💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 186 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐हीरे की पहचान💐💐*
एक राजा का दरबार लगा हुआ था,
क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये
राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..
महाराज के सिंहासन के सामने...
एक शाही मेज थी...
और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि
सभी दरबार मे बैठे थे
और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..
उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा
“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और
अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है
और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”..
अब आपके नगर मे आया हूँ
राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”
तो उसने दोनो वस्तुएं....
उस कीमती मेज पर रख दीं..
वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान
आकार, समान रुप रंग, समान
प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..
राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.
तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो
एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न.
इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा
और एक है काँच का टुकडा।
लेकिन रूप रंग सब एक है.
कोई आज तक परख नही पाया क़ि
कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..
कोइ परख कर बताये की....
ये हीरा है और ये काँच..
अगर परख खरी निकली...
तो मैं हार जाऊंगा और..
यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.
पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं
पहचान पाया तो इस हीरे की जो
कीमत है उतनी धनराशि आपको
मुझे देनी होगी..
इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से...
जीतता आया हूँ..
राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते
क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..
हारने पर पैसे देने पडेगे...
इसका कोई सवाल नही था,
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी,
इसका सबको भय था..
कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. ..
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो...
मैने सब बाते सुनी है...
और यह भी सुना है कि....
कोई परख नही पा रहा है...
एक अवसर मुझे भी दो.. ..
एक आदमी के सहारे....
वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की...
मै तो जनम से अंधा हू....
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..
और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं..
और यदि सफल न भी हुआ...
तो वैसे भी आप तो हारे ही है..
राजा को लगा कि.....
इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है...
राजा ने कहा क़ि ठीक है..
तो तब उस अंधे आदमी को...
दोनो चीजे छुआ दी गयी..
और पूछा गया.....
इसमे कौन सा हीरा है....
और कौन सा काँच….?? ..
यही तुम्हें परखना है.. ..
कथा कहती है कि....
उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..
जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था
वह नतमस्तक हो गया..
और बोला....
“सही है आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…
अपने वचन के मुताबिक.....
यह हीरा.....
मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..
सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था वह भी
बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम
कोई तो मिला परखने वाला..
उस आदमी, राजा और अन्य सभी
लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही
जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..
उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक
धूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ ..
जो ठंडा रहा वह हीरा.....
जो गरम हो गया वह काँच...
जीवन मे आप भी देखना.....
👇👇👇👇
जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये...
वह व्यक्ति "काँच" है।
और
जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे.....
वह व्यक्ति "हीरा" है..!!
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 187 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐जीवन की डोर💐💐*
एक सन्त थे ,जो एक छोटे आश्रम का संचालन करते थे !
एक दिन पास के ही रास्ते से
एक राहगीर को पकड़ करके अन्दर ले आये !
और शिष्यों के सामने उस से प्रश्न किया,
कि यदि तुम्हें सोने की अशर्फियों की एक थैली,
रास्ते में, पड़ी मिल जाए ; तो तुम क्या करोगे ?
वह आदमी बोला -
"मैं तत्क्षण उसके मालिक का पता लगा कर
उसे वापस कर दूँगा अन्यथा राज-कोष में जमा करा दूँगा !
सन्त हँसे और राहगीर को विदा कर के शिष्यों से बोले -
"यह आदमी मूर्ख है !"
शिष्य बड़े हैरान कि गुरुजी क्या कह रहे हैं ?
इस आदमी ने ठीक ही तो कहा है तथा
सभी को ही यह सिखाया गया है -
कि ऐसे किसी परायी वस्तु को ग्रहण नहीं करना चाहिए !
थोड़ी देर बाद
फिर सन्त किसी दूसरे को अन्दर ले आये और
उस से भी वही प्रश्न दोहरा दिया !
उस दूसरे राहगीर ने उत्तर दिया कि
क्या मुझे निरा मूर्ख समझ रखा है ?
जोकि स्वर्ण मुद्राएँ पड़ी मिलें और
मैं लौटाने के लिए मालिक को खोजता फिरूँ ?
तुम ने मुझे समझा क्या है ?
वह राहगीर जब चला गया - तो सन्त ने कहा,
"यह व्यक्ति शैतान है !"
तो शिष्य बड़े हैरान हुए कि
पहला मूर्ख और दूसरा शैतान,
फिर गुरु जी चाहते क्या हैं ?
अबकी बार सन्त
तीसरे राहगीर को पकड़ कर अन्दर ले आये और
वही प्रश्न दोहराया !
तो उस राहगीर ने बड़ी ही सज्जनता से यह उत्तर दिया,
"महाराज ! अभी तो कुछ कहना बड़ा मुश्किल है !
