गरीबी ( विपन्नता )के दो कारण शारीरिक आलस्य एवं
मानसिक प्रमाद
🌺 ऋषि चिंतन से 66🌺 Rishi chintan se 66🌺
*🌴१९ दिसम्बर २०२२ सोमवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष एकादशी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*✌️〰️विपन्नता के दो दुश्मन〰️✌️*
*❗शारीरिक आलस्य❗*
*➖एवं➖*
*‼️मानसिक प्रमाद‼️*
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👉 *"गरीबी" से तात्पर्य है - वह आर्थिक तंगी जो अखरे और जिसके बिना जीवन निर्वाह में अड़चन पड़े ।* अपने देश में अधिकांश लोगों की ऐसी मनःस्थिति औऱ परिस्थिति है जिनके अनेक कारण है । *"अदक्षता" प्रथम कारण है, औऱ रोजगार का न मिलना दूसरा ।*
👉 *"अदक्षता"* का सबसे बड़ा कारण है-" *"शारीरिक आलस्य"* और *"मानसिक प्रमाद"* । यह एक प्रकार की अपंगता है जो प्रायः मनःक्षेत्र पर छायी रहती है । वह ढर्रे के क्रियाकलाप तो किसी प्रकार पूरे कर लेती है, पर यह नहीं सोचने देती कि *"दक्षता" या "व्यवस्था में किसी प्रकार के सुधार की आवश्यकता है क्या ?* यदि है तो उसे किस प्रकार सम्भव किया जाना चाहिए ? *प्रगति के लिए आतुर इच्छा का होना आवश्यक है ।* मन पर मूर्छना मुर्दनी छायी रहे तो यथा स्थिति बनाए रखना भी कठिन हो जाता है । जो उठता नहीं वह गिरता है । यथास्थिति बनाये रखना तो थोड़े समय ही संभव होता है । पतन या उत्थान दोनों में से एक उसे अपनी ओर खींचने में सफल हो ही जाते हैं ।जड़ता पत्थरों के लिए तो स्वाभाविक मानी जा सकती हैं, पर प्राणधारियों के लिए उसे अयोग्य ठहराया जाता है । फिर मनुष्य की विशेषता को देखते हुए उससे और भी अधिक आशा की जाती है ।
बरगद का पेड़ अपनी शाखाओं में से जड़ें निकालता रहता है और उन्हें नीचे जमीन में धँसा कर अधिक खुराक पाने और अधिक विस्तार करने में जुटा रहता है । यदि अवरोध बाधक न बना हो तो ऐसे कई वृक्ष असाधारण विस्तार करते औऱ चकित कर देने वाला दीर्घायुष्य प्राप्त करते हैं । *मनुष्यों के लिए उसकी "चेतना" को देखते हुए इच्छित दिशा में ऐसी ही प्रगति करते रहना सम्भव है, गरीबी की रेखा को लाँघते हुए समर्थ सम्पन्नता उपलब्ध कर सकना भी ।*
👉 पर उस मानसिक प्रमाद को क्या कहा जाए जो उज्जवल भविष्य के सपने देखना तक सहन नहीं करता और भाग्य के भरोसे किसी प्रकार जिन्दगी के दिन काटते रहने की बात सोचकर अनिवार्य क्रियाशीलता न अपनाकर निष्क्रिय हो बैठता है । गरीबी से ग्रसित लोगों में से अधिकांश लोग मानसिक अवसाद के चंगुल में फँसे होते हैं । छप्पर फाड़कर धन बरसने जैसे मीठे सपने उन्हें भले ही दीख जाते हों ।
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*गरीबी भगाएँ- गरिमा बढ़ाएँ* पृष्ठ-०३
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 67🌺 Rishi chintan se 6🌺
मनुष्य जन्म को सार्थक करें
*🥀 ०४ अप्रैल २०२३ मंगलवार 🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशी २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*मनुष्य जन्म को सार्थक करें*
