🌺 ऋषि चिंतन से 46 🌺 Rishi chintan se 46🌺
*🌞०१ जनवरी २०२३ रविवार🌞*
*🍁पौष शुक्लपक्ष दशमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*चरित्र ही संसार की सर्वोत्तम उपलब्धि*
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👉 *यह कम खेद का विषय नहीं है कि लोग "धन" की लिप्सा में "चरित्र" को भूलते जा रहे हैं ।* न जाने लोग इस सत्य को समझने का प्रयत्न क्यों नहीं करते कि *"चरित्र"* के अभाव में *"धन" एक भयानक अभिशाप बन जाता है ।*
👉 आवश्यकता से अधिक धन-लिप्सा पूरी करने में लोग इतने बावले हो जाते हैं कि उन्हें उचित-अनुचित का तनिक भी ध्यान नहीं रहता । इस प्रयत्न में वे यह भी भूल जाते हैं कि उनके ये कृत्य उनकी आत्मा को दिन-दिन गिराते हुए उनके लिए एक ज्वलंत नरक का निर्माण कर रहे हैं ।
👉 *निश्चित है जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक धन एकत्र करना चाहेगा तो उसे शोषक, क्रूर एवं अनुदार बनना ही होगा ।* उसे दूसरे का हिस्सा छीनकर, लूटकर अथवा ठगकर अपनी थैली मोटी करनी पड़ेगी । *उसे दया, सहानुभूति, सहायता, संवेदना एवं उदारता के मानवीय गुणों को तिलांजलि देकर अपने को पाषाण खंड की तरह नीरस और निर्मम बनाना होगा ।उसे अपने व्यवसाय में "बेईमानी" और कारोबार में "मक्कारी" को प्रश्रय देना होगा ।* धन के लिए मानवीय गुणों को छोड़कर इन आसुरी दुर्गुणों को अपने में लाने में लोग कौन सी बुद्धिमानी मानते हैं यह बात किसी भी विचारवान व्यक्ति की समझ में नहीं आ सकती ।
👉 *"चरित्र" की महत्ता "पैसे" से कहीं बढ़कर है । जिसने "धन" के लोभ में "चरित्र" खो दिया है अथवा "चरित्र" को खोकर "धन" कमाया है उसने मानो पाप ही कमाया है ।* चरित्रहीन व्यक्ति का संसार में कहीं भी आदर नहीं होता फिर उसका बैंक बैलेंस कितना ही लंबा चौड़ा क्यों ना हो ? *इसके विपरीत "चरित्रवान" व्यक्ति "निर्धनता" की दशा में भी सब जगह सम्मान की दृष्टि से ही देखा जाता है ।*
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*हम बदलें तो दुनियाँ बदले* पृष्ठ-११६
*🌹पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🌹*
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🌺 ऋषि चिंतन से 47 🌺 Rishi chintan se 47🌺
*🍂३१ दिसंबर २०२२ शनिवार🍂*
*🍁पौष शुक्लपक्ष नवमी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*अपने को जानें, भव बंधनों से छूटें*
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👉 *संसार में जानने को बहुत कुछ है, पर सबसे महत्वपूर्ण जानकारी अपने आप के संबंध की है ।* उसे जान लेने पर बाकी जानकारियाँ प्राप्त कर लेना सरल हो जाता है । *ज्ञान का आरंभ आत्मज्ञान से होता है । "जो अपने को नहीं जानता वह दूसरों को क्या जानेगा ?*
👉 आत्मज्ञान जहाँ कठिन है वहाँ सरल भी बहुत है । दूसरी वस्तुएँ दूर भी है और उनका सीधा संबंध भी अपने से नहीं है । किसी के द्वारा ही संसार में बिखरा हुआ ज्ञान पाया और जाना जा सकता है । पर अपना आपा सबसे निकट है, हम उसके अधिपति है ---आदि से अंत तक उस में समाए हुए हैं, *इस दृष्टि से "आत्मज्ञान" सबसे सरल भी है ।* शोध करने योग्य एक ही तथ्य है-- आविष्कृत किए जाने योग्य एक ही चमत्कार है-- वह है अपना---आपा । जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता।
