स्वाध्याय के लिए, आत्म चिन्तन के लिए,साधना के लिए "क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।" Gayatri pariwar images part 14



स्वाध्याय के लिए, आत्म चिन्तन के लिए,साधना के लिए "क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।"



✍️Akhand Jyoti - June, 1947 ✍️

स्वाध्याय के लिए, आत्म चिन्तन के लिए,साधना के लिए अक्सर लोग यह कहा करते हैं कि "क्या करें, फुरसत नहीं मिलती।" वे अपने को बहुत कार्य व्यस्त बताते हैं। जरूरी कामों से फुरसत पाये बिना भला श्राध्यात्मिक कामों के
लिए इन्हें किस प्रकार समय मिल सकता है ।





विचार करना चाहिए कि क्या वास्तव में उन्हें फुरसत नहीं मिलती ? क्या वास्तव में इतने कार्य व्यस्त होते हैं कि आत्म निर्माण के लिए जरा भी समय न निकाल सके ? जिन काम को वे जरूरी समझते हैं क्या वे वास्तव में इतने जरूरी होते हैं कि उनसे थोड़ा भी समय कम न किया जासके ? हम देखते हैं कि छापने को बहुत ही व्यस्त समझने वाले व्यक्ति भी नित्य काफी समय, गप शप में, मनोरंजन में, मटर गस्ती में, तथा आलस्य में व्यतीत करते हैं । उनके कार्यों का बहुत सा भाग ऐसा होता है जो उतना आवश्यक नहीं होता। फिर भी वे अपनी रुचि एवं दृष्टि के अनुसार उसे जरूरी समझते हैं ।







असल बात यह है- फुरसत न मिलना एक बहाना है । फुरसत न मिलने का असली मतलब है- 'दिलचस्पी न होगा । जिस काम में आदमी को दिलचस्पी नहीं होती, जो उतना श्रावश्यक, महत्व पूर्ण लाभ दायक एवं रुचिकर प्रतीत नहीं होता, उसके लिए कह दिया जाता है कि इस काम के लिए हमें फुरसत नहीं है।









अपना सगा बेटा बीमार पड़ जावे तो तिजारत के सारे कामों को एक तरफ हटा कर पिता, अपने बेटे की चिकित्सा में लग जाता है। विवाह शादी के दिनों में सोने के लिए पूरा समय नहीं मिलता । विश्राम के घंटों का कार्यक्रम घटाकर उस समय को शादी संबंधी कामों में लगाता है । सिनेमा, नाटक, स्वांग, तमाशे देखने में लोग रातें बिता देते हैं । इन सब कार्यों के लिए फुरसत मिल जाती है पर कथा कीर्तन के लिए समय नहीं मिलता । दैनिक कार्यक्रम को बारीकी से देखा जाय तो हर आदमी के पास थोड़ा बहुत समय फालतू अवश्य मिलेगा । वह चाहे तो आसानी से थोड़ा समय आत्म साधना के लिए निकाल सकता है।





प्रश्न रुचि का है। विचार करना चाहिए कि क्या आत्म साधना ऐसी निरर्थक चीज है जिसके लिए दुनियादारी के साधारण काम काजों में से बचाकर समय का एक टुकड़ा भी न फेंका जा सके ? घर में कुत्ते और भिखारी को थोड़ा बहुत भोजन दिया जाता है सोचना चाहिए कि आत्मा का महत्व क्या कुत्ते और भिखारी से भी कम है जिसकी झोली में समय का एक छोटा सा टकड़ा भी न डाला जा सके ! शरीर की भुख बुझाने के लिए हम तरह तरह के बढ़िया बढ़िया साधन जुटाते हैं, काफी समय खर्च करके भोजन सामग्री कमाते हैं, पर आत्मा की भूख बुझाने के लिए - स्वाध्याय, चिन्तन, मनन तथा साधन के लिए थोड़ा भी समय नहीं लगाया जा सकता ! क्या सचमुच आत्मा ऐसी तुच्छ वस्तु है, जिसकी शरीर के मुकाविले में इतनी उपेक्षा की जाय !



यह विचारणीय प्रश्न है। इसे इसी प्रकार अधर लटका रहने देने से काम न चलेगा । हमें सोचना होगा कि क्या हम शरीर मात्र है ? क्या हमारी प्राप्ति धनसंचय एवं इन्द्रिय भोगों से ही हो सकती है ? क्या मानव जीवन का उपयोग शरीर पोषण और धन उपार्जन मात्र है ? क्या सांसारिक उन्नति ही पूर्ण उन्नति है ? इन प्रश्नों पर विचार करने से पता चलेगा कि जो कुछ हम कर रहे हैं, वह ही पूर्ण नहीं है। आत्मोन्नति भी एक कार्य है और वह कार्य शरीर पोपल से कम महत्व का नहीं है ।




आत्मा की महत्ता पर विचार कीजिए आत्मोन्नति के महत्व को समझिए और तब निर्णय कीजिए कि आपको फुरसत है या नहीं !

✍️Akhand Jyoti - June, 1947 ✍️






















































































































































































































































































































































































































































































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