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👉 मनुष्य जीवन के दो लक्ष्य हैं -- *पहला संग्रहित कुसंस्कारों और कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाना और परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाकर विश्व उद्यान का परिपूर्ण आनंद उपलब्ध करना ।* परिष्कृत जीवन के साथ जुड़ी हुई आनंद भरी उपलब्धियाँ *"स्वर्ग"* कहलाती हैं और दुर्बुद्धि से, दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने को *"मुक्ति"* कहते हैं । जीवन का एक लक्ष्य यह है ।
👉 दूसरा है -- *भगवान के विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में संलग्न होकर अपनी गरिमा को विकसित करना ।* मनुष्य को ईश्वर का राजकुमार, उत्तराधिकारी एवं पार्षद कहा गया है और उसके कंधों पर यह उत्तरदायित्व डाला गया है कि स्रष्टा के विश्व उद्यान का सौंदर्य बढ़ाने में हाथ बटाएँ और सच्चे मित्र, भक्त की भूमिका संपन्न करें ।
👉 *दोनों प्रयोजनों को जो जितनी मात्रा में पूरा करता है, वह उतना ही बड़ा "ईश्वर भक्त" कहलाता है ।* इस मार्ग पर चलने वाले महामानव, संत, ब्राह्मण, ऋषि, देवात्मा, अवतारी आदि नामों से पुकारे जाते हैं । *उन्हें असीम "आत्म संतोष" प्राप्त होता है और "लोक सम्मान" एवं "सहयोग" की वर्षा होने से उन्हें अपने उच्च स्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति में असाधारण सफलता भी मिलती है ।* उनके क्रिया-कृत्य ऐतिहासिक होते हैं और उनके प्रभाव से असंख्यों को ऊँचा उठने का, आगे बढ़ने का असाधारण सहयोग मिलता है । धन-संपत्ति कमाना जब लक्ष्य ही नहीं, वैयक्तिक तृष्णाओं से जब उपराम ही पा लिया गया तो फिर उनका संचय न होना स्वाभाविक ही है । वैभव की दृष्टि से संपन्न होने की जब वे इच्छा ही नहीं करते तो फिर धनवान वे बनेंगे भी कैसे ? *इतने पर भी उनकी आंतरिक संपन्नता इतनी बढ़ी-चढ़ी होती है कि अपनी नाव पार लगाने के साथ असंख्यों को उस पर बिठाकर पार लगा सकें । ईश्वर का असीम "अनुग्रह" और "अनुदान" ऐसे ही लोगों के लिए सुरक्षित रहा है । "लोक" और "परलोक" का बनाना इसी को कहते हैं ।* मनुष्य जीवन इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए मिला है, जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं उन्हीं का नर जन्म धारण करना धन्य एवं सार्थक बनता है, वे ही इस सुर दुर्लभ उपलब्धि का रसास्वादन करते हुए कृतकृत्य होते हैं । *जो इस मार्ग पर जितना बढ़ सका, समझना चाहिए कि उसने उतनी ही मात्रा में लक्ष्य को प्राप्त करने में सफलता पा ली ।*
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*आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-२२*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 68🌺 Rishi chintan se 68🌺
हम बुद्धिमान सिद्ध भी तो हों
*🥀//०५ अप्रैल २०२३ बुधवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष चतुर्दशी२०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*हम बुद्धिमान सिद्ध भी तो हों*
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👉 *"बुद्धिमत्ता" इस बात में थी कि "आत्मा" और "शरीर" दोनों की आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता ।* श्रम और बुद्धि की जो सामर्थ्य प्राप्त है, उनका उपयोग दोनों क्षेत्रों के लिए इस प्रकार किया जाता कि *"शरीर" की सुरक्षा बनी रहती और "आत्मा" अपने महान लक्ष्य को प्राप्त कर सकने में सफल हो जाती,* किंतु होता विचित्र है । जो बुद्धि आए दिन अनेक समस्याओं के सुलझाने में, संपदा और उपलब्धियों के उपार्जन में, पग-पग पर चमत्कार दिखाती है, *वह मौलिक नीति निर्धारण में भारी चूक करती है ।*
