🌺 ऋषि चिंतन से 26 🌺 Rishi chintan se 26🌺
*🥀१४ जनवरी २०२३ शनिवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष सप्तमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*✌️सुखी रहने के अचूक उपाय✌️*
*➖"सादगी" और "मितव्ययता"➖*
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👉 *"सादगी", "मितव्ययता" और "सामान्य श्रेणी" का जीवन यापन करने में ही मनुष्य का गौरव है । "सज्जनता" का यही परिधान है ।* समाज में जब तक यह प्रवृत्ति विकसित न होगी, हम अशांति और असभ्यता की ओर बढ़ते रहेंगे । कहते हैं कि जरूरतों से प्रेरित होकर मनुष्य दुष्कर्म करते हैं, फिर हम इसकी जड़ को ही क्यों न काटें । *अपनी जरूरतों को ही सीमित क्यों न करें, जिससे दुष्कर्म करने की आवश्यकता ही न पड़े ।* संतोषी को सबसे बड़ा सुखी माना गया है । *वित्तेषणा पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए यदि हम "सादगी" को अपनी जीवन नीति बना लें और "मितव्ययता" को अपनाकर तृष्णा को निरर्थक अनुभव करने लगें, तो सचमुच अपना जीवन बड़ा सुखी हो सकता है ।*
👉 यदि स्वयं सुखी रहना और दूसरों को शांति से रहने देना हमें अभीष्ट हो तो वित्तेषणा को अस्वाभाविक, अनैतिक, अवांछनीय एवं अनुपयुक्त मानना पड़ेगा । *यह डायन जब तक हमारे पीछे पड़ी रहती है, तब तक न चैन की साँस लेने का अवसर मिलता है और न दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारे का कोई मार्ग रह जाता है ।* जिसे निरंतर धन की हाय लगी हुई है, वह सज्जनता और सदाचार का जीवन देर तक नहीं बिता सकता । अवसर आते ही उसका अनीति के मार्ग पर फिसल पड़ना निश्चित है । यह फिसलन ही असभ्यता है । *सभ्य समाज की रचना के लिए वित्तेषणा को अपना प्रथम शत्रु मानते हुए "सादगी" "मितव्ययता" और "सज्जनता" की बुद्धि उत्पन्न करनी चाहिए ।*
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*असंतोष की आग से बचिए पृष्ठ-१२*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 27 🌺 Rishi chintan se 27🌺
*🥀१५ जनवरी २०२३ रविवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष अष्टमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*"वित्तेषणा" रूपी "डायन" से बचिए*
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👉 *जीवनयापन के लिए थोड़े से "धन" की, नियमित आजीविका की आवश्यकता पड़ती है, निर्वाह की अनेक आवश्यकताओं में से एक "धन" भी है ।* उसके लिए भी ध्यान देना एवं प्रयत्न करना आवश्यक है । पर यदि सब ओर से ध्यान हटाकर *"धन"* को ही एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए और उसी बात पर दिन-रात सोचते रहा जाए, उसी के निमित्त पूरा जीवनक्रम लगाए रखा जाए, तो यह बहुत ही अनुचित बात है । *इसी को "वित्तेषणा" कहते हैं । "साधन" न रहकर जब "धन" "साध्य" बन जाता है तो उस तृष्णा के वशीभूत होकर मनुष्य बुरे से बुरे काम करते हैं । गरीबी नहीं तृष्णा दुष्कर्मों की जननी है ।* गरीब भीख माँग सकता है या पेट भरने लायक कोई छोटी-मोटी बुराई कर सकता है । उसमें इतनी अकल कहाँ है, जो बड़े-बड़े योजनाबद्ध प्लान बना कर अनैतिक उपायों पर पर्दे डालकर बहुत कुछ डकार जाए । यह कार्य सुशिक्षित साधन संपन्न और सामर्थ्यवान लोगों का ही है ।
