💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 71 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐दो खरगोश💐💐*
एक बार की बात है, दो खरगोश थे. एक का नाम वाईजी था और दूसरे का नाम फूली। वाईजी अपने नाम के अनुसार वाइज यानी बुद्धिमान था और फूली अपने नाम के अनुरूप फूलिश यानी बेवकूफ था।
दोनों में गहरी दोस्ती थी. एक दिन उन्हें गाजर खाने का बड़ा मन किया और वे फ़ौरन इनकी खोज में निकल पड़े।
कुछ दूर चलने पर उन्हें अगल-बगल लगे दो गाजर दिखे. एक गाजर के ऊपर बड़े-बड़े पत्ते लगे थे जबकि दूसरे के पत्ते काफी छोटे थे।
फूली बिना देर किये बड़े पत्तों वाले गाजर के पास दौड़ा और उसे उखाड़ते हुए कहने लगा, “ये वाला मेरा है… ये वाला मेरा है…”
वाईजी उसकी इस हरकत को देख कर मुस्कुराया और बोला, “ठीक है भाई तुम उसे ले लो मैं ये बड़ा वाला ले लेता हूँ?”
और जब उसने गाजर उखाड़ा तो सचमुच वो फूली के गाजर से बड़ा था.
यह देख कर फूली को बड़ा आश्चर्य हुआ, वह बोला, “लेकिन मेरे गाजर के पत्ते तो काफी बड़े थे!”
“तुम गाजर के पत्ते देखकर उसकी साइज़ का अनुमान नहीं लगा सकते!”, वाईजी ने समझाया।
गाजर चट कर दोनों दोस्त आगे बढ़ गए।
थोड़ी दूरी पर उन्हें फिर से दो गाजर दिखाई दिए।
फूली बोला, “जाओ इस बार तुम पहले अपना गाजर चुन लो।
वाईजी बारी-बारी से दोनों गाजरों के पास गया और सावधानी से उन्हें देखने लगा…. उसने उनके पत्ते छुए और कुछ देर सूंघने के बाद बड़े पत्ते वाला गाजर ही चुन लिया।
“ये क्या तुमने इस बार छोटा गाजर क्यों चुन लिया.” फूली बोला।
“मैंने छोटा नहीं बड़ा गाजर ही चुना है!” वाईजी ने जवाब दिया।
और सचमुच इस बार भी वाईजी का ही गाजर बड़ा था.
फूली कुछ नाराज़ होते हुए बोला, “लेकिन तुमने तो कहा था कि जिसके पत्ते बड़े होते हैं वो गाजर छोटा होता है!”
“ना-ना, मैंने तो बस इतना कहा था कि तुम गाजर के पत्ते देखकर उसकी साइज़ का अनुमान नहीं लगा सकते! कोई भी चुनाव करने से पहले सोच-विचार करना ज़रूरी है.” वाईजी बोला.
फूली ने हामी भरी और फिर दोनों ने गाजर के मजे उठाये और आगे बढ़ गए…
तीसरी बार भी उन्हें दो अलग-अलग साइज़ की पत्तियों वाले गाजर दिखे.
फूली कुछ कन्फ्यूज्ड दिख रहा था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. तभी वाईजी ने उससे कहा कि पहले वो अपना गाजर चुन सकता है.
बेचारा फूली धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और गाजरों का निरिक्षण करने का दिखावा करता है, उसे समझ नहीं आता कि कौन सा गाजर चुने. वह मायूस हो वाईजी की ओर देखता है.
वाईजी मुस्कुराता है और कूद कर गाजरों के पास पहुँच जाता है. वह उन्हें सावधानी से देखता है और फिर एक गाजर उखाड़ लेता है.
फूली चुप-चाप दूसरे गाजर की ओर बढ़ने लगता है, तभी वाईजी उसे रोकते हुए कहता है, “नहीं, फूली, ये वाला गाजर तुम्हारा है.”
“लेकिन इसे तो तुमने चुना है और ये ज़रूर दूसरे वाले से बड़ा होगा. मुझे नहीं पता तुम ये कैसे करते हो, शायद तुम मुझसे अधिक बुद्धिमान हो.” फूली उदासी भरे शब्दों में बोला.
