💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 31 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐संत और तोता💐💐*
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एक संत के आश्रम में एक शिष्य कहीं से एक तोता ले आया।
और उसे पिंजरे में रख दिया।संत ने कई बार शिष्य से कहा कि इसे कैद ना करो।
परतंत्रता संसार का सबसे बड़ा अभिशाप है।
पर शिष्य अपने बाल सुलभ कोतुहल को रोक ना सका।
उसने तोते को पिंजरे में ही बंद रहने दिया।
तब संत ने सोचा कि तोते को ही स्वतंत्र होने का पाठ पढ़ाना चाहिए। वह हर दिन तोते के पास जाने लगे। और उसे नित्य ही सिखाने लगे “पिंजरा छोड़ दो उड़ जाओ”। कुछ दिन में तोते को वाक्य भली भांति रट गया।
तब एक दिन सफाई करते समय
शिष्य से भूल से पिंजरा खुला रह गया।
संत कुटी में आए तो देखा
तोता पिंजरे से बाहर निकल आया है।
और बड़े आराम से इधर-उधर घूम रहा है।
साथ ही ऊंचे स्वर में कह भी रहा है।
“पिंजरा छोड़ दो उड़ जाओ”।
संत को आता देख
वह अपने पिंजरे में अंदर चला गया।
और अपना पाठ जोर जोर से दोहराने लगा।
संत को यह देखकर आश्चर्य हुआ। साथ ही वह दुखी भी हुआ। यह वह यही सोचते रहे कि इसने केवल शब्द को ही याद किया। यदि इसका अर्थ भी जानता तो यह इस समय पिंजरे से स्वतंत्र हो गया होता।
*💐💐शिक्षा💐💐*
हम सब ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें सीखते और करते हैं। पर उसका मर्म समझ नहीं पाते उचित समय और अवसर मिलने पर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते और जहां के तहां रह जाते हैं।
हम रोज कितने ही मंसूबे गड़ते रहते हैं। सोचते बहुत हैं बस सोचे हुए पर टिकते नहीं हैं। फिर झुँझलाते हैं और खुद पर लापरवाह आलसी और नाकाबिल होने के ठप्पे भी लगाते हैं। दरअसल सोचना ही काफी नहीं होता खुद को बेहतर भी बनाना होता है।।
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 32 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐मूर्ख राजा और चतुर मंत्री 💐💐*
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एक समय की बात है दियत्स नाम की नगरी एक नदी किनारे बसी हुई थी। वहां का राजा बहुत ही मूर्ख और सनकी था। एक दिन राजा अपने मंत्री के साथ संध्या के समय नदी के किनारे टहल रहा था। तभी उसने मंत्री से पूछा, “मंत्री बताओ यह नदी किस दिशा की ओर और कहाँ बहकर जाती है?”
“महाराज, यह पूर्व दिशा की ओर बहती है और पूर्व की ओर स्तिथ देशो में बहकर समुन्द्र में मिल जाती है।”, मंत्री ने उत्तर दिया। यह सुनकर राजा बोला, “यह नदी हमारी है, और इसका पानी भी हमारा है, क्या पूर्व में स्तिथ देश इस नदी के पानी का उपयोग करते हैं।”
“जी, महाराज, जब नदी उधर बहती है तो करते ही होंगे।”, मंत्री ने उत्तर दिया। इस पर राजा बोला,”जाओ नदी पर दीवार बनवा दो, और सारा का सारा पानी रोक दो, हम नहीं चाहते है की पूर्व दिशा में स्तिथ देशों को पानी दिया जाये।”
