🌺 ऋषि चिंतन से 51 🌺 Rishi chintan se 51🌺
*🥀//२७ मार्च २०२३ सोमवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖अपने दोषों से➖*
*कठोरता पूर्वक लड़कर समाप्त करें*
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👉 *हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पाई जाती है ।* आँखें बाहर को देखती है, भीतर का कुछ पता नहीं । कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने ह्रदय और फेफड़ों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुंजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते । *इसी प्रकार दूसरे के "गुण"-"अवगुण" देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी, पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है, जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप से देखा और स्वीकारा जा सके ।* आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं, दोष तो एक भी नजर नहीं आता । *कोई दूसरा बताता है तो वह शत्रुवत् प्रतीत होता है ।* जिस कार्य को कभी भी न किया हो, वह बन ही नहीं पड़ता । *"आत्म-समीक्षा" कोई कब करता है ?* अस्तु वह प्रक्रिया ही कुंठित हो जाती है । अपने दोष ढूँढने में काफी कठोरता बरतने की क्षमता उत्पन्न हो जाए तो वस्तु स्थिति समझने और सुधार के लिए प्रयत्न करने का अगला चरण उठाने में सुविधा होती है ।
👉 *दोष-दुर्गुणों के सुधारने के लिए अपने आप से संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं ।* गीता में जिस महाभारत का उल्लेख और जिसमें भगवान ने हठपूर्वक जो कार्य नियोजित किया था, वह अंत:संघर्ष ही था । *भगवान के अवतरण में अधर्म के नाश और धर्म के संस्थापन की प्रतिज्ञा जुड़ी हुई है ।* अवतार इसी प्रयोजन के लिए होते हैं । *अंतःकरण में जब भी भगवान अवतरित होते हैं, तब विचार और व्यवहार के साथ लिपटकर संबंधियों जैसी प्रिय लगने वाली असुरता से लड़ने के लिए कटिबद्ध होना पड़ता है ।* हर अवतार को असुरों को प्राप्त करने और देवत्व को जिताने का कार्य अनिवार्य रूप से करना पड़ा है । *इस प्रक्रिया को वैयक्तिक जीवन की दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन कह सकते हैं ।* ईश्वर की दिव्य ज्योति जिस भी अंतरात्मा में प्रकट होगी उसमें प्रथम स्फुरणा यही होगी कि *जीवन के जिस भी क्षेत्र में दुष्ट दुर्बुद्धि छिपी पड़ी है और दुष्कर्म के लिए ललचाती है, उसे ताड़का, सूर्पणखा, पूतना की तरह निरस्त कर दिया जाए ।*
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*😌साधना से सिद्धि😌- पृष्ठ- ३७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 52 🌺 Rishi chintan se 52🌺
*🔆२७ दिसंबर २०२२ बुधवार🔆*
*🍁➖पौष शुक्ल पक्ष➖🍁*
*💦〰️चतुर्थी/पंचमी २०७९〰️💦*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*❗➖देवासुर संग्राम➖❗*
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👉 *मनुष्य के भीतर दो व्यक्तित्वों का संघर्ष चलता रहा है ।* पौराणिक भाषा में जिसे *देवासुर संग्राम* कहा जा सकता है । अमुक स्थान में *"देवता"* निवास करते हैं और अमुक में *"असुर"* तथा उनके बीच युद्ध होते रहते हैं-- का वर्णन भारतीय धर्म पुराणों में ही नहीं विश्व के अन्यान्य धर्म ग्रंथों में भी आता है । यह व्यक्तित्व के दो भिन्न स्वरूपों का आलंकारिक वर्णन चित्रण है जो यह दर्शाता है कि *"देवता"* और *"असुर"* के बीच अर्थात मनुष्य के भीतर काम करने वाले दो व्यक्तित्वों के बीच परस्पर मतभेद एवं संघर्ष होने पर व्यक्तित्व छिन्न-भिन्न हो जाता है । विकास अवरुद्ध हो जाता है तथा अनेकों प्रकार के शारीरिक मानसिक विक्षोभ उत्पन्न होते हैं । पुराणों में वर्णन आता है कि *"देवता"* और *"असुर"* जब तक एक दूसरे से अलग रहे, असहयोग करते तथा लड़ते रहे; परिस्थितियाँ विपन्न और प्रतिकूल बनी रही, सर्वत्र अव्यवस्था फैली। दोनों ने जब परस्पर सहयोग करना स्वीकारा तो समुद्र मंथन जैसे दुस्तर एवं कठिन काम का सिलसिला चल पड़ा, जिसकी परिणति चौदह दिव्य रत्नों की उपलब्धियों के रूप में सामने आई जिसे प्राप्त कर विश्व वसुधा धन्य हो गई ।