इस पर वाईजी ने उसका हाथ थामते हुए कहा-
फूली, उस बुद्धी का क्या लाभ जिससे मैं अपने दोस्त की मदद ना कर सकूँ… तुम मेरे दोस्त हो और मैं चाहता हूँ कि तुम ये गाजर खाओ. एक बुद्धिमान खरगोश जिसका पेट भरा हो पर उसका कोई दोस्त ना हो…क्या सचमुच बुद्धिमान कहलायेगा?
“सही कहा!”, फूली ने उसे गले लगाते हुए कहा.
और फिर दोनों दोस्त गाजर खाते-खाते अपने घरों को लौट गए।
*💐💐 शिक्षा 💐💐*
दोस्तों, ईश्वर ने हमें जो भी कला दी हैं उनका सही इस्तेमाल इसी में है कि वे औरों की मदद में काम आयें. सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करने वाले लोगों के पास पैसा हो सकता है…प्रसन्नता नहीं! इसलिए अगर कोई ऐसा है जिसकी लाइफ आपकी मदद से बेहतर बन सकती है तो उसकी मदद ज़रूर करिए।
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 72 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐दड़बे की मुर्गी💐💐*
एक शिष्य अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला, ” लोगों को खुश रहने के लिए क्या चाहिए?”
“तुम्हे क्या लगता है?”, गुरु ने शिष्य से खुद इसका उत्तर देने के लिए कहा नवनीत।
शिष्य एक क्षण के लिए सोचने लगा और बोला, “मुझे लगता है कि अगर किसी की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो रही हों… खाना-पीना मिल जाए …रहने के लिए जगह हो…एक अच्छी सी नौकरी या कोई काम हो… सुरक्षा हो…तो वह खुश रहेगा.”
यह सुनकर गुरु कुछ नहीं बोले और शिष्य को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए चलने लगे।
वह एक दरवाजे के पास जाकर रुके और बोले, “इस दरवाजे को खोलो…”
शिष्य ने दरवाजा खोला, सामने मुर्गी का दड़बा था. वहां मुर्गियों और चूजों का ढेर लगा हुआ था… वे सभी बड़े-बड़े पिंजड़ों में कैद थे….
“आप मुझे ये क्यों दिखा रहे हैं.” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।
इस पर गुरु शिष्य से ही प्रश्न-उत्तर करने लगे.
“क्या इन मुर्गियों को खाना मिलता है?'”
“हाँ.”
“क्या इनके पास रहने को घर है?”
“हाँ… कह सकते हैं.”
“क्या ये यहाँ कुत्ते-बिल्लियों से सुरक्षित हैं?”
“हम्म”
“क्या उनक पास कोई काम है?”
“हाँ, अंडा देना.”
“क्या वे खुश हैं?”
शिष्य मुर्गियों को करीब से देखने लगा. उसे नहीं पता था कि कैसे पता किया जाए कि कोई मुर्गी खुश है भी या नहीं…और क्या सचमुच कोई मुर्गी खुश हो सकती है?
वो ये सोच ही रहा था कि गुरूजी बोले, “मेरे साथ आओ.”
दोनों चलने लगे और कुछ देर बाद एक बड़े से मैदान के पास जा कर रुके. मैदान में ढेर सारे मुर्गियां और चूजे थे… वे न किसी पिंजड़े में कैद थे और न उन्हें कोई दाना डालने वाला था… वे खुद ही ढूंढ-ढूंढ कर दाना चुग रहे थे और आपस में खेल-कूद रहे थे.
“क्या ये मुर्गियां खुश दिख रही हैं?” गुरु जी ने पूछा.
शिष्य को ये सवाल कुछ अटपटा लगा, वह सोचने लगा…यहाँ का माहौल अलग है…और ये मुर्गियां प्राकृतिक तरीके से रह रही हैं… खा-पी रही रही है…और ज्यादा स्वस्थ दिख रही हैं…और फिर वह दबी आवाज़ में बोला-
“शायद!”
“बिलकुल ये मुर्गियां खुश है, बेतुके मत बनो,” गुरु जी बोले, ” पहली जगह पर जो मुर्गियों हैं उनके पास वो सारी चीजें हैं जो तुमने खुश रहने के लिए ज़रूरी मानी थीं.
उनकी मूलभूत आवश्यकताएं… खाना-पीना, रहना सबकुछ है… करने के लिए काम भी है….सुरक्षा भी है… पर क्या वे खुश हैं?
