💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 26 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐सबसे कीमती तोहफ़ा 💐💐*
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मोहन काका डाक विभाग के कर्मचारी थे। बरसों से वे माधोपुर और आस पास के गाँव में चिट्ठियां बांटने का काम करते थे।
एक दिन उन्हें एक चिट्ठी मिली, पता माधोपुर के करीब का ही था लेकिन आज से पहले उन्होंने उस पते पर कोई चिट्ठी नहीं पहुंचाई थी।
रोज की तरह आज भी उन्होंने अपना थैला उठाया और चिट्ठियां बांटने निकला पड़े। सारी चिट्ठियां बांटने के बाद वे उस नए पते की ओर बढ़ने लगे।
दरवाजे पर पहुँच कर उन्होंने आवाज़ दी, “पोस्टमैन!”
अन्दर से किसी लड़की की आवाज़ आई, “काका, वहीं दरवाजे के नीचे से चिट्ठी डाल दीजिये।”
“अजीब लड़की है मैं इतनी दूर से चिट्ठी लेकर आ सकता हूँ और ये महारानी दरवाजे तक भी नहीं निकल सकतीं !”, काका ने मन ही मन सोचा।
“बहार आइये! रजिस्ट्री आई है, हस्ताक्षर करने पर ही मिलेगी!”, काका खीजते हुए बोले।
“अभी आई।”, अन्दर से आवाज़ आई।
काका इंतज़ार करने लगे, पर जब 2 मिनट बाद भी कोई नहीं आयी तो उनके सब्र का बाँध टूटने लगा।
“यही काम नहीं है मेरे पास, जल्दी करिए और भी चिट्ठियां पहुंचानी है”, और ऐसा कहकर काका दरवाज़ा पीटने लगे।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।
सामने का दृश्य देख कर काका चौंक गए।
एक 12-13 साल की लड़की थी जिसके दोनों पैर कटे हुए थे। उन्हें अपनी अधीरता पर शर्मिंदगी हो रही थी।
लड़की बोली, “क्षमा कीजियेगा मैंने आने में देर लगा दी, बताइए हस्ताक्षर कहाँ करने हैं?”
काका ने हस्ताक्षर कराये और वहां से चले गए।
इस घटना के आठ-दस दिन बाद काका को फिर उसी पते की चिट्ठी मिली। इस बार भी सब जगह चिट्ठियां पहुँचाने के बाद वे उस घर के सामने पहुंचे!
“चिट्ठी आई है, हस्ताक्षर की भी ज़रूरत नहीं है…नीचे से डाल दूँ।”, काका बोले।
“नहीं-नहीं, रुकिए मैं अभी आई।”, लड़की भीतर से चिल्लाई।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला।
लड़की के हाथ में गिफ्ट पैकिंग किया हुआ एक डिब्बा था।
“काका लाइए मेरी चिट्ठी और लीजिये अपना तोहफ़ा।”, लड़की मुस्कुराते हुए बोली।
“इसकी क्या ज़रूरत है बेटा”, काका संकोचवश उपहार लेते हुए बोले।
लड़की बोली, “बस ऐसे ही काका…आप इसे ले जाइए और घर जा कर ही खोलियेगा!”
काका डिब्बा लेकर घर की और बढ़ चले, उन्हें समझ नहीं आर रहा था कि डिब्बे में क्या होगा!
घर पहुँचते ही उन्होंने डिब्बा खोला, और तोहफ़ा देखते ही उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे।
डिब्बे में एक जोड़ी चप्पलें थीं। काका बरसों से नंगे पाँव ही चिट्ठियां बांटा करते थे लेकिन आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था।
ये उनके जीवन का सबसे कीमती तोहफ़ा था…काका चप्पलें कलेजे से लगा कर रोने लगे; उनके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- बच्ची ने उन्हें चप्पलें तो दे दीं पर वे उसे पैर कहाँ से लाकर देंगे?
