🌺 ऋषि चिंतन से 76🌺 Rishi chintan se 76🌺
*🥀//०९ अप्रैल २०२३ रविवार//🥀*
*//वैशाख कृष्णपक्ष तृतीया २०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*मन की स्थिरता एवं एकाग्रता*
*〰️अर्थात〰️*
*➖"तन्मयता"➖*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *"मन" की स्थिरता एवं एकाग्रता का सार तत्व "तन्मयता" शब्द में आ जाता है ।* गायत्री उपासना में यह प्रयोजन *"तन्मयता"* से पूरा होता है । *"तन्मयता" का अर्थ है-- "इष्ट" के साथ भाव संवेदनाओं को केंद्रीभूत कर देना ।* यह स्थिति तभी आ सकती है जब *इष्ट के प्रति "असीम श्रद्धा"* हो । *"श्रद्धा" तब उत्पन्न होती है, जब किसी की "गरिमा" पर परिपूर्ण विश्वास हो ।* साधक को अपनी मनोभूमि ऐसी बनानी चाहिए जिसमें गायत्री महाशक्ति की चरम उत्कृष्टता पर, असीम शक्ति सामर्थ्य पर, संपर्क में आने वाले के उत्कर्ष होने, पर गहरा विश्वास जमता चला जाए । यह कार्य शास्त्र वचनों का, अनुभवियों द्वारा बताए गए सत्परिणामों का, उपासना विज्ञान की प्रामाणिकता का, अधिकाधिक अध्ययन अवगाहन करने पर संपन्न होता है । आशंकाग्रस्त, अविश्वासी जन, उपेक्षा भाव से आधे अधूरे मन से उपासना में लगें, तो स्वभावत: वहाँ उसकी रूचि नहीं होगी और मन जहाँ-तहाँ उड़ता फिरगा । *मन लगने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाए ।* व्यवसाय-उपार्जन में, इंद्रिय भोगों में, विनोद मनोरंजनों में, सुखद कल्पनाओं में, प्रिय जनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है । *इसका कारण यह है कि इन प्रसंगों के द्वारा मिलने वाले सुख, लाभ एवं अनुभव के संबंध में पहले से ही विश्वास जमा होता है ।*
👉 प्रश्न यह नहीं है कि वे आकर्षण, दूरदर्शिता की दृष्टि से लाभदायक हैं या नहीं । *तथ्य इतना ही है कि उन विषयों के संबंध में अनुभव-अभ्यास के आधार पर मन में आकर्षण उत्पन्न हो गया है ।* उस आकर्षण के फलस्वरूप ही मन उनमें रमता है और भाग-भाग कर जहाँ-तहाँ घूम फिर कर वही जा पहुँचता है । *हटाने से हटता नहीं, भगाने से भागता नहीं ।* मानसिक संरचना के इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें *"उपासना" के समय मन को "इष्ट" पर केंद्रित रखने की आवश्यकता पूरी करने के लिए पहले से ही मस्तिष्क को प्रशिक्षित करना चाहिए ।* गायत्री महाशक्ति के संदर्भ में जितना अधिक ज्ञान-विज्ञान संग्रह किया जा सके मनोयोग पूर्वक करना चाहिए । *विज्ञ व्यक्तियों के साथ उसकी चर्चा करनी चाहिए ।* इस संदर्भ में होने वाले सत्संग में नियमित रूप से जाना चाहिए । जिसने लाभ उठाये हों, उनके अनुभव सुनने चाहिए । यह कार्य यों तद्विषयक स्वाध्याय और मनन चिंतन के एकाकी प्रश्न से भी संभव हो सकता है, *पर अधिक सरल और व्यावहारिक यह है कि गायत्री चर्चा के संदर्भ में चलने वाले सत्संग में उत्साह पूर्वक नियमित रूप से सम्मिलित होते रह जाए ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-४१*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖ Rx➖➖🪴➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 77🌺 Rishi chintan se 77🌺
*🥀//०७ अप्रैल २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//वैशाखकृष्णपक्षप्रतिपदा २०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖😌एकाग्रता😌➖*
*उपासना के लिए अत्यंत उपयोगी*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *"उपासना" में "एकाग्रता" पर बहुत जोर दिया गया है ।* ध्यान-धारणा का अभ्यास इसीलिए किया जाता है कि मन की अनियंत्रित भगदड़ करने की आदत पर नियंत्रण स्थापित किया जाए और उसे तथ्य विशेष पर केंद्रित होने के लिए प्रशिक्षित किया जाए ।
👉 *"एकाग्रता" एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है ।* मन की अनियंत्रित कल्पनाएँ, अनावश्यक उड़ानें उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केंद्रित किया गया होता तो गहराई में उतरने और महत्वपूर्ण उपलब्धता प्राप्त करने का अवसर मिलता । *यह "चित्त" की चंचलता ही है, जो मन:संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है ।*