👉 *मनुष्य के मानसिक जगत में चलने वाले संग्राम का यह आलंकारिक चित्रण है ।* संघर्ष रुकने, देव और असुर रूपी *दो व्यक्तित्वों के बीच सहयोग का क्रम चलते ही मनुष्य के सर्वांगीण विकास का दौर द्रुत गति से चल पड़ता है ।*
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*नर से नारायण बनने का प्रगति पथ* पृष्ठ-9
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
🌺 ऋषि चिंतन से 53🌺 Rishi chintan se 53🌺
*🌴२६ दिसम्बर २०२२ सोमवार 🌴*
*🍁पौष शुक्लपक्ष तृतीया२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*सुसंस्कृत व्यक्तियों का निर्माण*
*वर्तमान की महती आवश्यकता*
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👉 सुसंस्कारिता जिसे मिली उसने वह सब कुछ पा लिया जिसे पाकर मनुष्य जीवन का अमृतोपम रसास्वादन करने का अवसर मिलता है । *"आध्यात्मिकता", "दृष्टिकोण की उत्कृष्टता" और "धार्मिकता", "व्यवहार की शालीनता" को ही कहते हैं ।* शब्दों की ऊँचाई से किसी रहस्यवादी कल्पना में भटकने की आवश्यकता नहीं है । जिन भौतिक सिद्धियों का और आध्यात्मिक ऋद्धियों का वर्णन चमत्कारी एवं आलंकारिक भाषा में किया गया है, वे समस्त विभूतियाँ मात्र सुसंस्कारिता की ही देन है । समुन्नत, सम्मानित और समृद्ध जीवन वस्तुतः सुसंस्कारों के कल्पवृक्ष का ही फलता-फूलता स्वरुप है ।
👉 *अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता भी "सुसंस्कृत व्यक्तियों" की है, कहना चाहिए "सुसंस्कारिता के अभिवर्धन" की है ।* इन दिनों व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में जितनी भी समस्याएँ व्याप्त है, उनका एकमात्र कारण सुसंस्कृत व्यक्तियों का अभाव या सुसंस्कारिता के अभिवर्धन के लिए उपयुक्त वातावरण का न मिल पाना है । इसके अभाव में ही व्यक्तिगत जीवन में दोष-दुर्गुण, अनीति अवांछनीयता और उनके कारण कई प्रकार के कष्ट-क्लेश तथा समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तथा सामाजिक जीवन में अव्यवस्था, भ्रष्टता, आतंक और असुरक्षा व्यापती है ।
👉 व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में व्याप्त कष्ट कठिनाइयों और समस्याओं के समाधान का एक ही उपाय है कि *"समाज में सुसंस्कारिता का वातावरण उत्पन्न किया जाए* ताकि लोगों को सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन मिले । इसे यों भी कहा जा सकता है -- सुसंस्कृत व्यक्तियों का निर्माण, सुसंस्कारिता का अभिवर्धन अपने युग की महती आवश्यकता है । यह कार्य एक सीमा तक तो प्रचार माध्यम से भी पूरा हो सकता है पर स्थायित्व लाने की अपेक्षा हो तो इतने मात्र से यह आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती । *इसके लिए अंत:चेतना की मर्मस्थल तक "सुसंस्कारिता" को पहुँचाना होगा ।*
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*परिवारों में सुसंस्कारिता का वातावरण* पृष्ठ-०६
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 54 🌺 Rishi chintan se 54🌺
*🌴२५ दिसम्बर २०२२ रविवार 🌴*
*🍁पौष शुक्लपक्ष द्वितीया२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖जीवन की मूल संपदा➖*
*🔆❗परिष्कृत व्यक्तित्व❗🔆*
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👉 *"व्यक्तित्व" ही मनुष्य की मूल संपदा है ।* इसकी श्रेष्ठता और निकृष्टता के आधार पर ही किसी व्यक्ति का श्रेष्ठ या निकृष्ट होना निर्भर है । *प्रश्न उठता है कि यह "व्यक्तित्व" क्या है ?* मनुष्य जो दिखाई देता है, आचरण, रहन-सहन व बोल-चाल व्यवहार का जैसा जो कुछ प्रभाव छोड़ता है क्या वही व्यक्तित्व है ?इसका उत्तर निश्चित ही "नही" में है । *"व्यक्तित्व" में ये सब बातें समाहित तो है, पर वह इन सबके जोड़ से भी ऊपर बहुत कुछ भिन्न है ।* आँख से देखने पर तो व्यक्तित्व शरीर की बनावट, आकर्षक साज-सज्जा, आकर्षक चाल-ढाल और शिष्टाचार पर अवलंबित दीखता है, पर परख की दृष्टि जब गहराई में प्रवेश करती है, *तो गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं चरित्र का समुच्चय ही "व्यक्तित्व" की कसौटी बन जाता है ।*
