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| Manav dharam |
🌺 ऋषि चिंतन से 186🌺 Rishi chintan se 186🌺
*🥀 ०२ अगस्त २०२३ बुधवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖ द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌔कृष्णपक्ष प्रतिपदा २०८०🌖*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖ बौद्धिक दास न बनिए ➖*
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👉 *"सामान्य व्यक्ति" और "असाधारण व्यक्ति" में जो एक बड़ा अंतर होता है, वह उनकी "बौद्धिक दासता" एवं स्वतंत्रता का ही होता है।* सामान्य व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण में प्रचलित मान्यताओं, धारणाओं एवं विश्वासों को जाने-अनजाने ज्यों का त्यों अपना लेता है। वह उनके विषय में सत्य असत्य, तथ्य अथवा अतथ्य का तर्क लेकर न तो विचार करता है और न उसकी उपयोगिता - अनुपयोगिता की ओर दृष्टिपात करता है, जबकि स्वाधीन विचारधारा वाला किसी भी मान्यता अथवा विश्वास को तभी स्वीकार करता है, जब उसको विचारपूर्वक उपयुक्तता की कसौटी पर परख लेता है। वह किसी बात को केवल इसीलिए ही सत्य नहीं मान लेता कि वह पूर्वकाल से परंपरागत चली आती है। *ऐसे ही स्वतंत्र एवं प्रगतिशील विचार वाले लोग सड़ी-गली मान्यताओं, अबुद्धि सम्मत विश्वासों एवं आधार धारणाओं से अलग होकर समयानुकूल युक्त एवं उपयोगी विचारधारा समाज अथवा राष्ट्र को देकर असामान्यता के लक्षण प्रकट करते और मानव समाज के पथ-प्रदर्शक बना करते हैं।* यह क्षमता पराधीन अथवा पक्षपाती मस्तिष्क में नहीं होती कि वह समय की माँग, समाज की आवश्यकता को ठीक से देख-समझ और परख सके और तदनुसार पथ एवं प्रकाश दे सके।
👉 *पथ और प्रकाश लेकर असामान्य स्थिति पा सकना तो दूर पराधीन विचार तथा पक्षपाती मस्तिष्क वाला व्यक्ति मान्यताओं के प्रति दुराग्रह में अपनी हानि देखता हुआ भी उन्हें छोड़ नहीं पाता।* मान्यताओं एवं विश्वासों के प्रति पूर्वाग्रह के कारण अनेक लोग प्रस्तुत परिस्थितियों से हारकर हानि तक कर लेते हैं। जैसे किसी की मान्यता है कि दूसरी जाति के व्यक्ति के हाथ का पानी नहीं पीना चाहिए, किंतु वह एक ऐसी परिस्थिति में फँस जाता है कि उसके पास न तो अपना लोटा-डोर है और न उस समय कोई परिचित व्यक्ति है तो उस पूर्वाग्रही के सामने प्यासे मरने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे अनेक दुराग्रही व्यक्तियों के प्यास से मरने के समाचार सुनने में आए और आते रहते हैं। कभी किसी परिस्थिति विशेष में हो सकता है कि इस मान्यता की कोई आवश्यकता रही हो अथवा हो सके किंतु सामान्य जीवन व्यवहार में न तो इसकी कोई आवश्यकता है और न महत्त्व। ऐसी मूढ़ मान्यताओं के व्यक्ति स्टेशनों तक पर नलों अथवा सप्लाई का पानी नहीं पीते और न बच्चों को पीने देते हैं, जिससे वे अनेकों घंटों प्यास से खुद परेशान रहते और बच्चों को भी रखते हैं। *खान-पान का संयम एवं शुद्धता ठीक है किंतु जब यह विवेक सम्मत बात मूढमान्यता बनकर किसी को पराधीन बना लेती है, तब उससे हानि होने के सिवाय कोई लाभ नहीं होता।*