“लेकिन, महाराज इससे हमे ही नुकसान होगा।”, मंत्री ने उत्तर दिया। “नुकसान! कैसा नुकसान? नुकसान तो हमारा हो रहा है, हमारा पानी पूरब के देश मुफ्त में ले रहे हैं। और तुम कहते हो की नुक्सान हमारा ही होगा? मेरी आज्ञा का शीघ्र से शीघ्र पालन करो।”, राजा गुस्से में बोला।
मंत्री तुरंत कारीगरों को बुला लाया और नदी पर दीवार बनाने के काम शुरू करवा दिया। कुछ ही दिनों में दीवार बन कर तैयार हो गयी। राजा बहुत खुश हुआ। पर उसकी मूर्खता की वजह से कुछ समय बाद नदी का पानी शहर के घरों में घुसने लगा। लोग अपनी परेशानी लेकर मंत्री के पास आये। मंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया की वह सब कुछ ठीक कर देगा।
मंत्री ने एक योज़ना बनाई । महल में एक घंटा बजाने वाला आदमी रहता था। वह हर घंटे पर समय के अनुसार घंटा बजा देता था, जिससे सभी को समय का पता चल जाता था। मंत्री ने उस आदमी को आदेश दिया की वह आज रात को जितना समय हो उसका दोगुना घंटा बजाये। आदमी ने ऐसा ही किया; जब रात के तीन बजे तो उसने 6 बार घंटा बजाया, जिसका अर्थ था कि सुबह के 6 बज गए हैं।
घंटा बजते ही सभी लोग उठ गए। राजा भी उठ गया और बाहर आ गया। वहा पर मंत्री मौजूद था, राजा ने मंत्री से पूछा, “मंत्री अभी तक सुबह नहीं हुई है क्या? और सूरज अभी तक निकला क्यों नहीं है?” मंत्री ने उत्तर दिया, “महाराज सुबह तो हो चुकी है,परन्तु सूरज नहीं निकला है, क्योंकि सूरज पूरब की ओर से निकलता है, शायद पूरब के देशों ने सूरज को रोक दिया है क्योंकि हमने उनका पानी रोक दिया था, इसीलिए अब हमारे राज्य में कभी सूरज नहीं निकलेगा।”
राजा बहुत चिंतित हुआ और बोला,”क्या अब कभी भी हमारे देश में सूरज नहीं निकलेगा ? हम सब अन्धकार में कैसे रहेंगे? इसका उपाय बताओ मंत्री?”
“महाराज, यदि आप नदी का पानी छोड़ दें, तो शायद वे भी सूरज छोड़ देंगे।”, मंत्री ने उत्तर दिया।
राजा ने तुरंत मंत्री को हुक्म दिया की वह नदी पर बनाई गयी दीवार को तुड़वाए। मंत्री ने राजा की आज्ञा का पालन किया और कारीगरों को आदेश दिया कि दीवार को तोड़ दिया जाये। कारीगरों ने दीवार तोड़ दी। और जैसे ही दिवार टूटी सचमुच सूर्योदय का समय हो चुका था, और दिव्यमान सूरज चारों तरफ अपनी लालिमा बिखेर रहा था!
सूरज को उगता देख राजा बहुत खुश हुआ और मंत्री को इनाम दिया और कहा,”तुम्हारी वजह से आज हम फिर सूरज को देख पाये है। अब हमारे राज्य में कभी अँधेरा नहीं रहेगा।”
मंत्री ने मासूम सा मुँह बनाकर जवाब दिया, “महाराज, यह तो मेरा फ़र्ज़ था।”
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 33 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐स्वमूल्यांकन💐💐*
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रामू एक बहुत ईमानदार और मेहनती युवक था। वह बहुत हंसमुख और मधुर स्वाभाव का व्यक्ति था। एक दिन रामू एक किराने की दुकान पर गया।
वहां सिक्का डालने वाला सार्वजनिक फ़ोन लगा था। रामू ने सिक्का डाला और एक नम्बर डायल किया।
ट्रिंग-ट्रिंग..ट्रिंग-ट्रिंग…. किसी ने फ़ोन उठाया।
रामू बोला, “ हेलो सर… नमस्ते, मैंने सुना था कि आपको एक ड्राईवर की आवश्यकता है। मैं भी एक ड्राईवर हूँ। क्या आप मुझे अपने यहाँ ड्राईवर की नौकरी देंगे ?”
