ऋषि चिंतन से भाग 18

प्राकृतिक जीवन जीने के फायदे



🌺 ऋषि चिंतन से 86🌺 Rishi chintan se 86🌺


*🥀//२३ अप्रैल २०२३ रविवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष तृतीया२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *क्रोध से बचने के कुछ प्रभावी सूत्र*
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👉 *घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि "क्रोध" के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का संपूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें ।* इससे सदैव हानि ही होती है । *प्रायः देखा गया है कि "क्रोध" का कारण जल्दबाजी है ।* किसी वस्तु को प्राप्त करने या इच्छापूर्ति में कुछ विलंब लगता है तो लोगों को क्रोध आ जाता है । *इसलिए अपने स्वभाव में "धैर्य" और "संतोष" का विकास करना चाहिए ।*
👉 जब कोई कार्य गलत हो जाए या कोई हानि हो जाए तो उसे समझने में जल्दबाजी न करें । गंभीरतापूर्वक सोचें कि यह सब किस कारण हुआ ? *आप निर्णय करते समय बुद्धि में पर्याप्त उदारता बनाए रखिए, इससे आपको बड़ी शांति मिलेगी ।* यदि कोई दूसरा व्यक्ति आप को अपशब्द या कड़वे वचन कहता है तो *आप यह समझ कर कि वह व्यक्ति मूर्ख है, कुछ न बोलिए, मौन व्रत कर लीजिए ।* इससे आप अकारण उत्तेजित भी नहीं होंगे और कोई अयाचित घटना भी नहीं घटेगी । *मन ही मन सामने वाले की बेवकूफी पर मुस्कुराते रहिए, देखिए आपके जी में जरा भी दु:ख नहीं आएगा ।*
👉 एक गिलास ठंडा पानी पीकर अपना *"क्रोध"* शांत करने की विद्या भी बड़ी उत्तम है । *"क्रोध"* आए तो कुछ देर के लिए उस स्थान से हट जाइए, किसी शीतल बगीचे में घूम आइए । *एक अत्यंत सरल उपाय यह भी है कि अपने किसी प्रियजन के पास बैठकर थोड़ी देर स्नेह पूर्ण बातें करके उनकी सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयास कीजिए ।*
👉 *"क्रोध" का एक कारण असात्विक आहार भी होता है ।* मिर्च-मसाले तथा खटाई खाने वाले अधिकांश व्यक्ति क्रोधी और चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं । *कुढ़ते हुए भोजन करना एक बड़ा दुर्गुण है ।* कदाचित आपको *"क्रोध'* आता ही हो तो एक और प्रयोग कीजिए । जैसे ही *"क्रोध"* आए चुपचाप अपने कमरे में चले जाइए और एक स्वच्छ सा शीशा लेकर उसमें अपनी आकृति देखिए । अनुभव कीजिए *"क्रोध"* के कारण आपका मुँह कैसा हो गया है । अब थोड़ा जल लेकर साबुन से मुँह धो कर तोलिया से मुँह साफ कर लीजिए और फिर शीशे के सामने खड़े हो जाइए देखिए फिर से सुंदरता प्राप्त कर ली है । *अब जरा मुस्कुराइए आपको प्रसन्नता मिलेगी ।*
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*आवेशग्रस्त होने से अपार हानि- पृष्ठ-१३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 87🌺 Rishi chintan se 87🌺



