🌺 ऋषि चिंतन से 31 🌺 Rishi chintan se 31🌺
*🥀११ जनवरी २०२३ बुधवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष चतुर्थी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*परिस्थितियों से तालमेल बैठाइए*
*➖और➖*
*🙂🥀---प्रसन्न रहिए---🥀🙂*
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👉 *धन, वासना और अहंता की उचित और व्यवस्थित प्रगति तो विवेक एवं दूरदर्शिता के आधार पर ही संभव हो सकती है ।* इसके लिए यह आवश्यक है कि हम आज की स्थिति पर संतोष अनुभव करते हुए मन को प्रसन्नता से, आशा से, उत्साह से परिपूर्ण रखें, जिससे प्रगति का कठिन मार्ग पार करते हुए हम दिन-दिन ऊँचे उठ सकने की स्थिति को प्राप्त कर सकें । *असंतुष्ट व्यक्ति एक प्रकार का उन्मत्त होता है, जो स्वयं परेशान रहता है और दूसरों को भी परेशान करता है ।* परिस्थितियों के साथ समझौता करके ही इस संसार में सबको काम चलाना पड़ता है । परिस्थितियों को अपने अनुरूप ढालने में लगा रहना चाहिए, पर साथ ही अपने को भी परिस्थितियों के अनुरूप ढालना चाहिए ।
👉 *हमें तीनों एषणाओं से बचते हुए आनंद-उल्लास का, प्रेम और संतोष का नैतिक जीवन व्यतीत करने की ही इच्छा करनी चाहिए ।* बड़ा आदमी बनने की महत्वाकांक्षा वाले व्यक्ति इस संसार में अत्यधिक हानिकारक सिद्ध होते हैं । आततायी उपद्रवकारियों की तरह वे दूसरों को पद दलित करते हुए उनकी लाशों पर ही चढ़कर बड़े बन पाते हैं । *इसलिए भौतिक विभूतियों की तृष्णा को अध्यात्मवाद की दृष्टि से सदा ही हेय माना जाता रहा है ।* उसे रोकने को और नियंत्रित रखने के लिए पग-पग पर शिक्षण दिया जाता रहा है । *समाज का संतुलन महत्वकांक्षी लोग ही बिगाड़ते हैं*, इसलिए इन मानसिक रोगियों से ऐसे ही सतर्क रहना चाहिए जैसे ईट मारने वाले पागल से बचा जाता है ।
👉 *आज "धन" के लिए हर व्यक्ति प्यासा सा फिरता है । "धन", "अधिक धन",."और अधिक धन" यह एक ही पुकार हर दिल और दिमाग में से उठती सुनाई देती है ।* धर्मध्वजी संत-महंतों से लेकर जेब कट और चोर-डाकुओं तक हर वर्ग के लोग धन की आकांक्षा से अपने चरखे चलाते रहते हैं । *विचारणीय बात यह है कि क्या "धन" की उतनी ही आवश्यकता है, क्या गरीबी इस सीमा तक पहुँच गई है कि मनुष्य को निरंतर "धन" के लिए उद्विग्न हुए बिना काम न चले ।* बात ऐसी बिल्कुल भी नहीं है । भगवान ने इतनी वस्तुएँ और साधन सामग्री इस धरती पर पहले से ही पैदा कर रखी है कि मिल बाँटकर मनुष्य अपना गुजारा कर सके और शांति तथा आनंद के साथ हिल-मिलकर प्रेम पूर्वक जीवन यापन करते हुए लक्ष्य प्राप्ति के लिए अग्रसर हो सके ।
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*असंतोष की आग से बचिए पृष्ठ-७*
*🌱पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🌱*
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🌺 ऋषि चिंतन से 32 🌺 Rishi chintan se 32🌺
*🥀१० जनवरी २०२३ मंगलवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष तृतीया २०७९🍁*
*👉आज व्रत की चतुर्थी है ..........*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*//-सामाजिक प्रगति के लिए-//*
*🍁--धर्म बुद्धि आवश्यक--🍁*
