आर्थिक विकास के साथ नैतिक शिक्षा भी जरूरी है
*🔆२१ दिसंबर २०२२ बुधवार🔆*
*🍁पौष कृष्णपक्ष त्रयोदशी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*💰➖आर्थिक विकास➖💰*
के साथ
*🔆"नैतिक उत्कर्ष"🔆*
*भी आवश्यक है*
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👉 आज *"आर्थिक विकास"* पर अत्यधिक जोर दिया जा रहा है । जितनी भी योजनाएं हैं इस तथ्य को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है कि मनुष्य को अधिक समृद्ध बनाया जाए । शिक्षा भी इसी दृष्टि से दी जा रही है कि पढ़ने वाला अधिक कमाऊ बन सके । *इस बात की सर्वत्र उपेक्षा ही दीखती है कि मनुष्य का व्यक्तित्व ऐसा बने जिसकी सुगंध से सारा वातावरण महकने लगे ।* नैतिकता की धर्म भावना, कर्तव्य परायणता एवं सदाचरण की अभिवृद्धि के लिए हमारे नेताओं का ध्यान नहीं के बराबर है । इस दिशा में जो किया जा रहा है वह बहुत ही स्वल्प एवं निराशाजनक है ।
👉 *आवश्यकता इस बात की है कि "आर्थिक विकास" से भी अधिक ध्यान "नैतिक उत्कर्ष" के लिए दिया जाए और अभी उसके लिए विशाल परिमाण में रचनात्मक कार्यक्रमों का विस्तार किया जाए ।* आर्थिक विकास का कोई मूल्य तभी रह सकता है जब वह सज्जनता संपन्न व्यक्तियों का होता हो । यदि दुष्ट और दुर्जन साधन संपन्न बन जाएंगे तो उससे उनका तथा सारे समाज का अहित ही होगा । दुर्गुणी व्यक्तियों की बढ़ी हुई कमाई ऐसे कामों में खर्च होती है, जिससे अशांति और अनाचार का ही सृजन होता है । अस्तु आवश्यकता इस बात की है कि समाज के कर्णधारों का जितना ध्यान आर्थिक विकास की योजनाओं में लगा हुआ है, जितना प्रयत्न और खर्च उन कार्यों के लिए किया जाता है, कम से कम उतना तो नैतिक उत्कर्ष के लिए किया ही जाना चाहिए । होना तो उससे भी अधिक चाहिए, *क्योंकि "धन" की अपेक्षा "व्यक्तित्व" का मूल्य अधिक है ।* व्यक्तित्व संपन्न व्यक्ति निर्धन रहकर भी ऋषियों की तरह प्रकाशमान बन सकता है ।पर अपार धन होते हुए भी दुर्जन मनुष्य केवल विनाश ही प्रस्तुत कर सकता है । *इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए "नैतिक उत्कर्ष" का मूल्य "धन" की अपेक्षा अनेक गुना अधिक है, अतः उसके लिए प्रयत्न भी अधिक ही होना चाहिए ।*
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*युगनिर्माण का शत सूत्री कार्यक्रम* पृष्ठ-9
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
🌺 ऋषि चिंतन से 62 🌺 Rishi chintan se 62🌺
युग निर्माण में साझेदारी करें--
*🌴२० दिसम्बर २०२२ मंगलवार 🌴*
*🍁पौष कृष्णपक्ष द्वादशी२०७९🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*---युग निर्माण में साझेदारी करें---*
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👉 अब दुनिया की चाल बहुत तेज हो गई है । चलने का युग बीत गया, अब हम लोग दौड़ने के युग में रह रहे हैं । *सब कुछ दौड़ता हुआ दीखता है।* इस घुड़दौड़ में पतन और विनाश भी उतनी ही तेजी से बढ़ता चला आ रहा है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती । *प्रतिरोध एवं परिवर्तन यदि कुछ समय और रुका रहा तो समय हाथ से निकल जाएगा और हम इतने गहरे गर्त में गिर पडेंगे कि फिर उठ सकना सम्भव न होगा ।