👉 *बाहर की चीजों को ढूँढने में मन इसीलिए लगा रहता है कि अपने को ढूँढने के झंझट से बचा जा सके, क्योंकि जिस स्थिति में आज हम हैं उसमें अंधेरा दीखता है और अकेलापन ।* यह डरावनी स्थिति है । सुनसान को कौन पसंद करता है ? खालीपन किसे भाता है ? अपने को इस विपन्न स्थिति में डालकर स्वयं ही अपने को डरावना बना लिया है और उससे भयभीत होकर स्वयं ही भागते हैं । अपने को देखने खोजने और समझने की इच्छा इसी से नहीं होती और मन बहलाने के लिए बाहर की चीजों को ढूँढते फिरते हैं, *कैसी है यह विडंबना ?*
👉क्या वस्तुत: भीतर अंधेरा है ? क्या वस्तुत: हम अकेले और सूने हैं ? नहीं, प्रकाश का ज्योतिपुंज अपने भीतर विद्यमान है और एक पूरा संसार ही अपने भीतर विराजमान है । उसे पाने के लिए आवश्यक है कि मुँह.अपनी और हो । पीठ फेर लेने से तो सूर्य भी दिखाई नहीं पड़ता और सीमा और हिमालय तथा समुद्र भी दीखना बंद हो जाता है । *अपनी और पीठ करके खड़े हो जाएँ तो शून्य के अतिरिक्त और दीखेगा भी क्या ?*
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*मनुष्य चलता फिरता पेड़ नहीं है* पृष्ठ-११७
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
🌺 ऋषि चिंतन से 48 🌺 Rishi chintan se 48🌺
*🌴३० दिसम्बर २०२२ शुक्रवार 🌴*
*🍁पौष शुक्लपक्ष अष्टमी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*अंतरात्मा की पुकार अनसुनी न करें*
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👉 *मनुष्य में जहाँ तक शारीरिक-मानसिक स्तर की अनेक विशेषताएँ हैं, वहीं उसकी वरिष्ठता इस आधार पर भी है कि उसमें "अंतरात्मा" कहा जाने वाला एक विशेष तत्व पाया जाता है ।* उसमें उत्कृष्टता का समर्थन और निकृष्टता का विरोध करने की ऐसी क्षमता है जो अन्य किसी प्राणी में नहीं पाई जाती । जीव-जंतुओं में उनकी इच्छा या आवश्यकता की पूर्ति के निमित्त ही कई प्रकार की प्रेरणा उठती हैं, इसमें उन्हें नीति-अनीति से कोई मतलब नहीं रहता । उदारता नाम की वस्तु मात्र मादाओं में उस सीमा या समय तक पाई जाती है, जब तक कि उनकी संताने असमर्थ रहती हैं या स्वावलंबी नहीं बनतीं । इस अवधि के समाप्त होने पर उनका महत्व समाप्त हो जाता है । यौन कार्य के समय भी नरमादा में कुछ आकर्षण या सहयोग जैसा सौजन्य उभरता है, आवश्यकता पूर्ण होने पर वह भी आमतौर से विस्मृत होते देखा गया है, जोड़ा मिलाकर देर तक साथ-साथ रहने वाले तो कुछेक पक्षी ही पाए गए हैं ।
👉 *मनुष्य में स्नेह, सौजन्य, औचित्य, न्याय एवं उदार सद्भावना से भरे गुण पाए जाते हैं ।* यह किसी स्वार्थ या लाभ से प्रेरित होकर नहीं; *वरन् अंतराल की गहरी परतों से उद्भूत होता और इतना प्रखर रहता है कि आदर्शवादिता के निमित्त कष्ट सहने या घाटा उठाने के लिए भी तत्परता बरती जा सके ।* *"यही "अंतरात्मा" है, जो सत्कर्म करने पर भीतर ही भीतर प्रसन्न होती, गर्व-संतोष प्रकट करती हुई देखी जाती है ।* अनीति अपनाते समय अंतर्मन विक्षुब्ध होता है और आत्मप्रताड़ना की पीड़ा अपने आप सहनी पड़ती है । भर्त्सना, प्रताड़ना का भय न हो तो भी दुष्कर्म करते समय भीतर जी काटता कचोटता है -- *"यही "अंतरात्मा" है । उसका प्रोत्साहन यह रहता है कि आदर्शवादिता अपनाई जाए और दूसरों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ ।*