*🥀//२० अप्रैल २०२३ गुरुवार//🥀*
*//वैशाखकृष्णपक्ष अमावस्या२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *बात-बात पर उद्विग्न न हों*
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👉 जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए तत्संबंधी योग्यता, अनुभव के साथ-साथ मानसिक संतुलन, शांत मस्तिष्क की भी अधिक आवश्यकता होती है । *कोई व्यक्ति कितना ही योग्य, अनुभवी, गुणी क्यों न हो, यदि बात-बात पर उसका मन आँधी-तूफान की तरह खुद उद्वेलित, अशांत हो जाता हो तो वह जीवन में कुछ भी नहीं कर पाएगा ।* उसकी शक्तियाँ व्यर्थ में ही नष्ट हो जाएँगी और भली प्रकार से वह अपने काम पूरे नहीं कर सकेगा ।
👉 *प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम "शांत" और "संतुलित" मस्तिष्क के द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं ।* संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, उसके मूल में धीर-गंभीर, शांत मस्तिष्क ही रहे हैं । *कोई भी साहित्यकार, वैज्ञानिक, कलाकार व शिल्पी यहाँ तक कि बढ़ई, लुहार, सफाई करने वाला श्रमिक तक अपने कार्य तब तक भली-भाँति नहीं कर सकते, जब तक उनकी मन:स्थिति शांत न हो ।* कोई भी साधना स्वस्थ, संतुलित मनोभूमि में ही फलित हो सकती है । जो क्षण-क्षण में उत्तेजित हो जाता हो, सामान्य सी घटनाएँ जिसे उद्वेलित कर देती हों, *जिसका मन अशांत और विक्षुब्ध बना रहता हो, ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य भली प्रकार से नहीं कर सकेगा और न वह अपने काम के बारे में ठीक-ठीक सोच-समझ ही सकेगा ।*
👉 *शांत और संतुलित अवस्था में ही मन कार्य करने तथा भली प्रकार सोचने-समझने की सहज स्थिति में होता है ।* ऐसी ही दशा में वह कोई रचनात्मक उपयोगी बात सोच सकता है और उसे पूरी कर सकता है । *संतुलित स्थिति में मनुष्य की शक्तियाँ एकाग्र, केंद्रित और परस्पर सहयोगी होकर काम करती हैं ।* अशांत स्थिति में आवेग,उद्वेगों में शक्तियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं । *वे अपनी मनचाही दिशाओं में दौड़ने लगती हैं ।* 
 👉मन में उठने वाले उद्वेगों का मुख्य कारण शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता ही है । पाचन-क्रिया की गड़बड़ी, जीर्ण रोग, अनिद्रा दुर्बलता आदि से मन भी अस्त-व्यस्त और उद्विग्न बन जाता है । शरीर. में कोई गड़बड़ी हो, कोई कष्ट हो, तो. प्रायः चिड़चिड़ाहट, अधीरता, मानसिक अशांति, और अतृप्ति पैदा हो जाती है, जो मन को *"असंतुलित"* बना देती है । *संतुलित और शांत मनोदशा के लिए हमें अपने स्वास्थ्य को सुधारना होगा ।* ऐसा वातावरण और संगत जिसमें हमें बार-बार उद्विग्न होना पडे़, *मनोभूमि असंतुलित हो जावे उससे बचते-बचते रहना चाहिए ।*
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*आवेशग्रस्त होने से अपार हानि- पृष्ठ-३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 88🌺 Rishi chintan se 88🌺



*🥀//२१अप्रैल२०२३ शुक्रवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष प्रतिपदा२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *"धन" को कितना महत्व दें ?*
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👉 *मनुष्य की बुद्धिमत्ता में संदेह नहीं ।* वह उपार्जन के क्षेत्र में सबसे अधिक चतुरता दिखाता है । *यदि नीतिपूर्वक प्रचुर संपदा नही कमा सकता तो धंधे में बेईमानी का यथानीति समावेश करने में भी चूकता नहीं ।* यह संयोग की बात है कि सूझ-बूझ की कमी या परिस्थितियों की प्रतिकूलता से इच्छित स्तर की सफलता न मिले फिर भी वह हार नहीं मानता । एक नहीं अनेक प्रयत्न करता रहता है । *दाँव न लगे तो बात दूसरी है, अन्यथा नीति-अनीति का कोई ऐसा मार्ग छोड़ता नहीं, जिसके आधार पर कम समय में अधिक धनाढ्य बन सकना संभव हो सके ।*
👉 उपार्जन का उपयोग कहाँ किया जाए ? किसलिए किया जाए ? किस प्रकार किया जाए ? इस संबंध में भी उसका निश्चय ऐसा नहीं होता जिसे निर्भ्रांत या उपयोगी कहा जाए । *अनीति द्वारा किया गया "उपार्जन" और अविवेकपूर्वक किया गया "अपव्यय" दोनों ही एक से एक बढ़कर खतरनाक होते हैं।* ऐसे दुष्परिणाम उत्पन्न करते हैं, जिनके लिए पीछे पश्चाताप ही करते रहना पड़े ।
👉 *इस सबका कारण है "धन" को अत्यधिक महत्व देना ।* उसी को सुख-संतोष का एकमात्र कारण मानना । जीवन की सफलता और प्रगति की संभावना का उसी को आधार मान बैठना ऐसी भ्रांति है, *जिसके कारण बहुमूल्य जीवन का समूचा "ज्ञान" और "कर्म" पूरी तरह नियोजित कर दिया जाता है ।* इस एक ही दिशा में इतनी अधिक विचारणा और क्रियाशीलता जुड़ जाती है कि अन्यान्य महत्वपूर्ण प्रयोजनों में.से और किसी के लिए न कुछ सोचते बन पड़ता है और न करते-धरते । फलतः जीवन विकास की अन्य सभी दिशा धाराएँ उपेक्षित स्थिति में पड़ी रहती हैं, एकाकीपन छा जाता है । एक पक्ष भी उतना सफल नहीं हो पाता, जितनी इच्छा थी । कारण कि *धन उपार्जन की सीमा है ।* अतएव पग-पग पर स्पर्धा बनी रहती है । सभी अपनी-अपनी ओर खींचतान करते हैं । इसे संयोग ही कहना चाहिए कि किसी के हाथ कुछ जमा पूंजी जैसा वैभव लग जाता है और किसी को मन मसोसकर रहना पड़ता है । *ऐसी दशा में यह भी हो सकता है कि कोई परिश्रमी, पुरुषार्थी भी खाली हाथ रहे । उसे स्वल्प में ही संतोष करना पड़े ।*
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*"समझदारों" की "नासमझी" पृष्ठ-८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 89🌺 Rishi chintan se 89🌺



