ईमानदार बालक प्रेरणादायक कहानियां भाग 35 prernadayak kahaniyan part 35






💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 171 💮




*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐ईमानदार बालक💐💐*



झुंझुनूं के एक छोटे से गांव नयासर में नंदू नाम का एक बालक अपने निर्धन माता-पिता के साथ रहता था। एक दिन दो भाई अपनी फसल शहर में बेचकर ट्रैक्टर से अपने गांव आ रहे थे। फसल बेचकर जो पैसा मिला वो उन्होंने एक थैली में रख दिया था। अचानक एक गड्डा आ गया और ट्रैक्टर उछला और थैली नीचे गिर गई । जिसे दोनों भाई देख नहीं पाएं और सीधे चले गए। बालक नंदू खेलकूद पर रात के अंधेरे में अपने घर जा रहा था। अचानक उसका पैर किसी वस्तु से टकरा गया। देखा तो पता चला कि किसी की थैली है। जब नंदू ने उसे खोलकर देखा तो थैली में नोट भरे हुए थे। वो हैरान हो गया। वह सोचने लगा की पता नहीं किसकी थैली है। उसने सोचा कि अगर यही छोड़ गया तो कोई और इसे उठा ले जाएगा।

वो मन ही मन सोचने लगा ‘जिसकी यह थैली है उसे कितना अधिक दुख और कष्ट हो रहा होगा। हालाँकि लड़का उम्र से छोटा था और निर्धन माँ बाप का बेटा था। लेकिन उसमे समझ बूझ काफी अच्छी थी। वह थैली को उठाकर अपने घर ले आया। उसने थैली को झोपड़ी में छुपा कर रख दिया। फिर वापस आकर उसी रास्ते पर खड़ा हो गया उसने सोचा। कोई रोता हुआ आएगा तो पहचान बताने पर उसे थैली दे दूंगा। इधर जब थोड़ी देर बाद दोनों भाई घर पहुंचे तो ट्रैक्टर में थैली नहीं थी । दोनों भाई यह जान निराश होते हुए बहुत दुखी होने लगे। पूरे साल की कमाई थैली में भरी थी। 

किसी को मिला भी होगा तो कोई बताएगा भी नहीं। शायद अभी वह किसी के हाथ ना लगा हो यह सोच दोनों भाई टॉर्च लेकर उसी रास्ते पर वापस र चले जा रहे थे। छोटा बालक नंदू उन्हें रास्ते में मिला। उसने उन दोनों से कुछ भी नहीं पूछा। लेकिन उसे शंका हुई की शायद वह थैली इन्हीं की हो। उसने उनसे पुछा ‘आप लोग क्या ढूंढ रहे हैं? उन्होंने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने दुवारा पूछा ‘आप दोनों क्या ढूढ़ रहा हो। उन्होंने कहा? अरे कुछ भी ढूंढ रहे हैं तू जा तुझे क्या मतलब। दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे। नंदू उनके पीछे चलने लगा। वो समझ गया था कि नोटों वाली थैली संभवत इन्हीं की ही है। 

उसने तीसरी बार फिर पूछा, तो चिल्लाकर एक भाई ने कहा ‘अरे चुप हो जा और हमें अपना काम करने दे। दिमाग को और खराब ना कर। अब नंदू को पूरा विश्वास हो गया कि वे थैली अवश्य ही इन्हीं की ही है। उसने फिर पूछा ‘आपकी थैली खो गई है क्या? दोनों भाई एकदम रुक गए और बोले हां। नंदू बोला ‘पहले थैली की पहचान बताइए। जब उन्होंने पहचान बताई तो बालक उन्हें अपने घर ले गया। टोकरी में रखी थैली उन दोनों भाइयों को सौंप दी। दोनों भाइयों के प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। नंदू की इमानदारी पर दोनों बड़े हैरान थे। उन्होंने इनाम के तौर पर कुछ रुपए देने चाहे, पर नंदू ने मना कर दिया बोला ‘यह तो मेरा कर्तव्य था।

दूसरे के दिन वह दोनों भाई नंदू के स्कूल पहुंच गए। उन्होंने बालक के अध्यापक को यह पूरी घटना सुनाते हुए कहा, हम सब विद्यार्थियों के सामने उस बालक को धन्यवाद देने आए। अध्यापक के नेत्रों से आंसू झरने लगे। उन्होंने बालक की पीठ थपथपाई और पूछा ‘बेटा, पैसे से भरे थैले के बारे में अपने माता पिता को क्यों नहीं बताया ? नंदू बोला, गुरूजी मेरे माता-पिता निर्धन हैं । कदाचित उनका मन बदल जाता तो हो सकता है रुपयों को देख कर उसे लौटने नहीं देते और यह दोंनो भाई बहुत निराश हो जाते। यह सोच मैंने घरवालों को थैली के बारे में कुछ भी नहीं बताया। सभी ने नंदू की बड़ी प्रशंसा की और कहा बेटा। धन्यवाद गरीब होकर भी तूने ईमानदारी को नहीं छोड़ा।