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, संवेदनशीलता /आत्मियता एक बहुत बड़ा मानवीय गुण है। दूसरों के दुखों को महसूस करना और उसे कम करने का प्रयास करना एक महान काम है। जिस बच्ची के खुद के पैर न हों उसकी दूसरों के पैरों के प्रति संवेदनशीलता हमें एक बहुत बड़ा सन्देश देती है। आइये हम भी अपने समाज, अपने आस-पड़ोस, अपने यार-मित्रों-अजनबियों सभी के प्रति संवेदनशील बनें…आइये हम भी किसी के नंगे पाँव की चप्पलें बनें और दुःख से भरी इस दुनिया में कुछ खुशियाँ फैलाएं!
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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐भेड़ की खाल में भेड़िया💐💐*
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बहुत समय पहले की बात है, एक चरवाहा था जिसके पास 10 भेड़े थीं। वह रोज उन्हें चराने ले जाता और शाम को बाड़े में डाल देता।
सबकुछ ठीक चल रहा था कि एक सुबह जब चरवाहा भेडें निकाल रहा था तब उसने देखा कि बाड़े से एक भेड़ गायब है। चरवाहा इधर-उधर देखने लगा, बाड़ा कहीं से टूटा नहीं था और कंटीले तारों की वजह से इस बात की भी कोई सम्भावना न थी कि बहार से कोई जंगली जानवर अन्दर आया हो और भेड़ उठाकर ले गया हो।
चरवाहा बाकी बची भेड़ों की तरफ घूमा और पुछा, “ क्या तुम लोगों को पता है कि यहाँ से एक भेंड़ गायब कैसे हो गयी…क्या रात को यहाँ कुछ हुआ था?”
सभी भेड़ों ने ना में सर हिला दिया।
उस दिन भेड़ों के चराने के बाद चरवाहे ने हमेशा की तरह भेड़ों को बाड़े में डाल दिया नवनीत।
अगली सुबह जब वो आया तो उसकी आँखें आश्चर्य से खुली रह गयीं, आज भी एक भेंड़ गायब थी और अब सिर्फ आठ भेडें ही बची थीं।
इस बार भी चरवाहे को कुछ समझ नहीं आया कि भेड़ कहाँ गायब हो गयी। बाकी बची भेड़ों से पूछने पर भी कुछ पता नहीं चला। ऐसा लगातार होने लगा और रोज रात में एक भेंड़ गायब हो जाती। फिर एक दिन ऐसा आया कि बाड़े में बस दो ही भेंड़े बची थीं।
चरवाहा भी बिलकुल निराश हो चुका था, मन ही मन वो इसे अपना दुर्भाग्य मान सबकुछ भगवान् पर छोड़ दिया था।
आज भी वो उन दो भेड़ों के बाड़े में डालने के बाद मुड़ा।
तभी पीछे से आवाज़ आई, “ रुको-रुको मुझे अकेला छोड़ कर मत जाओ वर्ना ये भेड़िया आज रात मुझे भी मार डालेगा!”
चरवाहा फ़ौरन पलटा और अपनी लाठी संभालते हुए बोला, “ भेड़िया! कहाँ है भेड़िया?”
भेड़ इशारा करते हुए बोली, “ ये जो आपके सामने खड़ा है दरअसल भेड़ नहीं, भेड़ की खाल में भेड़िया है। जब पहली बार एक भेड़ गायब हुई थी तो मैं डर के मारे उस रात सोई नहीं थी। तब मैंने देखा कि आधी रात के बाद इसने अपनी खाल उतारी और बगल वाली भेड़ को मारकर खा गया।”
भेड़िये ने अपना राज खुलता देख वहां से भागना चाहा, लेकिन चरवाहा चौकन्ना था और लाठी से ताबड़तोड़ वार कर उसे वहीँ ढेर कर दिया।
चरवाहा पूरी कहानी समझ चुका था और वह क्रोध से लाल हो उठा, उसने भेड़ से चीखते हुए पूछा, “ जब तुम ये बात इतना पहले से जानती थी तो मुझे बताया क्यों नहीं?”