👉 सारे का सारा कौशल शारीरिक सुख-सुविधाओं के संचय-संवर्धन में लग जाता है । यहाँ तक कि अपने आप को पूरी तरह शरीर ही मान लिया जाता है, *"आत्मा" के अस्तित्व एवं लक्ष्य का ध्यान ही नहीं रहता है, आत्म कल्याण के लिए कुछ सोचते करते बन ही नहीं पड़ता ।* बुद्धि का यह एक पक्षीय असंतुलन ही जीवात्मा का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है । उसी से छुटकारा पाने के लिए "ब्रह्म-ज्ञान", "आत्म-ज्ञान", "तत्व-ज्ञान" के विशालकाय कलेवर की संरचना की गई है । *"बुद्धि" को आत्मा का स्वरुप और लक्ष्य समझने का अवसर देना ही "उपासना" का मूलभूत उद्देश्य है ।*
👉 चौबीसों घंटे मात्र शरीर के लिए ही शत-प्रतिशत दौड़ धूप करने वाली भौतिकता में पूरी तरह रंगी हुई और लगी हुई बुद्धि को कुछ समय उस भगदड़ से विश्राम देकर आत्मा की स्थिति और आवश्यकता समझने के लिए सहमत किया जाता है । उस अति महत्वपूर्ण पक्ष की उपेक्षा न करने, उस संदर्भ में भी कुछ करने के लिए बुद्धि पर दबाव दिया जाना उपासना का तात्विक उद्देश्य है । *"मन" को तदनुसार कल्पनाएँ और बुद्धि तद्विषयक धारणाएँ करने के लिए उपासना पद्धति के आधार पर प्रशिक्षित किया जाता है ।* वह बहुत बड़ा काम है । *सांसारिक जीवन के सबसे बड़े और सबसे महत्वपूर्ण कामों में से यह एक है ।* मोटी समझ से तो उसकी तात्कालिक उपयोगिता प्रतीत नहीं होती और कोई आकर्षण न होने से मन भी नहीं लगता, *पर विवेक दृष्टि से देखने पर जब उस कार्य की महत्ता समझ में आ जाती है, तब प्रतीत होता है कि यह इतना लाभदायक, उत्पादक, आकर्षक और महत्वपूर्ण कार्य है, जिसकी तुलना संसार के अन्य किसी कार्य से नहीं हो सकती ।*
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*आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव पृष्ठ-२३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 69🌺 Rishi chintan se 69🌺
सुखमय जीवन के लिए विचार" उत्कृष् होना आवश्यक है
*🌴१८ दिसम्बर २०२२ रविवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष दशमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*----सुखमय जीवन के लिए----*
*"विचार" उत्कृष्ट होना आवश्यक है*
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👉 *"विचारों" का असंयम मानव-जाति के लिए एक भयंकर अभिशाप एवं दुर्भाग्य बना हुआ है ।* हम मानवोचित उत्कृष्ट आदर्शवादी विचारधारा का परित्याग कर पशुओं और पिशाचों के ढंग से सोचते हैं। आकांक्षाओं का स्तर बहुत ही निकृष्ट रहता है । साहस के अभाव में चिंता, भय, निराशा, शोक, क्षोभ से चित्त निरंतर उद्विग्न बना रहता है । कलह और संघर्षों का, द्वेष और दुर्भावनाओं का विस्तार, विचारधारा का स्तर अधोगामी होने के कारण ही होता है । *यदि लोग ऊँचे ढंग से सोचें, अपने मानवीय गौरव का स्मरण रखें और मनुष्यता की प्रतिष्ठा एवं मर्यादा के अनुरुप सोचें तो निकृष्ट गतिविधियाँ अपनाने का अवसर ही न आए ।* कुकर्मों की सृष्टि कुविचारों से ही होती है । दीनता, दरिद्रता और पतन के लिए निकृष्ट कोटि की विचारधारा ही उत्तरदायी है । *यदि विचार शक्ति का संयम और सदुपयोग कर हम ध्यान देने लगें तो नर को नारायण और जीव को ब्रह्म के रूप में परिणत होते हुए तनिक भी देर न लगे ।*