*💐💐शिक्षा:-💐💐*

सबसे बड़ा गुण ईमानदारी का है। ईमानदार होना हमें सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति की स्थिति में ले जाता है। जिस प्रकार इस छोटे से बालक ने अपने ईमान को नहीं खोया भले ही उसकी गरीबी के लिए कष्टदाई थी। लेकिन ईमानदारी व्यक्ति छोटा हो या बड़ा ईमानदारी का गुण ही जीवन के सबसे बड़े गहने हैं। ईमानदारी से ही हमारे व्यक्तित्व को बहुत ही प्रसिद्धि मिलती है। ईमानदार मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम रचना है।



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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 172 💮





*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*



*💐💐दोस्ती की आग💐💐*


https://youtu.be/FJcSzBDHMEo

राम नाम के एक लड़के को पैसों की सख्त ज़रुरत थी। उसने अपने मालिक से मदद मांगी. मालिक पैसे देने को तैयार हो गया पर उसने एक शर्त रखी. शर्त ये थी कि राम को बिना आग जलाये कल की रात पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी पर बितानी थी, अगर वो ऐसा कर लेता तो उसे एक बड़ा इनाम मिलता और अगर नहीं कर पाता तो उसे मुफ्त में काम करना होता।

राम जब दुकान से निकला तो उसे एहसास हुआ कि वाकई कड़ाके की ठण्ड पड़ रही है और बर्फीली हवाएं इसे और भी मुश्किल बना रही हैं. उसे मन ही मन लगा कि शायद उसने ये शर्त कबूल कर बहुत बड़ी बेवकूफी कर दी है. घबराहट में वह तुरंत अपने दोस्त श्याम के पास पहुंचा और सारी बात बता दी।

श्याम ने कुछ देर सोचा और बोला, “चिंता मत करो, मैं तुम्हारी मदद करूँगा।कल रात जब तुम पहाड़ी पर होगे तो ठीक सामने देखना मैं तुम्हारे लिए सामने वाली पहाड़ी पर सारी रात आग जला कर बैठूंगा। तुम आग की तरफ देखना और हमारी दोस्ती के बारे में सोचना, वो तुम्हें गर्म रखेगी. और जब तुम रात बिता लोगे तो बाद में मेरे पास आना, मैं बदले में तुमसे कुछ लूंगा.”

राम अगली रात पहाड़ी पर जा पहुंचा, सामने वाली पहाड़ी पर श्याम भी आग जला कर बैठा था. अपने दोस्त की दी हुई हिम्मत से राम ने वो बर्फीली रात किसी तरह से काट ली. मालिक ने शर्त के मुताबिक उसे ढ़ेर सारे पैसे इनाम में दिए.

इनाम मिलते ही वो श्याम के पास पहुंचा और बोला, “तुमने कहा था कि मेरी मदद के बदले में तुम कुछ लोगे… कितने पैसे चाहिएं तुम्हें...”

श्याम बोला, “हाँ, मैंने कुछ लेने को कहा था, पर वो पैसे नहीं हैं. मैं तो तुमसे एक वादा लेना चाहता हूँ… वादा करो कि अगर कभी मेरी ज़िन्दगी में भी बर्फीली हवाएं चलें तो तुम मेरे लिए दोस्ती की आग जलाओगे.”

राम ने फ़ौरन उसे गले लगा लिया और हमेशा दोस्ती निभाने का वादा किया.

*💐💐शिक्षा:-💐💐*

मित्रों, कहते हैं दोस्ती ही वो पहला रिश्ता होता है जो हम खुद बनाते हैं, बाकी रिश्तों के साथ तो हम पैदा होते हैं. सचमुच अगर हम अपने जीवन से “दोस्तों” को निकाल दें तो ज़िन्दगी कितनी खाली लगेंगे... दोस्त होने का मतलब सिर्फ खुशियां बांटना नहीं होता... दोस्ती का असली मतलब अपने दोस्त का उस समय साथ देना होता है जब वो मुसीबत में हो, जब उसे हमारी सबसे ज्यादा ज़रुरत हो…

क्या आपका कोई सच्चा दोस्त है ? बिलकुल है, वो वही है जिसके आप सच्चे दोस्त हैं और अगर नहीं है तो सबसे पहले आपको एक सच्चा दोस्त बनना चाहिए... अपने आप ही आपका एक सच्चा दोस्त बन जाएगा..!!


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*💐💐कर्तव्य💐💐*


ये क्या कर रही हो निशा तुम.....अपनी पत्नी निशा को कमरे में एक और चारपाई बिछाते देख मोहन ने टोकते हुए कहा ...

