💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 76 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐तीन बालक💐💐*
एक राजा थे, उन्हें पशु-पक्षियों से बहुत प्यार था। वे पशु-पक्षियों से मिलने के लिए वन में जाते थे।
हमेशा की तरह एक दिन राजा पशु-पक्षियों को देखने के लिए वन में गए। अचानक आसमान में बादल छा गए और तेज-तेज बारिश होने लगी।
बारिश होने के कारण उन्हें ठीक से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, राजा रास्ता भटक गए। रास्ता दूंढते-ढूंढते किसी तरह राजा जंगल के किनारे पहुंच ही गए।
भूख-प्यास और थकान से बेचैन राजा, एक बड़े से पेड़ के नीचे बैठ गए। तभी राजा को उधर से आते हुए तीन बालक दिखाई दिए।
राजा ने उन्हें प्यार से अपने पास बुलाया,"बच्चों यहां आओ। मेरी बात सुनो।"
तीनों बालक हंसते-खेलते राजा के पास आ गए। तब राजा बोले-मुझे बहुत भूख और प्यास लगी है, क्या मुझे भोजन और पानी मिल सकता है।
बालक बोले, पास में ही हमारा घर है। हम अभी जाकर आपके लिए भोजन और पानी लेकर आते हैं। आप बस थोड़ा-सा इंजतार कीजिए।
तीनों बालक दौड़कर गए और राजा के लिए भोजन और पानी ले आए।*
राजा बालकों के व्यवहार से बहुत खुश हुए। और बोले,प्यारे बच्चों, तुमने मेरी भूख और प्यास मिटाई है।
मैं तुम तीनों बालकों को इनाम के रूप में कुछ देना चाहता हूँ। बताओ तुम बालकों को क्या चाहिए?
थोड़ी देर सोचने के बाद एक बालक बोला:-महाराज,क्या आप मुझे एक बड़ा सा बंगला और गाड़ी दे सकते हैं?
राजा बोले:- हां-हां क्यों नहीं। अगर तुम्हें ये ही चाहिए तो जरूर मिलेगा।अब तो बालक फूले न समाया।
दूसरा बालक भी उछलते हुए बोला:- मैं बहुत गरीब हूं। मुझे धन चाहिए। जिससे मैं भी अच्छा-अच्छा खा सकूं, अच्छे-अच्छे कपड़े पहन सकूं और खूब मस्ती करूं।
राजा मुस्कराकर बोले, ठीक है बेटा, मैं तुम्हें बहुत सारा धन दूंगा।यह सुनकर दूसरा बालक भी खुशी से झूम उठा।
भला तीसरा बालक क्यों चुप रहता। वह भी बोला:-महाराज। क्या आप मेरा सपना भी पूरा करेंगे?
मुस्कराते हुए राजा ने बोला-क्यों नहीं, बोलो बेटा तुम्हारा क्या सपना है? क्या, तुम्हें भी धन-दौलत चाहिए?
नहीं महाराज। मुझे धन-दौलत नहीं चाहिए। मेरा सपना है कि मैं पढ़-लिखकर विद्वान बनूं। क्या आप मेरे लिए कुछ कर सकते हैं?
