प्रेरणादायक कहानियां भाग 41 prernadayak kahaniyan part 41



💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 201. 💮




*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*



*💐💐कर्म भोग💐💐*
     
                

एक गाँव में एक किसान रहता था उसके परिवार में उसकी पत्नी और एक लड़का था। कुछ सालों के बाद पत्नी की मृत्यु हो गई उस समय लड़के की उम्र दस साल थी। किसान ने दूसरी शादी कर ली। उस दूसरी पत्नी से भी किसान को एक पुत्र प्राप्त हुआ। किसान की दूसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई। किसान का बड़ा बेटा जो पहली पत्नी से प्राप्त हुआ था जब शादी के योग्य हुआ तब किसान ने बड़े बेटे की शादी कर दी। फिर किसान की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई। किसान का छोटा बेटा जो दूसरी पत्नी से प्राप्त हुआ था और पहली पत्नी से प्राप्त बड़ा बेटा दोनों साथ साथ रहते थे। कुछ समय बाद किसान के छोटे लड़के की तबियत खराब रहने लगी। बड़े भाई ने कुछ आस पास के वैद्यों से इलाज करवाया पर कोई राहत ना मिली। छोटे भाई की दिन ब दिन तबियत बिगड़ती जा रही थी और बहुत खर्च भी हो रहा था। एक दिन बड़े भाई ने अपनी पत्नी से सलाह की कि यदि ये छोटा भाई मर जाए तो हमें इसके इलाज के लिए पैसा खर्च ना करना पड़ेगा। और जायदाद में आधा हिस्सा भी नहीं देना पड़ेगा। तब उसकी पत्नी ने कहा कि क्यों न किसी वैद्य से बात करके इसे जहर दे दिया जाए किसी को पता भी ना चलेगा किसी रिश्तेदारी में भी कोई शक ना करेगा कि बीमार था बीमारी से मृत्यु हो गई। बड़े भाई ने ऐसे ही किया एक वैद्य से बात की कि आप अपनी फीस बताओ ऐसा करना मेरे छोटे बीमार भाई को दवा के बहाने से जहर देना है ! वैद्य ने बात मान ली और लड़के को जहर दे दिया और लड़के की मृत्यु हो गई। उसके भाई भाभी ने खुशी मनाई की रास्ते का काँटा निकल गया अब सारी सम्पत्ति अपनी हो गई। उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। कुछ महीनों पश्चात उस किसान के बड़े लड़के की पत्नी को लड़का हुआ ! उन पति पत्नी ने खूब खुशी मनाई, बड़े ही लाड़ प्यार से लड़के की परवरिश की। कुछ ही गिने वर्षों में लड़का जवान हो गया। उन्होंने अपने लड़के की भी शादी कर दी! शादी के कुछ समय बाद अचानक लड़का बीमार रहने लगा। माँ बाप ने उसके इलाज के लिए बहुत वैद्यों से इलाज करवाया। जिसने जितना पैसा माँगा दिया सब कुछ दिया ताकि लड़का ठीक हो जाए । अपने लड़के के इलाज में अपनी आधी सम्पत्ति तक बेच दी पर लड़का बीमारी के कारण मरने की कगार पर आ गया। शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो गया की अस्थि-पिंजर शेष रह गया था। एक दिन लड़के को चारपाई पर लेटा रखा था और उसका पिता साथ में बैठा अपने पुत्र की ये दयनीय हालत देख कर दुःखी होकर उसकी ओर देख रहा था! तभी लड़का अपने पिता से बोला कि भाई! अपना सब हिसाब हो गया बस अब कफन और लकड़ी का हिसाब बाकी है उसकी तैयारी कर लो। ये सुनकर उसके पिता ने सोचा की लड़के का दिमाग भी काम नहीं कर रहा है बीमारी के कारण और बोला बेटा मैं तेरा बाप हूँ भाई नहीं! तब लड़का बोला मैं आपका वही भाई हूँ जो आप ने जहर खिलाकर मरवाया था। जिस सम्पत्ति के लिए आप ने मरवाया था मुझे अब वो मेरे इलाज के लिए आधी बिक चुकी है आपकी शेष है हमारा हिसाब हो गया! तब उसका पिता फ़ूट-फूट कर रोते हुए बोला कि मेरा तो कुल नाश हो गया। जो किया मेरे आगे आ गया। पर तेरी पत्नी का क्या दोष है जो इस बेचारी को जिन्दा जलाया जाएगा। (उस समय सतीप्रथा थी जिसमें पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था) तब वो लड़का बोला की वो वैद्य कहाँ है, जिसने मुझे जहर खिलाया था। तब उसके पिता ने कहा की आप की मृत्यु के तीन साल बाद वो मर गया था। तब लड़के ने कहा कि ये वही दुष्ट वैद्य आज मेरी पत्नी रूप में है मेरे मरने पर इसे जिन्दा जलाया जाएगा।