निशा -मां के लिए बिस्तर लगा रही हूं आज से मां हमारे पास सोएगी....

मोहन-क्या ..... तुम पागल हो गई हो क्या ...

यहां हमारे कमरे में ...और हमारी प्राइवेसी का क्या ...

और जब अलग से कमरा है उनके लिए तो इसकी क्या जरूरत...

निशा-जरूरत है मोहन .....जब से बाबूजी का निधन हुआ है तबसे मां का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता तुमने तो स्वयं देखा है पहले बाबूजी थे तो अलग कमरे में दोनों को एकदूसरे का सहारा था मगर अब ....मोहन बाबूजी के बाद मां बहुत अकेली हो गई है दिन में तो मैं आराध्या और आप उनका ख्याल रखने की भरपूर कोशिश करते है ताकि उनका मन लगा रहे वो अकेलापन महसूस ना करे मगर रात को अलग कमरे में अकेले ....नहीं वो अबसे यही सोएगी...

मोहन-मगर अचानक ये सब ...कुछ समझ नहीं पा रहा तुम्हारी बातों को...।

निशा-मोहन हर बच्चे का ध्यान उसके माता पिता बचपन में रखते हैं सब इसे उनका फर्ज कहते हैं वैसे ही बुढ़ापे में बच्चों का भी तो यही फर्ज होना चाहिए ना..._"और मुझे याद है मेरा तो दादी से गहरा लगाव था मगर दादी को मम्मी पापा ने अलग कमरा दिया हुआ था ...और उसरात दादी सोई तो सुबह उठी ही नहीं ..."_ डाक्टर कहते थे कि आधी रात उन्हें अटैक आया था जाने कितनी घबराहट परेशानी हुई होगी और शायद हममें यसे कोई वहां उनके पास होता तो... शायद दादी कुछ और वक्त हमारे साथ ...मोहन जो दादी के साथ हुआ वो मैं मां के साथ होते हुए नहीं देखना चाहती ...और फिर बच्चे वहीं सीखते है जो वो बड़ो को करते देखते हैं मैं नहीं चाहती कल आराध्या भी अपने ससुराल में अपने सास ससुर को अकेला छोड़ दे उनकी सेवा ना करें ...आखिर यही तो संस्कारों के वो बीज है जोकि आनेवाले वक्त में घनी छाया देनेवाले वृक्ष बनेंगे ...।

मोहन उठा और निशा को सीने से लगाते बोला-मुझे माफ करना निशा... अपने स्वार्थ में.. मैं अपनी मां को भूल गया अपने बेटे होने के कर्तव्य को भूल गया ...और फिर दोनों मां के पास गए और आदरपूर्वक उन्हें अपने कमरे मे ले आए....

घर का प्रत्येक सदस्य अपना कर्तव्य क्या है ये बात जिस दिन समझ लेगा हमारा घर साक्षात स्वर्ग बन जायेगा!


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*💐💐किसान की बेटी💐💐*


स्कूल प्रिंसिपल ने बहुत ही कड़े शब्दों मे जब किसान की बेटी ख़ुशी से पिछले एक साल की स्कूल फीस मांगी ,तो ख़ुशी ने कहा मैडम मे  घर जाकर आज पिता जी से कह दूंगी , घर जाते ही बेटी ने माँ से पूछा पिता जी कहाँ है ? तो माँ ने कहा तुम्हारे पिता जी तो रात से ही  खेत मे है  बेटी दौड़ती हुई खेत मे जाती है और सारी बात अपने पिता को बताती है !

 ख़ुशी का पिता बेटी को गोद मे  उठाकर प्यार करते हुए कहता है की इस बार हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है अपनी मैडम को कहना  अगले हफ्ता सारी  फीस आजाएगी, 
क्या हम मेला भी जाएंगे ?? ख़ुशी पूछती है 
हाँ हम मेला भी जाएंगे और पकोड़े, बर्फी भी खाएंगे ख़ुशी के पिता कहते है ।

ख़ुशी इस बात को सुनकर नाचने लगती है और घर आते वक्त रस्ते मे अपनी सहेलियों को बताती  है की मै अपने माँ पापा के साथ मेला देखने जाउंगी,पकोड़े बर्फी भी खाउंगी  ये बात सुनकर पास ही खड़ी एक बजुर्ग कहती है ,बेटा ख़ुशी मेरे लिए क्या लाओगी मेले से ??

काकी हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है मे आपके लिए नए कपडे लाऊंगी  ख़ुशी कहती हुई घर दौड़ जाती है ! 