तीसरे बालक की बात सुनकर राजा बहुत खुश हुए।
राजा ने उसके पढ़ने-लिखने की उचित व्यवस्था करवा दी। वह मेहनती बालक था। वह दिन-रात लगन से पढ़ता और कक्षा में पहला स्थान प्राप्त करता। इस तरह समय बीतता गया। वह पढ़-लिखकर विद्वान बन गया। राजा ने उसे राज्य का मंत्री बना दिया।बुद्धिमान होने के कारण सभी लोग उसका आदर-सम्मान करने लगे।
उधर जिस बालक ने राजा से बंगला और गाड़ी मांगी थी। अचानक बाढ़ आने से उसका सब कुछ पानी में बह गया।
दूसरा बालक भी धन मिलने के बाद, कोई काम नहीं करता था। बस दिनभर फिजूल खर्च करके धन को उड़ता और मौज-मस्ती करता था। लेकिन रखा धन भला कब तक चलता। एक समय आया कि उसका सारा धन समाप्त हो गया। वह फिर से गरीब हो गया।
दोनों बालक उदास होकर अपने मित्र यानि मंत्री से मिलने राजा के दरबार में गए। वे दुखी होकर अपने मित्र से बोले, हमने राजा से इनाम मांगने में बहुत बड़ी भूल की।
हमारा धन, बंगला, गाड़ी सब कुछ नष्ट हो गया। हमारे पास अब कुछ नहीं बचा है। मित्र ने समझाते हुए कहा, किसी के भी पास धन-दौलत हमेशा नहीं रहते। धन तो आता-जाता रहता है। सिर्फ शिक्षा है जो हमेशा हमारे पास रहती है। धन से नहीं बल्कि शिक्षा से ही हम धनवान बनते हैं।
दोनों बालकों को अपनी गलती पर बहुत पछतावा हुआ। उन्होंने तय किया कि हम भी मेहनत और लगन से पढ़ाई करेंगे और अपने जीवन को सुखी बनाएंगे।
*💐💐शिक्षा💐💐*
इसी लिये कहा गया है कि, विद्याधन सबसे बड़ा धन है, इसे कोई चुरा नहीं सकता है और जितना बाँटो उतना ही अधिक बढ़ता जाता है।अपने बच्चों को सामाजिक, राजनैतिक, व्यावसायिक, धार्मिक, व नैतिकशिक्षा से परिपूर्ण करें । यही सच्चा धन है।
*प्रस्तुतकर्ता-ओम प्रकाश सिंह भदोरिया।।*
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 77 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐दो तेंदुए💐💐*
नंदन वन में जग्गा और राका नाम के दो तेंदुए रहते थे. वहां हिरनों की कोई कमी नहीं थी, दोनों अपने-अपने इलाकों में आराम से इनका शिकार करते और महीने के अंत में जंगल के बीचो-बीच स्थित एक टीले पर मिलकर साथ में कुछ समय बिताते।
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ऐसी ही एक मुलाक़ात में जग्गा बोला, “मैं सोच रहा हूँ कि अब मैं सुअर का शिकार करना भी सीख लूँ।
इस पर राका बोला. “ऐसा करने की क्या ज़रुरत ? इस जंगल में हज़ारों हिरन हैं और हम बड़ी आसानी से उनका शिकार कर लेते हैं…फिर क्यों बेकार में नया शिकार सीखने में अपनी एनर्जी बर्बाद की जाए?”
“तुम्हारी बात सही है कि आज यहाँ बहुत से हिरन हैं… पर कल किसने देखा है? क्या पता एक दिन इनकी संख्या कम हो जाए…” जग्गा ने समझाया।
यह सुन कर राका जोर से हंस पड़ा और बोला, “जो तुम्हारे जी में आये करो मैं बेकार की चीजों में अपना समय बर्बाद नहीं करूँगा.”
इसके बाद दोनों तेंदुए अपने-अपने रास्ते चल दिए और एक महीने बाद वापस उसी टीले पे मिले।
“पता है इस महीने मैंने बड़े ध्यान से सुअरों की गतिविधियाँ देखीं… इन्हें पकड़ना इतना आसान भी नही होता है… कई प्रयासों के बाद ही मैं पहली बार एक सुअर का शिकार कर पाया… और पूरे महीने इसी की प्रैक्टिस करता रहा. और अब इस महीने मैं बंदरों का शिकार करना सीखूंगा.” जग्गा उत्साहित होते हुए बोला।
पर इन सब बातों का राका पर कोई असर नहीं पड़ा उसने वही बात दोहरा दी, “जो तुम्हारे जी में आये करो मैं बेकार की चीजों में अपना समय बर्बाद नहीं करूँगा.”
