तरह की परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आते-जाते रहना नियतिचक्र का सहज स्वाभाविक नियम है।* इनसे बचा नहीं जा सकता, इन्हें टाला नहीं जा सकता।
👉 एकांगी विचारप्रेरित मनुष्य इस नियति के विधान को नहीं समझ पाता। *वह अपनी इच्छा-कामना के अनुकूल परिस्थितियों में ही सुख का अनुभव करता है तो विपरीत परिस्थितियों में दु:खी हो जाता है।* अधिकांश व्यक्ति सुख, सुविधा, संपन्नता, लाभ, उन्नति आदि में प्रसन्न और सुखी रहते हैं किंतु दुःख, कठिनाई, हानि आदि में दु:खी और उद्विग्न हो जाते हैं। किंतु यह मनुष्य के एकांगी दृष्टिकोण का परिणाम है और इसी के कारण कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि शब्दों की रचना हुई। *वस्तुतः परिवर्तन मानव जीवन में उतना ही महत्त्वपूर्ण, सहज और स्वाभाविक है जितना रात और दिन का होना-ऋतु का बदलना- आकाश में ग्रह-नक्षत्रों का विभिन्न स्थितियों में गतिशील रहना।* किंतु केवल सुख, लाभ, अनुकूल परिस्थितियों की ही चाह के एकांगी दृष्टिकोण के फलस्वरूप मनुष्य दुःख, कठिनाई और विपरीतताओं में रोता है, दूसरों को अथवा ईश्वर को अपनी विपरीतताओं के लिए कोसता है। शिकायत करता है, इनसे बचने के लिए कोसता है। *वह सदा ही इनसे बचने के लिए असफल प्रयत्न करता है।* किंतु इससे तो उसकी समस्याएँ बढ़ती ही जाती हैं, घटती नहीं। *वस्तुतः कठिनाइयाँ जीवन का एक आवश्यक नियम है, जिन्हें स्वीकार करने में ही लाभ है।*
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*कठिनाइयों की कसौटी पर खरे उतरें पृष्ठ-५*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://www.youtube.com/watch?v=iq6ZkVy4SZI





🌺 ऋषि चिंतन से 178🌺 Rishi chintan se 178🌺


*🥀२२ जुलाई २०२३ शनिवार🥀*
      *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌛शुक्लपक्ष चतुर्थी २०८०🌜*
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*अपने स्वास्थ्य के विषय में स्वयं सोचिए*
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👉 *नियमित, संयत और व्यवस्थित जीवन जीने से मनुष्य शरीर शांति और सुविधापूर्वक चलता है।* मनुष्य शरीर ही नहीं मामूली वस्तुएँ भी यही अपेक्षा करती हैं कि उनका संचालन क्रमबद्ध तरीके से हो। घड़ी को सधे हाथ से नियत समय पर चाबी दिया कीजिए । सँभालकर रखा कीजिए तो ही वह पूरे दिन जी सकेगी। यदि दिन कई बार, समय-कुसमय, झटके से चाबी भरें, गलत तरह से इस्तेमाल करें तो वह कुछ ही दिनों में खराब हो जाएगी। कपड़ों को साज- सँभाल रखने से वे काफी दिन काम देते हैं, जो उन्हें ऐसे ही इधर- उधर बेसिलसिले पटकते रहते हैं; उन्हें कीड़े, चूहे, झींगुर खा जाते हैं, मैल और उपेक्षा से उनकी जिंदगी आधी रह जाती है। *संसार की कोई वस्तु यह नहीं चाहती कि उसके साथ उपेक्षा बरती जाए। उपेक्षा एवं तिरस्कार सबको बुरा लगता है।* हमारा शरीर भी उपेक्षा बरदाश्त नहीं करता। वह रूठकर कोपभवन में चला जाता है, बीमार पड़ जाता है और तब तक रूठा ही पड़ा रहता है, जब तक उसे पुनः उचित सत्कार का - व्यवस्थितता का आश्वासन न दिया जाए।
👉 भोजन का समय दो बार हो सकता है । मध्य और सायंकाल को दो बार नियत आहार लेते रहने से पाचनक्रिया ठीक प्रकार अपना काम करती रहती है । *सारे दिन बकरी की तरह मुँह चलाते रहने से पेट की वह दशा हो जाती है, जो अधपकी खिचड़ी में बीच में कुछ और उसी में पकने के लिए डाल देने से होती है। चूल्हे पर चढ़ी हुई पतीली में तभी कोई भोजन ठीक प्रकार से पकाकर देगी, जब बीच में उसके साथ छेड़छाड़ न की जाए ।  
👉 थोड़ी-थोड़ी देर बाद अनेक प्रकार की अनेक चीजें यदि पकने के लिए डालते रहा जाए तो उस पतीली में कुछ चीजें घुल जाएगी, कुछ जलने लगेंगी, कुछ कच्ची रह जायेंगी। *जो लोग समय- कुसमय जीभ के चटोरेपन या दिखावा एवं शेखी के लिए बार- बार चाय, बिस्कुट, नाश्ता, वगैरा उड़ाते रहते हैं, उनके पाचन कभी ठीक नहीं रह सकते।* भोजन के बारे में यह कठोर नियम बनाया जाना चाहिए कि *दिन में दो बार ही खाया जाए। बीच के समय में कुछ भी न खाने का कठोर प्रतिबंध रखा जाता है।*