व्यक्ति ने कहा “ बेटा, मेरे यहाँ पहले से ही एक ड्राईवर है। मुझे अन्य किसी ड्राईवर की आवश्यकता नहीं है।
रामू ने कहा “ सर, मैं एक अच्छा ड्राईवर होने के साथ- साथ एक ईमानदार इंसान भी हूँ। आपके यहाँ जो ड्राईवर है, मैं उससे भी कम तनख्वाह काम करने को तैयार हूँ।
“ बेटा, जो ड्राईवर मेरे यहाँ काम करता है, मैं उसके काम से खुश हूँ। बात पैसों की नहीं है, हम जैसा ड्राईवर चाहते हैं, वैसा हमारे पास हैं और हमें किसी अन्य ड्राईवर की जरूरत नहीं है।”, व्यक्ति ने समझाया।
रामू ने जोर देकर कहा, “ सर, मैं आपके यहाँ ड्राईवर का काम करने के साथ- साथ अन्य काम भी करूँगा, जैसे- बाज़ार से सब्जी लाना, आपके बच्चों को स्कूल छोड़कर आना, इत्यादि। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि मैं आपको किसी भी शिकायत का मौका नहीं दूंगा। मुझे उम्मीद है कि अब आप मुझे मना नहीं करोगे।”
व्यक्ति बोला “ कहा न मुझे अभी किसी ड्राईवर की जरूरत नहीं है!” और ऐसा कहकर उसने फ़ोन काट दिया।
दुकानदार रामू की बात बहुत ध्यान से सुन रहा था। उसने रामू से कहा “मेरा बेटा शहर में रहता है। उसे एक अच्छे ड्राईवर की जरूरत है। अगर तुम कहो तो मैं तुम्हे नौकरी दिलवा सकता हूँ।”
रामू ने दुकानदार से कहा, “ आपके सहयोग के लिए धन्यवाद ! पर मुझे नौकरी की कोई आवश्यता नहीं है।”
दुकानदार हैरानी से बोला “ लेकिन अभी तो तुम फ़ोन पर नौकरी पाने के लिए गिडगिडा रहे थे। अब क्या हुआ ? अब जब मैं तुम्हे घर बैठे ही नौकरी दिलवा रहा हूँ तो तुम मुझे नखरे दिखा रहे हो..भलाई का ज़माना ही नहीं रहा!”
रामू ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा, “ आप मुझे गलत न समझिएगा। मुझे काम की कोई जरूरत नहीं है। दरअसल सच बात तो यह है कि, मैं अपने ही काम की परीक्षा ले रहा था। उस व्यक्ति के यहाँ काम करने वाला ड्राईवर और कोई नहीं, वो मैं ही हूँ।
**💐💐शिक्षा💐💐**
दोस्तो, सफल जीवन जीने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है, कि हम स्वयं को अच्छी तरह जाने। हम अपनी कमजोरियों और कमियों को पहचाने और जितनी जल्दी हो सके उन कमियों पर विजय प्राप्त करें।
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*💐💐अरबी घोड़े 💐💐*
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महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक दिन एक अरब प्रदेश का व्यापारी घोड़े बेचने आता है। वह अपने घोड़ो का बखान कर के महाराज कृष्णदेव राय को सारे घोड़े खरीदने के लिए राजी कर लेता है तथा अपने घोड़े बेच जाता है। अब महाराज के घुड़साल इतने अधिक घोड़े हो जाते हैं कि उन्हें रखने की जगह नहीं बचती, इसलिए महाराज के आदेश पर बहुत से घोड़ों को विजयनगर के आम नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे दिया जाता है। हर एक देखभाल करने वाले को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जाता है।
विजयनगर के सभी नागरिकों की तरह चतुर तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को घर लेजा कर घर के पिछवाड़े एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध दिया। और घुड़साल की नन्ही खिड़की से उसे हर रोज थोड़ी मात्रा में चारा खिलाने लगे।
बाकी लोग भी महाराज कृष्णदेव राय की सौंपी गयी ज़िम्मेदारी को निभाने लगे। महाराज नाराज ना हो जाए और उन पर क्रोधित हो कोई दंड ना दे दें; इस भय से सभी लोग अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को उत्तम चारा खरीद कर खिलाने लगे।
ऐसा करते-करते तीन महीने बीत जाते हैं। तय दिन सारे नागरिक घोड़ो को ले कर महाराज कृष्णदेव राय के समक्ष इकठ्ठा हो जाते हैं। पर तेनालीराम खाली हाथ आते हैं। राजगुरु तेनालीराम के घोड़ा ना लाने की वजह पूछते है। तेनालीराम उत्तर मे कहते है कि घोड़ा काफी बिगडैल और खतरनाक हो चुका है, और वह खुद उस घोड़े के समीप नहीं जाना चाहते हैं। राजगुरु , महाराज कृष्णदेव राय को कहते है के तेनालीराम झूठ बोल रहे है। महाराज कृष्णदेव राय सच्चाई का पता लगाने के लिए और तेनालीराम के साथ राजगुरु को भेजते हैं।