भेड़ शर्मिंदा होते हुए बोली, “ मैं उसके भयानक रूप को देख अन्दर से डरी हुई थी, मेरी सच बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई, मैंने सोचा कि शायद एक-दो भेड़ खाने के बाद ये अपने आप ही यहाँ से चला जाएगा पर बात बढ़ते-बढ़ते मेरी जान पर आ गयी और अब अपनी जान बचाने का मेरे पास एक ही चारा था- हिम्मत करके सच बोलना, इसलिए आज मैंने आपसे सबकुछ बता दिया…”
चरवाहा बोला, “ तुमने ये कैसे सोच लिए कि एक-दो भेड़ों को मारने के बाद वो भेड़िया यहाँ से चला जायेगा…भेड़िया तो भेड़िया होता है…वो अपनी प्रकृति नहीं बदल सकता! जरा सोचो तुम्हारी चुप्पी ने कितने निर्दोष भेड़ो की जान ले ली। अगर तुमने पहले ही सच बोलने की हिम्मत दिखाई होती तो आज सब कुछ कितना अच्छा होता!”
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, ज़िन्दगी में ऐसे कई मौके आते हैं जहाँ हमारी थोड़ी सी हिम्मत एक बड़ा फर्क डाल सकती है पर उस भेड़ की तरह हममें से ज्यादातर लोग तब तक चुप्पी मारकर बैठे रहते हैं जब तक मुसीबत अपने सर पे नहीं आ जाती। चलिए इस कहानी से प्रेरणा लेते हुए हम सही समय पर सच बोलने की हिम्मत दिखाएं और अपने देश को भ्रष्टाचार, आतंकवाद और बलात्कार जैसे भेड़ियों से मुक्त कराएं।
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 28 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐ऊँची उड़ान 💐💐*
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गिद्धगिद्धों का एक झुण्ड खाने की तलाश में भटक रहा था।
उड़ते – उड़ते वे एक टापू पे पहुँच गए। वो जगह उनके लिए स्वर्ग के समान थी। हर तरफ खाने के लिए मेंढक, मछलियाँ और समुद्री जीव मौजूद थे और इससे भी बड़ी बात ये थी कि वहां इन गिद्धों का शिकार करने वाला कोई जंगली जानवर नहीं था और वे बिना किसी भय के वहां रह सकते थे।
युवा गिद्ध कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे, उनमे से एक बोला, ” वाह ! मजा आ गया, अब तो मैं यहाँ से कहीं नहीं जाने वाला, यहाँ तो बिना किसी मेहनत के ही हमें बैठे -बैठे खाने को मिल रहा है!”
बाकी गिद्ध भी उसकी हाँ में हाँ मिला ख़ुशी से झूमने लगे नवनीत।
सबके दिन मौज -मस्ती में बीत रहे थे लेकिन झुण्ड का सबसे बूढ़ा गिद्ध इससे खुश नहीं था।
एक दिन अपनी चिंता जाहिर करते हुए वो बोला, ” भाइयों, हम गिद्ध हैं, हमें हमारी ऊँची उड़ान और अचूक वार करने की ताकत के लिए जाना जाता है। पर जबसे हम यहाँ आये हैं हर कोई आराम तलब हो गया है …ऊँची उड़ान तो दूर ज्यादातर गिद्ध तो कई महीनो से उड़े तक नहीं हैं…और आसानी से मिलने वाले भोजन की वजह से अब हम सब शिकार करना भी भूल रहे हैं … ये हमारे भविष्य के लिए अच्छा नहीं है …मैंने फैसला किया है कि मैं इस टापू को छोड़ वापस उन पुराने जंगलो में लौट जाऊँगा …अगर मेरे साथ कोई चलना चाहे तो चल सकता है !”
बूढ़े गिद्ध की बात सुन बाकी गिद्ध हंसने लगे। किसी ने उसे पागल कहा तो कोई उसे मूर्ख की उपाधि देने लगा। बेचारा बूढ़ा गिद्ध अकेले ही वापस लौट गया।
समय बीता, कुछ वर्षों बाद बूढ़े गिद्ध ने सोचा, ” ना जाने मैं अब कितने दिन जीवित रहूँ, क्यों न एक बार चल कर अपने पुराने साथियों से मिल लिया जाए!”