👉डाकू गरीब नहीं होते, गरीब बंदूक कहाँ से प्राप्त करेगा ? शरीर में इतना बल कहाँ से लावेगा ? *"रिश्वतखोरी", "बेईमानी" "ठगी" के जो विशालकाय अनर्थ होते हैं, वे सब उच्च वर्ग के लोगों द्वारा ही संपन्न किए जाते हैं । उनके मूल में गरीबी नहीं धन की तृष्णा होती है ।* निर्वाह के लायक उचित आवश्यकताएँ पूर्ण करने योग्य धन के उपार्जन और संग्रह की मर्यादा सीमित करके मनुष्य सुखी हो सकता है; अपने चरित्र को संभाले रह सकता है । बाल-बच्चों को उत्तराधिकार में मुफ्त का माल देकर उन्हें निक्कमे बनाने से बचाए रह सकता है और जनसाधारण में ईर्ष्या एवं असंतोष उत्पन्न होने से रोके रह सकता है । *धन की असीम तृष्णा में संलग्न व्यक्ति यह सब बुराइयाँ पैदा करते रहते हैं ।* यह तृष्णा उनके निज के लिए ही नहीं, सारे समाज के लिए घातक सिद्ध होती है । *इसलिए "वित्त" को नहीं, "वित्तेषणा" को निंदनीय ठहराया गया है ।* इस दिशा में संतोष की, मर्यादा की मनोवृति रखकर ही मनुष्य अपने मानसिक स्तर को इतनी फुर्सत में रख सकता है कि वह अपने आत्म कल्याण की बात सोच सके और उसके लिए कुछ कर सके । *इस "तृष्णा" से बचे रहने वाले के पास इतना मन, उत्साह और खाली समय रह सकता है कि वह देश धर्म की कुछ बात सोच सके और उसके लिए प्रयत्न कर सके । श्रेय मार्ग पर ध्यान दिए बिना, उसके लिए समय लगाए बिना जीवन सफल एवं सार्थक नहीं हो सकता और इधर कदम उठा सकना उन्हीं के लिए संभव है जिनका मन, धन को नहीं जीवन के सर्वांगीण विकास को अपना लक्ष्य निर्धारित कर सका होगा ।*
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*असंतोष के कारण एवं निवारण पृष्ठ-१३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 28 🌺 Rishi chintan se 28🌺
*🥀१६ जनवरी २०२३ सोमवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष नवमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*सभ्य समाज का निर्माण ऐसे करेंगे*
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👉 *जिस समाज में लोग एक दूसरे के दु:ख-दर्द में सम्मिलित रहते हैं, सुख संपत्ति को बाँटकर रखते हैं और परस्पर स्नेह, सौजन्य का परिचय देते, स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं, उसे "देव समाज" कहते हैं ।* जब जहाँ जनसमूह इस प्रकार पारस्परिक संबंध बनाए रहता है, तब वहाँ स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी रहती हैं । पर जब कभी लोग न्याय-अन्याय का, उचित-अनुचित का, कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार छोड़कर उपलब्ध सुविधा या सत्ता के साधनों का अधिकाधिक उपयोग करने लगते हैं तब क्लेश, द्वेष और असंतोष की प्रबलता बढ़ने लगती है । शोषण और उत्पीड़न का बाहुल्य होने से वैमनस्य और संघर्ष के दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं । पाप, दुराचार, अनीति, छल एवं अपराधों की प्रवृत्तियाँ जहाँ पनप रही होगी, वहाँ प्रगति का मार्ग रुक जाएगा और पतन की व्यापक परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगेगी । चातुर्य, विज्ञान एवं श्रम के बल पर आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है, पर उससे उपभोग के साधन बढ़ सकते हैं । *मनुष्य की वास्तविक प्रगति एवं शांति तो पारस्परिक स्नेह-सौजन्य एवं सहयोग पर निर्भर रहती है यदि वह प्राप्त न हो सके तो विपुल साधन-सामग्री पाकर भी सुख शांति के दर्शन दुर्लभ होंगे ।*