वहीँ मैदानों में घूम रही मुर्गियों को खुद अपना भोजन ढूंढना है… रहने का इंतजाम करना है… अपनी और अपने चूजों की सुरक्षा करनी है… पर फिर भी वे खुश हैं…”
*💐💐शिक्षा💐💐*
गुरु जी गंभीर होते हुए बोले, ” हम सभी को एक चुनाव करना है, “या तो हम दड़बे की मुर्गियों की तरह एक पिंजड़े में रह कर जी सकते हैं एक ऐसा जीवन जहाँ हमारा कोई अस्तित्व नहीं होगा… या हम मैदान की उन मुर्गियों की तरह जोखिम उठा कर एक आज़ाद जीवन जी सकते हैं और अपने अन्दर समाहित अनन्त संभावनाओं को टटोल सकते हैं…तुमने खुश रहने के बारे में पूछा था न… तो यही मेरा जवाब है… सिर्फ सांस लेकर तुम खुश नहीं रह सकते… खुश रहने के लिए तुम्हारे अन्दर जीवन को सचमुच जीने की हिम्मत होनी चाहिए…. इसलिए खुश रहना है तो दड़बे की मुर्गी मत बनो!”
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 73 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐अंधा अनुसरण💐💐*
बहुत समय पहले की बात है, घास के मैदानों से भरा एक जंगल था जिससे भैंसों का एक झुण्ड गुजर रहा था। झुंड अभी कुछ ही आगे बढ़ा था कि अचानक शेरों ने उनपर हमला कर दिया।
बाकी भैंसे तो बच गयीं पर एक बेचारी भैंस झुण्ड से अलग हो गयी. शेर उसका पीछा करने लगे और वो घबराहट के मारे इधर-उधर भागने लगी… कभी दाएं…. कभी बाएँ…कभी ढलान पर … तो कभी चढ़ाई पर…।
भैंस इतनी डरी हुई थी कि उसने पलट कर देखा तक नहीं कि शेर कब के वापस लौट गए हैं…उसे तो बस अपने जान की फ़िक्र थी! काफी देर तक भागने के बाद जब वो रुकी तब उसे एहसास हुआ कि वह जंगल से बाहर निकल एक गाँव में आ चुकी है।
अगले दिन जंगली कुत्तों का झुण्ड घास के बीच मिल रही उस भैंस की गंध का पीछा करते-करते उसी रास्ते पर चल पड़ा।
अगले दिन भेडें भी घास के बीच बने रास्ते को देखकर उसी पर चल पड़ी..
ऐसे करते-करते बहुत से जानवर उसी रास्ते पर चलने लगे… और एक दिन जब जंगल में शिकार कर रहे नवयुवकों ने वो रास्ता देखा तो वो भी उसी पर चल पड़े और गाँव पहुँच कर बहुत खुश हुए कि उन्होंने जंगल से निकलने का एक सरल रास्ता खोज लिया है।
फिर क्या था गाँव वाले भी उसे रास्ते जंगल आने जाने लगे… धीरे-धीरे उस रास्ते पर बैल गाड़ियाँ चलने लगीं जिसपर किसान लकड़ियाँ काट कर गाँव ले जाते और फिर उसे शहर में बेच देते।
भैंस द्वारा बनाया गया वो रास्ता आज उस इलाके का मुख्य मार्ग बन चुका था…और बेहद बेढंगा…ऊँचा-नीचा और कठिन होने के बावजूद सब उसी रस्ते पर ख़ुशी-ख़ुशी चल रहे थे।
पर वो जंगल गाँव वालों की ख़ुशी देखकर मुस्कुरा रहा था… क्योंकि वो जानता था जंगल से गाँव जाने का इससे कठिन और कोई रास्ता हो ही नहीं सकता था…. आज एक भैंस की वजह से हज़ारों लोग 30 मिनट के रास्ते को तीन घंटे में बड़ी कठिनाई के साथ पार कर रहे थे…पर फिर भी वे खुश थे।
*💐💐शिक्षा💐💐*
बच्चों, आप किस रास्ते पर हैं ? क्या ये आपका सोचा-समझा रास्ता है या कोई विसंगत रास्ता है जिसपर हज़ारों लोग चल रहे हैं और इस वजह से वह तार्किक लग रहा है?