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👉 मनुष्य हाड़-मांस का पुतला, एक तुच्छ प्राणी मात्र है, उसमें न कुछ विशेषता है न न्यूनता । *उच्च भावनाओं के आधार पर वह देवता बन जाता है, तुच्छ विचारों के कारण वह पशु दिखाई पड़ता है और निकृष्ट "पापबुद्धि" को अपना कर वह असुर एवं पिशाच बन जाता है ।* इस लोक में जो कुछ सुख-शांति, समृद्धि और प्रगति दिखाई पड़ती है, वह सब सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का परिचय है । जितनी भी उलझनें, पीड़ाएँ और कठिनाइयाँ दीखती हैं, उनके मूल में कुबुद्धि का विष बीज ही फलता-फूलता रहता है । *सैकड़ों, हजारों वर्ष बीत जाने पर भी पुरानी ऐतिहासिक इमारतें लोहे की चट्टान की तरह आज भी अडिग खड़ी हैं , पर हमारे बनाए हुए बाँध, स्कूल, पुल बनकर कुछ ही दिनों में बिखरना शुरु हो जाते हैं । सामान और ज्ञान दोनों ही आज पहले की अपेक्षा अधिक उच्च कोटि का उपलब्ध है, पर उस लगन की कमी ही दिखाई पड़ती है जिसके कारण प्राचीन काल में लोग स्वल्प साधन होते हुए भी बड़ी बड़ी मजबूत चीजें बनाकर खड़ी कर देते थे ।*
👉जब तक मजदूर ईमानदारी से काम न करेंगे, *कोई कारखाना पनप न सकेगा ।* जब तक चीजें अच्छी और मजबूत न बनेंगी, *उनसे किसी खरीदने वाले को लाभ न मिलेगा ।* जब तक विक्रेता और व्यापारी मिलावट, कम तोल-नाप, मुनाफाखोरी न छोडेंगे, *तब तक व्यापार की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी ।* सरकारी कर्मचारी जब तक अहंकार, रिश्वत, कामचोरी और घोटाला करने की प्रवृत्ति न छोड़ेंगे, *तब तक शासन तंत्र का उद्देश्य पूरा न होगा । यह सत्प्रवृत्तियाँ इन वर्गों में अभी उतनी नहीं दिखाई देती, जितनी होनी चाहिए । यही कारण है कि हमारी प्रगति अवरुद्ध बनी पड़ी है ।* साधनों की कमी नहीं है, आज जितना ज्ञान, धन और श्रम साधन अपने पास मौजूद है, उनका सदुपयोग होने लगे तो सुख सुविधाओं की अनेक गुनी अभिवृद्धि हो सकती है ।
👉 *"आत्म-कल्याण" की लक्ष्य पूर्ति तो सर्वथा "सत्प्रवृत्तियों" पर ही निर्भर है ।* ईश्वर का साक्षात्कार, स्वर्ग एवं मुक्ति को प्राप्त कर सकना केवल उन्हीं के लिए संभव है, जिनके विचार और कार्य उच्चकोटि के, आदर्शवादी एवं परमार्थ भावनाओं से ओत-प्रोत हैं । भगवान घटघट वासी है । वे भावनाओं को परखते हैं और हमारी प्रवृत्तियों को भली-भाँति जानते हैं, उन्हें किसी बाह्य उपचार से बहकाया नहीं जा सकता ।
👉 लौकिक और पारलौकिक, भौतिक और आत्मिक कल्याण के लिए उत्कृष्ट भावनाओं की अभिवृद्धि नितांत आवश्यक है । प्राचीन काल में जब भी अनर्थ के अवसर आये हैं, तब उनका कारण मनुष्य की *"स्वार्थपरता" एवं "पापबुद्धि"* ही रही है और जब भी सुख-शांति का आनंदमय वातावरण रहा है, उसके पीछे *"सद्भावनाओं"* का बाहुल्य ही मूल कारण रहा है । *आज भी हमारे लिए वही मार्ग शेष है । इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग न पहले था और न आगे रहेगा । सभ्य समाज की स्थिति जब-जब रही, तब "धर्म-बुद्धि" की ही प्रधानता रही है । हमें वर्तमान दुर्दशा से ऊँचे उठने के लिए जनमानस में गहराई तक "धर्म-बुद्धि" की स्थापना करनी होगी । इसी आधार पर विश्वव्यापी "सुख-शांति" का वातावरण सकना संभव होगा ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-३५-३७*
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 33 🌺 Rishi chintan se 33🌺
*🥀०९ जनवरी २०२३ सोमवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष द्वितीया२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*चरित्रवान व्यक्ति ही शक्तिशाली होते हैं*