👉 सम्मानित और तिरस्कृत, समुन्नत और पतित, प्रखर और पिछड़े लोगों के बीच पाया जाने वाला अंतर तो परिस्थितिजन्य दीखता है, पर वस्तुतः यह विभेद अंत:स्थिति का होता है । यह अंत:स्थिति जो मान्यता-अभिरुचि और आदत के रूप में समूचे अंतराल पर कब्जा जमाए बैठी है । अंत:क्षेत्र से उठने वाली सुगंध अथवा दुर्गंध ही समीपवर्ती वातावरण को उल्लसित एवं कलुषित बनाती है ।अंतराल ही बाह्य जगत में प्रतिबिंबित होता है और स्वर्गीय एवं नारकीय प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करता है । *अपना ही स्वभाव समीपवर्ती लोगों के साथ सहयोग एवं विग्रह के अवसर रचता और इन्हें चित्र-विचित्र घटनाक्रर्मों के रुप में सामने ला खड़ा करता है ।*
👉 *जीवन का सबसे बड़ा उपार्जन एवं वैभव परिष्कृत "व्यक्तित्व" ही है ।* पग-पग पर मानवीय अनुदानों और दैवी वरदानों के उपहार बरसाने वाला सौभाग्य और कुछ नहीं मनुष्य का स्व उपार्जित व्यक्तित्व ही है । कोई किसी को यदि वस्तुतः कोई ठोस अनुदान दे सकता है तो वह एक ही अनुग्रह है कि *व्यक्तित्व को परिष्कृत* करने में सहायता की जाए । अन्य संपदाएँ ऐसी हैं, जिन्हें कोई किसी को कितने ही बडे़ परिमाण में देकर भी वास्तविक साधन नहीं कर सकता । उपकार वही सार्थक है, जो *"व्यक्तित्व"* को विकसित करने की सहायता के रूप में लिया या दिया जा सके । अनुग्रह वही धन्य है जो प्रखरता और प्रतिभा निखारने में सहयोग प्रदान करें । *सौभाग्यशाली वे हैं जिनने "सुसंस्कृत" लोगों का सान्निध्य पाया ।*
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*परिवारों में सुसंस्कारिता का वातावरण* पृष्ठ-०४
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 55 🌺 Rishi chintan se 55 🌺
*🥀//२८ मार्च २०२३ मंगलवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष सप्तमी २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*अपनी बुरी आदतों से लड़िए*
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👉 *अभ्यस्त कुसंस्कार आदत बन जाते हैं और व्यवहार में अनायास ही उभर उभर आते रहते हैं ।* इनके लिए भी विचार संघर्ष की तरह कर्म संघर्ष की नीति अपनानी पड़ती है । थल सेना से थल सेना लड़ती है और नभ सेना के मुकाबले नभ सेना भेजी जाती है । *जिस प्रकार कैदियों को नयी बदमाशी खड़ी कर देने से रोकने के लिए जेल के चौकीदार उन पर हर घड़ी कड़ी नजर रखते हैं, वही नीति "दुर्बुद्धि" पर ही नहीं, "दुष्प्रवृत्तियों" पर भी रखनी पड़ती है ।* जो भी उभरे उसी से संघर्ष खड़ा कर दिया जाए । *"बुरी आदतें"* जब कार्यांवित होने के लिए मचल रही हों तो उनके स्थान पर *"उचित सत्कर्म"* ही करने का आग्रह खड़ा कर देना चाहिए और मनोबल पूर्वक *अनुचित को दबाने और उचित को अपनाने* का ही हठ ठान लेना चाहिए । *"मनोबल दुर्बल"* होगा तो ही हारना पड़ेगा अन्यथा *"सत्साहस"* जुटा लेने पर श्रेष्ठ स्थापना से सफलता ही मिलती है । घर में बच्चे जाग रहे हों, बुड्ढे खाँस रहे हो तो मजबूत चोर के पाँव काँपने लगते हैं और वह उलटे पैरों लौट जाता है । *ऐसा ही तब होता है, जब दुष्प्रवृत्तियों की तुलना में सत्प्रवृत्तियों को साहस पूर्वक अड़ने और लड़ने के लिए खड़ा कर दिया जाता है ।*
👉 छोटी बुरी आदतों से लड़ाई आरंभ करनी चाहिए और उनसे सरलता पूर्वक सफलता प्राप्त करते हुए क्रमशः *अधिक कड़ी, अधिक पुरानी और अधिक प्रिय बुरी आदतों से लड़ाई लड़ते रहना चाहिए ।* छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से साहस एवं आत्म-विश्वास बढ़ता है और इस आधार पर अवांछनीयताओं के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संस्थापन में सफलता मिलती चली जाती है । *यह प्रयास देर तक जारी रहना चाहिए ।* थोड़ी सी सफलता से निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए । *लाखों योनियों के कुसंस्कार विचार मात्र से समाप्त नहीं हो जाते । वे मार खाकर अंतर्मन के किसी कोने में जा छिपते हैं और अवसर पाते ही छापामारों की तरह घातक आक्रमण करते हैं । इनसे सतत सजग रहने की आवश्यकता है । यह सतर्कता अनवरत रूप से "आजन्म" बरती जानी चाहिए कि कहीं बेखबर पाकर "दुर्बुद्धि" और "दुष्प्रवृत्ति" की घातें फिर न पनपने लगे ।*
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*😌साधना से सिद्धि😌- पृष्ठ- ३९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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