अपने अंदर आत्मविश्वास कैसे जगाये, ऋषि चिंतन से भाग 17 18 अप्रैल






🌺 ऋषि चिंतन से 81🌺 Rishi chintan se 81🌺





*🥀//१४ अप्रैल २०२३ शुक्रवार//🥀*
*🔆वैशाखकृष्णपक्ष नवमी२०८०🔆*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *😀आत्मविश्वास जगाइये😀*
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👉 *जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल होने के लिए "आत्मविश्वास" की आवश्यकता होती है ।* अच्छे से अच्छा तैराक भी आत्मविश्वास के अभाव में किसी नदी को पार नहीं कर सकता । वह बीच में फँस जायेगा, नदी के प्रवाह में बह जाएगा, अथवा हाथ पैर पटक कर वापिस लौट आएगा । *यही बात भवसागर पार करने में लागू होती है ।* जीवन में अनेकों कठिनाइयाँ, उलझनें, अप्रिय परिस्थितियाँ आती रहती हैं । *इन झंझावातों में कठोर चट्टान की तरह अपनी राह पर अडिग रहने के लिए "आत्मविश्वास" की आवश्यकता होती है ।*
👉 लक्ष्य जितना बड़ा होगा, मार्ग भी उतना ही लंबा होगा और अवरोध भी उतने ही अधिक आएँगे । *इसलिए उतने ही प्रबल "आत्मविश्वास" की आवश्यकता होगी ।* संसार भी *"आत्मविश्वासी"* का समर्थन करता है । *"आत्मविश्वासी"* के चेहरे पर आकर्षण बनकर फूट पड़ता है, जिससे पराए भी अपने बन जाते हैं । अनजान भी हमराही की तरह साथ देते हैं । *विपरीत परिस्थितियाँ भी "आत्मविश्वासी" के लिए अनुकूल परिणाम पैदा करती है ।*
👉 *"आत्मविश्वास" का मूल स्वरुप है "आत्मसत्ता" पर विश्वास करना । जिसे अपनी आत्मा की अजेय शक्ति महानता पर विश्वास है, जो अपने जीवन की सार्थकता, महत्ता, महानता स्वीकार करता है, उसी में "आत्मविश्वास" का स्रोत उमड़ पड़ता है,* वही जीवन पथ के अवरोधों, कठिनाइयों को चीरता हुआ, राह के रोड़ो को धकेलता हुआ, अपना मार्ग स्वयं निकाल लेता है । *प्रकृति भी "आत्मविश्वासी" पुरुष का साथ देती है, अपने नियमों का व्यतिरेक करके भी ।* अपने आप को तुच्छ, अनावश्यक समझने वाले संसार सागर में तिनके की तरह कभी इधर कभी उधर थपेड़े खाते हैं । जिन्हें अपनी आत्मसत्ता, अपने महान अस्तित्व का बोध नहीं, उन्हें जीवन के समरांगण में हारना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं । *जो अपने आप को तुच्छ और अनावश्यक समझते हैं उन्हें दूसरे कैसे आवश्यक और महत्वपूर्ण समझ सकते हैं ?* आत्मविश्वास के अभाव में संदेह, भय, चिंता आदि मनोविकार पनप उठते हैं और तब दूसरों का विश्वास, आत्मीयता, सहानुभूति भी प्राप्त नहीं होती ।
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*"मनोविकार" सर्वनाशी महाशत्रु- पृष्ठ-२८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 82🌺 Rishi chintan se 82🌺



