धन कमाने के साथ ही सद्गुण भी कमाइए
🌺 ऋषि चिंतन से 56 🌺 Rishi chintan se 56 🌺
*🥀//२९मार्च २०२३ बुधवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष अष्टमी २०८०🔆*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖💵"धन"💵➖*
*➖कमाने के साथ ही➖*
*🧑🎤"सद्गुण" भी कमाइए🧑🎤*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *आलस्य दूर करने की प्रतिक्रिया श्रम-शीलता में समुचित रुचि एवं तत्परता के रूप में दृष्टिगोचर होनी चाहिए ।* प्रमाद से पिंड छूटा हो, लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी हटा दी हो, तो उसके स्थान पर जागरुकता, तन्मयता, नियमितता, व्यवस्था जैसे मनोयोग का परिचय मिलना चाहिए । *"मधुरता", "शिष्टता", "सज्जनता", "दूरदर्शिता", "विवेकशीलता", "ईमानदारी", "संयमशीलता", "मितव्ययता", "सादगी", "सहृदयता", सेवा भावना जैसी सत्प्रवृत्तियों में ही मानवी गरिमा परिलक्षित होती है ।* उन्हें अपनाने, स्वभाव का अंग बनाने के लिए सतत प्रयत्नशील रहा जाना चाहिए । *आम तौर से लोग "धन" उपार्जन को प्रमुखता देते हैं और उसी के लिए अपना श्रम, समय, मनोयोग लगाए रहते हैं । उत्कर्ष के इच्छुकों को "संपत्ति" से भी अधिक "सद्गुणों" की विभूतियों को महत्व देना चाहिए ।* परिष्कृत व्यक्तित्व ही वह कल्पवृक्ष है, जिस तक पहुँचने वाला भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों को सफलता प्राप्त करता है । *"धन" उपार्जन में जितनी तत्परता बरतनी पड़ती है, उस से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही तत्परता "सद्गुणों" को, स्वभाव का अंग बनाने में बरतनी पड़ती है ।* धन तो उत्तराधिकार में, स्वल्प श्रम से, संयोगवश अथवा ऋण अनुदान से भी मिल सकता है , पर *"सद्गुणों"* की संपदा एकत्रित करने में तो तिल-तिल करके अपने ही प्रयत्न जुटाने पड़ते हैं । *यह पूर्णतया अपने ही अध्यवसाय का प्रतिफल है ।* उत्कृष्ट चिंतन और आदर्श कर्तृत्व अपनाये रहने पर यह संपदा क्रमिक गति से संचित होती है । *चंचल बुद्धि वाले नहीं, संकल्प निष्ठ, सतत प्रयत्नशील और धैर्यवान व्यक्ति ही इस वैभव का उपार्जन कर सकने में समर्थ होते हैं ।* चक्की के दोनों पाटों के बीच से गुजरने वाला अन्न ही आटा बनता है । *"सद्विचार" और "सत्कर्म" के दबाव से व्यक्तित्व का सुसंस्कृत बन सकना संभव होता है ।* अपना लक्ष्य यदि आदर्श मनुष्य बनना हो तो इसके लिए आवश्यक उपकरण अलंकार जुटाये जाते रहेंगे । *इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम समयानुसार आत्म-निर्माण के रूप में परिलक्षित होता दिखाई देगा ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*😌साधना से सिद्धि😌- पृष्ठ- ४०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 57 🌺 Rishi chintan se 57🌺
*🥀//३० मार्च २०२३ गुरुवार//🥀*
