ऋषि चिंतन से भाग 37



Gayatri sadhana 




🌺 ऋषि चिंतन से 181 🌺 Rishi chintan se 181🌺


*🥀 २८ जुलाई २०२३ शुक्रवार 🥀*
     *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌜शुक्लपक्ष दशमी २०८०🌛*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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    *➖समय देवता को साधिए➖*
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👉 *"समय" ही जीवन है।* यही हमारी सर्वोत्तम संपत्ति है। भगवान ने आयुष्य की अमूल्य पूँजी मनुष्य को प्रदान की है और कहा है कि वह इस पूँजी का जिस ओर सदुपयोग करेगा, उधर ही उसे आशाजनक सफलताएँ प्राप्त होने लगेंगी। रुपया हाथ में हो तो उसके बदले में बिकने वाली हर चीज खरीदी जा सकती है। *"समय" भी एक प्रकार का रुपया है, उसे जिस काम में भी खरच किया जाएगा उसी दशा में प्रगति होने लगेगी।* रुपये से दवा भी खरीदी जा सकती और जहर भी। *"समय" को आलस्य, प्रमाद, व्यसन, लापरवाही, मटरगश्ती और शौक-मौज की निस्सार बातों में या कुविचारों एवं दुष्कर्मों में खरच करना जहर खरीदने के बराबर है, पर जो अपना एक-एक मिनट बहूमूल्य समझकर उसे सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर खरच करते हैं, वे अपने जीवन का सच्चा लाभ उठा लेते हैं।* व्यवस्थित आदतों वाले मनुष्य का अंतर्मन भी व्यवस्थित हो जाता है और फिर उसके नियंत्रण में चलने वाला शरीर भी नियमित और व्यवस्थित रीति से काम करने लगता है। *काम कम हो या ज्यादा, हर व्यक्ति को नियत दिनचर्या के अनुसार ही उसे पूरा करना चाहिए।* नौकरी के घंटे नियत होते हैं, स्कूल में पढ़ने के घंटे विषयवार विभाजित रहते हैं, बाजार की दुकानें खुलने और बंद होने का समय सरकार ने नियत कर दिया है। 
👉 *व्यवस्थित रीति से नियत समय में ही बहुत काम हो जाता है और अव्यवस्थित कार्य प्रणाली से समय तो बहुत बरबाद होता है, पर काम जरा-सा दिखाई पड़ता है।* समय की अव्यवस्था का सबसे खराब प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। शौच, स्नान, कुल्ला, दातौन, सोना, जागना, खाना, पीना, किसी भी बात का जिनका नियम नहीं उन्हें अनुशासन भंग करने का दंड प्रकृति देगी ही और उन्हें अस्वस्थता की शिकायत बनी ही रहेगी।
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*रोगों को आप स्वयं आमंत्रित करते हैं पृष्ठ-३१*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/DrlT0RPJYMw