👉 *"स्वस्थ शरीर", "स्वच्छ मन", और "सभ्य समाज"* की अभिनव रचना, यही युगनिर्माण का उद्देश्य है । इसके लिए अपना व्यक्तित्व , अपना परिवार और अपना समाज हमें आत्मिक दृष्टि से उत्कृष्ट बनाना पड़ेगा । *भौतिक सुसज्जा कितनी ही प्राप्त क्यों न कर ली जाए, जब तक आत्मिक उत्कृष्टता न बढ़ेगी, तब तक न मनुष्य सुखी रहेगा और न संतुष्ट ।* उसकी सफलता एवं समृद्धि भी क्षणिक तथा दिखावटी मानी जाएगी । * मनुष्य का वास्तविक पराक्रम उसके सद्गुणों से ही निखरता है ।सद्गुणी ही सच्ची प्रगति कर सकता है । *उच्च अंत:करण वाले, विशाल हृदय, दूरदर्शी एवं दृढ़ चरित्र व्यक्ति अपना गौरव प्रकट करते हैं, दूसरों का मार्ग दर्शन कर सकने लायक क्षमता सम्पन्न होते हैं ।* ऐसे लोगों का बाहुल्य होने से ही कोई राष्ट्र सच्चे अर्थों में समर्थ एवं सम्पन्न बनता है ।
👉 योजना के विविध कार्यक्रमों में यही तथ्य सन्निहित है । *"व्यक्ति" का विकास, "परिवार" का निर्माण, और "सामाजिक" उत्कर्ष में परिपूर्ण सहयोग की त्रिविध प्रवृत्तियां जन साधारण के मन:क्षेत्र में प्रतिष्ठापित एवं. परिपोषित करने के लिए यह अभियान आरंभ किया गया है ।*इसकी सफलता पर.हमारा वैयक्तिक एवं सामूहिक भविष्य"उज्ज्वल" या "अंधकारमय" बनेगा ।*
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*युग निर्माण का शत सूत्रीय कार्यक्रम* पृष्ठ-८
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
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🌺 ऋषि चिंतन से 63 🌺 Rishi chintan se 63🌺
श्रद्धा" और "विश्वास उत्कृष्ट जीवन का आधार
*🥀//०१ अप्रैल २०२३ शनिवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष एकादशी२०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖"श्रद्धा" और "विश्वास"➖*
*🧑🎤उत्कृष्ट जीवन का आधार*
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👉 *"श्रद्धा" और "विश्वास" के बिना भौतिक जीवन में भी गति नहीं, फिर आध्यात्मिक क्षेत्र का तो उसे प्राण ही कहा गया है ।* आदर्शवादिता में प्रत्यक्षत: हानि ही रहती है, *पर "उच्चस्तरीय मान्यताओं" में "श्रद्धा" रखने के कारण ही मनुष्य त्याग-बलिदान का कष्ट सहन करने के लिए खुशी-खुशी तैयार होता है .* ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व तक प्रयोगशालाओं की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता । *वह निश्चित रूप से "श्रद्धा" पर ही अवलंबित है ।* मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का, आदतों का गहरा पुट रहता है, वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार की आदतें और मान्यताएँ अत्यंत गहराई तक घुसी रहती हैं और वे उन्हें छोड़ने को सहज ही तैयार नहीं होते । यह संस्कार और कुछ नहीं चिरकाल तक सोचे गये, माने गये और व्यवहार में लाए गये अभ्यासों का ही परिपाक है । *तथ्यों की कसौटी पर इन संस्कारों में से अधिकांश "बेतुके" और "अंधविश्वास" स्तर के होते हैं, पर मनुष्य इन्हें इतनी मजबूती से पकड़े होता है कि उसके लिए वे ही "सत्य" बन जाते हैं और सत्य और तथ्य कह कर वह उन पूर्वाग्रहों के प्रति अपनी कट्टरता का परिचय देता है ।* उसके लिए लड़ने-मरने तक को तैयार हो जाता है । *यह मान्यता परक कट्टरता और कुछ नहीं मात्र "श्रद्धा" द्वारा रची गयी खिलवाड़ मात्र है ।*
