ऋषि चिंतन से भाग 5 दृष्टिकोण बदले ,उत्कृष्टता अपनाएँ

🌺 ऋषि चिंतन से 21 🌺 Rishi chintan se 21🌺



*🥀२१ जनवरी २०२३ शनिवार🥀*
*🍁माघकृष्णपक्षअमावस्या२०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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    *➖👁️दृष्टिकोण बदलें👁️➖*
   *➖👌🏽उत्कृष्टता अपनाएँ👌🏽➖*
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👉 *"दृष्टिकोण" का परिवर्तन ही व्यक्ति परिवर्तन कहा जाता है ।* बाहरी कामों, व्यवस्थाओं, गतिविधियों को, परिस्थितियों को तो बलपूर्वक भी बदला जा सकता है । भय, दंड या प्रलोभन के वशीभूत होकर लोग वह कार्य करते हैं, जो वस्तुत: उन्हें करने नहीं होते, पर उनमें कोई स्थायित्व नहीं होता । सरकारी कानून, सामाजिक प्रतिबंधों या भावुकता को उभारकर जोश, आवेश में बुराइयों की रोकथाम की जा सकती है, किंतु होती अस्थायी ही है । *जब अंत:करण बदले, हृदय परिवर्तन हो और दृष्टिकोण में सुधार हो, इसी में स्थिरता भी सन्निहित है और वास्तविकता भी ।*
👉 *"दृष्टिकोण" का परिवर्तन ही सबसे बड़ा परिवर्तन है ।* अपनी सीमा के संकीर्ण दायरे को बढ़ाकर विशाल क्षेत्र विकसित करने का नाम ही विकास है । *"वासना" और "तृष्णा" की "क्षुद्रता" की "मोह निद्रा" की उपेक्षा करते हुए "कर्तव्य पालन" और "परमार्थ" की आकांक्षाएँ जागृत करना ही "जागरण" है ।* कुविचारों और दुर्भावनाओं के, काम, क्रोध, लोभ, मोह के बंधनों को तोड़ डालना-- *इसी का नाम मुक्ति है ।* *"संतोष" "संयम" और "सच्चाई" "सज्जनता" और "शांति" की संतुलित मनोभूमि बनाए रखना--- "यही स्वर्ग है ।* यह अपनी धरती स्वर्ग से श्रेष्ठ है, *यह अपना मानव शरीर देवताओं से उत्तम है ।* यह मनुष्य जन्म ईश्वर का हमें सबसे बड़ा अनुग्रह और वरदान है । इस अलभ्य अवसर का, इस परम सौभाग्य का समुचित सदुपयोग करते हुए *वह करना चाहिए, जो करने योग्य है । वह सोचना चाहिए, जो सोचने योग्य है । वह चाहना चाहिए, जो चाहने योग्य है । उस मार्ग पर चलना चाहिए, जो चलने योग्य है ।*
👉 हमें अपनी असुरता को देवत्व में परिणत करने का प्रयत्न करना चाहिए, ताकि नारकीय अंतर्द्वंदों, और शोक-संतापों से छुटकारा पाकर शांति एवं संतोष का स्वर्गोपम सुख निरंतर उपलब्ध करते रहना संभव हो सके । *"दृष्टिकोण" बदलने से जीवन बदल जाता और युग बदल जाता है ।* असुरता देवत्व में बदल सकती है, नर्क को स्वर्ग में परिणत किया जा सकता है, *यदि हमारा दृष्टिकोण बदले ।* *इस बदलने की विशाल कार्यपद्धति को बिगुल बजाते हुए हम "युग निर्माण" के लिए अग्रसर होते हैं । आज हम थोड़े लोग बढ़ें, तो कल इन्हीं पद चिन्हों पर सारी दुनिया को चलना पड़ेगा ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले, पृष्ठ-२९*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 22 🌺 Rishi chintan se 22🌺




*🥀२० जनवरी २०२३ शुक्रवार🥀*
   *🍁➖माघ कृष्णपक्ष➖🍁*
  *🍁त्रयोदशी/चतुर्दशी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*〰️आओ देवत्व की ओर चलें〰️*
