ऋषि चिंतन से भाग 19

   मानसिक संतुलन बनाए रखिए 


🌺 ऋषि चिंतन से 91🌺 Rishi chintan se 91🌺

*🥀//२९ अप्रैल २०२३ शनिवार//🥀*
*💦वैशाखशुक्लपक्षनवमी२०८०💦*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *मानसिक संतुलन बनाए रखिए*
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👉 *मस्तिष्कीय स्वास्थ्य को सही रखने के लिए आवश्यक है कि जीवन को खिलाड़ी की तरह जिया जाए ।* उस भागदौड़ में लगने वाली छोटी-मोटी ठोकरों, हार-जीतों को महत्व न दिया जाए । इन्हें रात दिन के ज्वार-भाटे जैसा नियति का कौतुक - कौतूहल मात्र माना जाए । हर काम में चुस्ती और मुस्तैदी भी बरती जाए, पर यह आशा न रखी जाए कि इच्छित कामना के अनुरूप ही परिस्थितियाँ बनती चली जाएँगी । *प्रतिकूलताएँ भी आती रहती हैं, उनका "खट्टा-मीठा" स्वाद तो चखते रहा जाए, पर अवसर ऐसा न आने दिया जाए कि हर्ष शोक की इतनी असाधारण अनुभूति हो कि मानसिक संतुलन ही गड़बड़ा जाए ।* आवेश चढ़ दौड़े और उत्तेजना में ऐसा कुछ न कर बैठा जाए जो अस्वाभाविक एवं अनावश्यक हो, जिसके लिए पीछे पछताना और लोगों का उपहास-तिरस्कार सहना पड़े ।
👉 *हर काम को पूरी समझदारी, जिम्मेदारी, तत्परता और तन्मयता के साथ किया जाए ।* उसमें आलस्य-प्रमाद को प्रवेश न होने दिया जाए । उपेक्षा-शिथिलता का लांछन न लगने दिया जाए । *इतने पर भी यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि जो चाहा है वही होकर रहेगा ।* तैयार उसके लिए भी रहा जाए कि जो आंशिक सफलता मिले अथवा सर्वथा असफल रहना पड़े तो विचलित होने की मन:स्थिति न बनने पाए । *सोचा जाना चाहिए कि संसार हमारे लिए ही नहीं बना है ।* इसमें असंख्यों की साझेदारी है । *जो अपने लिए लाभदायक समझा जाता है, उससे दूसरों की हानि भी हो सकती है ।* प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए सभी का ध्यान रखना पड़ता है । खेल में एक जीतता है तो दूसरा हारता है । *यही बात घटनाक्रमों के संबंध में भी लागू होती है ।* इच्छापूर्ति की आतुरता की महत्वाकांक्षा बनी रहती है । आवश्यक नहीं कि हर किसी की पूरी ही होती रहे । अस्तु किसी भी विचारशील को हार-जीत के लिए, अनुकूलता-प्रतिकूलता में से कोई भी हाथ लगने की संभावना से पूर्व मानस बना लेना चाहिए । *प्रतिकूलताएँ ऐसी न हों, जो आवेश ग्रस्त मानस बना दे और अपनी विवेक शक्ति का ही अपहरण कर ले ।* वही तो एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके सहारे कठिनाइयों से बचना-छूटना संभव होता है
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*समग्र स्वास्थ्य संवर्धन कैसे ? पृष्ठ-१९*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/oTRU5Gwj0V4