👉 तर्क या अर्थ विज्ञान की दृष्टि से *"अंतरात्मा" की पुकारें घाटा देने वाली और झंझट में फँसाने वाली होती हैं ।* इतने पर भी कुछ ऐसी उमंगे उठती हैं, जिनके कारण मनुष्य उस कष्ट को तप-सेवा, पुण्य-परमार्थ कहकर उत्साह पूर्वक सहन कर लेता है । जबकि पशु प्रवृत्ति में ऐसी उदारता अपनाने की कोई गुंजाइश नहीं है । यदि है भी तो इतनी उथली और क्षणिक, जिसके कारण कोई इस प्रकार का महत्वपूर्ण कदम नहीं उठा सकते । दूसरी और मनुष्य है जो इसी अंत:प्रेरणा से अनुप्राणित होकर त्याग बलिदान भरे उच्च स्तरीय उदाहरण प्रस्तुत करता और न्याय रक्षा के लिए निजी स्वार्थ न होने पर भी कष्ट झेलने का साहस करता देखा गया है । *"अंतरात्मा" ही मनुष्य में विराजमान परमात्मा का प्रतीक प्रतिनिधि माना गया है ।*
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*नर से नारायण बनने का प्रगति पथ* पृष्ठ-६१
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 49 🌺 Rishi chintan se 49 🌺
*🌴२९ दिसम्बर २०२२ बृहस्पतिवार 🌴*
*🍁पौष शुक्लपक्ष सप्तमी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*💦श्रेष्ठ व्यक्तित्व को कैसे पहचानें*
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👉 *अमेरिकी वैज्ञानिक "अब्राहम मैसलो" के अनुसार श्रेष्ठ व्यक्तित्व सहज स्वभाव के होते हैं, उनमें कृत्रिमता का अभाव पाया जाता है ।* बाहर एवं भीतर से एक जैसे होते हैं । उनकी भावना, विचारणा एवं क्रिया तीनों में ही एकरूपता पाई जाती है । जैसा विचार करते हैं, ह्रदय में वैसे ही भाव उठते तथा व्यवहार में उसी स्तर के कृत्य दिखाई देते हैं । उनका स्वभाव स्वच्छंद होता है, यह स्वच्छंदता -- प्रगतिशीलता की, श्रेष्ठ प्रयोजनों की पक्षधर होती है, पर उसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वे मर्यादा हीन होते हैं । *"स्वच्छंदता" से अभिप्राय उस स्वतंत्रता से है, जिसके सहारे वे परंपरागत कुरीतियों-रूढ़ियों का विरोध करने तथा तोड़ने में जरा भी नहीं हिचकते ।*
👉विचारों की सीमित परिधि में रहना उन्हें नहीं रुचता । नित नए प्रगतिशील विचारों का आह्वान करना उनकी विशेषता होती है । *समाज एवं देश को वे उपयोगी विचार देते हैं, साथ ही अनुपयोगी के खंडन में भी वे पीछे नहीं रहते ।* मौलिकता उनमें कूट-कूट कर भरी रहती है । अंधानुकरण को वे पिछड़ेपन का चिन्ह मानते तथा उससे सदा बचते हैं । अपनी राह स्वयं बनाते तथा बिना किसी की परवाह किए एकाकी चल पड़ते हैं । परंपरा वादियों के विरोध का उन पर प्रभाव नहीं पड़ता । *अपने मार्ग से वे संघर्षों के कारण विचलित नहीं होते ।* संकटों, संघर्षों एवं प्रतिकूलताओं को tvयह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि पिछले दिनों ढर्रे पर चले आ रहे चिंतन एवं मनुष्य के प्रवृत्ति मूलक प्रतिपादन से विपरीत जो नया वर्ग मनोवैज्ञानिकों का उभर आया है, उनमें अमेरिकी मनोवैज्ञानिक "अब्राहम मेसलो" का नाम वरिष्ठों में लिया जाता है ।