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*सत्य को पूर्वाग्रहों में न बांधे पृष्ठ-२८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/2GuUme1Q9BM
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| Gayatri pariwar images |
🌺 ऋषि चिंतन से 187🌺 Rishi chintan se 187🌺
*🥀 ०३ अगस्त २०२३ गुरुवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष द्वितीया २०८०🌘*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖युग की पुकार अनसुनी न करें➖*
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👉 *जिन परिस्थितियों में हमें आज जीवनयापन करना पड़ रहा है, उन्हें बदलना नितांत आवश्यक है।* जीवनोपयोगी साधनों का अभाव अनेकों को कष्ट दे रहा है। यों धरती माता का भंडार खाली नहीं हो गया, उसके पास अपनी प्रत्येक संतान का समुचित निर्वाह कर सकने के लिए व्यापक धन-धान्य प्रचुर मात्रा में विद्यमान है, पर उसके उत्पादन, वितरण एवं संग्रह की वर्तमान प्रणाली इतनी दूषित है कि चंद श्रीमंतों को छोड़कर शेष सभी को अत्यधिक कष्ट के साथ गुजर करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। *सामाजिक न्याय के अभाव में मनुष्य, मनुष्य के खून का प्यासा बना हुआ है।* अमुक वंश, जाति में पैदा होने के कारण लोग ऊँच या नीच माने जाते हैं और उन्हें अहंकार करने एवं तिरस्कृत होने का अवसर मिलता हैं। स्त्रियाँ पुरुषों की खरीदी हुई जड़-संपत्ति की तरह दिन गुजार रही हैं। *सामाजिक कुरीतियों का ऐसा बोलबाला है कि विवाह-शादी जैसे मामूली से आयोजन को आकाश-पाताल जैसा तूल मिल गया है और उस कुचक्र में जन-समाज की आर्थिक एवं पारिवारिक सुव्यवस्था चकनाचूर हुई जा रही है।*
👉 इन परिस्थितियों में हमें जिस घुटन के साथ जिंदा रहना पड़ रहा है, वह दिन-दिन असह्य होती जाती है। युग की आत्मा पुकारती है कि इन विषमताओं को बदला ही जाना चाहिए।
*अपना जन-जीवन दर्शन आज कितना क्षुद्र एवं घृणित है, इसे देखकर विवेक की आत्मा सिहर उठती है।* हर आदमी के सामने धन का बिना उचित-अनुचित का ध्यान किए प्रचुर मात्रा में उपार्जन एवं संग्रह करना ही एकमात्र लक्ष्य बना हुआ है। उस उपार्जन का उपयोग वह केवल अपने व्यक्तिगत विलास, स्वार्थ एवं अहंकार की पूर्ति तक ही सीमित रखे हुए है। इस हर दृष्टि से पिछड़े हुए समाज को उठाने और बढ़ाने के लिए आर्थिक साधनों की अत्यधिक आवश्यकता है, पर लोग अपनी संपन्नता बढ़ाने और विलासिता उभारने के अतिरिक्त उस दिशा में सोच तक नहीं पाते। कुछ अनुदान दे सकना तो दूर की बात है। *जो देते भी हैं उनके पीछे कोई उदारता या विवेक नहीं होता, केवल अपनी कीर्ति के मूल्य पर ही कुछ रोटियाँ फेंकी जाती हैं। "आज का यही अहंकार है ।" इसने अपराधों की बाढ़ खड़ी कर दी है। हर क्षेत्र में अर्थ-लोलुपता ने एक प्रकार का चरित्र संकट खड़ा कर दिया है। जहाँ देखिए प्रकट-अप्रकट, भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। फलते शोषण, उत्पीड़न, छल, विश्वासघात, लूट, हत्या, गुंड़ागर्दी, बेईमानी की घटनाएँ पग-पग पर देखने को मिल रही हैं। *उनकी प्रतिक्रिया से दशों दिशाएँ क्षोभ, रोष, असंतोष एवं प्रतिशोध की भावना से भरी हुई उद्विग्न हो रही हैं।* क्या इन परिस्थितियों के, इन आकांक्षाओं एवं आदर्शों के रहते कभी सामाजिक शांति स्थापित हो सकती है ? *यदि हमें चैन से रहने और रहने देने की स्थिति प्राप्त करनी हैं तो इन परिस्थितियों को बदलने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।*