*🥀//१५अप्रैल२०२३शनिवार//🥀*
*🔆वैशाखकृष्णपक्षदशमी२०८०🔆*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *"आलस्य" - एक महा पाप*
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👉 *कुछ ऐसे "पाप" भी गिनाये जा सकते हैं, जो समाज में प्रचलित हैं, पर कानून की पकड़ में नहीं आते ।* इसी से जनसाधारण की दृष्टि में उन्हें *"पाप" या "अपराध"* नहीं माना जाता । *पर उतने से ही उन "दुष्प्रवृत्तियों" की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए जो कानूनी "पाप" तो नहीं हैं, पर हानि उतनी ही करते हैं, जितने चोरी, डकैती आदि गैरकानूनी समझे जाने वाले ।*
👉 *ऐसे पापों में सबसे पहला और सबसे बड़ा है-- "आलस्य" ।* इस दुष्ट ने जितने बहुमूल्य जीवनों को जितनी बुरी तरह बर्बाद किया है, उतना शायद ही और किसी ने किया हो । *मनुष्य के भविष्य को जितना अंधकारमय "आलस्य" बनाता है, उतना कोई और नही ।* समाज का भी जितना अहित और सब पापों से मिलाकर होता है, उससे अधिक मनुष्य स्वभाव में घुसे हुए इस एक ही दुर्गुण से होता है । अन्य पाप दुर्घटना के रूप में आँखों से देखे जा सकते हैं, इसलिए वे सहज ही पकड़ में आ जाते हैं, उनकी प्रतिक्रिया भी तत्काल होती है और प्रतिरोध की व्यवस्था भी जल्दी ही बनाई जाने लगती है । चोरी होते ही थाने में रिपोर्ट होती है, पुलिस आ धमकती है और चोरों को पकड़ने के लिए दौड़-धूप आरंभ हो जाती है । पड़ोसी भी सावधान होते हैं, सुनने वाले भी चर्चा करते हैं, एक से दूसरे को खबर पहुँचती है और यह प्रयत्न आरंभ हो जाता है कि उस दुर्घटना की पुनरावृत्ति न होने पावे । चोर यदि पकड़ा जाता है तो मालिक का माल मिल जाता है और अपराधी को दण्ड मिलता है *पर "आलस्य" ऐसा दुष्ट अपराध है कि हानि अत्यधिक करता है पर आँखों से दीखता नहीं इसलिए पकड़ में नहीं आता, लोगों का ध्यान भी उसकी ओर नहीं जाता, कोई प्रतिक्रिया भी नहीं होती ।* आलसी को दंड भी नहीं मिलता और किसी का ध्यानाकर्षण भी नहीं होता । अतएव वह चुपचाप अपना काम निरंतर करता रहता है । *लकड़ी में लगा हुआ घुन जिस तरह धीरे-धीरे उसे खोखला कर देता है और कुछ ही दिनों में उस मजबूत लकड़ी को खोखला करता है, ठीक इसी तरह "आलस्य" रूपी घुन भी मनुष्य की सारी शुभ संभावनाओं को, भविष्य की शाखाओं को धूल में मिलाकर रख देता है ।*
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*"आलस्य छोड़िए-परिश्रमी बनिए पृष्ठ-२*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/7KklS1yRPUs






🌺 ऋषि चिंतन से 83🌺 Rishi chintan se 83🌺


*🥀//१६ अप्रैल २०२३ रविवार//🥀*
*//वैशाखकृष्णपक्षएकादशी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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 *➖मनुष्य शरीर एक वरदान➖*
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👉 *मनुष्य का शरीर एक "कल्पवृक्ष" है, इसकी छाया में बैठा हुआ मन उत्तम वरदान पा सकता है*, मनोकामनाएँ पूरी कर सकता है पर स्वर्ग के और पृथ्वी के कल्पवृक्षों में थोड़ा सा अंतर यह है कि स्वर्ग के कल्पवृक्ष इच्छा करते ही, बिना श्रम के ही मनोकामनाएँ पूरी कर देते हैं, *पर पृथ्वी का यह "कल्पवृक्ष" मानव शरीर "परिश्रम" की कसौटी पर कसे जाने के उपरांत ही अभीष्ट फल प्रदान करता है ।*  
👉 वैसे उनमें शक्ति, सामर्थ्य एवं संभावना इतनी अधिक सन्निहित है कि मनुष्य चाहे जिस स्थिति तक पहुँच सकता है, चाहे जो बन सकता है, चाहे जिस वस्तु को प्राप्त कर सकता है । *उसकी शक्ति का कोई अंत नहीं ।* मानव शरीर का निर्माण बड़े विलक्षण मसाले से हुआ है । यदि निकम्मा पड़ा रहे तो बात दूसरी है, *अन्य किसी भी दिशा में उसे सुनियोजित ढंग से लगा दिया जाय तो मंजिल पर मंजिल पार करते हुए सफलता की अंतिम सीढ़ी तक जा पहुँचता है ।*
👉 *"परिश्रम" एक प्रकार की शरीर साधना है ।* इस साधना के द्वारा शरीर देवता को प्रसन्न कर उससे अभीष्ट वरदान प्राप्त किये जा सकते हैं । जिस प्रकार देवताओं या भूत-पलीतों की साधना की जाती है, *उसी प्रकार यह "शरीर" भी एक प्रत्यक्ष देवता है, इसमें एक से एक अद्भुत वरदान दे सकने की क्षमता विद्यमान है, पर वह देता उसी को है, जो "श्रम"-"साधना" द्वारा अपनी "श्रद्धा", "भक्ति" एवं "पात्रता" की परीक्षा देने में पीछे नहीं हटता ।*
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*"आलस्य" छोड़िए-परिश्रमी बनिए पृष्ठ-३*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 84🌺 Rishi chintan se 84🌺