👉 आवेशों पर नियंत्रण न रहने से छोटे-छोटे कारणों को लेकर लोग आपे से बाहर हो जाते हैं और न करने लायक उद्धत कृत्य कर डालते हैं । छुरेबाजी, हत्याएँ, आत्म-हत्याएँ, मुकदमेबाजी, पार्टिबन्दी, षड्यंत्र आदि की दुर्घटनाओं के पीछे मनुष्य की गलत ढंग से सोचने की आदत ही प्रधान कारण रही होती है। *यदि लोग गंभीरतापूर्वक सोचने, दूसरों की परिस्थिति को समझने और उलझनों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयत्न करें, सहिष्णुता, सहनशीलता एवं सद्भावना से काम ले तो पेचीदा दीखने वाली उलझनें भी सहज ही सुलझ जाया करें और भिन्नता के बीच एकता बनाए रहने का रास्ता निकल आया करे ।*
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-२२
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 70🌺 Rishi chintan se 70🌺
वाणी में अमृत व विष दोनों ही हैं,
उपयोग हमें करना आना चाहिए ।
*🌴१७ दिसम्बर २०२२ शनिवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष नवमी २०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*वाणी में अमृत व विष दोनों ही हैं*
*उपयोग हमें करना आना चाहिए*
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👉 *"वाणी" का सदुपयोग करना हम सीख जाएँ तो प्रिय, हित और मित ही बोला करें ।* दूसरों की प्रसन्नता और हिम्मत बढ़ाने वाली आदर, विनय और मधुरता से भरी हुई वाणी सबको मधु से भी मधुर लगती है । उसे सुनने के लिए हर किसी के कान प्यासे रहते हैं । *जिससे दूसरों का हित साधन होता हो ऐसी सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाली उपयोगी बातें करने के लिए ही "वाणी" उपयोग किया जाया करे तो वह कितनी सार्थक बन सकती है ।* कोयल और कौए की वाणी का अंतर और उसका प्रतिफल जानते हुए भी हमारे स्वभाव में कटु-भाषण ही समाया रहता है । निंदा, चुगली, व्यंग्य, उपहास, कठोरता, कर्कशता, अहंकार, शेखी जैसी बुराइयों से भरी हुई दूसरों का दिल दुखाने वाली वाणी ही अक्सर हम लोग बोला करते हैं, कतरनी की तरह लबड़-लबड़ बेकार में जीभ चलाते रहने वाले बातूनी लोग अपना और दूसरों का समय बरबाद करते हैं और बात का बतंगड़ बनाने के लिए कुछ न कुछ ऐसे प्रसंग उठाते हैं जिससे दुर्भावनाएँ बढ़ चले ।
👉 *खरी बात कहने के नाम पर तीर सी चुभने वाली कटु भाषा बोलने वाले असभ्य लोग अंततः अपने चारों ओर शत्रुता का वातावरण बना लेते हैं ।* वाणी का यदि सदुपयोग सीख लिया जाए तो चारों और प्रेम की धारा बहने लगे और सहयोग एवं सद्भाव का स्वर्गीय वातावरण इस धरती पर सदैव फैला-फैला दीख पड़ने लगे । क्लेश, कलह और द्वेष, दुर्भावना पूर्ण वाणी के दुरुपयोग से बढ़ते हैं । *सुसंस्कृत अभिभाषण का "सतयुग" यदि व्यापक रूप से अपनाया जा सके तो "सतयुग" जैसी स्नेह-सौजन्य से भरी परिस्थितियाँ आज भी चारों ओर परिलक्षित हो सकती है ।*
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*हम दुर्बल नहीं, शक्तिशाली बनें* पृष्ठ-२०
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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