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*अखण्डज्योति अगस्त १९६७ पृष्ठ-३८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/k9nGrmlU_9o
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| Gayatri pariwar images |
🌺 ऋषि चिंतन से 188 🌺 Rishi chintan se 188🌺
*🥀 ०४ अगस्त २०२३ शुक्रवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष तृतीया २०८०🌒*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖❗ सदैव कर्मरत रहिए ❗➖*
*‼️जीवन सुखमय बनाइए ‼️*
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👉 *चिंता से मुक्ति के लिए सक्रिय रहना आवश्यक है।* इससे इच्छाशक्ति भी बढ़ेगी और दूषित भावों का भी शोधन होगा। कोई भी काम जो सरल एवं अपनी रुचि के अनुकूल हो, उसमें लग जाना चाहिए। चिंता, क्रोध, शोक आदि हीन भावों से ग्रस्त व्यक्ति के लिए तो अकर्मण्य रहना बड़ा भारी कुपथ्य है, इससे रोग दिन दूना और रात चौगुना बढ़ता ही जाता है। *दूसरों की सेवा, घर का काम, अध्ययन, शिल्प, कला, साहित्य साधना, आदि छोटे-बड़े कार्यों में से अपनी रुचि के अनुसार निर्णय लेकर उसमें दत्त-चित्त होकर लग जाना चिंता, मानसिक विकार, उद्विग्नता आदि से बचने का सरल उपाय है।* जो लोग अपने कार्यों में दत्त-चित्त होकर नहीं लगे रहते, बहुधा चिंताएँ उन्हें ही सताती हैं। जो व्यक्ति दृढ़ता के साथ अपने आपको काम में लगा सकता है, वही विकारों से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता है। *कर्मशील व्यक्ति भूत-भविष्य की उधेड़-बुन में लगा नहीं रहता वरन् वर्तमान को महत्त्व देता है और अपने काम में लगा रहता है।*
👉 जो मनुष्य सतत अपने कर्तव्य कर्म में लगा रहता है, उसे किसी दूसरे की निंदा-स्तुति करने का अवकाश नहीं रहता। *कर्मरत के लिए एक क्षण भी इन बेकार बातों के निमित्त निकालना मुश्किल है।* किसी भी व्यक्ति को अपने कार्य की सिद्धि के लिए दूसरों के गुणों को देखने-समझने और उनका अनुकरण करने की आवश्यकता होती है। *कर्मयोगी को दूसरों के गुण- अच्छाइयों को देखने की आदत बन जाती है और दोष-दर्शन के लिए न उसे उत्साह रहता है और न अवकाश।* छिद्रान्वेषण, परदोष दर्शन, असद्भाव, कुविचार प्रायः उन्हीं लोगों में देखे जाते हैं जो अकर्मण्य होते हैं। जल के बहते हुए प्रवाह में जिस प्रकार कूड़ा-करकट अपने आप बहता चला जाता है, उसी प्रकार कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति के मन में कुविचार भी टिक नहीं पाते।
👉 *अच्छे, आदर्श, रचनात्मक, उपयोगी और आत्मसंतोष देने वाले कार्यों में संलग्न रहकर मनुष्य को जो प्रफुल्लता मिलती है, यह और किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकती।* कामनाओं और लालसाओं को छोड़कर, खेल और अभिनय की तरह उदात्त बुद्धि से जो कार्य करते हैं, उनके लिए तो यह जीवन ही नहीं सारा संसार और उसका प्रत्येक कार्य भी आनंदमय बन जाता है। *कर्म की महत्ता अनंत है। इसलिए उसे "योग" कहा गया है।* अन्य साधनाओं की भाँति ही मनुष्य कर्मयोग की साधना से पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