मत स्वीकार करिए उस रास्ते को जो आपने सिर्फ इस लिए चुना है क्योंकि सब उसे ही चुनते हैं…एक बार ठहरिये और समझने की कोशिश करिए…कहीं आप भी 30 मिनट का रास्ता 3 घंटे में तो नहीं पूरा कर रहे हैं… पूछिए खुद से
क्या आप सही रास्ते पर हैं?
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 74 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐समय के साथ बदलाव💐💐*
जंगल के बीचो बीच जामुन का एक बहुत पुराना वृक्ष था. पीढ़ियों से गिलहरियों का एक परिवार उस वृक्ष पर रहता आ रहा था।
वह वृक्ष उन्हें हर वो चीज देता आ रहा था जो जीने के लिए ज़रूरी थी…खाने के लिए फल, रहने के लिए अपने खोखले तनों में आसरा और खतरनाक पक्षीयों और जानवरों से सुरक्षा. यही वजह थी कि आज तक गिलहरियों के कुनबे में से किसी ने कहीं और जाने की नहीं सोची थी।
लेकिन अब परिस्थितियां बदल रहीं थीं… हर चीज जो शुरू हुई है वो ख़त्म भी होती है…अब जामुन के पेड़ का भी अंत निकट था…उसकी मजबूत जडें अब ढीली पड़ने लगी थीं… जामुन के फलों से लदे रहने वाले उसे पेड़ पर अब मुश्किल से ही जामुन खाने को मिल रहे थे।
यह एक आपात स्थिति थी और गिलहरी परिवार ज्यादा दिनों तक इसकी अनदेखी नहीं कर सकता था… अंततः एक मीटिंग बुलाई गयी।
सबसे बुजुर्ग होने के कारण अकड़ू गिलहरी ने मीटिंग की अध्यक्षता की और अपनी बात रखते हुए कहा, “मित्रों ये पेड़ ही हमारी दुनिया है… यही हमारा अन्न दाता है…इसने सदियों से हमारे पूर्वजों का पेट पाला है… हमारी रक्षा की है…आज भले ही इसपर फल आने कम हो गए हैं… इसकी जडें कमजोर पड़ गयी हैं पर फिर भी यह हम सबको आश्रय देने के लिए पर्याप्त है… और भगवान की कृपा हुई तो क्या पता ये कुछ दिनों में ये वापस ठीक हो जाए? अतः हम सबको यहीं रहना चाहिए और ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए।
सभी गिलहरियों ने अकड़ू की हाँ में हाँ मिलायी लेकिन गिल्लू गिलहरी से रहा नहीं गया और उसने हाथ उठाते हुए कहा, “मुझे कुछ कहना है.”
“क्या कहना है? हम भी तो सुनें”, अकड़ू कुछ अकड़ते हुए बोला।
“क्यों न हम एक नया पेड़ तलाशें और अपना परिवार वहीँ ले चलें… क्योंकि इस पेड़ का अंत निकट है, हो सकता है हम कुछ महीने और यहाँ काट लें…पर उसके बाद क्या? हमें कभी न कभी तो इस पेड़ को छोड़ना ही होगा।
“बेकार की बात करना छोडो गिल्लू… नए खून के जोश में तुम ये भूल रहे हो कि इस पेड़ के बाहर कितना खतरा है… जो कोई भी यहाँ से जाने की सोचेगा उसे बाज, लोमड़ी या कोई अन्य जानवर मार कर खा जाएगा… और भगवान पर भरोसा भी तो कोई चीज होती है !” ,अकड़ू ने ऊँची आवाज़ में गिल्लू को समझाया।
“चाचा, खतरा कहाँ नहीं है… सच कहूँ तो इस समय नया घर खोजने का खतरा ना उठाना ही हमारे परिवार के लिए सबसे खतरनाक चीज है…और जहाँ तक भगवान पर भरोसे की बात है तो अगर हम उस पर इस मरते हुए पेड़ में जान डालने का भरोसा कर सकते हैं तो नया घर खोजते वक़्त हमारी जान की रक्षा करने का भरोसा क्यों नहीं दिखा सकते…. आप लोगों को जो करना है करिए मैं तो चला नया घर ढूँढने!”, और ऐसा कहते हुए गिल्लू जामुन का पेड़ छोड़ कर चला गया।