लम्बी यात्रा के बाद जब वो टापू पे पहुंचा तो वहां का दृश्य भयावह था।
ज्यादातर गिद्ध मारे जा चुके थे और जो बचे थे वे बुरी तरह घायल थे।
“ये कैसे हो गया ?”, बूढ़े गिद्ध ने पूछा।
कराहते हुए एक घायल गिद्ध बोला, “हमे क्षमा कीजियेगा, हमने आपकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया और आपका मजाक तक उड़ाया … दरअसल, आपके जाने के कुछ महीनो बाद एक बड़ी सी जहाज इस टापू पे आई …और चीतों का एक दल यहाँ छोड़ गयी। चीतों ने पहले तो हम पर हमला नहीं किया, पर जैसे ही उन्हें पता चला कि हम सब न ऊँचा उड़ सकते हैं और न अपने पंजो से हमला कर सकते हैं…उन्होंने हमे खाना शुरू कर दिया। अब हमारी आबादी खत्म होने की कगार पर है .. बस हम जैसे कुछ घायल गिद्ध ही ज़िंदा बचे हैं !”
बूढ़ा गिद्ध उन्हें देखकर बस अफ़सोस कर सकता था, वो वापस जंगलों की तरफ उड़ चला।
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, अगर हम अपनी किसी शक्ति का उपयोग नहीं करते तो धीरे-धीरे हम उसे खत्म कर देते हैं।तेजी से बदलती इस दुनिया में हमें खुद को बदलाव के लिए तैयार रखना चाहिए।
ऐसा मत करिए…अपनी काबिलियत, अपनी ताकत को जिंदा रखिये…अपने कौशल, अपने हुनर को और तराशिये…उसपे धूल मत जमने दीजिये…और जब आप ऐसा करेंगे तो बड़ी से बड़ी मुसीबत आने पर भी आप ऊँची उड़ान भर पायेंगे!
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*💐💐कुएं का मेंढक💐💐*
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दो टैडपोल एक कुएं में बड़ी मस्ती से घूम रहे थे। दोनों अपनी पूंछ हिलाते और बाकी मेंढकों को अपना खेल दिखाते।
उनकी शैतानियाँ देखकर एक वयस्क मेंढक बोला, “जितनी पूंछ हिलानी है हिला लो, कुछ दिन बाद ये गायब हो जायेगी।”
“हा-हा-हा…”, ये सुनकर बाकी मेंढक हंसने लगे।
दोनों टैडपोल फ़ौरन अपनी माँ के पास गए और उस मेंढक की बात बताते हुए बोले, “माँ, क्या सचमुच हमारी पूंछ गायब हो जायेगी?”
“हाँ!”, माँ बोली, “यही प्रकृति का नियम है, जब हम पैदा होते हैं तो हमारी छोटी सी पूंछ होती है पर समय के साथ हम विकसित हो जाते हैं, ये पूंछ गायब हो जाती है और हमारे पैर निकल आते हैं, तब हम कुएं के बाहर भी जा सकते हैं, लम्बी छलांगे मार सकते हैं और स्वादिष्ट कीड़े-मकौड़े खा सकते हैं।”
माँ की बात सुनकर पहले टैडपोल ने मन ही मन सोचा, “इससे पहले की पूंछ गायब हो मैं और मस्ती कर लेता हूँ, तालाब के कई चक्कर लगा लेता हूँ और एक से बढ़कर एक करतब दिखाता हूँ…”
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और ऐसा सोच कर वह दुबारा मस्ती से घुमने लगा।
वहीँ दुसरे टैडपोल ने सोचा, “जब ये पूंछ एक दिन गायब ही हो जानी है तो इससे खेलने और मौज-मस्ती करने से क्या फायदा, जब पैर निकलेंगे तब मौज की जायेगी।”, और वह कुएं के एक हिस्से में गुमसुम सा रहने लगा।
फिर एक दिन वो भी आया जब दोनों टैडपोल मेंढक में विकसित हो गए।
दोनों काफी खुश थे और फैसला किया कि वे तालाब से निकल कर बागीचे में सैर करने जायेंगे।
पहला मेंढक किनारे पे पहुंचा और तेजी से छलांग लगा कर बाहर निकल गया। वहीँ दुसरा मेंढक छलांग लगाने की कोशिश करता पर लगा ही नहीं पाता…मानो उसके पैरों में जान ही ना हो!