👉 *अच्छे व्यक्तित्व अच्छे समाज में ही जन्मते, पनपते और फलते-फूलते हैं ।* जिस समाज का वातावरण दूषित तत्वों से भरा होता है उसकी अगली पीढ़ियाँ क्रमशः अधिक दुर्बल एवं पतित बनती चली जाती है । *नम्रता, सज्जनता, कृतज्ञता, नागरिकता एवं कर्तव्य-परायणता की भावना से ही किसी का मन ओत-प्रोत रहे, ऐसे पारस्परिक व्यवहार का प्रचलन हमें करना चाहिए ।* दूसरों के दु:ख-सुख समझें और एक दूसरे की सहायता के लिए तत्परता प्रदर्शित करते हुए संतोष अनुभव करें, ऐसा जनमानस निर्माण किया जाना चाहिए । *आदर्शवादी आचरण में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें, यह प्रतिस्पर्धा तीव्र की जानी चाहिए ।* पशु प्रवृत्तियों का उन्मूलन और मानवीय सभ्यता का अभिवर्धन निरंतर होता रहे, ऐसी योजनाएँ प्रचलित करने पर ही नव निर्माण का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे । *"संस्कृति" पर ही "संपन्नता" निर्भर रहती है, यह हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए ।*
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*हम बदलें तो दुनिया बदले पृष्ठ-५७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 29 🌺 Rishi chintan se 29🌺
*🥀१३ जनवरी २०२३ शुक्रवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष षष्ठी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*प्रसन्नता धन सम्पत्ति से नहीं मिलती*
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👉 लोगों में अधिकतर एक सामान्य धारणा यह रहा करती है कि यदि उनके पास अधिक पैसा हो, साधन-सुविधाएँ हों तो वे प्रसन्न रह सकते हैं । *ऐसी धारणाओं वाले लोग पैसे और साधन-सुविधाओं के लिए रोते-रिरियाते रहने की बजाय, एक बार दृष्टि उठाकर अन्य लोगों की ओर क्यों नहीं देखते कि प्रचुरता से परिपूर्ण होने पर भी क्या वे सुखी हैं, प्रसन्न और संतुष्ट हैं ?* यदि धन-दौलत तथा साधन-सुविधाएँ ही प्रसन्नता के हेतु होती तो संसार का हर धनवान अधिक से अधिक सुखी और अधिक से अधिक संतुष्ट होता, किंतु ऐसा कहाँ है ? *इससे स्पष्ट सिद्ध है कि वैभव और विभूति वास्तविक प्रसन्नता का कारण नहीं है ।* प्रसन्नता प्राप्ति का हेतु मानकर इन भौतिक विभूतियों के लिए रोते-मरते रहना बुद्धिमानी नहीं है ।
👉 *बल बुद्धि और विद्या को भी प्रसन्नता का हेतु मानने की एक सभ्य प्रथा है ।* किंतु यह ऐश्वर्य भी वास्तविक प्रसन्नता का वाहक नहीं है । यदि ऐसा होता तो हर शिक्षित प्रसन्न दिखाई देता और हर अशिक्षित अप्रसन्न । ऐसा भी देखने में नहीं आता । *जिस प्रकार अनेक धनवान अप्रसन्न और निर्धन प्रसन्न देखे जा सकते हैं, उसी प्रकार अनेक विद्वान, क्षुब्ध तथा बेपढ़े-लिखे लोग प्रसन्न मिल सकते हैं ।* बड़े बड़े बलवान आहें भरते और साधारण सामर्थ्य वाले व्यक्ति हँसी-खुशी से जीवन बिताते मिल सकते हैं ।
👉 *इस प्रकार विचार करने से पता चलता है कि वास्तविक "प्रसन्नता" कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसको किसी शक्ति अथवा साधन के बल पर प्राप्त किया जा सके ।* साधनों की झोली फैलाकर प्रसन्नता की तलाश में दौड़ने वाले कभी भी प्रसन्नता प्राप्त नहीं कर सकते और वास्तविक बात तो यह है कि जो जितना अधिक प्रसन्नता के पीछे दौड़ते हैं, वे उतने ही अधिक निराश होते हैं । उनका यह निर्रथक श्रम उस अबोध हिरण की तरह ही शोचनीय होता है जो पानी के भ्रम में मरू मरीचिका के पीछे दौड़ते हैं, अथवा उस बालक की तरह कौतुकपूर्ण है जो आगे पड़ी हुई अपनी छाया को पकड़ने के लिए दौड़ता है । *"प्रसन्नता" कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसका पीछा करने की जरूरत है ।* वह तो अवसर आने पर स्वयं ही आकर मन मंदिर में हँसने लगती है । *उसके आने का एक अवसर तो वही होता है जब हम उसको पाने के लिए कम से कम लालायित" व्यग्र और चिंतित होते हैं ।*