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👉 *"असुर", "मनुष्य" और "देवता" देखने में एक ही आकृति के होते हैं । अंतर उनकी प्रकृति में होता है ।* *"असुर" वे हैं,* जो अपना छोटा स्वार्थ साधने के लिए दूसरों का बड़े से बड़ा अहित कर सकते हैं, *"मनुष्य वे हैं"*, जो अपना *"स्वार्थ"* तो साधते हैं पर *"उचित अनुचित"* का ध्यान रखते हैं, *"पाप से डरते"* और अपनी नियत *"मर्यादाओं"* का उल्लंघन नहीं करते । *"देवता" वे हैं जो अपने "अधिकारों" को भूल कर "कर्तव्य" पालन का ही स्मरण रखते हैं ।* अपनी शक्तियों को परमार्थ और परोपकार में अधिक व्यय करते हैं और इसी में अपना सच्चा स्वार्थ साधन मानते हैं । *असुरों के दृष्टिकोण में "दुष्टता", "मनुष्य" में "मर्यादा" और "देवताओं" में "उदारता" भरी रहती है ।* दृष्टिकोण के इस अंतर के कारण ही उनके बुरे भले कार्यों की श्रंखला सामने आती है और उसी आधार पर वे निंदा-प्रशंसा के पात्र बनते हैं । *"सद्गति" और "दुर्गति" भी इन्हीं के आधारों पर होती है ।*
👉 व्यापक बुराइयों की अधिक चर्चा करने से कुछ लाभ नहीं । वस्तुस्थिति को हम सब जानते ही हैं, इस चर्चा से चित्त में क्षोभ और संताप ही उत्पन्न होता है । *यों भले मनुष्यों का भी अभाव नहीं है । वे प्रत्येक क्षेत्र में, बदनाम क्षेत्रों में भी मौजूद रहते हैं, पर उनकी संख्या नगण्य है ।*
👉 प्रश्न यह है कि क्या इस बढ़ती हुई असुरता को इसी रूप में बढ़ने दिया जाये और सर्वनाश की घड़ी के लिए निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते रहा जाए ? अथवा स्थिति को सुधारने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाए ? *"विवेक", "कर्तव्य", "धर्म" और "पुरुषार्थ" की चुनौती यह है कि निष्क्रियता उचित नहीं । शांति का संतुलन बनाए रखने के लिए, धर्म और कल्याण के रक्षा के लिए, हमें कुछ करना ही चाहिए ।* जिस दिशा में अपने कदम अब तक तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं, उसी सर्वनाश की ओर अब इस दौड़ को बंद किया ही जाना चाहिए । असुरता के विरुद्ध विवेक की इसी प्रतिक्रिया का नाम है -- *"युग निर्माण योजना"*
👉 *प्रस्तुत योजना के अंतर्गत हमें मानव जीवन का उद्देश्य, आदर्श, तत्वज्ञान और व्यवहार सीखना पड़ेगा ।* फूहड़पन से जिंदगी जीना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं । चौरासी लाख योनियों में करोड़ों वर्ष बाद मिले हुए इस अवसर को यों ही गंदे'संदे ढंग से जी डालना, यह भी कोई समझदारी की बात है । जब थोड़ी सी उपयोगी और कीमती चीजों को संभाल कर रखने और उपयोग करने की बात सोची जाती है, तो मानव जीवन जैसे सुर दुर्लभ अवसर को ऐसी उपेक्षा अस्त-व्यस्तता के साथ क्यों जिया जाना चाहिए ? *उचित यही है कि हम "जीवन विद्या" को सीखें और जिंदगी का स्वरूप समझने और उसके सदुपयोग का प्रयत्न करें ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले, पृष्ठ-२४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 23 🌺 Rishi chintan se 23🌺



*🥀१९ जनवरी २०२३ गुरुवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्षद्वादशी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*दूसरों पर दोषारोपण करने से पहले*
*अपने स्वयं को भी भलीभाँति जाँचें*
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👉 बहुधा हम सब यह अभियोग करते रहते हैं कि संसार बहुत खराब हो गया है । जिसे देखो वह वैसे ही कार्य करने में लगा हुआ है, जो संसार की दु:ख-वृद्धि करते हैं, *पर क्या कभी हम यह भी सोच पाते हैं कि संसार में दु:ख और कष्ट बढाने में हमारा भी कुछ हाथ है या नहीं ?*