अगले महीने जग्गा बन्दर कर शिकार करना सीख चुका था।
समय बीतता गया और साल का अंत आते-आते जग्गा ने सुअर, बन्दर, ज़ेब्रा , भेंड़, नीलगाय समेत कई जानवरों का शिकार करने में महारथ हासिल कर लिया।
और दूसरी तरफ राका अभी भी बस हिरनों का शिकार करना ही जानता था।
अगले कुछ सालों तक सबकुछ सामान्य रहा पर उसके बाद नंदन वन में भयंकर सूखा पड़ा. तालाब के तालाब सूख गए, कभी घासों से लहलहाते मैदान आज बंजर हो गए…पेड़-पौधों से पत्तियां गायब सी हो गयीं… भोजन और पानी की कमी के कारण बहुत से जानवर मर गए. हर तरफ हाहाकार मच गया।
बचे हुए मुट्ठीभर हिरनों को मारने के लिए शेर, बाघ और चीता जैसे जानवर आपस में टकराने लगे।
ऐसे में जग्गा और राका एक बार फिर से टीले पर मिले।साफ़ पता चल रहा था कि इस त्रासदी के बावजूद जग्गा की सेहत पर कोई ख़ास फरक नहीं पड़ा था जबकि राका की हालत बुरी थी… पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण वह कमजोर हो गया था… और इस हालत में कोई नया शिकार करना सीखना भी उसके बस की बात नहीं थी।
राका आज मन ही मन पछता रहा था उसके मन में उसके ही शब्द…“जो तुम्हारे जी में आये करो मैं बेकार की चीजों में अपना समय बर्बाद नहीं करूँगा.” गूँज रहे थे।
दोनों दोस्त विदा हुए और इसके बाद राका कभी नहीं दिखाई दिया।
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों, अक्सर हम जितनी skills से काम चल जाता है उतने पे ही अटके रहते हैं और कभी योजनानुसार उसे अपग्रेड करने की कोशिश नहीं करते।
इस सवाल पर जरा सोचिये –
आपको कितने दिन हुए कोई नयी चीज सीखे?
और इसका सही उत्तर खुद को दीजिये।
बहुत से लोग महसूस करेंगे कि उन्होंने हफ़्तों, महीनों नहीं सालों से कुछ नया नहीं सीखा है. वे जो कुछ चीजें जानते हैं और जिसके बल पर उनकी जॉब या बिजनेस चल रहा है बस उतनी ही स्किल्स लेकर सिमटे हुए हैं.
वे सालों से जिस क्लास को जिस तरीके से पढ़ाते थे वैसे आज भी पढ़ा रहे हैं…
वे सालों से कम्पनी में जो काम जिस तरह से करते थे आज भी वैसे ही कर रहे हैं…
वे सालों से जो बिजनेस जैसे चला रहे थे वैसे आज भी चला रहे हैं…
न उन्होंने अपना तरीका बेहतर किया, न नए सबजेक्ट्स पढ़ाना सीखा, न कंपनी के लिए खुद में value ad किया, न नए बिजनेस के बारे में सोचा… बस गाड़ी जैसी चल रही है चलने दिया… क्योंकि वे सोचते हैं जंगल में हज़ारों हिरन हैं और कभी उनकी कमी नहीं होने वाली।
पर जल्द ही समय इस सोच को गलत साबित कर देगा… ये दुनिया जितना आप सोचते हैं उससे कहीं अधिक तेजी से बदल रही है… नयी तकनीक, नए inventions, artificial intelligence, internet, आदि चीजों को बड़ी तेजी से बदल रहे हैं.
बेहतर होगा कि राका की गलती ना करते हुए जग्गा की तरह हम अपने अच्छे समय में खुद को अपग्रेड कर लें और उस सूखे की तैयारी कर लें जो कभी बता कर नहीं आता!