*🔆चैत्र शुक्लपक्ष नवमी २०८०🔆*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*❗श्रद्धा-भक्ति-विश्वास-संकल्प❗*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *अंत:करण की उत्कृष्टता को "श्रद्धा" के नाम से जाना जाता है । उसका व्यावहारिक स्वरुप है -"भक्ति" ।* यों साधारण बोलचाल में दोनों का उपयोग पर्यायवाची शब्दों के रूप में होता है । फिर भी कुछ अंतर तो है ही । *"श्रद्धा" अंतरात्मा की आस्था है ।* श्रेष्ठता के प्रति असीम प्यार के रूप में उसकी व्याख्या की जा सकती है । *"भक्ति" उसका व्यावहारिक रूप है ।* करुणा, उदारता, सेवा, आत्मीयता के आधार पर चलने वाली विभिन्न गतिविधियों को भक्ति कहा जा सकता है । देश-भक्ति, आदर्श-भक्ति, ईश्वर-भक्ति आदि के रूपों में त्याग-बलिदान के, तप-साधना के अनुकरणीय आदर्शवादिता के अनेकों उदाहरण इसी भक्ति भावना की प्रेरणा से बन पड़ते हैं ।
👉 *"आस्थायें"-"आकांक्षायें" जब परिपक्व स्थिति में पहुँचती हैं और निश्चय पूर्वक लक्ष्य की और बढ़ती है, तो उन्हें "संकल्प" कहते हैं ।* संकल्प की प्रचंड शक्ति सर्वविदित है । संकल्पों के धनी व्यक्तियों ने ही सामान्य साधनों और सामान्य अवसरों में भी चमत्कारी सफलताएँ उपलब्ध की है । *"संकल्प" की प्रखरता मस्तिष्क और शरीर दोनों को अभीष्ट दिशा में घसीट ले जाती है और असंख्य अवरोधों से टकराती हुई उस लक्ष्य तक पहुँचाती है, जिसे आरंभ में असंभव तक समझा जाता था । पुरुषार्थियों की यशगाथा से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं । वस्तुतः उन्हें "संकल्प" शक्ति का चमत्कार ही कह सकते हैं ।* यहाँ इतना ही समझने की आवश्यकता है कि संकल्प उभरकर आने से पूर्व विश्वास बनकर मन:क्षेत्र में अपनी जडें जमाता है या उस बीज का प्रत्यक्ष पौधा संकल्प रूप में प्रकट होता है । *"विश्वास" की प्रतिक्रिया ही "संकल्प" है ।* यही कारण है कि अंत:करण की उच्च स्तरीय आस्थाओं को श्रद्धा-विश्वास का रूप दिया गया है । *वे उत्कृष्ट स्तर की होने पर शिव-पार्वती का युग्म बनते हैं* और निकृष्ट होने पर आसुरी क्रूर कर्मों में इस प्रकार निरत दीख पड़ते हैं, जैसा कि उपाख्यानों में दानवों एवं शैतान का चित्रण किया जाता है ।
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*😌साधना से सिद्धि😌- पृष्ठ- ६४*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 58 🌺 Rishi chintan se 58 🌺
*🔆२४ दिसंबर २०२२ शनिवार🔆*
*🍁पौष शुक्लपक्षप्रतिपदा२०७९🍁*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*🔆➖❗मन:स्थिति➖❗🔆*
*〰️ही〰️*
*❗परिस्थितियों की जन्मदात्री❗*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *यह एक सुविदित तथ्य है कि "मन:स्थिति" ही "परिस्थितियों" की जन्मदात्री है ।* मनुष्य के सुख-दु:ख, विकास अथवा पतन के लिए मुख्यत: वही जिम्मेदार है । परिस्थितियों की अपनी स्वतंत्रता सत्ता तो है, पर मनुष्य की प्रगति - अवगति में उसकी नगण्य भूमिका ही होती है । *मूलतः कारण आंतरिक स्थिति ही होती है ।* मन की विलक्षण सामर्थ्य और संभावनाओं को रखकर ही ऋषियों ने उसे व्यक्तित्व के प्रत्यक्ष घटकों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना था और यहांँ तक कहा था कि *मनुष्य का मन ही उसके बंधन अथवा मुक्ति का कारण है ।*