🌺 ऋषि चिंतन से 92🌺 Rishi chintan se 92🌺

*🥀२५ अप्रैल २०२३ मंगलवार🥀*
*// वैशाखशुक्लपक्ष पंचमी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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  *कष्ट के पीछे के भाव को.समझिए*
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👉 *सफलता का मार्ग सुलभ नहीं है,* उसमें पग पग पर काँटे बिछे हुए हैं । शहद मधुमक्खियों के जहरीले डंकों की बाढ़ के भीतर छिपा रहता है । *जो उन तीक्ष्ण डंकों का सामना कर सकता है वही शहद को पा सकता है ।* सुंदर व्याघ्र चर्म पाने की इच्छा रखने वालों को काल सी कराल दाढ़ों वाले व्याघ्र से युद्ध करना पड़ता है । गुलाब के सुंदर फूल का डंठल काँटों से भरा होता है । *इन काँटों के खतरे को उठाकर ही कोई उस फूल को तोड़ सकता है ।* मोती ढूँढने वाले को मगरमच्छों से भरे हुए समुद्र की तली तक दौड़ लगानी पड़ती है । भगवान की प्राप्ति करने वाले साधकों को पहले कठोर साधना के कष्टों को सहना पड़ता है । 
👉 *"कष्ट" और "कठिनाई" का व्यवधान उन्नति की हर दिशा में मौजूद रहता है ।* ऐसी एक भी सफलता नहीं है जो कठिनाइयों से संघर्ष किए बिना ही प्राप्त हो जाती हो । जीवन के महत्वपूर्ण मार्ग विघ्न बाधाओं से सदा ही भरे रहते हैं । *यदि परमात्मा ने सफलता का कठिनाई के साथ गठबंधन न किया होता उसे सुलभ बना दिया होता तो मनुष्य जाति का वह सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता ।* तब सरलता से मिली हुई सफलता बिल्कुल नीरस एवं उपेक्षित हो जाती । *जो वस्तु जितनी कठिनाई से, जितना अधिक खर्च करके मिलती है वह उतनी ही आनंददायक होती है ।* कोई शाक्य फल जिन दिनों सस्ता और काफी संख्या में मिलता है उन दिनों उसकी कोई पूछ नहीं होती, पर जिन दिनों वह दुर्लभ होता है उन दिनों अमीर लोग खोज करा कर महंगे दामों पर खरीदते हैं । अमीर के लिए रुपया ठीकरी के बराबर है पर गरीब को वह चंद्रमा के समान बड़ा मालूम पड़ता है । जब लकड़ियाँ घिसकर आग पैदा की जाती थी तब अग्नि का बड़ा भारी महत्व था । देवता की तरह की पूजा होती थी । पर जब आज दियासलाई के बाक्स दुकान में भरे पड़े हैं, तब अग्नि की कौन परवाह करता है । *जिनके संतति नहीं है उनके लिए एक बालक का होना किसी देवता के अवतार लेने के बराबर महत्वपूर्ण है,* पर जिनके यहाँ हर दूसरे वर्ष बच्चे आ सकते हैं उनके लिए नए बालक का जन्म चिंता, झुंझलाहट दुर्भाग्य सूचक और कष्टदायक होता है ।
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*सफलता के तीन साधन- पृष्ठ-२६*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/yYuuWvvLxuY