Teen vardan 




🌺 ऋषि चिंतन से 182 🌺 Rishi chintan se 182🌺


*🥀 २९ जुलाई २०२३ शनिवार 🥀*
     *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌜शुक्लपक्ष एकादशी २०८०🌛*
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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      *➖❗मितव्ययता❗➖*
*〰️‼️राष्ट्रभक्ति का द्योतक है‼️〰️*
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👉 *यह स्मरण रखो कि तुम्हारा इसी में कल्याण है कि तुम "मितव्ययी" बनो।* अपनी आय की सीमा के बाहर खरच न करो । *आज एक एक पैसे की बचत कल का अनंत सुख साबित हो सकती है।* आज का जीवन और वातावरण तो कई प्रकार से आकस्मिकताओं वाला बन चुका । उस आकस्मिकता का ठीक तरह से सामना करने के लिए जरूरी है कि व्यक्ति आज जितनी भी अधिकाधिक संभव हो बचत करे और ये तब तक संभव नहीं, *जब तक तुम यह नियम नहीं बना लेते कि हम अनावश्यक एक पैसा भी खरच न करेंगे।* तब तक न तो आप मितव्ययी ही हो सकते हो और न धन संचय ही कर सकते हो। अपनी, अपने घर-परिवार और अपने आश्रितों की सुरक्षा के लिए धन संग्रह करने का निषेध किसी ने कहीं भी नहीं किया।
👉 *प्रत्येक वस्तु खरीदने, प्रत्येक नई आवश्यकता को बढ़ाने के पूर्व अपने आप से ये प्रश्न करो कि क्या उस आवश्यकता अथवा वस्तु के बिना आपका कार्य नहीं चल सकता?* क्या उसके लिए व्यय करना, आपके लिए अनिवार्य है ? यदि उस वस्तु अथवा आवश्यकता के अभाव में आपके जीवन की, आपकी प्रतिष्ठा की और आपके सामाजिक संबंधों को कोई हानि नहीं पहुँचती हो, तो व्यर्थ में एक नई आवश्यकता बढ़ाने से बचो।
👉 महात्मा गाँधी की व्यक्तिगत वस्तुओं की संपत्ति एक छोटी गठरी में बाँधकर कहीं भी रख दी जा सकती थी। लंगोटी, चादर, चप्पल और कंबल यही तो उनके जीवन की आवश्यक वस्तुएँ थीं। न तो उन्हें कभी क्रीम की जरूरत पड़ी और न वैसलीन की। 
👉 पाश्चात्य देशों की नकल करने वाले और अपने देश की आवश्यकताओं को न समझने वाले व्यक्ति भी देशद्रोही ही हैं। *यदि आप अपने देश की स्वतंत्रता की रक्षा करना चाहते हैं, तो आपको साधारण मनुष्य के जीवन स्तर को ऊंचा उठाना होगा।* यह कार्य प्रत्येक व्यक्ति की सहायता से ही हो सकता है। *आप मितव्ययी बनो और अपने आस-पास के दीन-हीन दुखियों की सहायता करो।* दूध की नदी बहाने वाले, कुत्तों को मखमल पर सुलाने वाले यह भूल जाते हैं कि उनके देश के आधे से अधिक लोग आधा पेट भोजन कर, चिथड़ों से अपने अंगों को ढककर अपना समय काट रहे हैं। *आपका कर्त्तव्य है कि आप अपव्यय रूपी दानव से देश की रक्षा करो और दीन-हीन जनों की सहायता करो।* महात्मा टालस्टॉय कहा करते थे कि *जब तक देश में एक भी व्यक्ति भूखा है, एक भी व्यक्ति नंगा है, तब तक तुम्हें दो बार भोजन करने और दो कोट रखने का कोई अधिकार नहीं। यदि आप ऐसा करते हो, तो ये आपका भयंकर स्वार्थ है। यह आपकी खुदगर्जी की हद है।*
👉 व्यर्थ की आलोचना करने वाले व्यक्ति से बचो, बस आपका कल्याण होगा। *अपव्यय, ऋण, व्यर्थ की तड़क-भड़क और व्यर्थ में व्यय कराने वाली परंपराओं से बचो।* यदि आप अपने घर में इतना संयम कर सके तो वास्तव में अपने देश को आप महात्मा गाँधी और टालस्टॉय का देश बना सकने में समर्थ होंगे। *आपके हाथ में ही देश को स्वर्ग और नरक बनाना है।* अपने मन पर संयम रखो, अपनी आवश्यकताओं का दमन करो, बस इतना ही पर्याप्त है। *कुछ ही दिनों में ही आप देखोगे, आपका देश फिर सोने की चिड़िया हो जाएगा।*
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*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-७७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://www.youtube.com/watch?v=lWJoiTfx0rk