वह घबराया हुआ वापस अपनी माँ के पास पहुंचा और घबराते हुए बोला, “मेरे पैर काम क्यों नहीं कर रहे…मेरा भाई तो बड़े आराम से छलांग लगा कर बाहर निकल गया पर मैं ऐसा क्यों नहीं कर पा रहा ?”
माँ बोली, “बेटे, ये तुम्हारी वजह से ही हुआ है, तुमने ये सोचकर की एक दिन पूंछ चली ही जानी है उसका इस्तेमाल ही बंद कर दिया और चुप चाप कोने में पड़े रहने लगे….मेरे समझाने पर भी तुम नहीं माने और इसी वजह से तुमहरा शरीर कमजोर हो गया, जिन अंगो का विकास ठीक से होना चाहिए था वो नहीं हो पाया और अब जिन पैरों का तुम इतने दिनों से इंतज़ार कर रहे थे वे भी बेकार निकल गए….मुझे अफोस है पर अब तुम्हे अपनी पूरी ज़िन्दगी कुएं का मेंढक बन कर ही बितानी होगी!
*💐💐शिक्षा💐💐*
इसलिए आज के काम से इसलिए बचने की कोशिश मत करिए कि बाद में आपके ये काम नहीं करना है….बल्कि उस काम को आनंदित होकर कीजिये, उसे और अच्छे ढंग से करने का प्रयास करिए…तभी आपकी स्किल्स का विकास हो पायेगा और आपकी ताकत का विकास हो पाएंगा और जब भविष्य में आपको कुछ कर दिखाने का अवसर मिलेगा तो आप सचमुच वो काम कर पाएंगे। वरना उस दुसरे मेंढक की तरह आप भी अपनी नियंत्रित योग्यता के साथ कुएं के मेंढक बनकर ही रह जायेंगे!
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*💐💐जीवन की डोर💐💐*
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रमेश क्लास 8 का स्टूडेंट था। वह जब क्लास में होता तब बाहर खेलने के बारे में सोचता और जब खेलने का मौका मिलता तो वो कहीं घूमने के बारे में सोचता…इस तरह वह कभी भी प्रेजेंट मोमेंट को एन्जॉय नहीं करता बल्कि कुछ न कुछ आगे का सोचा करता। उसके घर वाले और दोस्त भी उसकी इस आदत से परेशान थे।
एक बार रमेश अकेले ही पास के जंगलों में घूमने निकल गया। थोड़ी देर चलने के बाद उसे थकान हो गयी और वह वहीं नरम घासों पर लेट गया। जल्द ही उसे नींद आ गयी और वह सो गया।
सोने के कुछ देर बाद एक आवाज़ आई-“ रमेश…रमेश…”
रमेश ने आँखें खोलीं तो सफ़ेद वस्त्रों में एक परी खड़ी थी। वह बहुत सुन्दर थी और उसने अपने एक हाथ में जादुई छड़ी ले रखी थी, और दुसरे हाथ में एक मैजिकल बॉल थी जिसमे से एक सुनहरा धागा लटक रहा था।
रमेश परी को देखकर ख़ुशी से झूम उठा! और कुछ देर परी से बातें करने के बाद बोला, “आपके हाथ में जो छड़ी है उसे तो मैं जानता हूँ पर आपने जो ये बॉल ली हुई है उससे ये सुनहरा धागा कैसा लटक रहा है?”