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*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-८३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/BbM0LnU3BNI
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| Rishi chintan se |
🌺 ऋषि चिंतन से 189🌺 Rishi chintan se 189🌺
*🥀 ०५ अगस्त २०२३ शनिवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष चतुर्थी २०८०🌘*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖कर्मदेव का सम्मान करें ➖*
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👉 *प्रत्येक कार्य जीवन में महान संभावनाएँ लेकर आता है।* छोटे-से-छोटा काम भी जीवन-विकास के लिए उसी तरह महत्त्वपूर्ण है, जिस तरह एक छोटा बीज, जो कालांतर में विशाल वृक्ष बन जाता है। किसी मनुष्य का मापदंड उसकी आयु नहीं, वरन् उसके काम ही हैं, जो उसने जीवन में किए हैं। *इसलिए कर्मवीरों ने काम को ही जीवन का आधार बनाया।* एक मनीषी ने तो यहाँ तक कह दिया- *"हे कार्य ! तुम्हीं मेरी कामना हो, तुम्हीं मेरी प्रसन्नता हो, तुम्हीं मेरा आनंद हो।"*
👉 इसमें कोई संदेह नहीं कि तुच्छ से महान, सामान्य से समर्थ एवं शक्तिशाली, रंक से राजा, मूरख से विद्वान, सामान्य से असामान्य बनाने वाले वे छोटे से लेकर बड़े सभी कार्य हैं, जो समय-समय पर हमारे सामने आकर उपस्थित होते हैं, किंतु एक हम हैं जो अनेक शिकायतें करके अपने कर्मदेव का अपमान करते हैं और जब वह हमारे द्वार से लौट जाता है, तब पश्चाताप करने और हाथ मलने के लिए ही विवश होना पड़ता है।
👉 कभी-कभी हम शिकायत करते हैं कि यह काम तो बहुत छोटा है, यह मेरे व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है, मैं इन तुच्छ काम के लिए नहीं हूँ आदि-आदि, लेकिन हमने कभी यह भी सोचा है कि उद्गम से आरंभ होने वाली नदी प्रारंभ में इतनी छोटी होती है कि उसे एक बालक भी पार कर सकता है। एक विशाल वृक्ष जो बहुतों को छाया दे सकता है, मीठे फलों से तृप्त कर सकता है, अनेक पक्षियों का बसेरा होता है, आरंभ में एक छोटा-सा बीज ही होता है जो तनिक-सी हवा के झोंके से उड़ सकता है। एक छोटी-सी चिड़िया भी उसे निगल सकती है। एक चींटी उसे उठाकर ले जा सकती है। बहुमूल्य मोती प्रारंभ में एक साधारण-सा बालू का कण होता है। यही स्थिति हमारे सामने आने वाले कार्यों की भी है। *प्रत्येक महान और असाधारण बनाने वाला काम भी प्रारंभ में छोटा सामान्य लगता है, किंतु कर्मवीर जब उसमें एकाग्र होकर लगते हैं, वे भी महान असाधारण महत्त्व के कार्य बन जाते हैं।* क्या आपको याद है कि वैज्ञानिक बनने की आकांक्षा रखने वाले बालक ऐडीसन को उसके शिक्षक ने पहले घर में झाड़ू लगाने का काम सौंपा था और जब शिक्षक ने देखा कि इस कार्य में भी बालक की वैज्ञानिक प्रतिभा और गहरी दिलचस्पी काम कर रही है, तो उसे विज्ञान की शिक्षा देनी प्रारंभ की और वह अपने इस सद्गुण को विकसित करता हुआ महान वैज्ञानिक बना। *प्रत्येक महान बनने वाले व्यक्ति के जीवन का प्रारंभ उन छोटे-छोटे कार्यों से होता है, जिन्हें हम छोटे, महत्त्वहीन, सामान्य समझकर टाल देते हैं।* उन पर ही हमारे जीवन की भावनाओं का भवन खड़ा होता है। मनुष्य जब अपने को कर्त्तव्य कर्मों, परिश्रम एवं पुरुषार्थ की आग में तपाता है, तो उसके भीतर सोया पड़ा नेता, समाज-सुधारक, लेखक, धर्म- प्रचारक, वैज्ञानिक अथवा उद्योगपति जाग कर ऊपर उभर आता है।