🌺 ऋषि चिंतन से 93🌺 Rishi chintan se 93🌺



*🥀//२६ अप्रैल २०२३ बुधवार//🥀*
*🍁वैशाखशुक्लपक्ष षष्ठी२०८०🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*क्या आपके पास..........*
      *आवश्यकता से अधिक धन है*
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👉 *जो अधिक उपार्जन कर सकते हैं, उनका उत्तरदायित्व है कि सामान्य सामाजिक स्तर से बढ़-चढ़कर आडंबर न बनावें, सादगी से रहें और उसी प्रकार से जीवन यापन करें जैसा कि उस देश के सामान्य नागरिकों को बिताना पड़ता है ।* थोड़ा अंतर रह सकता है, पर वह उतना ही होना चाहिए जितना हाथ की पाँचों उंगलियों की लंबाई में थोड़ा सा अंतर रहता है । *बहुत भारी राजा और रंक जैसा अंतर सामाजिक रहन-सहन में रहना केवल द्वेष की आग ही भड़का सकता है और उससे अनाचार ही उत्पन्न हो सकता है ।*
👉 आर्थिक उपार्जन की क्षमता की सार्थकता एवं प्रशंसा इस बात में है कि उसका उपयोग अपने से पिछड़े हुए लोगों को ऊँचा उठाने में किया जाए । *"दान" इन लोगों का एक नैतिक कर्तव्य है, जो अपने आवश्यक खर्चों के अतिरिक्त कुछ अधिक धन कमा या बचा सकते हैं ।* अपरिग्रह एक धर्म कर्तव्य माना गया है । *जितनी अनिवार्य आवश्यकता है उतने से अधिक का संग्रह "परिग्रह" रूपी "पाप" की श्रेणी में गिना जाना चाहिए ।* किसे कितनी आवश्यकता है इसका निर्णय उस समाज की मध्यम श्रेणी के स्तर के आधार पर किया जाना चाहिए । *अन्यथा कोई व्यक्ति "विलासिता" को भी अपनी "आवश्यकता" सिद्ध करने लगेगा ।*
👉 *आर्थिक उपार्जन की क्षमता का होना प्रशंसनीय है ।* पर उस प्रशंसा की सार्थकता तभी है, जब व्यक्तिगत विलासिता बढ़ाने की अपेक्षा लोक कल्याण के काम आवे । धन को शक्ति का प्रतीक माना गया है, उसकी लक्ष्मी के रूप में पूजा भी की जाती है । *वे मान्यताएँ तभी सत्य मानी जा सकती हैं जब उसके उपार्जन एवं व्यय पर धर्म बुद्धि का समुचित नियंत्रण बना रहे ।* अनियंत्रित उपार्जन एवं खर्च दोनों ही पतन का कारण बनते हैं । *उसके कारण व्यक्ति का नाश और समाज का पतन होता है ।* धन विधायक शक्ति अवश्य है, पर उसकी विनाशक शक्ति और भी प्रचंड है । *धन का अनियंत्रित उपयोग किसी भी समाज का सर्वनाश करने के लिए भयंकर संहारक अस्त्र सिद्ध हो सकता है ।*
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*"उपभोग" नहीं "उपयोग"- पृष्ठ-१७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 94🌺 Rishi chintan se 94🌺



*🥀//२७ अप्रैल २०२३ गुरुवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष सप्तमी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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       *'धन" कमाना बुरा नहीं है*
*उसका सदुपयोग करना आना चाहिए*
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👉 पैसे की अधिकता के कारण ही कोई मनुष्य श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता । *"श्रेष्ठ" कार्य ही मनुष्य को "श्रेष्ठ" बना सकते हैं ।* यदि पैसे ने आज तक किसी को श्रेष्ठ बनाया होता तो संसार के धनवान लोग किसी निर्धन को प्रतिष्ठा पाने ही न देते । वे एक के दस खर्च करके समाज की सारी प्रतिष्ठा अपने लिए खरीद लेते ।
👉 ऐसा नहीं है कि धन प्रतिष्ठा के लिए बाधक है अथवा धनवान प्रतिष्ठा पा ही नहीं सकता । *"धनवान" प्रतिष्ठा पा सकते हैं किंतु वे, जिनके धनोपार्जन के साधन पवित्र एवं उपयुक्त होते हैं और जिनका धन समाज सेवा के किन्हीं श्रेष्ठ कार्यों पर खर्च होता है ।*
👉 धन को धनवान होने के लिए कमाना और रखते जाना अथवा केवल अपने पर ही खर्च करना कोई अर्थ नहीं रखता । जो समाज के बीच धन कमाता और जोड़ता रहता है, जिसका पैसा आवश्यकता पड़ने पर पीड़ितों अथवा समाज सेवा के काम में नहीं आता, वह वास्तव में धनवान नहीं, *धन का चोर है ।* *धन किसी के अधिकार में क्यों न हो वह समाज का ही है क्योंकि उसकी प्राप्ति समाज से, समाज की सहायता से ही हुई है ।* उस धनवान को श्रेष्ठ ही कहा जाएगा जो समाज के धन को अपनी सुरक्षा में रखकर बढ़ाता और समयानुकूल उसका उपयुक्त भाग समाज सेवा के कार्यों में खर्च करता है । *ऐसे धनवान श्रेष्ठियों को समाज का खजांची ही माना जाएगा और वे अपने पद एवं कार्य के अनुरूप प्रतिष्ठा के अधिकारी होंगे ।*
👉 *तन, मन, धन तीनों उपकरणों में से जो व्यक्ति कोई भी उपकरण समाज के श्रेष्ठ कामों में नियोजित करता है, उसे एक श्रेष्ठ मनुष्य ही कहा जाएगा ।* केवल धनवान, बलवान अथवा महामना मात्र होने से कोई श्रेष्ठता का अधिकारी नहीं हो सकता । जिसका धन, बल और महा मानवता समाज के किसी काम नहीं आती वह अपने काम में कितना ही श्रेष्ठ एवं महान बनता रहे वस्तुतः समाज उसे श्रेष्ठ मानने और श्रेष्ठता देने के पक्ष में कृपणता ही बरतेगा ।
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*"उपभोग" नहीं "उपयोग"- पृष्ठ-१८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 95🌺 Rishi chintan se 95🌺