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*असंतोष के कारण एवं निवारण पृष्ठ-५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 30 🌺 Rishi chintan se 30🌺
*🥀१२ जनवरी २०२३ गुरुवार🥀*
*🍁माघ कृष्णपक्ष पंचमी २०७९🍁*
👉 *आज ..........................*
*🍂➖स्वामी विवेकानंद जयंती➖🍂* है ।
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*❌प्रसन्न रहने के प्रचलित नहीं❌*
*✅यथोचित कारण ढूंढने होंगे✅*
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👉 जीवन में बालक से लेकर बूढ़े तक सभी प्रसन्नता चाहते हैं और उसे पाने का प्रयत्न करते रहते हैं । ऐसा करना भी चाहिए । *क्योंकि स्थायी "प्रसन्नता" जीवन का चरम लक्ष्य भी है ।* यदि मनुष्य जीवन में *"प्रसन्नता"* का नितांत अभाव हो जाए तो उसका कुछ समय चल सकना भी असंभव समझना चाहिए ।
👉 यह बात सत्य है कि मानव जीवन में अनुपात दु:ख-कलेश का ही अधिक देखने में आता है । तब भी लोग शौक से जी रहे हैं । *इसका कारण यही है कि बीच-बीच में उन्हें "प्रसन्नता" भी प्राप्त होती रहती है और उसके लिए उन्हें नित्य नई आशा भी बनी रहती है ।* प्रसन्नता जीवन के लिए संजीवनी तत्व है, मनुष्य को उसे प्राप्त करना चाहिए । *प्रसन्नावस्था में ही मनुष्य अपना तथा समाज का कुछ भला कर सकता है ₹, विषण्णावस्था में नहीं ।*
👉 *"प्रसन्नता" वांछनीय भी है और लोग उसे पाने के लिए निरंतर प्रयत्न भी करते रहते हैं, किंतु फिर भी कोई उसे अपेक्षित अर्थ में पाता दिखाई नहीं देता ।* क्या धनवान, क्या बालक और वृद्ध किसी से भी पूछ देखिए -- *क्या आप जीवन में पूर्ण संतुष्ट और प्रसन्न हैं ?* उत्तर अधिकतर नकारात्मक ही मिलेगा । उसका पूरक दूसरा प्रश्न भी करके देखिए -- *"तो क्या आप उसके लिए प्रयत्न नहीं करते ?* 90% से अधिक उत्तर यही मिलेगा कि *"प्रयत्न तो बहुत करते हैं, पर "प्रसन्नता" मिल ही नहीं पाती ।"* निस्संदेह मनुष्य की असफलता आश्चर्य ही नहीं, दु:ख का विषय है ।
👉कितने खेद का विषय है कि आदमी किसी एक विषय अथवा वस्तु के लिए प्रयत्न करें और उसको प्राप्त न कर सके । ऐसा भी नहीं कि कोई उसे प्राप्त करने में कम श्रम करता हो अथवा प्रयत्नों में कोताही रखता हो । *मनुष्य अनुक्षण एकमात्र संपूर्ण "प्रसन्नता" प्राप्त करने में ही तत्पर एवं व्यस्त रहता है ।* सोते-जागते, उठते-बैठते' चलते-फिरते जो कुछ भी अच्छा- बुरा करता है, सब प्रसन्नता प्राप्त करने के मंतव्य से । किंतु खेद है कि वह इसे उचित रूप में प्राप्त नहीं कर पाता ।
👉 *इस स्थिति को देखते हुए तो यही समझ में आता है कि या तो मनुष्य "प्रसन्नता" के वास्तविक रूप को नहीं पहचानता अथवा वह अपनी वांछित वस्तु को पाने के लिए जिस दिशा में प्रयत्न करता है वही गलत है ।* इस समस्या पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है
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*असंतोष के कारण एवं निवारण पृष्ठ-३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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