तेनालीराम के घर के पीछे बनी छोटी सी घुड़साल देख राजगुरु कहते है कि अरे मूर्ख मानव तुम इस छोटी कुटिया को घुड़साल कहते हो? तेनालीराम बड़े विवेक से राजगुरु से कहते है के क्षमा करें मैं आप की तरह विद्वान नहीं हूँ। कृपया घोड़े को पहले खिड़की से झाँक कर देख लें। और उसके पश्चात ही घुड़साल के अंदर कदम रखें।
राजगुरु जैसे ही खिड़की से अंदर झाँकते हैं, घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। लोग जमा होने लगते हैं। काफी मशक्कत करने के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है। अंततः कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर उन्हे घोड़े के चंगुल से छुड़ाया जाता है। परेशान राजगुरु और चतुर तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के पास पहुँचते हैं।
घोड़े की दुबली-पतली हालत देख कर महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं। तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को प्रति दिन थोड़ा सा चारा ही देता था, जिस तरह आप की गरीब प्रजा थोड़ा भोजन कर के गुजारा करती है। और आवश्यकता से कम सुविधा मिलने के कारण घोडा और व्यथित और बिगड़ेल होता गया। ठीक वैसे ही जैसे के आप की प्रजा परिवार पालन की जिम्मेदारी के अतिरिक्त, घोड़ो को संभालने के बोझ से त्रस्त हुई।
राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है। उन पर अधिक बोझ डालना नहीं। आपके दिये हुए घोड़े पालने के कार्य-आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए पर आप की प्रजा दुर्बल हो गयी है। महाराज कृष्णदेव राय को तेनालीराम की यह बात समझ में आ जाती है, और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है।
प्रजा के सुखी जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक है कि राजा स्वयं प्रजा के बारे में जाने,उनकी कमियों को पहचान कर इनको दूर करें और उन्हें खुशहाल जीवन प्रदान करें ,तभी राज्य सुचारु रूप से चलेगा।
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एक राजा था। उसने परमात्मा को खोजना चाहा।
वह किसी आश्रम में गया। उस आश्रम के प्रधान साधु ने कहा, जो कुछ तुम्हारे पास है, उसे छोड़ दो। परमात्मा को पाना तो बहुत सरल है।
राजा ने यही किया। उसने राज्य छोड़ दिया और अपनी सारी सम्पत्ति गरीबों में बांट दी।
वह बिल्कुल भिखारी बन गया, लेकिन साधु ने उसे देखते ही कहा, अरे, तुम तो सभी कुछ साथ ले आये हो! राजा की समझ में कुछ भी नहीं आया, पर वह बोला नहीं। साधु ने आश्रम के सारे कूड़े-करकट का फेंकने का काम उसे सौंपा।
आश्रमवासियों को यह निर्णय बड़ा कठोर लगा, किन्तु साधु ने कहा, सत्य को पाने के लिए राजा अभी तैयार नहीं है और इसका तैयार होना तो बहुत ही जरूरी है। कुछ दिन और बीते।
आश्रमवासियों ने साधु से कहा कि अब वह राजा को उसके कठोर काम से छुट्टी देने के लिए उसकी परीक्षा ले लें।
साधु बोला, अच्छा! अगले दिन राजा अब कचरे की टोकरी सिर पर लेकर गांव के बाहर फेंकने जा रहा था तो एक आदमी रास्ते में उससे टकरा गया।
राजा बोला, आज से पंद्रह दिन पहले तुम इतने अंधे नहीं थे।
साधु को जब इसका पता चला तो उसने कहा, मैंने कहा था न कि अभी समय नहीं आया है। वह अभी वही है।
कुछ दिन बाद फिर राजा से कोई राहगीर टकरा गया। इस बार राजा ने आंखें उठाकर उसे सिर्फ देखा, पर कहा कुछ भी नहीं। फिर भी आंखों ने जो भी कहना था, कह ही दिया। साधु को जब इसकी जानकारी मिली तो उसने कहा, सम्पत्ति को छोडऩा कितना आसान है, पर अपने को छोडऩा कितना कठिन है।
तीसरी बार फिर यही घटना हुई। इस बार राजा ने रास्ते में बिखरे कूड़े को बटोरा और आगे बढ़ गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। उस दिन साधु बोला, अब यह तैयार है।
जो खुदी को छोड़ देता, वही प्रभु को पाने का अधिकारी होता है। सत्य को पाना है तो स्वयं को छोड़ दो। मैं से बड़ा और कोई असत्य नहीं है।
*💐💐शिक्षाः-💐💐*
मन विचारों के कूड़े-करकट से भरा हुआ है इसलिए मन को विचारों से मुक्त करना ही सत्य को पाना है।
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