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👉 "धनीमानी" वह नहीं है, जिसके पास सोने चांदी अथवा मुद्राओं की बहुतायत है और न "धनीमानी" उसे ही माना जा सकता है, जिसका कारोबार लंबा चौड़ा है, *"धनीमानी" वास्तव में वही है, जिसके पास "चरित्र" रूपी धन है ।* माननीय यदि संसार में कोई वस्तु हुई है और आगे भी रहेगी, तो वह *मनुष्य का महान "चरित्र" ही है ।* धनी का आदर तो लोग स्वार्थवश करते हैं - वह भी वे लोग जिनमें धन-लिप्सा की दुर्बलता होती है । स्वार्थ निकल जाने अथवा आशा न रहने से स्वार्थी व्यक्ति तक उस धनवान का आदर करना छोड़ देते हैं, जिसके पीछे "चरित्र" की विपुलता नहीं होती ।
👉 *"सच्चरित्रता" से मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का विकास होता है । "चरित्रवान" व्यक्ति संसार में कहीं भी निर्भयता पूर्वक विचरण कर सकता है ।* भय, अवमानना अथवा अप्रतिष्ठा की तुच्छ शंका उसके पास से होकर नहीं जाती । *"चरित्रवान" की आत्मा इतनी उज्जवल एवं बलिष्ठ हो जाती है, उसका "आत्मविश्वास" इतना ऊँचा हो जाता है कि वह निर्धन होते हुए भी धनवानों के बीच नि:संकोच होकर आता-जाता, बात करता और समुचित सम्मान पाता है ।* "चरित्रवान" व्यक्ति अल्पबल होने पर भी बड़े-बड़े बलवानों के बीच निर्भयता का प्रमाण ही नहीं देता, अपितु उन्हें प्रभावित भी किया करता है । *किसी "चरित्रवान" व्यक्ति को कभी कोई चरित्रहीन बलवान् निरस्त कर सका है, ऐसा इतिहास आज तक कोई भी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका है ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-११८*
*💦पं.श्रीराम शर्मा आचार्य💦*
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🌺 ऋषि चिंतन से 34 🌺 Rishi chintan se 34🌺
*🥀०८ जनवरी २०२३ रविवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष द्वितीया २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖☝️दुनिया प्रवचन से नहीं☝️➖*
*👍〰️आचरण से बदलेगी〰️👍*
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👉 *हम दुनिया को बदलने की सोचते रहते हैं, चाहते हैं कि संसार से में से बुराई घटे और अच्छाई फैले ।* इस कार्य की पूर्ति के लिए आमतौर से सभा-सम्मेलन करने की, प्रवचन-व्याख्यान करने की, लेख लिखने और अखबार छापने की बात सोची जाती है, कुछ प्रचारात्मक, प्रदर्शनात्मक कार्यक्रम भी बनते हैं, प्रतियोगिताएँ, जुलूस, प्रदर्शनी आदि के आयोजन होते हैं और बात इतने तक ही समाप्त हो जाती है । यह कार्यक्रम बहुत दिन से चलते आ रहे हैं, इनका थोड़ा सा असर भी होता है, *पर चिर प्रयत्नों के बावजूद वह लक्ष्य अभी भी दूर दिखाई पड़ता है, जिसके लिए यह सब किया गया होता है।* कारण एक ही है कि लोगों की पैनी दृष्टि इन तुलनात्मक काम करने वालों के व्यक्तिगत जीवन पर जा टिकती है । *वे यह जानना चाहते हैं कि यदि यह प्रचार वस्तुतः अच्छा और सच्चा है, तो उसके संयोजकों ने , प्रचारकों ने अपने जीवन में उतारा ही होगा ।* लाभदायक उत्तम बात का लाभ कोई स्वयं ही अपनाने के लाभ से वंचित क्यों रहेगा ? *जनता की यह कसौटी सर्वथा उचित भी है ।*
👉 धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना कष्ट साध्य है, उसमें लाभ तो है, पर तुरंत नहीं विलंब से वह मिलता है । इसके विपरीत अनैतिक कार्यों का अंतिम परिणाम सुखद भले ही न होता हो, तुरंत लाभ तो रहता ही है । *इस तुरंत के लाभ को छोड़कर तुरंत कष्ट साध्य प्रक्रिया में पड़ने के लिए लोग तभी तैयार हो सकते हैं, जब उन्हें विश्वास हो जाए कि धर्म प्रचारक लोग उन्हें बहका तो नहीं रहे हैं ।* यदि उन्हें संदेह हो गया कि धर्म प्रचार का आडंबर सस्ती वाहवाही लूटने और किसी स्वार्थ साधन के लिए किया जा रहा है, तो लोग धर्म-कर्म की बातों को सुन तो लेते हैं, पर उन्हें अपनाने के लिए तैयार नहीं होते । प्रचार की बड़ी-बड़ी स्कीमें इसी चट्टान से टकराकर टूट जाती हैं । आज अगणित उदारवादी संस्थान प्रचुर जन-शक्ति और धन-शक्ति लगाकर मनुष्य को अच्छा बनाने का आंदोलन कर रहे हैं, वह सब निष्फल ही जा रहा है, स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है ।