🥀//१९अप्रैल२०२३ बुधवार//🥀
//वैशाखकृष्णपक्ष चतुर्दशी२०८०//
                  
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            ‼ऋषि चिंतन‼
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     इस पर गंभीरतापूर्वक सोचें
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👉 मनुष्य की प्रधान विशेषता उसकी विचारशीलता है । इसी आधार पर उसकी विचारणा, कल्पना, विवेचना, धारणा का विकास होता है ।अनेक "विशेषताओं' के साथ ही एक "भौतिक दुर्गुण" भी है कि समीपवर्ती वातावरण में जो कुछ होता देखता है, उसी के अनुसरण का अभ्यासी बन जाता है ।
👉 जीवन के साथ घनिष्ठता पूर्वक जुड़ी हुई एक कुटेव "चटोरेपन" की है । सृष्टि के सभी प्राणी अपना स्वाभाविक आहार कच्चे रूप में प्राप्त करते हैं, कोई प्राणी अपने भोजन को पकाता, भूनता, तलता, मिर्च-मसाले, शक्कर आदि के आधार पर चटपटा नहीं बनाता । मनुष्य ने पाक कला सीखी, जायकेदार व्यंजन बनाना और स्वाद के.नाम पर अभक्ष्य खाना आरंभ कर दिया । फलतः पाचनतंत्र खराब हुआ, अनेकानेक रोग पीछे पड़े और जीवन अवधि में भारी कटौती हो गई । यदि यह कुटेव न अपनाई गई होती, उपयुक्त शाकाहार पर निर्भर रहा गया होता तो प्रायः आधे आहार से काम चल जाता । पकने में लगने वाला श्रम और धन बर्बाद न होता । पेट ठीक बना रहता, शरीर में शक्ति रहती और लंबा जीवन जीने का अवसर मिलता, पर मनुष्य है जो चटोरा बनकर गुलाम रहने में ही प्रसन्नता अनुभव करता है। व्यंजनों में अपनी रुचि बढ़ाता ही जाता है । फलतः दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु को न्यौत बुलाता है, इसे "समझदारी" को "नासमझी" न कहा जाए तो और क्या कहें ?
👉 लोग घरों में रहते हैं, पर यह आवश्यक नहीं समझते कि घर की बनावट ऐसी हो जिसमें धूप और हवा का आवागमन पूरी तरह होता रहे । किंतु देखा जाता है कि झोपड़ी में रहने की अपेक्षा ऐसे घरों में लोग रहते हैं, जिनमें न धूप पहुँचती है और न हवा ।
👉 यदि मनुष्य ने प्राकृतिक जीवन जिया होता, प्रकृति के सान्निध्य में रहा होता, आहार-विहार में व्यतिक्रम न किया होता, धूप, हवा के संपर्क से अपने को बचाकर न रखा होता तो "आरोग्य" जैसी बहुमूल्य संपदा को गँवा बैठने का त्रास न सहना पड़ता । जैसे-जैसे मनुष्य ने अपनी जीवनशैली में कृत्रिमता को बढ़ावा दिया वैसे-वैसे उसने अपने लिए संकटों को आमंत्रण दिया । मनुष्य की विचारणा शक्ति से नित नूतन अन्वेषण तो होंगें, लेकिन जीवन तो हमें जीना है, आत्म-संयम को अपना कर सुखमय जीवन जिया जा सकता है।
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"समझदारों" की "नासमझी" पृष्ठ-६
     🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴
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🌺 ऋषि चिंतन से 90🌺 Rishi chintan se 90🌺