👉 *"तर्क" की शक्ति का जन्म भी "श्रद्धा" के गर्भ से ही होता है ।* यों तो तर्क विचारणा को जन्म देता है और श्रद्धा विश्वास को, *पर विचारणा भी विचार के लिए आधार ढूँढती है । आधार तभी बन सकता है जब "विश्वास" हो ।* अन्यथा तर्क बुद्धि तो किसी भी केंद्र पर चिंतन को केंद्रीभूत नहीं कर सकती । यह तो तभी बन पाता है जब विश्वास के सहारे विषय पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाता है । दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि *"श्रद्धा" के अभाव में "विचारणा", "तर्क" का प्रादुर्भाव संभव नहीं ।* किसी विषय पर आस्था ही तर्कों का सृजन करती, उस पर सोचने, सत्य को खोज निकालने को प्रेरित करती है । *"श्रद्धा" मानवीय व्यक्तित्व के मूल में घुली-मिली है, जिसके बिना एक क्षण भी नहीं रहा जा सकता । आगे बढ़ने, प्रगति करने की बात तो दूर रही । यह बात अलग है कि हम उसका अनुभव न कर सकें ।*
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*😌साधना से सिद्धि😌 - पृष्ठ-६०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 64 🌺 Rishi chintan se 64🌺
श्रद्धा अत्यंत समाजोपयोगी तत्व
*🥀//०२ अप्रैल २०२३ रविवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष द्वादशी २०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*"श्रद्धा" अत्यंत समाजोपयोगी तत्व*
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👉 *संपूर्ण जीवन प्रवाह एवं उसकी उपलब्धियाँ वस्तुतः "श्रद्धा" की ही परिणति है ।* माँ अपना अभिन्न अंग मानकर नौ माह तक अपने गर्भ में बच्चे का सेचन करती है । अपने रक्त मांस को काटकर शिशु को पोषण प्रदान करती है । *"श्रद्धा" का यह उत्कृष्ट स्वरूप है जिसका बीजारोपण माँ बच्चे में "संस्कार" के रूप में करती है ।* नि:स्वार्थ भाव से उसको संरक्षण देती है । अनावश्यक भार, कष्टों का जंजाल समझने का कुतर्क उठे तो नवशिशु का प्रादु्र्भाव ही संभव न हो सकेगा ।
👉 यह *"श्रद्धा"* ही है जिसके कारण बच्चा माँ के सीने से चिपकने, स्नेह-दुलार पाने के लिए लालायित रहता, रोता-कलपता है । मूक भाषा, वाणी से रहित नव शिशु की *"श्रद्धा"* एकमात्र माँ के ऊपर ही होती है । *माता-पिता भी निश्चल हृदय से बच्चे के विकास के लिए हर संभव प्रयास करते हैं ।* खाने-पीने, स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर शिक्षा-दीक्षा के झंझट भरे सरंजाम जुटाते हैं । समग्र विकास ही उनका एकमात्र लक्ष्य होता है । *"तर्क" तो हर बात को "उपयोगिता" की कसौटी पर कसता है ।* इस आधार पर कसने पर माता-पिता को हर दृष्टि से घाटा ही घाटा दिखायी पड़ेगा । *बात "तर्क" की मान ली जाए तो बच्चे का अस्तित्व ही शंका में पड़ जाएगा ।* दृष्टि मात्र उपयोगितावादी हो जाए तथा यह परंपरा प्रत्येक क्षेत्र में चल पड़े, तो परिवार एवं समाज विश्रृंखलित हो जाएगा । *सभ्यता को अधिक दिनों तक जीवित नहीं रखा जा सकेगा ।*