हमारा जीवन जो उतार-चढ़ाव से भरा है इसके पीछे हमारे अपने ही कर्म होते हैं। हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटना पड़ेगा। कर्म करो तो फल मिलता है, आज नहीं तो कल मिलता है। जितना गहरा अधिक हो कुआँ, उतना मीठा जल मिलता है। जीवन के हर कठिन प्रश्न का, जीवन से ही हल मिलता है!!

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 202. 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐कड़वा वचन💐💐*


सुंदर नगर में एक सेठ रहते थे। उनमें हर गुण था- नहीं था तो बस खुद को संयत में रख पाने का गुण। जरा-सी बात पर वे बिगड़ जाते थे। आसपास तक के लोग उनसे परेशान थे। खुद उनके घर वाले तक उनसे परेशान होकर बोलना छोड़ देते।

किंतु, यह सब कब तक चलता। वे पुन: उनसे बोलने लगते। इस प्रकार काफी समय बीत गया, लेकिन सेठ की आदत नहीं बदली। उनके स्वभाव में तनिक भी फर्क नहीं आया।

अंततः एक दिन उसके घरवाले एक साधु के पास गये और अपनी समस्या बताकर बोले- “महाराज ! हम उनसे अत्यधिक परेशान हो गये हैं, कृपया कोई उपाय बताइये।” तब, साधु ने कुछ सोचकर कहा- “सेठ जी ! को मेरे पास भेज देना।”

“ठीक है, महाराज” कहकर सेठ जी के घरवाले वापस लौट गये। घर जाकर उन्होंने सेठ जी को अलग-अलग उपायों के साथ उन्हें साधु महाराज के पास ले जाना चाहा। किंतु, सेठ जी साधु-महात्माओं पर विश्वास नहीं करते थे। अतः वे साधु के पास नहीं आये। तब एक दिन साधु महाराज स्वयं ही उनके घर पहुंच गये। वे अपने साथ एक गिलास में कोई द्रव्य लेकर गये थे।

साधु को देखकर सेठ जी की प्योरिया चढ़ गयी। परंतु घरवालों के कारण वे चुप रहे।

साधु महाराज सेठ जी से बोले- “सेठ जी ! मैं हिमालय पर्वत से आपके लिए यह पदार्थ लाया हूं, जरा पीकर देखिये।” पहले तो सेठ जी ने आनाकानी की, परंतु फिर घरवालों के आग्रह पर भी मान गये। उन्होंने द्रव्य का गिलास लेकर मुंह से लगाया और उसमें मौजूद द्रव्य को जीभ से चाटा।

ऐसा करते ही उन्होंने सड़ा-सा मुंह बनाकर गिलास होठों से दूर कर लिया और साधु से बोले- “यह तो अत्यधिक कड़वा है, क्या है यह ?”