*🥀//२४ अप्रैल २०२३ सोमवार//🥀*
*//वैशाख शुक्लपक्ष चतुर्थी २०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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       *➖प्रगति करने हेतु➖*
     *〰️तीव्र इच्छा कीजिए〰️*
     *तीव्र इच्छा अर्थात्."आकांक्षा"*
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👉 रामायण कहती है--
 *जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू ।*
 *सो तेहि मिलहि न कछु संदेहू।।* 
मनुष्य जिस प्रकार की इच्छा करता है, वैसी ही परिस्थितियाँ उसके निकट एकत्रित होने लगती है । *"इच्छा" एक प्रकार की चुंबकीय शक्ति है, जिसके आकर्षण से अनुकूल परिस्थितियाँ खिंची चली आती है ।* जहाँ इच्छा नहीं वहाँ कितने ही अनुकूल साधन मौजूद हों, पर कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त नहीं होती ।
👉 मन में जो इच्छा प्रधान रूप से काम करती है, उसे पूरा करने के लिए शरीर की समस्त शक्तियाँ काम करने लगती है । *"निर्णय शक्ति", "निरीक्षण शक्ति", "अन्वेषण शक्ति", "आकर्षण शक्ति", "चिंता शक्ति", "कल्पना शक्ति" आदि मस्तिष्क की अनेकों शक्तियाँ उसी दिशा में अपना प्रयत्न आरंभ कर देती हैं ।* यह शक्तियाँ जब सुप्त अवस्था में पड़ी होती हैं, या विभिन्न दिशाओं में बिखरी होती हैं, मनुष्य की स्थिति अस्त-व्यस्त एवं नगण्य ही होती हैं, परंतु जब वे सब शक्तियाँ एक ही दिशा में काम करना प्रारंभ कर देती हैं, तो एक जीवित चुंबक पत्थर को कूड़े कचरे में भी फिराया जाए तो धातु के जो टुकड़े इधर-उधर बिखरे रहे होंगे वे उससे चिपक जाएँगे । इसी प्रकार विशिष्ट आकांक्षाएँ मन में धारण किए हुए व्यक्ति अपनी आकर्षण शक्ति से उन सब तत्वों को ढूँढता और प्राप्त करता रहता है जो लघु कणों के रूप में जहाँ-तहांँ बिखरे पड़े होते हैं ।
👉 आपको अपने पड़ोसी के घर की बातों की बहुत कम जानकारी है । परंतु उस घर में कितनी संपत्ति कहाँ रखी हुई है इसका पूरा विवरण कई मील दूर रहने वाले चोर को पता लग जाता है । कारण यह है कि चोर सदा तलाश में रहता है कि लोगों की संपत्तियों के स्थान, परिमाण और मूल्य की उसे जानकारी हो । *यह तलाश की "इच्छा" ही उसे ऐसे सूत्र उपलब्ध करा देती है, जिनसे उसे बड़े-बड़े गहरे भेद मालूम हो जाते हैं और एक दिन वह उस घर में जाकर बड़ी सफल चोरी कर भी लेता है ।* जुआरी, शराबी, नशेबाज अपने जैसे लोग ढूंढ लेते हैं । साधु विद्वान की भी परस्पर भेंट होती रहती है । हर अभिरुचि के लोग इस दुनिया में मौजूद हैं और *अपने समान विचार वालों का सहयोग करना मनुष्य का स्वभाव है । श्री रामचंद्र जी अकेले घोर विपत्ति में पड़े हुए, सुनसान वनों में भटक रहे थे, तब भी उन्हें गिद्ध, रीछ, बंदर आदि का सहयोग प्राप्त हो गया था ।*
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*सफलता के तीन साधन- पृष्ठ-७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/wyvp0LeesWs










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