👉 *रात को जल्दी सोने और प्रातः जल्दी उठने की आदत स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही आवश्यक है।* प्रकृति ने रात सोने के लिए और दिन काम करने के लिए बनाए हैं। दिन छिपते ही चिड़ियाँ अपने घोंसलों में आ जाती हैं। पशु जंगल में चरकर अपने आश्रय स्थानों को लौट आते है। रात्रि में काम करने वाले हिंसक पशु-पक्षी, या चोर- बदमाश सरीखे ही कोई हो सकते हैं। इसलिए उन्हें निशाचर के बुरे नाम से संबोधित किया जाता है। *जो लोग देर तक रात को जागते, मटरगश्ती करते, खेल-तमाशों में घूमते, हाहा - हूहू करते रहते हैं, वे उतने ही अंश से निशाचर हैं जितनी कि रात जागने में गँवाते हैं।* रेल, पुलिस आदि की जिनकी ड्यूटी ही रात की है उनकी मजबूरी समझ में आती है, पर जो लोग अकारण रात में जागते रहते हैं और सबेरे दिन निकलने तक पड़े सोते रहते हैं, वे स्वास्थ्य संबंधी एक भयंकर भूल करते हैं। शाम का भोजन जल्दी ही कर लेना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके सो जाना चाहिए। *नींद पूरी करके ब्राह्ममुहूर्त में आँख खुलती है तो शरीर में एक उत्साहपूर्वक ताजगी दिखाई पड़ती है। उस समय जो भी काम किया जाएगा बहुत ही अच्छा होगा ।*
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*रोगों को आप स्वयं आमंत्रित करते हैं पृष्ठ-२७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/xL_rJNWVJTM





🌺 ऋषि चिंतन से 179🌺 Rishi chintan se 179🌺


*🥀२३  जुलाई २०२३ रविवार🥀*
       *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
*🌜. शुक्लपक्ष पंचमी  २०८०   🌛*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*"विचार शक्ति को परिष्कृत कीजिए"*
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👉 *जो जैसा सोचता और करता है, वह वैसा ही बन जाता है।* मनुष्य का विकास और भविष्य उसके विचारों पर निर्भर है। जैसा बीज होगा, वैसा ही पौधा उगेगा। जैसे विचार होंगे, वैसे कर्म बनेंगे और जैसे कर्म करेंगे, वैसी परिस्थितियां बन जाएँगी। इसीलिए तो कहा गया है कि *मनुष्य अपनी परिस्थितियों का दास नहीं, वह उनका निर्माता, नियंत्रणकर्ता और स्वामी है। वास्तविक शक्ति "साधनों" में नहीं, "विचारों" में सन्निहित है।*
👉 कहते हैं मनुष्य के भाग्य का लेखा-जोखा कपाल में लिखा रहता है। कपाल अर्थात् मस्तिष्क । मस्तिष्क अर्थात विचार। *अतः मानस शास्त्र के आचार्यों ने यह उचित ही संकेत किया है कि भाग्य का आधार हमारी विचार पद्धति ही हो सकती है।* विचारों की प्रेरणा और दिशा अपने अनुरूप कर्म करा लेती है। इसीलिए भी कहते हैं कि *"मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है ।"*
👉 विचार आंतरिक बल और पुरुषार्थ है, उसे जिस लक्ष्य पर नियोजित किया जाता है, उसी में तदनुरूप प्रगति होती है और सफलता मिलती है। लोग अस्त-व्यस्त और विकृत कल्पनाओं में उलझाए रहकर उसे नष्ट भी करते हैं और विकृतियों में उलझकर - अपने लिए संकट भी उत्पन्न करते हैं। लक्ष्य तक पहुँचने का पुरुषार्थ इंद्रिय शक्ति के माध्यम से ही करना पड़ता है और उसी आधार पर सफलताएँ प्राप्त होती हैं, पर *इंद्रिय शक्ति को पकड़कर विशेष दिशा में लगा देने का पुरुषार्थ "विचार बल" द्वारा ही संभव होता है।* सही दिशा में इंद्रिय शक्ति न लग पाने से उपलब्धियाँ नहीं मिलतीं। बात यहीं तक सीमित नहीं, विचार बदलते हैं तो इंद्रियाँ भी दिशा बदलती हैं और हजार परेशानियाँ मनुष्य स्वयं पैदा कर लेता है। रावण प्रकांड पंडित, विद्वान, ज्ञानी था, लेकिन उसने सत्पुरुषों जैसा व्यवस्थित चिंतन छोड़ दिया, लोलुपों का अस्त-व्यस्त क्रम अपनाया। इसलिए अपने ज्ञान का ठोस लाभ समाज को न दे सका। आदर्शनिष्ठ चिंतन छोड़कर, संकीर्ण स्वार्थगत चिंतन में, हीन कर्मों में लगा दिया और दुर्गति करा ली। उसकी रुचि के और संसार की आवश्यकता के ढेरों कार्य प्रतीक्षा में ही रखे रह गए।
👉 *"विचार" सूक्ष्म स्तर का कर्म है।* कार्य का मूल रूप विचार है।  समय की तरह विचार - प्रवाह को भी सत्प्रयोजनों में निरत रखा जाना चाहिए। *जिस प्रकार समय को योजनाबद्ध कर सफलता पाई जाती है, उसी प्रकार विचार - प्रवाह को भी सुनियोजित कर, लक्ष्य विशेष से जोड़कर लाभान्वित हुआ जा सकता है ।*
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*सफल जीवन की दिशा-धारा  पृष्ठ-४५*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/xL_rJNWVJTM