“अरे आपकी जबान जानती है कि कड़वा क्या होता है” साधु महाराज ने कहा। “यह तो हर कोई जानता है” कहते समय सेठ ने रहस्यमई दृष्टि से साधु की ओर देखा।

“नहीं ऐसा नहीं है, अगर हर कोई जानता होता तो इस कड़वे पदार्थ से कहीं अधिक कड़वे शब्द अपने मुंह से नहीं निकालता। सेठ जी वह एक पल को रुके फिर बोले। सेठ जी याद रखिये जो आदमी कटु वचन बोलता है वह दूसरों को दुख पहुंचाने से पहले, अपनी जबान को गंदा करता है।”

सेठ समझ गये थे कि साधु ने जो कुछ कहा है उन्हें ही लक्षित करके कहा है। वह फौरन साधु के पैरों में गिर पड़े- “बोले साधु महाराज ! आपने मेरी आंखें खोल दी, अब मैं आगे से कभी कटु वचनों का प्रयोग नहीं करूंगा।”

सेठ के मुंह से ऐसे वाक्य सुनकर उनके घरवाले प्रसन्नता से भर उठे। तभी सेठ जी ने साधु से पूछा- “किंतु, महाराज ! यह पदार्थ जो आप हिमालय से लाये हो वास्तव में यह क्या है ?”

साधु मुस्कुराकर बोले- “नीम के पत्तों का अर्क।” “क्या” सेठ जी के मुंह से निकला और फिर वे धीरे-से मुस्कुरा दिये।

*💐💐शिक्षा:-💐💐*

मित्रों! कड़वा वचन बोलने से बढ़कर इस संसार में और कड़वा कुछ नहीं। किसी द्रव्य के कड़वे होने से जीभ का स्वाद कुछ ही देर के लिए कड़वा होता है। परंतु कड़वे वचन से तो मन और आत्मा को चोट लगती है..!!


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 203 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐 परिश्रम का महत्त्व💐💐*

एक गांव में एक धनी मनुष्य रहता था | उसका नाम भैरोमल था | भैरोमल के पास बहुत खेत थे| उसने बहुत से नौकर और मजदूर रख छोड़े थे | भैरोमल बहुत सुस्त और आलसी था | वह कभी अपने खेतों को देखने नहीं जाता था | अपने मजदूर और नौकरों को भेजकर ही वह काम कराता था |

मजदूर और नौकर मनमाना काम करते थे | वे लोग खेत पर तो थोड़ी देर काम करते थे , बाकी घर बैठे रहते थे | इधर-उधर घूमते या गप्पे उड़ाया करते थे ,खेत न तो ठिकाने से जोते जाते थे | न सिंचे जाते थे और न उनमें ठीक से खाद पडती थी | खेतों में बीज भी ठिकाने से नहीं पडते थे और उनकी घास(खरपतवार) तो कोई निकालता ही नहीं था | इसका नतीजा यह हुआ कि उपज धीरे-धीरे घटने लगी | थोड़े दिनों में भैरोमल गरीब होने लगा|

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उसी गांव में रामप्रसाद नामक एक दूसरा किसान था | उसके पास खेत नहीं थे | वह भैरोमल के ही कुछ खेत लेकर खेती करता था | किंतु; था ! परिश्रमी | अपने मजदूरों के साथ वह खेत पर जाता था | डटकर परिश्रम करता था उसके खेत भली प्रकार जोते और सींचे जाते थे | अच्छी खाद पडती थी, घास निकाली जाती थी और बीज भी समय पर बोए जाते थे | उसके घर के लोग भी खेत पर काम करते थे | खेत में उपज अच्छी होती थी, लगान देखकर और खर्च करके भी वह बहुत अन्न बचा लेता था | थोड़े दिनों में रामप्रसाद धनी हो गया |


जब भैरोमल बहुत गरीब हो गया | उसके ऊपर महाजनों का ऋण हो गया तो उसे अपने खेत बेचने की आवश्यकता जान पड़ी | यह समाचार पाकर रामप्रसाद उसके पास और बोला – ” मैंने सुना है! कि आप अपने खेत बेचना चाहते हैं | कृपया करके आप मेरे हाथ अपने खेत बेचे मैं दूसरों से कम मुल्य नहीं दूंगा |”

भैरोमल ने आश्चर्य से पूछा – ” भाई रामप्रसाद मेरे पास इतने खेत भी मैं ऋणी हो गया किंतु: तुम्हारे पास धन कहां से आ गया है | तुम तो मेरे थोड़े से खेत लेकर खेती करते हो उन खेतों की लगान भी तुम्हें देनी पड़ती है और घर का भी काम चलाना पड़ता है | मेरे खेत खरीदने के लिए तुम्हें किसने रुपये दिए?