👉प्रगति की आकांक्षा रखने तथा महानता का मार्ग गमन करने वालों को सर्वप्रथम मन को ही समझाना - संभालना पड़ता है । अनगढ़ रहने पर वह अड़ियल घोड़े की तरह परेशान करता तथा विकास का मार्ग अवरुद्ध करता है । सुगढ़ता प्राप्त करते ही वह सधे घोड़े की सवारी ढोने, भार लादने की तरह इच्छाओं - आकांक्षाओं का सही नियोजन तथा पूर्ण मनोयोग का परिचय देकर अनेकों प्रकार से सहयोग देता है । उसका स्तर निकृष्ट हो तो पतन - पराभव का मार्ग स्वयमेव खुल जाता है । अनियंत्रित निरुद्देश्य इच्छाएंँ हवा के साथ उड़ने वाले तिनकों की भांति भटकती रहती है । उनसे कोई विशेष प्रयोजन पूरा नहीं होता ।
👉श्रेय मार्ग का चयन करने तथा महानता का वरण करने की जो आकांक्षा करते हैं, उन्हें साधनात्मक प्रयत्न करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी यह भी है कि मन को सही दिशा दें । इच्छाओं - आकांक्षाओं का सही स्वरुप समझें ताकि उन में से उचित का ही वरण कर सकें । *श्रेय मार्ग के पथिक को लक्ष्य ही नहीं,अपने चिंतन का स्वरुप भी निर्धारित करना पड़ता है ।* कारण कि *उत्कृष्ट "जीवन" की ओर चलने में सर्वाधिक सहायक अथवा बाधक अपना "चिंतन" एवं "दृष्टिकोण" ही होता है ।*
➖➖➖➖🍂➖➖➖➖
*नर से नारायण बनने का प्रगति पथ* पृष्ठ-२९
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
➖➖➖➖🍂➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 59 🌺 Rishi chintan se 59🌺
*//२३ दिसंबर २०२२ शुक्रवार//*
*🍁पौष कृष्णपक्ष अमावस्या२०७९🍁*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*◆तृष्णा रुपी सुरसा से सावधान◆*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *"तृष्णा" आदमी को जरूरत से ज्यादा धन - दौलत और सुविधाओं को इकट्ठा करने के लिए उकसाती रहती है ।* सोच यही रहती है कि जितना अधिक ये चीजें रहेगी, हम उतना ही सुखी और प्रसन्न हो जाएंँगे, किंतु यह ख्याल एक धोखा ही सिद्ध होता है ।
👉 इंसान की जरुरत बहुत थोड़ी सी हैं । उन की बनावट ऐसी है कि थोड़े में ही उसका गुजारा हो जाता है । पेट भरने, शरीर को ढकने और परिवार के पालन पोषण के लिए जरूरी चीजों का इंतजाम कुछ ही घंटो की मेहनत मशक्कत करके पूरा हो जाता है । *बाकी समय का उपयोग अपना सुधार करने, अपनी योग्यता बढ़ाने और भगवान के काम में कर सकता है ।* इस तरह की जिंदगी जीने वालों के लिए कोई बड़ी दिक्कत नहीं आती, पर कठिनाई तब होती है, जब धन्ना सेठ बनने की और बहुत सारा ठाठ - बाट बटोरने की सनक दिमाग पर चढ़ी होती है ।
👉 यह लालच आदमी को चैन से बैठने नहीं देता है । ऐसे आदमी के दिमाग में हर घड़ी धन कमाने और उसे कमा कर मौज मस्ती करने की बात घूमती रहती है । इसके वश में हुए व्यक्ति के लिए पैसा ही भगवान बन जाता है और किसी भी तरह उसे जोड़ना उसकी पूजा बन जाती है । *सुख की आशा में वह धन - दौलत और ठाठ - बाट के ढेर लगाता जाता है, किन्तु इसके नतीजे उल्टे ही निकलते हैं ।*