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-९७*
*🌹पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🌹*
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🌺 ऋषि चिंतन से 35 🌺 Rishi chintan se 35🌺
*🥀०७ जनवरी २०२३ शनिवार🥀*
*🍁माघकृष्णपक्षप्रतिपदा २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*महत्वाकांक्षाएँ अनियंत्रित न होने पाए*
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👉 *आजकल हमारा जीवन संघर्ष इतना बढ़ गया है कि हमें जीवन में संतोष और शांति का अनुभव नहीं हो पाता ।* बहुत से लोग जीवन भर विकल और विक्षुब्ध ही रहते हैं । हम जीवन में दिन-रात दौड़ते हैं । नाना प्रयत्नों में जुटे रहते हैं । कभी इधर कभी उधर हमारी घुड़दौड़ निरंतर चालू ही रहती है । किंतु फिर भी हममें से बहुत कम ही जीवन की प्रेरणाओं का स्रोत ढूंँढ पाते हैं, विरले ही जीवन की यथार्थता का साक्षात्कार कर पाते हैं । *जहाँ हमें सहज ही शांति और संतोष की उपलब्धि होती है वहाँ बहुत ही कम पहुँच पाते हैं ।* आजीवन निरंतर सचेष्ट रहते हुए भी हममें से बहुतों को अंत में पश्चाताप और खिन्नता के साथ जीवन छोड़ना पड़ता है ।
👉 *हमें लक्ष्य भ्रष्ट करने में विकृत महत्वाकांक्षाओं का बड़ा हाथ है ।* वे हमें जीवन के सहज और स्वाभाविक मार्ग से भटका कर गलत मार्ग पर ले जाती हैं । *इनके कारण हमें जो करना चाहिए उसकी उपेक्षा कर देते हैं और जो हमें नहीं करना चाहिए, वह करने लगते हैं ।*
👉 *यों जीवन में "आकांक्षाओं" का होना आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना तो जीवन जड़ बन जाएगा । प्रगति का द्वार ही बंद हो जाएगा ।* आज संसार का जो विकसित, प्रगतिशील स्वरूप दिखाई देता है वह बहुत से व्यक्तियों की आकांक्षाओं का ही परिणाम है । किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में जब यह प्रश्न उठता है कि *"यह क्या है ?" "कैसा है ?" "कैसे चल रहा है ?"* तो उसे जानने के लिए मचल उठता है, उसके लिए तन्मय होकर अपने को अंत तक लगाए रखना, संसार में महान वैज्ञानिक आश्चर्य का द्वार खोल देता है ।
👉 *यद्यपि कुछ न कुछ कुछ "आकांक्षाएँ" सभी में होती है तथापि हर "आकांक्षा" को महत् नहीं कहा जा सकता । "आकांक्षाएँ" जब स्वयं व्यक्ति और समाज के लिए हित साधक होती हैं, तभी वे "महत्वाकांक्षाएँ" हैं ।* किसी को नुकसान पहुँचाने या डाकू बन कर लूटपाट करने के लिए किए जाने वाले दुस्साहस को महत्वाकांक्षा नहीं कहा जा सकता । स्वर्गीय चितरंजन दास के शब्दों में - *"महत्वाकांक्षाएँ" जब पदार्थ प्रेरित होती हैं, तभी तक ये महत् हैं।"* जिनसे समाज का अहित होता है, जो रचनात्मक न होकर विनाशात्मक हो, ऐसी महत्वाकांक्षा रावण, कंस, दुर्योधन की महत्वाकांक्षा है, जो जगत के लिए हानिकारक और स्वयं उनके जीवन में भी विनाशकारी ही सिद्ध होती है । ऐसी दुस्साहसी आकांक्षाओं का अवलंबन लेकर कोई व्यक्ति जीवन में संतोष-शांति का अनुभव कर सके, यह असंभव है ।
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*असंतोष की आग से बचिए पृष्ठ-३*
*🍁पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍁*
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