रामप्रसाद ने कहा – ” मुझे रुपए किसी ने नहीं दिए! रुपए तो मैंने खेतों की उपज से ही बचा कर ही इकट्ठे किए हैं | आप की खेती और मेरी खेती में एक अंतर है | आप नौकरों मजदूरों आदि सब से काम करने के लिए जाओ-जाओ कहते हैं | आपकी संपत्ति भी चली गई | मैं मजदूरों और नौकरों से पहले काम करने को तैयार होकर उन्हें अपने साथ काम करने के लिए सदा “आओ” कह कर बुलाता हूं | इससे मेरे यहां संपत्ति आती है |”

अब भैरोमल बात समझ गया | उसने थोड़े से खेत रामप्रसाद के हाथ बेच कर अपना ऋण चुका दिया | और बाकी खेतों में परिश्रमपूर्वक खेती करने लगा | थोड़े ही दिनों में उसकी दशा सुधर गई | वह फिर सुखी और संपन्न हो गया |


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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*



*💐💐गुण का महत्व💐💐*

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एक बार दरबार में बैठे हुए सम्राट चंद्रगुप्त ने चाणक्य से कहा, “गुरुदेव, काश आप खूबसूरत होते?”

चन्द्रगुप्त के ऐसा बोलने पर सारे दरबारी उनकी तरफ देखने लगे। परंतु चाणक्य ने शांत स्वभाव से कहा, ‘राजन, इंसान की पहचान उसके गुणों से होती है, रूप से नहीं।’

तब चंद्रगुप्त ने चाणक्य के जवाब से संतुष्ट न होते हुए पूछा, ‘क्या कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हो जहां गुण के सामने रूप छोटा रह गया हो?’

तब चाणक्य ने दो गिलास पानी मंगाया। और राजा को पानी पीने को दिया। जब चन्द्रगुप्त ने पानी पी लिया फिर चाणक्य ने कहा,
‘पहले गिलास का पानी सोने के घड़े से लाया गया था। और दूसरे गिलास का पानी मिट्टी के घड़े से लाया गया था। आपको कौन सा पानी अच्छा लगा।’

चंद्रगुप्त उत्तर देते हुए बोले, ‘मटकी से भरे गिलास का पानी अच्छा था।’ नजदीक ही सम्राट चंद्रगुप्त की पत्नी मौजूद थीं, वह चाणक्य द्वारा दिए गए इस उदाहरण से काफी प्रभावित हुई। उन्होंने कहा, ‘वो सोने का घड़ा किस काम का जो एक इंसान की प्यास न बुझा सके। मटकी भले ही कितनी भी कुरूप हो, लेकिन प्यास मटकी के पानी से ही सही ढंग से बुझती है, यानी रूप से कहीं अधिक महान गुण का महत्व होता है।’

चन्द्रगुप्त ये सब देखकर बहुत प्रसन्न हुए। ऐसे गुरु के कारण ही वो मगध राज्य पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में कामयाब हुए थे। ऐसे गुरु जी संगत मिल जाने से जीवन का उद्धार हो ही जाता है।

इसी तरह इंसान अपने रूप के कारण नहीं बल्कि अपने गुणों के कारण पूजा जाता है। रूप तो कुछ दिनों बाद ढल जाता है लेकिन इंसान का गुण उम्र के साथ साथ और निखर जाता है। गुण को दूसरे को भी दिया जा सकता है लेकिन रूप किसी को नहीं दिया जा सकता। इसलिए हमें अपने गुणों को बढ़ाना चाहिये और दूसरों के गुणों को ग्रहण करना चाहिए।