👉 संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता प्राप्त की है या महत्वपूर्ण सफलताएँ उपलब्ध की हैं, उन सबको विचारों पर नियंत्रण करने, उन्हें अनावश्यक चिंतन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलाने की क्षमता प्राप्त रही है । *इसके बिना "चंचलता" की वानरवृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई के साथ सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थिर रह सकता है ।* शिल्प, कला, साहित्य ,शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है । *"चंचलता" को तो असफलता की सगी बहन माना जाता है । "बाल चपलता" का मनोरंजक उपहास उड़ाया जाता है ।* वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे, विचारों की दिशा धारा बनाने और चिंतन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है । ऐसे लोगों का भविष्य उत्साहवर्धक नहीं
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-३६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 78🌺 Rishi chintan se 78🌺
*🥀//०८ अप्रैल २०२३ शनिवार//🥀*
*🔆वैशाखकृष्णपक्षद्वितीया२०८०🔆*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*🧑🎤उच्च स्तरीय अवस्था है*
*➖ चित्त की एकाग्रता ➖*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *"उपासना" के लिए जिस "एकाग्रता" का प्रतिपादन है, उसका लक्ष्य है-- "भौतिक जगत् की कल्पनाओं से मन को विरत करना और उसे अंतर्जगत् की क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित कर देना ।"* *"उपासना"* के समय यदि मन सांसारिक प्रयोजनों में न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझना चाहिए कि *"एकाग्रता का उद्देश्य"* ठीक तरह पूरा हो रहा है । विज्ञान के शोध कार्यों में, साहित्य के सृजन प्रयोजनों में, वैज्ञानिक या लेखक का चिंतन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है । इतने भर में *"एकाग्रता"* का प्रयोजन पूरा हो जाता है । *यद्यपि इस प्रकार के "बौद्धिक पुरुषार्थ" में "मन" और "बुद्धि" को असाधारण रूप से गतिशील रहना पड़ता है और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे "चंचलता" नहीं कहा जाता है ।* अपनी निर्धारित परिधि में रहकर कितना ही द्रुतगामी चिंतन क्यों न किया जाए ? कितनी ही कल्पनाएँ, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर रही हों, वे *"एकाग्रता"* की स्थिति में तनिक भी विक्षेप उत्पन्न नहीं करेंगी । *गड़बड़ तो अप्रासंगिकता में उत्पन्न होती है । बेतुका--बेसिलसिले का अप्रासंगिक "अनावश्यक चिंतन" ही विक्षेप करता है ।* एक बेसुरा वादन पूरे आर्केस्ट्रा के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है । *ठीक इसी प्रकार चिंतन में "अप्रासंगिक विक्षेपों" का ही निषेध है ।* निर्धारित परिधि में कितनी ही, कितने ही प्रकार की कल्पनाएँ, विवेचना करते रहने की पूरी-पूरी छूट है ।
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*आत्मशक्ति से युगशक्ति का उद्भव- पृष्ठ-३८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 79🌺 Rishi chintan se 79🌺
*🥀//१० अप्रैल २०२३ सोमवार//🥀*
*🔆वैशाखकृष्णपक्षचतुर्थी२०८०🔆*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖स्वस्थ रहने के लिए➖*
*"मस्तिष्क" को नियंत्रित कीजिए*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *शरीर पर "मन" का नियंत्रण है- इस तथ्य को हम प्रतिक्षण देखते हैं ।* मस्तिष्क की इच्छा और प्रेरणा के अनुरूप प्रत्येक अंग कार्य करता है । *प्रत्यक्ष रुप से दिखाई देने वाले क्रिया-कलाप हमारी मानसिक प्रेरणाओं से ही प्रेरित होते हैं ।* जो कार्य स्वसंचालित दिखाई पड़ते हैं, वे भी वस्तुतः हमारे अचेतन मन की क्षमता एवं प्रवीणता से संचालित होते हैं । श्वांस-प्रश्वांस, रक्ताभिषरण, आकुंचन-प्रकुंचन, निद्रा-जागृति, पाचन, मल विसर्जन जैसी स्वयंमेव चलती प्रतीत होने वाली क्रियाएँ भी अचेतन मन के द्वारा गतिशील रहती है । *शरीर को ऐसा घोड़ा मानना चाहिए, जिसकी प्रत्यक्ष और परोक्ष नियंत्रण सत्ता पूरी तरह "मस्तिष्क" के हाथ में है ।*