Gayatri pariwar images 





🌺 ऋषि चिंतन से 183 🌺 Rishi chintan se 183🌺


*🥀 ३० जुलाई २०२३ रविवार 🥀*
     *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *शुक्लपक्ष द्वादशी त्रयोदशी२०८०*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖सत्य में हजार हाथियों का बल➖*
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👉 *"सत्य" की महिमा अपार है।* शास्त्रों और ऋषियों ने उसे धर्म और अध्यात्म का आधार माना है और कहा है- *"सत्यमेव जयते नानृतम्"* अर्थात् *"सत्य" ही जीतता है, "असत्य" नहीं।* चिरस्थायी सफलताओं का आधार सत्य पर रखा गया है। असत्य के सहारे कोई व्यक्ति थोड़े समय तक लाभ प्राप्त कर सकता है, पर जब वस्तुस्थिति प्रकट हो जाती है, तब उस लाभ को समाप्त होते हुए भी देर नहीं लगती। *"सत्य" का वट वृक्ष धीरे-धीरे भले ही बढ़ता और फलता-फूलता हो, पर जब वह परिपुष्ट हो जाता है, तब उसका आयुष्य हजारों वर्षों का बन जाता है।* वट वृक्ष की जड़ें नीचे जमीन में भी चलती हैं और ऊपर की शाखाओं में से भी निकलकर नीचे आती हैं और जमीन में प्रवेश कर वृक्ष की पुष्टि और आयु बढ़ाने में सहायक होती हैं। दूसरे छोटे पेड़-पौधे प्रकृति के प्रवाह को देर तक नहीं सह पाते और शीघ्र ही बूढ़े होकर अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। सत्य वट वृक्ष के समान है, अन्य आधारों पर प्राप्त की गई सफलताएँ बरसाती घास-पात की तरह हैं, जो सत्य के सूर्य की प्रखरता सहन कर सकने में समर्थ नहीं होती ग्रीष्म ऋतु में उनका अस्तित्व अक्षुण्ण नहीं रह सकता।
👉 उक्ति है कि— *“सत्य" में हजार हाथियों के बराबर बल होता है।"* शारीरिक दृष्टि से यह बात सच भले ही न हो, पर आत्मिक दृष्टि से पूर्णतया सही है। *सत्यनिष्ठ व्यक्ति में इतना आत्मबल होता है कि वह अकेला हजार मिथ्याचारियों से भिड़ सकता है और अंततः वही विजय प्राप्त करता है।* जहाँ सत्य है, वहाँ अन्य गुण अपने आप उत्पन्न हो जाते हैं। जहाँ असत्य है, वहाँ दुर्गुणों का भंडार धीरे-धीरे भरता और बढ़ता चला जाता है। इसलिए आत्मबल बढ़ाने के लिए, ईश्वर प्राप्त करने के लिए हमारे शास्त्रों में सत्यनिष्ठा को महानतम  
उपासना बताया है। *भारतीय धर्म में सत्य को परमात्मा का स्वरूप माना है।* *"सत्य"* को *"नारायण"* कहा गया है, सत्यनारायण भगवान् की 'जय बोलने, कथा सुनने, व्रत रखने का अपने यहाँ चिरप्रचलन है। *यह "सत्यनारायण" कोई व्यक्ति या देवता नहीं है वरन् सच्चाई को अंतःकरण, मस्तिष्क और व्यवहार में प्रतिष्ठापित करने की प्रगाढ़ आस्था ही है।* जो सत्यनिष्ठ है, वही *"सत्यनारायण"* भगवान का समीपवर्ती साधक है। स्वर्ग और मुक्ति-सिद्धि एवं समृद्धि तो उसके करतलगत ही रहती है ।
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*सत्य को पूर्वाग्रहों में न बाँधे पृष्ठ-६*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://www.youtube.com/watch?v=lWJoiTfx0rk


Gayatri mahima 




🌺 ऋषि चिंतन से 184 🌺 Rishi chintan se 184🌺


*🥀 ३१ जुलाई २०२३ सोमवार 🥀*
     *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌜शुक्लपक्ष चतुर्दशी २०८०🌛*
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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 *➖असत्य भाषण से अपार हानि➖*
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👉 *"सत्य" सदैव कल्याणकारी तथा शक्तिदायक होता है।* सीधी-सच्ची और सही बात कह देने से मनुष्य की बहुत कम हानि होने की संभावना रहती है। ठीक और सही बात सुनकर प्रथम तो कोई भी अच्छा आदमी बुरा नहीं मानता है और यदि सत्य की कठोरता से उसे कुछ नाराजगी भी होती है, तो वह तात्कालिक ही होती है और जल्द ही दूर हो जाती है। *सम-स्थिति में आने पर श्रोता सत्य-वक्ता का सम्मान करने लगता है। इसलिए सत्य भाषण से होने वाली सामयिक तथा अस्थायी हानि जल्दी ही पूरी हो जाती है।* इसलिए मनुष्य को किसी हानि के भय से असत्य भाषण नहीं करना चाहिए।
👉 असत्य से मनुष्य की अपरिमित और स्थायी हानि होती है। *सीधी सही बात को छिपाकर उनके स्थान पर गलत बात कहने के लिए मनुष्य को जिस काल्पनिक प्रसंग की रचना करनी पड़ती है. उसके लिए उसे बहुत अधिक बौद्धिक श्रम अतिरिक्त रूप से करना पड़ता है।* ऐसा व्यर्थ श्रम मानसिक संस्थान पर बड़ा भार डालता है। *मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि वह श्रम जो मनुष्य के मानसिक संस्थान पर अनावश्यक दबाव डालता है मस्तिष्क को निर्बल बना देता है, जिससे अनेक प्रकार के मानसिक तथा बौद्धिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।* बहुधा देखने में भी आता है कि जो लोग बेकार की गप हाँका करते हैं, किसी बात को तोड़-मरोड़कर कहा करते हैं अथवा सीधी-सच्ची बात को असत्य अथवा अयथार्थ रूप में सामने लाते हैं, वे अपने जीवन में बड़े ही अस्त-व्यस्त, असंतुलित और अविश्वासी होते हैं। उनका स्वभाव बड़ा ही अस्थिर और अस्थायी हो जाता है। *यह एक मानसिक रोग होता है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति जीवन में कोई महत्त्वपूर्ण काम नहीं कर पाता और यों ही अस्त-व्यस्त स्थिति में जिंदगी खो देता है।*