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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐तीसरा समझदार दोस्त💐💐*
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बहुत समय पहले की बात है, दो अरबी दोस्तों को एक बहुत बड़े खजाने का नक्शा मिला., खजाना किसी रेगिस्तान के बीचो-बीच था।
दोनों ने योजना बनाना शुरू की, खजाने तक पहुँचने के लिए बहुत लम्बा समय लगता और रास्ते में भूख- प्यास से मर जाने का भी खतरा था। बहुत विचार करने पर दोनों ने तय किया कि इस योजना में एक और समझदार दोस्त को शामिल किया जाए, ताकि वे एक और ऊंट अपने साथ ले जा सकें जिस पर खाने-पीने का ढेर सारा सामान भी आ जाए और खजाना अधिक होने पर वे उसे ऊंट पर ढो भी सकें।
पर सवाल ये उठा कि चुनाव किसका किया जाए?
बहुत सोचने के बाद गुरु और बबलू को चुना गया। दोनों हर तरह से बिलकुल एक तरह के थे और कहना मुश्किल था कि दोनों में अधिक बुद्धिमान कौन है? इसलिए एक प्रतियोगिता के जरिये सही व्यक्ति का चुनाव करने का फैसला किया गया।
दोनों दोस्तों ने उन्हें एक निश्चित स्थान पर बुलाया और बोले, “आप लोगों को अपने-अपने ऊंट पर सवार होकर सामने दिख रहे रास्ते पर आगे बढ़ना है. कुछ दूर जाने के बाद ये रास्ता दो अलग-अलग रास्तों में बंट जाएगा- एक सही और एक गलत। जो इंसान सही रास्ते पर जाएगा वही हमारा तीसरा साथी बनेगा और खजाने का एक-तिहाई हिस्सा उसका होगा।”
दोनों ने आगे बढ़ना शुरू किया और उस बिंदु पे पहुँच गए जहाँ से रास्ता बंटा हुआ था।
वहां पहुँच कर गुरु ने इधर-उधर देखा, उसे दोनों रास्तों में कोई अंतर समझ नहीं आया और वह जल्दी से बांये तरफ बढ़ गया. जबकि, बबलू बहुत देर तक उन रास्तों की ओर देखता रहा, और उन पर आगे बढ़ने के नतीजे के बारे में सोचता रहा।
करीब 1 घंटे बाद बायीं ओर के रास्ते पर धूल उड़ती दिखाई दी।गुरु बड़ी तेजी से उस रास्ते पर वापस आ रहा था।
उसे देखते ही बबलू मुस्कुराया और बोला, “गलत रास्ता ?”
“हाँ, शायद!”, गुरु ने जवाब दिया.
दोनों दोस्त छुप कर यह सब देख रहे थे और वे तुरंत उनके सामने आये और बोले, “बधाई हो!
“शुक्रिया!”, बबलू ने फ़ौरन जवाब दिया।
“तुम्हे नहीं, हमने गुरु को चुना है.”, दोनों दोस्त एक साथ बोले।
“पर गुरु तो गलत रास्ते पर आगे बढ़ा था… फिर उसे क्यों चुना जा रहा है?”,बबलू गुस्से में बोला।
“क्योंकि उसने ये पता लगा लिया कि गलत रास्ता कौन है और अब वो सही रास्ते पर आगे जा सकता है, जबकि तुमने पूरा वक़्त बस एक जगह बैठ कर यही सोचने में गँवा दिया कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत। समझदारी किसी चीज के बारे में ज़रूरत से ज्यादा सोचने में नहीं बल्कि एक समय के बाद उस पर काम करने और तजुर्बे से सीख लेने में है.”, दोस्तों ने अपनी बात पूरी की,और खजाने की तरफ चल दिये,बबलू बैठा बैठा वही पछताता रहा।
*💐💐शिक्षा💐💐*
बच्चों, हमारे जीवन में भी कभी न कभी ऐसा स्थान(समय) आता है जहाँ हम निर्णय नहीं कर पाते कि कौन सा रास्ता सही है और कौन सा गलत. और ऐसे में बहुत से लोग बस सोच-विचार करने में अपना काफी समय बर्बाद कर देते हैं,जबकि, ज़रुरत इस बात की है कि चीजों को विश्लेषण करने की बजाय गुरु की तरह अपने विकल्प को समझ करके निर्णय लिया जाए और अपने अनुभव के आधार पर आगे बढ़ा जाए।
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 79 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐अखबार वाला💐💐*
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एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय अख़बार देने आता था, उस समय रमेश बाबू उसको अपने मकान की गैलरी में टहलते हुए मिल जाते थे ।
प्रतिदिन वह रमेश बाबू के आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए अख़बार फेंकता और उनको 'नमस्ते बाबू जी' बोलकर अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था।
क्रमश: समय बीतने के साथ रमेश बाबू के सोकर उठने का समय बदलकर प्रात: 7:00 बजे हो गया।
जब कई दिनों तक रमेश बाबू उस अखबार वाले को प्रात: टहलते नहीं दिखे तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह उनका कुशल-क्षेम लेने उनके आवास पर आ गया।
तब उसे ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, रमेश बाबू बस यूँ ही देर से उठने लगे थे ।
वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, "बाबू जी! एक बात कहूँ?"