👉 *"मस्तिष्क" को स्वस्थ, संतुलित और हल्का-फुल्का रखे बिना कोई व्यक्ति अपने शरीर को निरोग एवं परिपुष्ट रख सकने में सफल नहीं हो सकता ।* मन पर उद्वेगों का तनाव छाया रहेगा तो शरीर का आहार-विहार ठीक रहने पर भी रोगों के आक्रमण होने लगेंगे और बढ़ती हुई दुर्बलता अकाल मृत्यु की और तेज से घसीटती ले चलेगी । *इसके विपरीत हँसते-हँसाते शांत संतुलित मन:स्थिति में जीवनयापन हो रहा हो तो शरीरगत असुविधाओं के रहते हुए भी स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहेगा ।*
👉 शरीर की देखभाल रखने और उसे स्वस्थ सुंदर रखने के लिए खुराक, साज-सज्जा, सुविधा आदि का जितना ध्यान रखा जाता है, *उतना ही ध्यान मस्तिष्क को उद्वेग रहित, संतुष्ट एवं प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाए तो स्वास्थ्य रक्षा की तीन चौथाई समस्या हल हो सकती है ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 80🌺 Rishi chintan se 80🌺
*🥀//१३ अप्रैल २०२३ गुरुवार//🥀*
*🔆वैशाखकृष्णपक्ष अष्टमी२०८०🔆*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖👍आत्मविश्वास👍➖*
*👉एक चमत्कारिक शक्ति👈*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *जब संसार में सभी साथी मनुष्य का साथ छोड़ दें, पराजय और पीड़ाओं के दंश मनुष्य को घायल कर दें, पैरों के नीचे से सभी आधार खिसक जायें, जीवन के अंधकारयुक्त बीहड़ पथ पर यात्री अकेला पड़ जाए तो भी क्या वह जीवित रह सकता है ? कुछ कर सकता है ? पथ पर आगे बढ़ सकता है ?* अवश्य मेव । यदि वह स्वयं अपने साथ है तो कोई शक्ति उसकी गति को नहीं रोक सकती । कोई भी अभाव उसकी जीवन यात्रा को अपूर्ण नहीं रख सकता । *मनुष्य का अपना "आत्मविश्वास" ही अकेला इतना शक्तिशाली साधन है जो उसे मंजिल पर पहुँचा सकता है ।* विजय की सिद्धि प्राप्त करा सकता है ।
👉 कवींद्र रवींद्र का "अकेला चल" शीर्षक वाला गीत आपने पढ़ा या सुना होगा । उस गीत के भाव हैं--
*यदि कोई तुमसे कुछ न कहे, तुझे भाग्यहीन समझ कर सब तुझसे मुँह फेर लें और तुझसे डरें-- तो भी तू अपने खुले हृदय से अपना मुँह खोलकर अपनी बात कहता चल ।*
*अगर तुझसे सब विमुख हो जाएँ,यदि गहन पथ प्रस्थान के समय कोई तेरी ओर फिर कर भी न देखें, तब पथ के काँटों को अपने लहू-लुहान पैरों से कुचलता हुआ अकेला चल ।*
*यदि प्रकाश न हो, झंझावात और मूसलाधार वर्षा की अंधेरी रात में अपने घर के दरवाजे भी तेरे लिए लोगों ने बंद कर दिए हों, तब उस वजानल से अपने वक्ष के पिंजर को जलाकर उस प्रकाश में अकेला ही चलता रह ।*
👉 निसंदेह हर परिस्थिति में मनुष्य का एकमात्र साथी उसका अपना आपा ही है । *स्वामी विवेकानंद* के शब्दों में -- *"आत्मविश्वास" सरीखा दूसरा मित्र नहीं, आत्मविश्वास ही भावी उन्नति की प्रथम सीढ़ी है ।* सचमुच आत्मविश्वास के कारण दुर्गम पथ भी सुगम बन जाता है, बाधाएँ भी मंजिल पर पहुँचाने वाली सीढ़ियाँ बन जाती हैं । *इमर्सन* ने कहा है-- *"आत्मविश्वास" सफलता का मुख्य रहस्य है ।*
👉 *"आत्मविश्वास" मनुष्य को तुच्छता से महानता की ओर अग्रसर करता है ।* सामान्य से असामान्य बना देता है । *स्वेट मार्डन* ने कहा है--
*"आत्मविश्वास" की मात्रा हममें जितनी अधिक होगी उतना ही हमारा संबंध अनंत जीवन और अनंत शक्ति के साथ गहरा होता जाएगा । जब चारों ओर विपत्तियों के काले बादल मंडराते हों, जब सागर में कहीं भी जीवन नैया को खड़ा करने का किनारा न मिल रहा हो, भयंकर तूफान उठ रहा हो, नाव अब डूबे तब डूबे की स्थिति में हो तो कैसे उद्धार हो सकता है ? "आत्मविश्वास" ही ऐसी स्थिति में मनुष्य को बचा सकता है ।* उसी तथ्य को व्यक्त करते हुए *कालबिक* ने लिखा है--
*"आत्मविश्वास" में वह शक्ति है, जो सहस्त्रों विपत्तियों का सामना कर उन पर विजय प्राप्त कर सकती है ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