👉 सत्य को छिपाकर असत्य बोलने में न केवल उसके खुल जाने के भय का ही त्रास रहता है, अपितु अंतरात्मा में एक चोरवृत्ति का भी विकास हो जाता है। *असत्यवादी का स्वभाव इतना तस्कर हो जाता है कि प्रायः वह अपने से भी सच्चाई को छिपाने लगता है।* इसके अतिरिक्त उसकी सरल आत्मा से जब तक कि वह पूरी तरह मर नहीं जाती उस चोर वृत्ति का संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष मनुष्य में अंतर्द्वद्व को जन्म देता है। *अंर्तद्वंद्व वह स्थायी ज्वाला होती है, जो मनुष्य की सारी शांति को जलाकर भस्म कर देती है।* कोई भी सत्य अपने में एक स्वाभाविक प्रवाह रखता है और अनायास ही अंदर से बाहर को निकलना चाहता है। किंतु असत्यवादी व्यक्ति उसे बाहर जाने से रोकते हैं। बलपूर्वक उसे अंदर ही दबाए रहते हैं। यह अस्वाभाविक प्रयत्न कम कष्टकर नहीं होता। इसमें मनुष्य की शक्ति की बहुत बड़ी मात्रा नष्ट हो जाती है ।
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*सत्य को पूर्वाग्रहों में न बाँधे पृष्ठ-१८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/xo88d4ZhnSg


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🌺 ऋषि चिंतन से 185🌺 Rishi chintan se 185🌺


*🥀 ०१ अगस्त २०२३ मंगलवार 🥀*
     *〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
  *❗//➖प्रथम श्रावण➖//❗* 
  *🌕शुक्लपक्ष पूर्णिमा२०८०🌕*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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    *➖सच्चे "कर्मयोगी" बनें➖*
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👉 *मानव जीवन की सफलता "कर्मयोग" में है, "कर्मभोग" में नहीं।* इसलिए मनुष्य को श्रेय प्राप्त करने के लिए कर्मभोगी नहीं, कर्मयोगी बनना चाहिए। उसे जीवन की हर छोटी-बड़ी शाखा पर सामान्य रूप से संपूर्ण योग्यता और मनोयोग से ध्यान देना चाहिए। *उस काम को जिसमें -अधिक लाभ है, जिसका फल अधिक मूल्यवान है, पूरे तन-मन से करना और जो अपेक्षाकृत कम लाभ की संभावना वाला है, उसकी उपेक्षा करना कर्म कौशल नहीं है।* कार्य कुशलता का प्रमाण इस बात में है कि छोटे-से-छोटा काम भी इस कुशलता से किया जाए कि वह सुंदर और महत्त्वपूर्ण बनकर कर्त्ता की ईमानदारी का साक्षी जैसा बोल उठे। कर्म का स्वरूप ही मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव की तस्वीर है, उसी के अनुसार गुणी एवं गुणज्ञ लोग किसी
कर्मयोगी को अंक दिया करते हैं। उसका ठीक-ठीक मूल्यांकन किया करते हैं।

👉 मनुष्य का सारा जीवन ही कर्मता से भरा हुआ है। किसी समय भी वह कर्म रहित होकर नहीं रह सकता। सोते-जागते, उठते-बैठते यहाँ तक कि श्वांस लेने में भी वह एक कर्म करता ही रहता है । श्रद्धा एवं लगन के साथ किया गया कोई भी काम मनुष्य को सद्भाव, उच्च विचार, उत्साह, संतोष, शांति प्रदान करता है। किसी भी भले काम में लगकर मनुष्य बाह्य संसार में कुछ भी सफलता प्राप्त करें, किंतु, आंतरिक लाभ शांति, आत्मसंतोष, उच्च विचार, सद्गुणावलोकन की दृष्टि तो प्राप्त होती ही है। मानसिक विकारों पर नियंत्रण प्राप्त होकर नैतिक तथा बौद्धिक उन्नति होती है । *कुल मिलाकर कर्मयोगी को अंतर्बाह्य जीवन में सफलता ही मिलती है।*
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*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-८१*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/Rje5Sk-xhb0










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