👉 *सच्ची बात यह है कि हमारी शिकायत ही इस बात का प्रमाण है कि हम स्वयं ही अपने में पूरी तरह से अच्छे नहीं हैं ।* यदि हमारी मनोभूमि स्वच्छ और उच्च स्तर की हो तो हमें संसार न तो बुरा ही दीख पड़े और न उससे प्रभावित होकर हम दु:खी हों ।
👉 *जिस मनुष्य का स्वभाव जैसा होता है, उसी प्रकार की प्रतिक्रियाएँ ही उसे प्रभावित करती हैं और उसी प्रकार के तत्व वह ग्रहण करता है ।* किसी दूसरे के क्रोध का प्रभाव उसी पर होगा जो स्वयं भी क्रोधी होगा । शांतचित्त और संतुलित मस्तिष्क वाले मनस्वी व्यक्तियों पर उसका न तो कोई प्रभाव पड़ता है और न उन पर तदनुरूप प्रतिक्रिया होती है । *जिसने अपने तामस पर विजय प्राप्त कर ली होती है, वह अपने प्रति दूसरे की बुराई देखकर भी शांत बना रहता है ।* दूसरे की क्रोधाग्नि को अपनी शीतल वाणी और मधुर व्यवहार से बुझाने का प्रयत्न किया करता है ।
👉 *यह एक निर्विवाद सत्य है कि जो जैसा होता है, संसार का स्वरुप उसे वैसा ही दिखाई देता है । यह संसार एक दर्पण के समान है, इसको जो देखता है, उसे अपना स्वरूप ही दिखाई देता है । *"सज्जन" व्यक्ति को यही संसार "सज्जनों" और "दुर्जन" व्यक्ति को "दुर्जनों" से भरा दीखता है ।* इसलिए शिकायत करने से पूर्व हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि हम पूरी तरह भले हैं या नहीं ? निश्चय ही हममें बुराइयाँ हैं, तभी संसार हमें बुरा दीखता है । यदि हमारी मनोभूमि उसकी बुराइयाँ ग्रहण करने योग्य न हो तो हमें यह संसार कदापि बुरा दिखलाई न पड़े ।
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*हम बदलें तो दुनिया बदले, पृष्ठ-१०३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 24 🌺 Rishi chintan se 24🌺



*🥀१८ जनवरी २०२३ बुधवार🥀*
*🍁माघकृष्णपक्षएकादशी२०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*☝️विरोधियों की उपेक्षा कीजिए*
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👉 *नदी को सागर तक पहुँचने में अनेकों अवरोधों एवं रुकावटों का सामना करना पड़ता है ।* बड़ी-बड़ी चट्टानें उसके मार्ग में आती हैं और रुकावटें डालती हैं, लेकिन इन अवरोधों से टकराकर नदी के प्रवाह में तेज उत्तेजना पैदा होती है । यह अपने बहने के तारतम्य को नहीं तोड़ती और एक क्षण ऐसा आता है, जब उन अवरोधों को अपने आप हट जाना पड़ता है । नदी के मार्ग से या उसके प्रवाह में टूट फूटकर बह जाना पड़ता है ।
 👉 *मानव जीवन में भी अंत तक अवरोधों का सामना करना पड़ता है ।* जितने उच्च लक्ष्य, कार्यक्रम होंगे, उतने ही अनुपात में व्यक्ति को विरोध का सामना करना पड़ता है । *इसलिए जीवन को "संघर्षमय" कहा गया है ।* कोई भी व्यक्ति अथवा समाज जब किसी महान लक्ष्य की ओर अग्रसर होने लगता है, तो दूसरे लोग अकारण ही विरोध करने लगते हैं, उसके मार्ग में रुकावटें डालते हैं, उपहास करते हैं । प्रत्येक प्रगतिशील व्यक्ति को तो अवश्य ही अपने जीवन में इन तत्वों का सामना करना पड़ता है, किंतु मनस्वी लोग इन विरोधों, रुकावटों को ही अपनी प्रगति और सफलता की फसल के लिए खाद बना लेते हैं । *कठिनाई और विरोध का अवसर आने से ही मनुष्य के पराक्रम और आत्मविश्वास का विकास होता है ।* विरोध उत्साहियों के उत्साह को कई गुना बढ़ा देते हैं । *वस्तुतः विरोधी हमारी सहायता करता है, क्योंकि उससे हमारे गुणों का विकास होता है । हममें उत्साह और आत्मस्फूर्ति की वृद्धि होती है ।*