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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐आनन्द की खोज💐💐*


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एक नगर का राजा, जिसे ईश्वर ने सब कुछ दिया, एक समृद्ध राज्य, सुशील और गुणवती पत्नी, संस्कारी सन्तान सब कुछ था उसके पास, पर फिर भी दुःखी का दुःखी रहता।

एक बार वो घुमते घुमते एक छोटे से गाँव में पहुँचा जहाँ एक कुम्हार भगवान भोले बाबा के मन्दिर के बाहर मटकीया बेच रहा था और कुछ मटकीयों में पानी भर रखा था और वही पर लेटे लेटे हरिभजन गा रहा था।

राजा वहाँ आया और भगवान भोले बाबा के दर्शन किये और कुम्हार के पास जाकर बैठा तो कुम्हार बैठा हुआ और उसने बड़े आदर से राजा को पानी पिलाया। राजा कुम्हार से कुछ प्रभावित हुआ और राजा ने सोचा कि ये इतनी सी मटकीयों को बेच कर क्या कमाता होगा?

तो राजा ने पूछा क्यों भाई प्रजापति जी मेरे साथ नगर चलोगे।

प्रजापति ने कहा- नगर चलकर क्या करूँगा राजा जी?

राजा- वहाँ चलना और वहाँ खुब मटकीया बनाना।

प्रजापति- फिर उन मटकीयों का क्या करूँगा?

राजा- अरे क्या करेगा? उन्हें बेचना खुब पैसा आयेगा तुम्हारे पास।

प्रजापति- फिर क्या करूँगा उस पैसे का?

राजा- अरे पैसे का क्या करेगा? अरे पैसा ही सब कुछ है।

प्रजापति- अच्छा राजन, अब आप मुझे ये बताईये कि उस पैसे से क्या करूँगा?

राजा- अरे फिर आराम से भगवान का भजन करना और फिर तुम आनन्द में रहना।

प्रजापति- "क्षमा करना हे राजन! पर आप मुझे ये बताईये कि अभी मैं क्या कर रहा हूं और हाँ पुरी ईमानदारी से बताना।

काफी सोच विचार किया राजा ने और मानो इस सवाल ने राजा को झकझोर दिया।

राजा- हाँ प्रजापति जी आप इस समय आराम से भगवान का भजन कर रहे हो और जहाँ तक मुझे दिख रहा है आप पुरे आनन्द में हो!

प्रजापति- हाँ राजन यही तो मैं आपसे कह रहा हूं कि आनन्द पैसे से प्राप्त नहीं किया जा सकता है!

राजा- हे प्रजापति जी कृपया कर के आप मुझे ये बताने कि कृपा करें की आनन्द की प्राप्ति कैसे होगी?

प्रजापति- बिल्कुल सावधान होकर सुनना और उस पर बहुत गहरा मंथन करना राजन! हाथों को उल्टा कर लिजिये!

राजा- वो कैसे?

प्रजापति- हे राजन! मांगो मत, देना सीखो और यदि आपने देना सीख लिया तो समझ लेना आपने आनन्द की राह पर कदम रख लिया! स्वार्थ को त्यागो परमार्थ को चुनो! हे राजन अधिकांशतः लोगों के दुःख का सबसे बड़ा कारण यही है कि जो कुछ भी उसके पास है वो उसमें सुखी नहीं है और बस जो नहीं है उसे पाने के चक्कर में दुःखी है! अरे भाई जो है उसमें खुश रहना सीख लो दुःख अपने आप चले जायेंगे और जो नहीं है क्यों उसके चक्कर में दुःखी रहते हो!

*💐शिक्षा:-💐*

आत्मसंतोष से बड़ा कोई सुख नहीं और जिसके पास सन्तोष रूपी धन है वही सबसे बड़ा सुखी है और वही आनन्द में है और सही मायने में वही राजा है!


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