परी मुस्कुराई, “रमेश, यह कोई मामूली धागा नहीं; दरअसल यह तुम्हारे जीवन की डोर है! अगर तुम इसे हल्का सा खींचोगे तो तुम्हारे जीवन के कुछ घंटे कुछ सेकंड्स में बीत जायेंगे, यदि इसे थोड़ा तेजी से खींचोगे तो पूरा दिन कुछ मिनटों में बीत जाएगा और अगर तुम उसे पूरी ताकत से खींचोगे तो कई साल भी कुछ दिनों में बीत जायेंगे।”
“तो क्या आप ये मुझे दे सकती हैं?”, रमेश ने उत्सुकता से पूछा।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं , ये लो…पकड़ो इसे…पर ध्यान रहे एक बार अगर समय में तुम आगे चले गए तो पीछे नहीं आ सकते।”, “ परी ने जीवन की डोर रमेश के हाथों में थमाते हुए कहा और फ़ौरन अदृश्य हो गयी।
अगेल दिन रमेश क्लास में बैठा खेलने के बारे में सोच रहा था, पर टीचर के रहते वो बाहर जाता भी तो कैसे?
तभी उसे परी द्वारा दी गयी सुनहरे धागों वाली बॉल का ख्याल आया। उसने धीरे से बॉल निकाली और डोर को जरा सा खींच दिया…कुछ ही सेकंड्स में वह मैदान में खेल रहा था।
“वाह मजा आ गया!”, रमेश ने मन ही मन सोचा!
फिर वह कुछ देर खेलता रहा, पर मौजूदा वक्त में ना जीने की अपनी आदत के अनुसार वह फिर से कुछ ही देर में ऊब गया और सोचने लगा ये बच्चों की तरह जीने में कोई मजा नहीं है क्यों न मैं अपने जीवन की डोर को खींच कर जवानी में चला जाऊं।
और झटपट उसने डोर कुछ तेजी से खींच दी।
रमेश अब एक शादी-शुदा आदमी बन चुका था और अपने दो प्यारे-प्यारे बच्चों के साथ रह रहा था। उसकी प्यारी माँ जो उसे जान से भी ज्यादा चाहती थीं, अब बूढी हो चुकी थीं, और पिता जो उसे अपने कन्धों पर बैठा कर घूमा करते थे वृद्ध और बीमार हो चले थे।
इस परिवर्तन से रमेश अपने माता-पिता के लिए थोड़ा दुखी ज़रूर था पर अपना परिवार और बच्चे हो जाने के कारण उसे बहुत अच्छा महसूस हो रहा था। एक-दो महीनो सब ठीक-ठाक चला पर रमेश ने कभी अपने वर्तमान को आनंद के साथ जीना सीखा ही नहीं था; कुछ दिन बाद वह सोचने लगा- “ मेरे ऊपर परिवार की कितनी जिम्मेदारी आ गयी है, बच्चों को संभालना इतना आसान भी नहीं ऊपर से ऑफिस की टेंशन अलग है! माता-पिता का स्वाथ्य भी ठीक नहीं रहता… इससे अच्छा तो मैं रिटायर हो जाता और आराम की ज़िन्दगी जीता।”
और यही सोचते-सोचते उसने जीवन की डोर को पूरी ताकत से खींच दिया।
कुछ ही दिनों में वह एक 80 साल का वृद्ध हो गया। अब सब कुछ बदला चुका था, उसके सारे बाल सफ़ेद हो चुके थे, झुर्रियां लटक रही थीं, उसके माता-पिता कब के उसे छोड़ कर जा चुके थे, यहाँ तक की उसकी प्यारी पत्नी भी किसी बीमारी के कारण मर चुकी थी। वह घर में बिलकुल अकेला था बस कभी-कभी दुसरे शहरों में बसे उसके बच्चे उससे बात कर लेते।
लाइफ में पहली बार रमेश को एहसास हो रहा था कि उसने कभी अपनी ज़िन्दगी को एन्जॉय नहीं किया…उसने न स्कूल डेज़ में मस्ती की न कभी कॉलेज का मुंह देखा, वह न कभी अपनी पत्नी के साथ कहीं घूमने गया और ना ही अपने माता-पिता के साथ अच्छे पल बिताये… यहाँ तक की वो अपने प्यारे बच्चों का बचपन भी ठीक से नहीं देख पाया… आज रमेश बेहद दुखी था अपना बीता हुआ कल देखकर वह समझ पा रहा था कि अपनी बेचैनी और व्याकुलता में उसने जीवन की कितनी सारी छोटी-छोटी खुशियाँ यूँही गवां दीं।
आज उसे वो दिन याद आ रहा था जब परी ने उसे वो मैजिकल बॉल दी थी…एक बार फिर वह उठा और उसी जंगल में जाने लगा और बचपन में वह जिस जगह परी से मिला था वहीँ मायूस बैठ अपने आंसू बहाने लगा।
तभी किसी की आवाज़ आई, “ रमेश……रमेश”
रमेश ने पलट कर देखा तो एक बार फिर वही परी उसके सामने खड़ी थी।
परी ने पूछा, “क्या तुमने मेरा स्पेशल गिफ्ट एन्जॉय किया?”