🌺 ऋषि चिंतन से 180 🌺 Rishi chintan se 180🌺


*🥀२५ जुलाई २०२३ मंगलवार🥀*
        *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌜---शुक्लपक्षसप्तमी२०८०---🌛*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*सद्विचारों की सतत बहने वाली गंगोत्री*
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👉 *"सद्विचारों" की महत्ता का अनुभव तो हम करते हैं, पर उन पर दृढ़ नहीं रह पाते।* जब कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते या सत्संग-प्रवचन सुनते हैं, तो इच्छा होती है कि इसी अच्छे मार्ग पर चलें, पर जैसे ही वह प्रसंग पलटा कि दूस एमसी प्रकार के पूर्व अभ्यासी विचार पुनः मस्तिष्क पर अधिकार जमा लेते हैं और वही पुराना घिसापिटा कार्यक्रम चलने लगता है। इस प्रकार उत्कृष्ट जीवन बनाने की आकांक्षा एक कल्पना मात्र बनी रहती है। उसके चरितार्थ होने का अवसर प्रायः आने ही नहीं पाता।
👉 *उच्च विचारों को बहुत थोड़ी देर हमारी मनोभूमि में स्थान मिलता है। जितनी देर सत्संग-स्वाध्याय का अवसर मिलता है, उतने थोड़े समय ही तो अच्छे विचार मस्तिष्क में ठहर पाते हैं।* इसके बाद वही पुराने कुविचार आँधी-तूफान की तरह आकर उन श्रेष्ठ विचारों की छोटी-सी बदली को उड़ाकर एक ओर भगा देते हैं। *निकृष्ट विचारों में तात्कालिक लाभ और आकर्षण स्वभावतः अधिक होता है, चिरकाल से अभ्यास में आते रहने के कारण उनकी जड़ें भी बहुत गहरी हो जाती हैं। इन्हें उखाड़ कर नए श्रेष्ठ विचारों की स्थापना करना, सचमुच बड़ा कठिन काम है।*
👉 दस-पाँच मिनट कुछ पढ़ने-सुनने या सोचने-चाहने से ही परिष्कृत मनोभूमि का बन जाना और उसके द्वारा सत्कर्मों का प्रवाह बहने लगना कठिन है। *जैसे विचारों को जितनी तीव्रता और निष्ठा के साथ जितनी अधिक देर मस्तिष्क में निवास करने का अवसर मिलता है, वैसे ही प्रभाव की मनोभूमि में प्रबलता होती चलती है।*
देर तक स्वार्थपूर्ण विचार मन में रहें और थोड़ी देर सद्विचारों के लिए अवसर मिले तो वह अधिक देर रहने वाला प्रभाव कम समय वाले प्रभाव को परास्त कर देगा। *इसलिए उत्कृष्ट जीवन की वास्तविक आकांक्षा करने वाले के लिए एक ही मार्ग रह जाता है कि मन में अधिक समय तक अधिक प्रौढ़, अधिक प्रेरणाप्रद एवं उत्कृष्ट कोटि के विचारों को स्थान मिले।*
👉 जिसका बहुमत होता है, उसकी जीत होती है। बहती गंगा में यदि थोड़ा मैला पानी पड़ जाए तो उसकी गंदगी प्रभावशाली न होगी, पर यदि गंदे नाले में थोड़ा गंगाजल डाला जाए तो उसे पवित्र न बनाया जा सकेगा। *इसी प्रकार यदि मन में अधिक समय तक बुरे विचार भरे रहेंगे तो थोड़ी देर, थोड़े से अच्छे विचारों को स्थान देने से भी कितना काम चलेगा ? उचित यही है कि हमारा अधिकांश समय इस प्रकार बीते जिससे उच्च भावनाएँ ही मनोभूमि में विचरण करती रहें।*
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*सफल जीवन की दिशा-धारा पृष्ठ-५१*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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