👉 बहुत से लोग विरोध के सामने आत्मसमर्पण कर बैठते हैं । हार मान लेते हैं और आगे बढ़ने के विचार ही छोड़ देते हैं ।लेकिन यह एक मानसिक कमजोरी ही मानी जाएगी । *विरोध को अनुकूलता में ढाल लेना एक महत्वपूर्ण सफलता है । जो इस सीमा को पार कर लेते हैं, वे जीवन में सफलता की मंजिल को भी पार कर ही लेते हैं ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-१४७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 25 🌺 Rishi chintan se 25🌺




*🥀१७ जनवरी २०२३ मंगलवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष दशमी २०७९🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖प्रगतिशील समाज के लिए➖*
*भाव संवेदना का जागरण अनिवार्य*
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👉 *पदार्थ-संपदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, पर यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है ।* कलम बनाने के काम आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है । बलिष्ठता, संपदा, शिक्षा के संबंध में भी यही बात है । *उसके सत्परिणाम तभी देखे जा सकते हैं, जब सदुपयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि सक्रिय हो ।* यहाँ इतना और भी समझ लेना चाहिए कि नीति निष्ठा और समाज निष्ठा का अवलंबन लेना भी पर्याप्त नहीं है, *उनमें "भाव संवेदनाओं" का पावन प्रवाह ही भले बुरे लगने वाले ज्वार-भाटे लाता रहा है ।* 
👉मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं । पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है । *फिर अच्छे खासे मस्तिष्क आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते ? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है ?* उनसे सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पढ़ना तो दूर, उल्टे संकटों, विपन्नताओं विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है । इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भावनाओं की गहराई में उतरना होगा । *यह तथ्य समझना होगा कि अंतःकरण में श्रद्धा, संवेदना की शीतलता, सरसता भरी रहने पर ही सदाशयता का वातावरण बनता है । मानसिकता तो उस चेरी की तरह जो अंत:श्रद्धा रूपी रानी की सेवा में हर घड़ी हुकुम बजाने के लिए खड़ी रहती है ।*
👉 स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उससे हुई बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है । *लोकमंगल के लिए, आत्म परिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण कण समर्पित करना पड़ा है । इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उनके आधार पर विकसित होने वाला उच्च स्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है । महानता इसी को कहते हैं ।* इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देव मानव या देवदूत कहलाते हैं । *उन्हीं के प्रबल पुरुषार्थ के आधार पर शालीनता का वातावरण बनता और समस्त संसार इसी आधार पर सुंदर व समुन्नत बन पड़ता है ।*
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*//सतयुग की वापसी// पृष्ठ-२१*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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