अगली सुबह ख़ुशी स्कूल जाकर अपनी मैडम को बताती है की मैडम इस बार हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है ,अगले हफ्ते सब फसल बिक जाएगी  और पिता जी आकर सारी फीस भर देंगें  ।

प्रिंसिपल : चुप करो तुम, एक साल से तुम बहाने बाजी कर रही हो 
ख़ुशी चुप चाप क्लास मे  जाकर बैठ जाती है और मेला घूमने के सपने देखने लगती है  तभी 
ओले पड़ने लगते है 
तेज बारिश आने लगती है बिजली कड़कने लगती है पेड़ ऐसे हिलते है मानो अभी गिर जाएंगे 
ख़ुशी एकदम  घबरा जाती है  
ख़ुशी की आँखों मे आंसू आने लगते है वोही डर फिर सताने लगता है डर  सब खत्म होने का , डर फसल बर्बाद होने का ,डर फीस ना दे पाने का ,स्कूल खत्म होने के बाद वो धीरे धीरे कांपती हुई घर की तरफ बढ़ने लगती है। हुआ भी ऐसा कि सभी फसल बर्बाद हो गई और खुशी स्कूल में फीस जमा नही करने के कारण ताना सुनने लगी।  

    उस छोटी सी बच्ची को मेला घुमने और बर्फी खाने का शौक मन में ही रह गया।      
छोटे किसान और मजदूरों के परिवार में जो दर्द है उसे समझने में पूरी उम्र भी गुजर जाएगी तो भी शायद वास्तविक दर्द को महसूस नही कर सकते आप।।। 
भारत के आम किसान का वास्तविक दर्द यह है।



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*💐💐जीवन की सहजता खोने न दें💐💐*



एक बार एक छोटा सा पारिवारिक कार्यक्रम चल रहा था। उसमें बहुत लोग उपस्थित थे। उस कार्यक्रम में बहुत ही बढ़िया बासमती चावल का पुलाव बन रहा था, सभी का मन पुलाव में लगा हुआ था। 

खाने में देर हो रही थी,भूख भी खूब लग रही थी। आखिर खाने में पुलाव परोसा गया, खाना शुरू ही होने वाला था कि रसोईयें ने आकर कहा कि पुलाव सम्हल कर खाइयेगा क्योंकि शायद उसमें एक आध कंकड़ रह गया है वह किसी के भी मुँह में आ सकता हैं। मैंने बहुत से कंकड़ निकाल दिए हैं, फिर भी एक आध रह गया होगा तो दाँत के नीचे आ सकता हैं। 

यह सुनकर सभी लोग बहुत सम्भल कर खाना खाने लगे सभी को लग रहा था कि कंकड़ उसी के मुँह में आयेगा। यह सोचकर खाने का सारा मजा किरकिरा हो गया और पुलाव खाने की जो प्रबल इच्छा थी वह भी थम गई। सब लोग बिना कुछ बोले, बिना किसी हंसी मजाक के भोजन करने लगे। जब सबने खाना खा लिया तब उन्होंने रसोईये को बुलाया और पूछा कि तुमने ऐसा क्यों कहा था। 

जबकि कंकड़ तो भोजन में था ही नहीं हममें से किसी के भी मुँह में नहीं आया । तब रसोईये ने कहा कि मैंने अच्छी तरह से चावल बिने थे, लेकिन चावल में कंकड़ भी ज्यादा थे इसलिए मुझे लगा शायद एक आध रह गया होगा। यह सुनकर सब एक दूसरे की तरफ देखने लगे। खाने के बाद किसी को कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था सब निराश हो गए थे क्योंकि सभी का ध्यान कंकड़ में था खाने का स्वाद कोई भी नहीं ले पा रहा था इसलिए सब निराश हो गए। 


*💐💐शिक्षा:-💐💐*

यही परिस्थिति हमारी आज की हैं। एक वायरस को लेकर हम हमारी आजादी खो बैठे हैं। हर वस्तु, व्यक्ति, प्राणी पर शंका कर रहे हैं। आज तक जो लोग हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे हैं, जैसे दूध वाला, फल वाला, सब्जीवाला, पेपर वाला इन लोगों पर से भी हमारा विश्वास उठ गया है, और हम हमारे आज के सुहाने दिन खो बैठे हैं। और शारीरिक रूप से भी थकान महसूस कर रहे हैं। यह सब, कुछ हद, तक हमारी सोच पर भी निर्भर हैं। इसलिए इससे बाहर निकलना है तो वाइरस को नहीं अपने आप को मजबूत करिये । अपने विचारों को सकारात्मक दिशा दीजिये। ईश्वर की कृपा से सब कुछ जल्दी ही अच्छा हो जाएगा। आज के सुंदर दिन के लिए सुंदर शुरुआत करिये । और अपने आप को मजबूत कीजिये । खाना खाते समय खाने  को पूरी रूचि से स्वाद लेकर खाइये, फिर देखिये हमारी जिंदगी कितनी बेहतर हो जाएगी।

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