रमेश बाबू ने कहा... "बोलो"
वह बोला... "आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आपके लिए ही मैं सुबह तड़के विधानसभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चलाकर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ...सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।"
रमेश बाबू ने विस्मय से पूछा...अरे तुम ! विधान सभा मार्ग से अखबार लेकर आते हो....इतनी दूर से ?"
“हाँ ! सबसे पहला वितरण वहीं से प्रारम्भ होता है ," उसने उत्तर दिया।
“तो फिर तुम जगते कितने बजे हो?" रमेश बाबू ने पूछा ।
“ढाई बजे.... फिर साढ़े तीन तक वहाँ पहुँच जाता हूँ।"
“फिर ?" रमेश बाबू ने जानना चाहा ।
“फिर लगभग सात बजे अख़बार बाँटकर घर वापस आकर सो जाता हूँ..... फिर दस बजे कार्यालय...... अब बच्चों को बड़ा करने के लिए ये सब तो करना ही होता है।”
रमेश बाबू कुछ पलों तक उसकी ओर देखते रह गए और फिर बोले, “ठीक! तुम्हारे बहुमूल्य सुझाव को अवश्य ध्यान में रखूँगा।"
घटना को लगभग पन्द्रह वर्ष बीत गये।
एक दिन प्रात: नौ बजे के लगभग वह अखबार वाला रमेश बाबू के आवास पर आकर एक निमंत्रण-पत्र देते हुए बोला, “बाबू जी! बिटिया का विवाह है..... आप को सपरिवार आना है।“
निमंत्रण-पत्र के आवरण में अभिलेखित सामग्री को रमेश बाबू ने सरसरी निगाह से जो पढ़ा तो संकेत मिला कि किसी डाक्टर लड़की का किसी डाक्टर लड़के से परिणय का निमंत्रण था। तो जाने कैसे उनके मुँह से निकल गया, “तुम्हारी लड़की ?"
उसने भी जाने उनके इस प्रश्न का क्या अर्थ निकाल लिया कि विस्मय के साथ बोला, “कैसी बात कर रहे हैं, बाबू जी! मेरी ही बेटी।"
रमेश बाबू अपने को सम्भालते हुए और कुछ अपनी झेंप को मिटाते हुए बोले , “नहीं! मेरा तात्पर्य कि अपनी लड़की को तुम डाक्टर बना सके, इसी प्रसन्नता में वैसा कहा।“
“हाँ बाबू जी! मेरी लड़की ने एमबीबीएस किया है और उसका होने वाला पति भी एमडी है ....... और बाबू जी! मेरा लड़का इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष का छात्र है।”
रमेश बाबू किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े सोच रहे थे कि उससे अन्दर आकर बैठने को कहूँ कि न कहूँ कि वह स्वयम् बोला, “अच्छा बाबू जी! अब चलता हूँ..... अभी और कई कार्ड बाँटने हैं...... आप लोग आइयेगा अवश्य।"
रमेश बाबू ने भी फिर सोचा... आज अचानक अन्दर बैठने को कहने का आग्रह मात्र एक छलावा ही होगा। अत: औपचारिक नमस्ते कहकर उन्होंने उसे विदाई दे दी।
उस घटना के दो वर्षों के बाद जब वह पुनः रमेश बाबू के आवास पर आया तो ज्ञात हुआ कि उसका बेटा जर्मनी के किसी नामी कंपनी में कहीं कार्यरत था।
उत्सुक्तावश रमेश बाबू ने उससे प्रश्न कर ही डाला कि आखिर उसने अपनी सीमित आय में रहकर अपने बच्चों को वैसी उच्च शिक्षा कैसे दे डाली?