इस चाण्डाल मन का क्या भरोसा - कब धोखा दे जाए ?
एक क्षण की खबर नहीं !
यदि परमात्मा की कृपा रही और सद्बुद्धि बनी रही,
तो लौटा दूँगा !"
सन्त बोले - "यह आदमी ही सच्चा है !
इसने अपनी डोर परमात्मा को सौंप रखी है ;
ऐसे व्यक्तियों द्वारा कभी भी गलत निर्णय नहीं होता !"
ज्येष्ठ पाण्डव, सूर्य-पुत्र कर्ण,
तो कर्म, धर्म का ज्ञाता था !
क्या कारण था कि
वह अपने छोटे भाई अर्जुन से हार गया
जबकि कर्म और धर्म दोनों में वह अर्जुन से श्रेष्ठ था ! कारण था कि
अर्जुन ने तो अपने घर से निकलने से पहले ही
अपने जीवन रथ की डोरी,
भगवान श्री कृष्ण के हाथ में दे दी थी !
हमें भी इसी प्रकार अपने मन तथा जीवन की डोर गुरु-परमात्मा के हाथ में दे देनी चाहिए !
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 188 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐थप्पड़💐💐*
उस बस स्टैण्ड में तीन दयालु व्यक्ति, और एक कहीं से भी दयालु नहीं लगने वाला व्यक्ति बैठा था । वो सभी बातें कर ही रहे थे कि इतने में एक बुढ़िया अपने दोनों बेटों के विक्षिप्त होने के कारण दाने-दाने को मोहताज़ होने की जानकारी देते हुए रोने लगी ।
इस पर पहले दयालु ने कहा-‘‘तुम लोग भूखे मर रहे हो इसका यह अर्थ हेै कि, राज्य नीति-निर्देशक तत्वों का पालन नहीं कर रहा है, मैं इस बात को विधानसभा और लोकसभा तक ले जाऊँगा ।’’
दूसरे दयालु ने कहा-‘‘ये तुम्हारे गाॅंव वालों के लिये शर्म की बात है कि उनके होते हुए एक परिवार भूख से मर रहा है ।’’
तीसरे दयालु ने कहा-‘‘माई अब रोना-धोना बंद करो । मैं बड़ा ही भावुक क़िस्म का आदमी हूॅं । तुम्हें रोता देखकर मुझे भी रोना आ रहा है ।’’
चौथा व्यक्ति निस्पृह भाव से उनकी बातें सुनता रहा, और फिर उठकर वहाँ से चला गया ।
इस पर एक दयालु ने कहा-देखो तो लोग दो शब्द सांत्वना के भी नहीं बोल सकते। कुछ देर बाद वह चौथा व्यक्ति एक थैले में दस क़िलो चावल लेकर आया, और बड़ी ही ख़ामोशी से उसने उस बुढिया को थैला सौंप दिया।
अचानक तीनों दयालुओं का हाथ अपने-अपने गालों तक पहुँच गया । उन्हेंं ऐसा लगा, जैसे किसी ने उन्हें झन्नाटेदार थप्पड़ रसीद कर दिया हो ।
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 189 💮
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*💐💐कृष्ण लीला💐💐*
एक महिला रोटी बनाते बनाते "ॐ नमो भगवते वासूदेवाय नम:" का जाप कर रही थी, अलग से पूजा का समय कहाँ निकाल पाती थी बेचारी, तो बस काम करते करते ही..."ॐ नमो भगवते वासूदेवाय नम:"! एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ मे दर्दनाक चीख। कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़ कर झांकी तो आठ साल का चुन्नू चित्त पड़ा था, खुन से लथपथ। मन हुआ दहाड़ मार कर रोये। परंतु घर मे उसके अलावा कोई था नही, रोकर भी किसे बुलाती, फिर चुन्नू को संभालना भी तो था।
दौड़ कर नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में माँ माँ की रट लगाए हुए है। अंदर की ममता ने आंखों से निकल कर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया। फिर 10 दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहाँ से इतनी शक्ति आ गयी कि चुन्नू को गोद मे उठा कर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी। रास्ते भर भगवान को जी भर कर कोसती रही, बड़बड़ाती रही, हे कन्हैया क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा, जो मेरे ही बच्चे को..। खैर डॉक्टर सा. मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया।
चोटें गहरी नही थी, ऊपरी थीं तो कोई खास परेशानी नही हुई।... *रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे तब उस औरत का मन बेचैन था। भगवान से विरक्ति होने लगी थी। एक मां की ममता प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही थी।*
उसके दिमाग मे दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी। कैसे चुन्नू आंगन में गिरा की एकाएक उसकी आत्मा सिहर उठी, कल ही तो पुराने चापाकल का पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया है, ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था। अगर कल मिस्त्री न आया होता तो..?
उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया जहां टांके अभी हरे ही थे, ऑपरेशन के। आश्चर्य हुआ कि उसने 20-22 किलो के चुन्नू को उठाया कैसे, कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी? फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू। वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नही ले जा पाती।
फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो 2 बजे तक ही रहते हैं और जब वो पहुंची तो साढ़े 3 बज रहे थे, उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ, मानो किसी ने उन्हें रोक रखा था।
उसका सर प्रभु चरणों मे श्रद्धा से झुक गया। अब वो सारा खेल समझ चुकी थी। मन ही मन प्रभु से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।
तभी टीवी पर ध्यान गया तो प्रवचन आ रहा था :--- *प्रभु कहते हैं, "मैं तुम्हारे आने वाले संकट रोक नहीं सकता, लेकिन तुम्हे इतनी शक्ति दे सकता हूँ कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको, तुम्हारी राह आसान कर सकता हूँ। बस धर्म के मार्ग पर चलते रहो।"* उस औरत ने घर के मंदिर में झांक कर देखा, कन्हैया मुस्कुरा रहे थे, मेरे कान्हा ..!!
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 190 💮
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*💐💐कर्म की गति💐💐*
एक कारोबारी सेठ सुबह सुबह जल्दबाजी में घर से बाहर निकल कर ऑफिस जाने के लिए कार का दरवाजा खोल कर जैसे ही बैठने जाता है, उसका पाँव गाड़ी के नीचे बैठे कुत्ते की पूँछ पर पड़ जाता है। दर्द से बिलबिलाकर अचानक हुए इस वार को घात समझ वह कुत्ता उसे जोर से काट खाता है। गुस्से में आकर सेठ आसपास पड़े 10-12 पत्थर कुत्ते की ओर फेंक मारता है पर भाग्य से एक भी पत्थर उसे नहीं लगता है और वह कुत्ता भाग जाता है।
सेठजी अपना इलाज करवाकर ऑफिस पहुँचते हैं जहां उन्होंने अपने मातहत मैनेजर्स की बैठक बुलाई होती है। यहाँ अनचाहे ही कुत्ते पर आया उनका सारा गुस्सा उन बिचारे प्रबन्धकों पर उतर जाता है। वे प्रबन्धक भी मीटिंग से बाहर आते ही एक दूसरे पर भड़क जाते हैं - बॉस ने बगैर किसी वाजिब कारण के डांट जो दिया था।
अब दिन भर वे लोग ऑफिस में अपने नीचे काम करने वालों पर अपनी खीज निकलते हैं – ऐसे करते करते आखिरकार सभी का गुस्सा अंत में ऑफिस के चपरासी पर निकलता है जो मन ही मन बड़बड़ाते हुए भुनभुनाते हुए घर चला जाता है। घंटी की आवाज़ सुन कर उसकी पत्नी दरवाजा खोलती है और हमेशा की तरह पूछती है “आज फिर देर हो गई आने में.... वो लगभग चीखते हुए कहता है “मै क्या ऑफिस कंचे खेलने जाता हूँ ? काम करता हूँ, दिमाग मत खराब करो मेरा, पहले से ही पका हुआ हूँ, चलो खाना परोसो।”
अब गुस्सा होने की बारी पत्नी की थी, रसोई मे काम करते वक़्त बीच बीच में आने पर वह पति का गुस्सा अपने बच्चे पर उतारते हुए उसे जमा के तीन चार थप्पड़ रसीद कर देती है। अब बिचारा बच्चा जाए तो जाये कहाँ, घर का ऐसा बिगड़ा माहौल देख, बिना कारण अपनी माँ की मार खाकर वह रोते रोते बाहर का रुख करता है, एक पत्थर उठाता है और सामने जा रहे कुत्ते को पूरी ताकत से दे मारता है। कुत्ता फिर बिलबिलाता है.
*💐💐शिक्षा💐💐*
दोस्तों,ये वही सुबह वाला कुत्ता था !!! अरे भई उसको उसके काटे के बदले ये पत्थर तो पड़ना ही था केवल समय का फेर था और सेठ जी की जगह इस बच्चे से पड़ना था !!! उसका कार्मिक चक्र तो पूरा होना ही था ना !!! इसलिए मित्र यदि कोई आपको काट खाये, चोट पहुंचाए और आप उसका कुछ ना कर पाएँ, तो निश्चिंत रहें, उसे चोट तो लग के ही रहेगी, बिलकुल लगेगी, जो आपको चोट पहुंचाएगा, उस का तो चोटिल होना निश्चित ही है, कब होगा किसके हाथों होगा ये केवल ऊपरवाला जानता है पर होगा ज़रूर , अरे भई ये तो सृष्टी का नियम है !!
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