*🥀//२८ अप्रैल २०२३ शुक्रवार//🥀*
*// वैशाख शुक्लपक्ष अष्टमी२०८० //*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *आपका स्वास्थ्य आपके हाथ*
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👉 *मनुष्य की उच्छृंखल आदतें ही उसे बीमार बनाती हैं ।* जीभ का चटोरापन अतिशय मात्रा में अखाद्य खाने के लिए बाध्य करता रहता है । *जो जितना भार उठा नहीं सकता उतना लादने पर किसी का भी कचूमर निकल सकता है ।* पेट पर अपच भी इसी कारण चढ़ दौड़ता है , बिना पचा सड़ता है और सड़न को रक्त प्रवाह में मिल जाने से जहाँ भी अवसर मिलता है, रोग का लक्षण उभर पड़ता है । *"कामुकता" की कुटैव जीवनी शक्ति को बुरी तरह क्षरण करती है और मस्तिष्क की तीक्ष्णता का हरण कर लेती है ।* अस्वच्छता, पूरी नींद न लेना, कड़े परिश्रम से जी चुराना, नशेबाजी जैसी कुटेवें भी स्वास्थ्य को जर्जर बनाने का निमित्त कारण बनती हैं । खुली हवा और रोशनी से बचना, घुटन भरे वातावरण में रहना भी रुग्णता का एक बड़ा कारण है । भय या आक्रोश जैसे उतार-चढ़ाव भरे ज्वार-भाटे भी मनोविकार बनते हैं और व्यक्ति को सनकी एवं कमजोर और बीमार बना कर रहते हैं । *हँसती-हँसाती जिंदगी जीने वाले प्राय: स्वस्थ ही रहते हैं और लंबी जिंदगी जीते हैं ।*
👉 *अपने ऊपर औचित्य का अंकुश लगाए रहा जाए तो दुर्बल पड़ने या बीमार रहने का अवसर ही न आए ।* उच्छृलंखता सर्वत्र अराजकता स्तर की अव्यवस्था को जन्म देती है, इस कुमार्ग पर चलने वाले ही रोग ग्रस्त बनते या रहते देखे गए हैं । *इस अनाचार का परित्याग कर देने पर कोई भी अपने खोए स्वास्थ्य को पुन: प्राप्त कर सकता है ।* प्रकृति उद्दंडता का दंड भी हाथों हाथ देने में निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह व्यवहार करती है, *किंतु साथ ही इतनी दयालु भी है कि गलती मान लेने, आदत सुधार लेने और रास्ता बदल देने पर क्षमा भी कर देती है । कितने ही स्वास्थ्य गँवा बेठने वाले लोग अपनी आदतें सुधार लेने के उपरांत पुन: स्वस्थ और समर्थ बनते देखे गए हैं, यह रास्ता सभी के लिए खुला है ।*
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*समग्र स्वास्थ्य संवर्धन कैसे ?- पृष्ठ-५*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/L5uS4BR-LKU




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