उसने कहना शुरू किया....“बाबू जी! इसकी बड़ी लम्बी कथा है , फिर भी कुछ आपको बताए देता हूँ। अख़बार, नौकरी के अतिरिक्त भी मैं ख़ाली समय में कुछ न कुछ कमा लेता था । साथ ही अपने दैनिक व्यय पर इतना कड़ा अंकुश कि भोजन में सब्जी के नाम पर रात में बाज़ार में बची खुची कद्दू, लौकी, बैंगन जैसी मौसमी सस्ती-मद्दी सब्जी को ही खरीदकर घर पर लाकर बनायी जाती थी। एक दिन मेरा लड़का परोसी गयी थाली की सामग्री देखकर रोने लगा और अपनी माँ से बोला, 'ये क्या रोज़ बस वही कद्दू, बैंगन, लौकी, तरोई जैसी नीरस सब्ज़ी... रूख़ा-सूख़ा ख़ाना...... ऊब गया हूँ इसे खाते-खाते। अपने मित्रों के घर जाता हूँ तो वहाँ मटर-पनीर, कोफ़्ते, दम आलू आदि....। और यहाँ कि बस क्या कहूँ!!'"
मैं सब सुन रहा था तो रहा न गया और मैं बड़े उदास मन से उसके पास जाकर बड़े प्यार से उसकी ओर देखा और फिर बोला, "पहले आँसू पोंछ फिर मैं आगे कुछ कहूँ।"
मेरे ऐसा कहने पर उसने अपने आँसू स्वयम् पोछ लिये। फिर मैं बोला, *"बेटा! सिर्फ़ अपनी थाली देख। दूसरे की देखेगा तो तेरी अपनी थाली भी चली जायेगी...... और सिर्फ़ अपनी ही थाली देखेगा तो क्या पता कि तेरी थाली किस स्तर तक अच्छी होती चली जाये। इस रूख़ी-सूख़ी थाली में मैं तेरा भविष्य देख रहा हूँ। इसका अनादर मत कर। इसमें जो कुछ भी परोसा गया है उसे मुस्करा कर खा ले ....।"
उसने फिर मुस्कराते हुए मेरी ओर देखा और जो कुछ भी परोसा गया था खा लिया। उसके बाद से मेरे किसी बच्चे ने मुझसे किसी भी प्रकार की कोई भी माँग नहीं रखी । बाबू जी! आज का दिन मेरे बच्चों के उसी त्याग औऱ तपस्या का परिणाम है।
उसकी बातों को रमेश बाबू बड़ी तन्मयता के साथ लगातार चुपचाप सुनते रहे औऱ बस यही सोचते रहे कि आज के बच्चों की कैसी मानसिकता है कि वे अपने अभिभावकों की हैसियत पर दृष्टि डाले बिना उन पर लगातार अपनी ऊटपटाँग माँगों का दबाव डालते रहते हैं....।
*💐💐शिक्षा💐💐*
बच्चों, अपने माता पिता के साथ हमेशा अछ्या व्यवहार करके ही आप अपने जीवन के लक्ष्यों को हासिल कर सकते है।उनसे ऐसी किसी प्रकार की मांग ना करें जो वो पूरी नही कर सकते,साथ ही माता पिता की भी जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों पर ध्यान देवे की उनकी संगति कैसी है।
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