गिल्लू के जाने के कई दिनों बाद तक उसकी कोई खबर नहीं आई. इस पर अकड़ू सबको यही कहता फिरता, “मैंने मना किया था… बाहर जान का खतरा है… पर वो सुनता तब तो… मारा गया बेकार में..।
बाकी गिलहरियाँ अकड़ू की बात सुनतीं पर समय के साथ-साथ उस धराशायी हो रहे पेड़ पर रहना मुश्किल होता जा रहा था. इसलिए गिलहरी परिवार ने एक और मीटिंग बुलाई. इस बार परिवार दो हिस्सों में बंट गया कुछ गिलहरियाँ गिल्लू की राह पर चलते हुए खतरा उठाने को तैयार हो गयीं और बाकी सभी अकड़ू की राह पर चलते हुए कोई खतरा नहीं उठाना चाहती थीं।
कुछ एक महीने और बीते, जामुन के पेड़ पर फल गायब हो चुके थे… उस पर रह रही गिलहरियाँ बिलकुल कमजोर हो चुकी थीं और अब उनमे कुछ नया करने की हिम्मत भी नहीं बची थी… धीरे-धीरे अकड़ू और बाकी गिलहरियाँ मरने लगीं और वहां से करीब 100 मीटर की दूरी पर गिल्लू और बाकी गिलहरियाँ एक दुसरे जामुन के पेड़ पर हंसी-ख़ुशी अपना जीवन जी रही थीं।
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, हम सभी किसी न किसी जामुन के पेड़ पर बैठे हुए हैं… हम जिस भी उद्योग में हैं…जो भी व्यवसाय कर रहे हैं वह धीरे-धीरे अप्रचलित हो रहा है या उसे करने का तरीका तेजी से बदल रहा है… सरकारी नौकरियां भी अब पहले की तरह नहीं रहीं. ऐसे में अगर हम अकड़ू की तरह बदलाव का विरोध करेंगे…बदल रही परिस्थिति को नजरअंदाज करेंगे और खुद को नयी परिस्थितियों के हिसाब से नहीं ढालेंगे तो बहुत जल्द हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 75 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐मिट्टी का दिल💐💐*
पंकज एक गुस्सैल लड़का था. वह छोटी-छोटी बात पर नाराज़ हो जाता और दूसरों से झगड़ा कर बैठता. उसकी इसी आदत की वजह से उसके अधिक दोस्त भी न थे।
पंकज के माता-पिता और सगे-सम्बन्धी उसे अपना स्वभाव बदलने के लिए बहुत समझाते पर इन बातों का उसपर कोई असर नहीं होता।
एक दिन पंकज के पेरेंट्स को शहर के करीब ही किसी गाँव में रहने वाले एक सन्यासी बाबा का पता चला जो अजीबो-गरीब तरीकों से लोगों की समस्याएं दूर किया करता था।
अगले दिन सुबह-सुबह वे पंकज को बाबा के पास ले गए।
बाबा बोले, “जाओ और चिकनी मिटटी के दो ढेर तैयार करो।
पंकज को ये बात कुछ अजीब लगी लेकिन माता-पता के डर से वह ऐसा करने को तैयार हो गया।
कुछ ही देर में उसने ढेर तैयार कर लिया.
बाबा बोले, “अब इन दोनों ढेरों से दो दिल तैयार करो!”
पंकज ने जल्द ही मिटटी के दो हार्ट शेप तैयार कर लिए और झुंझलाते हुए बोला, “हो गया बाबा, क्या अब मैं अपने घर जा सकता हूँ?”
बाबा ने उसे इशारे से मना किया और मुस्कुरा कर बोले, “अब इनमे से एक को कुम्हार के पास लेकर जाओ और कहो कि वो इसे भट्टी में डाल कर पका दे.”
पंकज को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि बाबा करना क्या चाहते हैं पर अभी उनकी बात मानने के अलावा उसके पास कोई चारा न था.
दो-तीन घंटे बाद पंकज यह काम कर के लौटा।
“यह लो रंग और अब इस दिल को रंग कर मेरे पास ले आओ!”, बाबा बोले।
“आखिर आप मुझसे कराना क्या चाहते हैं? इन सब बेकार के टोटकों से मेरा गुस्सा कम नहीं हो रहा बल्कि बढ़ रहा है!”, पंकज बड़बड़ाने लगा।
बाबा बोले, “बस पुत्र यही आखिरी काम है!”