👉 *"श्रद्धा" ही पारिवारिक जीवन को स्नेह सूत्र में बांधे रहती है ।* सहयोग करने, अन्य सदस्यों के लिए अपने स्वार्थ का उत्सर्ग करने की प्रेरणा देती है । *पारिवारिक विघटन में इसका अभाव ही कारण बनता है ।* पति-पत्नी के बीच मनमुटाव, सदस्यों के बीच टकरा हट का कारण *"अश्रद्धा"* है । *"तर्क" एवं "उपयोगिता" की कसौटी पर कसने पर तो वृद्ध माता-पिता का महत्व भी समझ में नहीं आता ।* वे भार के रूप में ही दिखाई पड़ते हैं । किंतु *"श्रद्धा" दृष्टि जानती है कि उनका कितना ऋण चढ़ा है ? उनके स्नेहाशीर्वाद को पाने की कामना आजीवन बनी रहती है । यह भाव दृष्टि तो श्रद्धा की ही उपलब्धि है, जो सदा एक युवक को माता पिता के समक्ष नतमस्तक किये रहती है ।*
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*😌साधना से सिद्धि😌 - पृष्ठ-६२*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 65🌺 Rishi chintan se 65🌺
उपासना का सही स्वरूप समझने की आवश्यकता
*🥀//०३ अप्रैल २०२३ सोमवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष त्रयोदशी२०८०🔆*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖उपासना का सही स्वरूप➖*
*〰️समझने की आवश्यकता〰️*
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👉 *"उपासना" की प्रक्रिया को अंतःकरण की वरिष्ठ चिकित्सा समझा जाना चाहिए ।* कुसंस्कारों की, कषाय कल्मषों की महाव्याधि से छुटकारा पाने के लिए यही *"रामबाण औषधि"* है । *उच्चस्तरीय "श्रद्धा" का जागरण और वरिष्ठ "निष्ठा" का प्रतिपादन "भगवद्भक्ति" की शिराओं में दवा का प्रवेश कराने के लिए इंजेक्शन की पोली सूई की जो भूमिका है, वही कार्य उत्कृष्टता को "अंतःकरण" की गहराई तक पहुँचाने में "उपासना" करती है ।*
👉 *पिछले दिनों "उपासना" के नाम पर भोंडा जाल-जंजाल ही जनसाधारण के गले में बाँध दिया गया है ।* देवताओं को फुसलाकर उचित-अनुचित मनोकामनाएँ पूरी कर लेने की आशा से ही अच्छी बुद्धि के लोग पूजा पाठ करते पाए जाते हैं । *यदि उन्हें "उपासना" का तत्वज्ञान और प्रतिफल ठीक तरह समझने का अवसर मिला होता और "आत्म परिष्कार" के उद्देश्य से जनसाधारण को इस पुण्य प्रयोजन में लगाया गया होता, तो स्थिति दूसरी ही होती ।* उपासना के माध्यम से आस्थाओं के उत्कर्ष का👍🏻 उद्देश्य ध्यान में रखा गया होता तो, व्यक्तित्व निखरते, परिष्कृत होते और प्रखर बनते । *तब "उपासना" करने वाला "भिक्षुक" की नहीं वरन् "दानी" की स्थिति में होता ।*
👉 स्वयं पार होता और असंख्यों को अपनी नाव में बिठाकर पार करता ।
*देवताओं के सामने उसे नाक रगड़ने की आवश्यकता न पड़ती वरन् स्वयं अपने आप में "देवत्व" का उदय देखता, संपर्क क्षेत्र में "स्वर्गीय" वातावरण उत्पन्न करता ।* प्राचीन काल में आत्म विज्ञान का यही स्वरूप था । ऐसी ही *"प्रखर उपासना" का अभ्यास किया जाता था । *आज फिर उसी तथ्य पू्र्ण उपासना पद्धति से जन-जन को अवगत और अभ्यस्त कराने की आवश्यकता है ।*
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*आत्म-शक्ति से युग शक्ति का उद्भव पृष्ठ-११*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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