शरीर को देव मन्दिर बनाएं
*********************
👉 शरीर क्या है? इसकी कितनी ही व्याख्याएँ हो सकती हैं। प्रत्यक्षतः यह मल-मूत्र की गठरी है। श्वास स्वेद आदि के द्वारा हर घड़ी दुर्गन्ध बाहर निकलती रहती है। इसे हर घड़ी स्वच्छ न रखा जाये तो थोड़े समय में ही इस गन्दगी के अम्बार लग जाते हैं। बीमार पड़ने की नौबत आ जाती है। दूसरों को समीप बिठाने या बैठने में घृणा लगने लगती है।
दूसरे अर्थों में इसे देखा जाय तो वह भगवान का सर्वोपरि उपहार है। इससे बहुमूल्य वस्तु जीवधारी को देने के लिए उनके पास और कोई है ही नहीं। यह स्वर्ग नसैनी है और वैतरणी की मझधार में डुबोने वाली नाव भी। सदुपयोग करने पर मनुष्य महामानव, देवता या ऋषि बन सकता है। दुरुपयोग करने पर प्रेत, पिशाच, दैत्य, दानव बन सकता है। नासमझों के लिए यह इतना भारी शकट है जिसे घसीटना दुष्कर पड़ता है। सुयोग्यों के लिए यह पुष्पक विमान है जिस पर बैठकर लोक-लोकान्तरों की सैर करते हुए ब्रह्मलोक तक जाया जा सकता है।
पं0 श्री राम शर्मा आचार्य
( अखण्ड ज्योति अक्टूबर १९८४ )