“पहले तो वो मुझे अच्छा लगा, पर अब मुझे उस गिफ्ट से नफरत है।”, रमेश क्रोध में बोला, “ मेरी आँखों के सामने मेरा पूरा जीवन बीत गया और मुझे इसका आनंद लेने का मौका तक नहीं मिला। हाँ, अगर मैं अपनी ज़िन्दगी नार्मल तरीके से जीता तो उसमे सुख के साथ दुःख भी होते पर मैजिकल बॉल के कारण मैं उनमे से किसी का भी अनुभव नहीं कर पाया। मैं आज अन्दर से बिलकुल खाली महसूस कर रहा हूँ…मैंने ईश्वर का दिया ये अनमोल जीवन बर्वाद कर दिया।”, रमेश निराश होते हुए बोला।
“ओह्हो…तुम तो मेरे तोहफे के शुक्रगुजार होने की बजाय उसकी बुराई कर रहे हो….खैर मैं तुम्हे एक और गिफ्ट दे सकती हूँ…बताओ क्या चाहिए तुम्हे?”, परी ने पूछा।
रमेश को यकीन नहीं हुआ कि उसे एक और वरदान मिल सकता है; वह ख़ुशी से भावुक होते हुए बोला…“मम..मम मैं..मैं फिर से वही पहले वाला स्कूल बॉय बनना चाहता हूँ…मैं समझ चुका हूँ कि जीवन का हर एक पल जीना चाहिए, जो ‘अभी’ को कोसता है वो कभी खुश नहीं हो पाता…उसका जीवन खोखला रह जाता है… प्लीज…प्लीज…मुझे मेरे पुराने दिन लौटा दो…. प्लीज…प्लीज…प्लीज न…”
तभी एक आवाज़ आती है… “उठो बेटा…तुम यहाँ…इन जंगलों में कैसे आ गये…और ये सपने में प्लीज..प्लीज…क्या बड़बड़ा रहे थे…”
रमेश आँखे खोलता है…अपनी माँ को आँखों के सामने देखकर वह कसकर उनसे लिपट जाता है और फूट-फूट कर रोने लगता है।
वह मन ही मन परी का शुक्रिया अदा करता है और कसम खाता है कि अब वो जीवन के अनमोल पलों को पूरी तरह जियेगा… और डे ड्रीमिंग और कल के बारे में सोचकर अपने आज को बर्वाद नहीं करेगा।
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, क्या आप खुद को रमेश से रिलेट कर पा रहे हैं? कई बार ऐसा होता है कि हम आज की खूबसूरती को सिर्फ इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि हम एक सुन्दर कल के बारे में सोचने में खोये रहते हैं… या कई बार हम जो नहीं घटा उसके घटने की चिंता में अपने आज को चिता पर जला देते हैं…बर्वाद कर देते हैं। हमें ऐसा नहीं करना चाहिए…खुशियों के छोटे-छोटे पलों को पूरी तरह जीना चाहिए, जीवन की डोर एक बार खिंच जाती है तो फिर लौट कर नहीं आती। किसी ने सच ही कहा है- “बीता हुआ कल कभी नहीं आएगा और आने वाला कल शायद कभी ना आये…इसलिए आज ही अपनी ज़िन्दगी जी लो…आज ही खुशियाँ मना लो।
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