* अपने प्रतिपादन के पक्ष में वे लिखते हैं कि ऐसे व्यक्तियों की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वे उन समस्याओं को ही महत्व देते तथा उन पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं, जिनमें देश एवं मानव जाति का हित जुड़ा हो । *उनका "अहम" "विराट" में विसर्जित हो जाता है ।* अपने 'स्व', उससे जुड़े स्वार्थों पर उनका कड़ा अंकुश रहता है । अपनी परिस्थितियों से वे संतुष्ट होते हैं । *प्रसिद्ध विचारक "कैप्टन शेटोवर" कहा करते थे, "इस संसार में हम रुचि तभी लेते हैं, जब हमारी रुचि स्वयं से प्रेरित होकर बाहर निकलने लगे ।* अर्थात इच्छाएंँ अतृप्त हो तो बाह्य समस्याएँ निरर्थक जान पड़ती हैं । *प्रकारांतर से यह भी कहा जा सकता है कि अपनी इच्छाओं को विगलित किए बिना "समाज" एवं "संसार" की सेवा संभव नहीं है ।*
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*नर से नारायण बनने का प्रगति पथ* पृष्ठ-३०
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 50 🌺 Rishi chintan se 50 🌺
*🥀 २८ दिसंबर २०२२ बुधवार 🥀*
*🍁पौष शुक्लपक्ष षष्ठी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*✌️➖द्विमुखी व्यक्तित्व➖✌️*
*🍂--Double Personality--🍂*
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👉 *"क्रिया", "विचारणा" एवं "भावना" के तीनों ही क्षेत्रों में एकरूपता हो तो मनुष्य असामान्य व्यक्तित्व का स्वामी बन सकता है ।* इसके विपरीत इन तीनो में एकता न होने पर विकासक्रम अवरूद्घ हो जाता है । *सामान्यतया इन तीनों में एकता कम ही स्थापित हो पाती है ।* प्रायः युग्म दो का बन जाता है । प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने वाला व्यक्तित्व उन्हीं के समन्वय से बनता है, जिसे ज्ञात व्यक्तित्व कहते हैं ।
👉 *अपने इस व्यक्तित्व का बोध अधिकांश व्यक्तियों को होता है ।* संभव है कि मनुष्य अपने ज्ञात स्वत्व में चरित्रवान, आदर्शवादी एवं सिद्धांतनिष्ठ हो, किंतु अज्ञात व्यक्तित्व में अनुदार, अनैतिक, क्रूर एवं व्यभिचारी हो सकता है । इसका प्रमाण कितने ही व्यक्तियों में मिलता रहता है । *नीति, सदाचार, आदर्श एवं सिद्धांत की बातें करते कितने ही व्यक्ति देखे जाते हैं, किंतु लोभ-मोह के, वासना-तृष्णा के अवसर आते ही वे उस प्रवाह में बह जाते हैं ।* इसका कारण यह होता है कि भीतरी अज्ञात व्यक्तित्व में निकृष्ट प्रवृतियों के संस्कार ही जड़ जमाए रहते हैं और अवसर उपस्थित होते ही प्रबल हो उठते तथा बाह्य प्रत्यक्ष व्यक्तित्व पर हावी हो जाते हैं । न चाहते हुए भी कितनी ही बार मनुष्य कितने ही ऐसे कार्य कर जाते हैं, जो सामाजिक एवं नैतिक दृष्टि से अनुचित होते हैं और जिसके लिए वे बाद में भारी पश्चाताप करते हैं । *यह अचेतन व्यक्तित्व का ही प्रभाव है कि मनुष्य अपने को अशक्त एवं असमर्थ पाता है ।* मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बाह्य-भीतरी सामंजस्य न होने से द्विमुखी व्यक्तित्व का निर्माण होता है । *"डबल पर्सनैलिटी"* को मनोवैज्ञानिक क्षेत्र में सभी प्रकार के मनोरोगों का कारण माना गया है ।
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*नर से नारायण बनने का प्रगति पथ* पृष्ठ-६९
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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