पंकज ने चैन की सांस ली और भट्टी में पके उस दिल को लाल रंग से रंगने लगा.।
रंगे जाने के बाद वह बड़ा ही आकर्षक लग रहा था. पंकज भी अब कहीं न कहीं अपनी मेहनत से खुश था और मन ही मन सोचा रहा था कि वो इसे ले जाकर अपने रूम में लगाएगा.
वह अपनी इस कृति को बड़े गर्व के साथ बाबा के सामने लेकर पहुंचा.
पहली बार उसे लग रहा था कि शायद बाबा ने उससे जो-जो कराया ठीक ही कराया और इसकी वजह से वह गुस्सा करना छोड़ देगा.
“तो हो गया तुम्हारा काम पूरा?”, बाबा ने पूछा.
“जी हाँ, देखिये ना मैंने खुद इसे लाल रंग से रंगा है!”, पंकज उत्साहित होते हुए बोला.
“ठीक है बेटा, ये लो हथौड़ा और मारो इस दिल पर.”, बाबा ने आदेश दिया.
“ये क्या कह रहे हैं आप? मैंने इतनी मेहनत से इसे तैयार किया है और आप इसे तोड़ने को कह रहे हैं?”, पंकज ने विरोध किया.
इस बार बाबा गंभीर होते हुए बोले, “मैंने कहा न मारो हथौड़ा!”
पंकज ने तेजी से हथौड़ा अपने हाथ में लिए और गुस्से से दिल पर वार किया.
जिस दिल को बनाने में पंकज ने आज दिन भर काम किया था एक झटके में उस दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए.
“देखिये क्या किया आपने, मेरी सारी मेहनत बर्बाद कर दी.”
बाबा ने पंकज की इस बात पर ध्यान न देते हुए अपने थैले में रखा मिट्टी का दूसरा दिल निकाला और बोले, “चिकनी मिट्टी का यह दूसरा दिल भी तुम्हारा ही तैयार किया हुआ है… मैं इसे यहाँ जमीन पर रखता हूँ… लो अब इस पर भी अपना जोर लगाओ…”
पंकज ने फ़ौरन हथौड़ा उठाया और दे मारा उस दिल पर.
पर नर्म और नम होने के कारण इस दिल का कुछ ख़ास नहीं बिगड़ा बस उसपर हथौड़े का एक निशान भर उभर गया.
“अब आप खुश हैं… आखिर ये सब कराने का क्या मतलब था… मैं जा रहा हूँ यहाँ से!”, पंकज यह कह कह कर आगे बढ़ गया.
“ठहरो पुत्र!,” बाबा ने पंकज को समझाते हुए कहा, “जिस दिल पर तुमने आज दिन भर मेहनत की वो कोई मामूली दिल नहीं था… दरअसल वो तुम्हारे असल दिल का ही एक रूप था.
तुम भी क्रोध की भट्टी में अपने दिल को जला रहे हो… उसे कठोर बना रहे हो… ना समझी के कारण तुम्हे ऐसा करना ताकत का एहसास दिलाता है… तुम्हे लगता है की ऐसा करने से तुम मजबूत दिख रहे हो… मजबूत बन रहे हो… लेकिन जब उस हथौड़े की तरह ज़िंदगी तुम पर एक भी वार करेगी तब तुम संभल नहीं पाओगे… और उस कठोर दिल की तरह तुम्हारा भी दिल चकनाचूर हो जाएगा!
समय है सम्भल जाओ! इस दूसरे दिल की तरह विनम्र बनो… देखो इस पर तुम्हारे वार का असर तो हुआ है पर ये टूट कर बिखरा नहीं… ये आसानी से अपने पहले रूप में आ सकता है… ये समझता है कि दुःख-दर्द जीवन का एक हिस्सा है और उनकी वजह से टूटता नहीं बल्कि उन्हें अपने अन्दर सोख लेता है…जाओ क्षमाशील बनो…प्रेम करो और अपने दिल को कठोर नहीं विनम्र बनाओ!”
पंकज बाबा को एक टक देखता रह गया. वह समझ चुका था कि अब उसे कैसा व्यवहार करना है!
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