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*सफल जीवन की दिशा धारा पृष्ठ-८४*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/BU--imyB_Js
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| Rishi chintan se |
🌺 ऋषि चिंतन से 190🌺 Rishi chintan se 190🌺
*🥀 ०६ अगस्त २०२३ रविवार 🥀*
*〰️🍀अधिकमास🍀〰️*
*❗//➖द्वितीय श्रावण➖//❗*
*🌒 कृष्णपक्ष पंचमी २०८०🌘*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*मोहग्रस्त नहीं, विवेकवान बनें*
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👉 *परिवार के प्रति हमें सच्चे अर्थों में कर्त्तव्यपरायण और उत्तरदायित्व निर्वाह करने वाला होना चाहिए।* आज मोह के तमसाच्छन्न वातावरण में जहाँ बड़े लोग छोटों के लिए दौलत छोड़ने की हविस में और उन्हीं की गुलामी करने में मरते-खपते रहते है, *वहाँ घर वाले भी इस शहद की मक्खी को हाथ से नहीं निकलने देना चाहते,* जिसकी कमाई पर दूसरे ही गुलछर्रे उडाते हैं। *आज के स्त्री-बच्चे यह बिलकुल पसंद नहीं करते कि उनका पति या पिता उन्हें लाभ देने के अतिरिक्त लोकमंगल जैसे कार्यों में कुछ समय या धन खरच करे।* इस दिशा में कुछ करने पर घर का विरोध सहना पड़ता है। उन्हें आशंका रहती है कि कहीं इस ओर दिलचस्पी लेने लगे तो अपने लिए जो मिलता था, उसका प्रवाह दूसरी ओर मुड़ जाएगा। ऐसी दशा में स्वार्थ-संकीर्णता के वातावरण में पले उन लोगों का विरोध उनकी दृष्टि में उचित भी है, *पर उच्च आदर्शों की पूर्ति उनके अनुगमन से संभव ही नहीं रहती ।*
👉 यह सोचना क्लिष्ट कल्पना है कि घर वालों को सहमत करने के बाद परमार्थ के लिए कदम उठाएँगे। यह पूरा जीवन समाप्त हो जाने पर भी संभव नहीं होगा। *जिन्हें वस्तुतः कुछ करना हो उन्हें अज्ञानग्रस्त समाज के विरोध की चिंता न करने की तरह "परिवार के अनुचित प्रतिबंधों को भी उपेक्षा के गर्त में ही डालना पड़ेगा।"* घर वाले जो कहें, जो चाहें वही किया जाए, यह आवश्यक नहीं। *हमें "मोहग्रस्त" नहीं "विवेकवान" होना चाहिए और पारिवारिक कर्त्तव्यों की उचित मर्यादा का पालन करते हुए उन लोभ एवं मोह भरे अनुबंधों की उपेक्षा ही करनी चाहिए जो हमारी क्षमता को लोकमंगल में न लगने देकर कुटुंबियों की ही सुख-सुविधा में नियोजित किए रहना चाहते हैं।* इस प्रकार का पारिवारिक विरोध आरंभ में हर महामानव और श्रेयपथ के पथिक को सहना पड़ा है। *"अनुकूलता पीछे आ गई यह बात दूसरी है,"* पर आरंभ में श्रेयार्थी को परिवार के इशारे पर गतिविधियाँ निर्धारित करने की अपेक्षा *"आत्मा की पुकार को ही प्रधानता देने का निर्णय करना पड़ा है।"*
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*अखण्डज्योति जून १९७१ पृष्ठ-५८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/BU--imyB_Js