👉 सबसे पहले तो इसके रख-रखाव की चिंता हर समय परेशान किए रहती है, कि कहीं कोई चोर, डाकू, सेंधबाज आदि इस पर हाथ साफ न कर ले । फिर ईर्ष्यालु और दुश्मन - बैरी लोग भी चैन से नहीं बैठने देते । नीचा दिखाने और बदनाम करने की हर संभव कोशिश करते रहते हैं । चापलूस, ठग आदि भी दोस्त बनकर घात लगाए बैठे रहते हैं । बहुत सारा माल - टाल आदतों को बिगाड़ कर तरह - तरह के व्यसनों में उलझा देता है और पता ही नहीं चलता कब शराब, नशा, नाच - गाना ताश - चौपड़ खर्चीले शौक आदि जिंदगी के अंग बनते चले जाते हैं । *समझदार और सही वारिस न मिलने पर इतनी भाग दौड़ कर इकट्ठा की गई संपदा यूँ ही बर्बाद होने का डर अलग से सताता रहता है, जो चैन से मरने भी नहीं देता ।*
➖➖➖➖🍂➖➖➖➖
*//मानव जीवन की गरिमा//* पृष्ठ-९
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*
🌺 ऋषि चिंतन से 60 🌺 Rishi chintan se 60 🌺
*//२२ दिसंबर २०२२ बृहस्पतिवार//*
*🍁पौषकृष्णपक्षचतुर्दशी२०७९🍁*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*"वासना" अनियंत्रित न होने पाए*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *"वासना" में कामुकता मुख्य है ।* इसमें बरती गई ज्यादती जिंदगी की जड़ों पर कुल्हाड़े से किए जाने वाले वार की तरह घातक सिद्ध होती है । *"वासना" की ललक में मनुष्य इससे जुड़ी सारी मान - मर्यादा को भूल जाते हैं ।* जीवनी शक्ति के इस खजाने का नाश करने की उतावली इस तरह बरतते हैं मानो इसमें फायदा ही फायदा हो । चासनी में बुरी तरह से टूट पड़ने वाली मक्खी जिस तरह अपने पंख उसमें फँसाती है और बेमौत मारी जाती है, वैसी ही बुरी दशा कामुकों की होती है ।
👉 *इस कार्य में पशु मनुष्य से अधिक समझदार निकलते हैं ।* वे कुदरत के नियम के अनुसार ठीक समय पर ही वंशवृद्धि का काम करते हैं । संयम - नियम से रहकर समझदारी का बेहतरीन उदाहरण देते हैं और स्वस्थ तथा सुखी रहते हैं । मनुष्य इसको मनोरंजन और खेल मानकर घोर असंयम और मूर्खता भरा जीवन जीता देखा जाता है ।
👉 *"वासना" आदमी को नींबू की तरह निचोड़कर रख देती है ।* यह जिंदगी में सेहत, तंदुरुस्ती और हंँसी- खुशी जैसा सब कुछ निचोडकर छिलके की तरह खोखला बनाकर छोड़ देती है । *कमजोर शरीर तरह-तरह की बीमारियों का अड्डा बन जाता है ।* मन कभी भारी, उदास तो कभी चंचल, अशांत रहता है । किसी काम में मन ठीक से नहीं लगता । किसी विषय पर एकाग्रता भी सध नहीं पाती । ऐसे में न तो जीवन में कोई बड़ी सफलता की आशा की जा सकती है और न ही समाज में सम्मान श्रेय की, क्योंकि ऐसे में व्यक्तित्व अप्रामाणिक और अविश्वसनीय स्तर का ही रह जाता है । फिर ऊँचे आदर्शों पर चलने की बात तो सोच तक ही सीमित रह जाती है ।
👉 *रोगी शरीर और कमजोर मन पर छोटी छोटी बातें भारी प्रभाव डालती है ।* मिजाज क्रोध, भय, ईर्ष्या, द्वेष, चिंता जैसे मानसिक आवेगो से अशांत और विक्षुब्ध रहता है, *किंतु वासना की आग है कि शांत होती ही नहीं ।* ऐसे ऐसे आपराधिक और पैशाचिक दुष्कर्म कर बैठती है कि जिंदगी भर पश्चाताप की आग में जलना पड़ता है ।
👉 *अतः जीवन लक्ष्य के प्रति जागरुक और इसे सुधारने - संवारने में उत्सुक हर मनुष्य का यह परम कर्तव्य बन जाता है कि जीवनी शक्ति के खजाने को बर्बादी से बचाएंँ और संयमित जीवन का आदर्श अपनाएंँ ।*
➖➖➖➖🍂➖➖➖➖
*//मानव जीवन की गरिमा//* पृष्ठ-७
*🍂पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🍂*