*🥀//१७ अप्रैल २०२३ सोमवार//🥀*
*//वैशाखकृष्णपक्ष द्वादशी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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     *"परिश्रम" - विलक्षण सद्गुण*
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👉 कई बार कुछ लोगों में जन्मजात प्रतिभाएँ भी पाई जाती हैं । उनमें शारीरिक एवं मानसिक प्रतिभा दूसरों की तुलना में अधिक होती है । इसके आधार पर वे जल्दी और अधिक सरलता से सफलता प्राप्त कर लेते हैं । *यह ईश्वर का पक्षपात या भाग्य का खेल नहीं, उनके पूर्व जन्मों के "परिश्रम" का फल है, जो जन्मजात संस्कार के रूप में इस जन्म में अनायास ही उपलब्धि जैसा दीख रहा है ।* 
👉 *"परिश्रम" वह साधना है जो कभी निष्फल नहीं जाती ।* आज उसका अभीष्ट परिणाम न मिले तो भी यह नहीं सोचना चाहिए कि श्रम साधना बेकार चली गई, *जी तोड़ मेहनत करने का सद्गुण जिसमें विकसित हो जाता है, उसकी अन्य अनेकों प्रतिभाएँ जागृत हो जाती हैं ।* परिस्थिति वश चाही हुइ दिशा में, चाहे हुए समय में कोई सफलता न भी मिले *तो भी यह निश्चित है कि वह व्यक्ति प्रतिभाशाली एवं मनीषी अवश्य बन जाता है और अपनी इन विशेषताओं के कारण समय-समय पर अन्य अनेक प्रयोजनों में दूसरों की अपेक्षा अधिक सफल सिद्ध होता है ।*
👉 देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन करके १४ रत्न निकाले थे । दोनों की दरिद्रता एवं विपन्नता से द्रवित होकर उन्हें प्रजापति ने यही परामर्श दिया था कि *आप लोग अनवरत "परिश्रम" करें ।* इसके फलस्वरूप आपके सभी अभाव एवं कष्ट दूर होंगें । उन्होंने किया भी वैसा ही । फलस्वरूप जो कुछ मिला, उसे पाकर उन्हें ही नहीं समस्त संसार को अधिक सुखी, अधिक सम्पन्न होने का अवसर मिला, *हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते तो उनका दैन्य-दारिद्र्य दिन-दिन बढ़ता ही रहता और अंत में वे अपने अस्तित्व से ही हाथ धो बैठते ।*
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*"आलस्य" छोड़िए-"परिश्रमी" बनिए पृष्ठ-४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 85🌺 Rishi chintan se 85🌺




*🥀//१८ अप्रैल २०२३ मंगलवार//🥀*
*//वैशाखकृष्णपक्षत्रयोदशी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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         *➖❗दारिद्र्य❗➖*
                *〰️अर्थात〰️*
      *➖आलस्य का दुष्परिणाम➖*
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👉 *"दारिद्र्य"और कुछ नहीं मनुष्य के शारीरिक और मानसिक आलस्य का ही प्रतिफल है ।* जिस वस्तु का समुचित उपयोग नहीं होता वह अपनी विशेषता खो बैठती है । सीलन में पड़े हुए लोहे को जंग लग जाती है और उसी से वह गलता चला जाता है । खूँटे से बँधा हुआ घोड़ा अड़ियल हो जाता है, जिन पक्षियों को उड़ने का अवसर नहीं मिलता वे अन्तत: उड़ने की शक्ति ही खो बैठते हैं । पान के पत्तों की हेराफेरी न की जाय तो जल्दी ही सड़ जाते हैं । *यही स्थिति मनुष्य के शरीर की भी है, यदि उसे परिश्रम से वंचित रहना पड़े तो अपनी प्रतिभा, स्फूर्ति एवं प्रगतिशील तेजस्विता ही नहीं खो बैठता प्रत्युत अवसाद ग्रस्त होकर रोगी भी रहने लगता है ।* जो बैठे रहते हैं, उनकी तोंद निकल आती है, शरीर भारी हो जाता है, चलने-फिरने में कठिनाई होती है, साँस फूलती है, दिल धड़कता है, पेशाब में शक्कर जाने लगती है, पैर भड़कते हैं और सिरदर्द बना रहता है । *इतनी व्यथाएँ उन लोगों के पल्ले बँधती है, जिन्हें परिश्रम नहीं करना पड़ता और बैठे-बैठे आलस्य में दिन बिताते हैं ।*
👉 आराम तलब, मेहनत से बचने वाले लोगों की जीवनी शक्ति क्षीण हो जाती है, सर्दी-गर्मी और बीमारियों से लड़ने की सामर्थ्य चली जाती है । जल्दी-जल्दी जुकाम होता है, सर्दी, खाँसी सताती है, जल्दी लू लगती है, गर्मी का प्रकोप रहता है । कोई छोटी सी भी बीमारी हो जाय तो मुद्दतों जड़ जमाये बैठी रहती है, कीमती दवा-दारू कराने पर भी टलने का नाम नहीं लेती । *ऐसा होता इसलिए है कि वह जीवनी शक्ति जो परिश्रम करने वाले में प्रदीप्त रहती है, ऐसे लोगों में मर जाती है और वे किसी छोटे-मोटे आक्रमण तक का सामना कर सकने में असमर्थ हो जाते हैं ।*
👉 *जिन्होंने कठोर श्रम के द्वारा अपनी जीवनी शक्ति को प्रखर और प्रचुर बनाया है वे शरीर पर होने वाले किसी भी बाह्य आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए जल्दी ही रोग मुक्त हो जाते हैं ।* उन्हें अच्छे होते देर नहीं लगती । कोई चोट लग जाय तो जल्दी ही जख्म भर जाता है, सर्दी-गर्मी का प्रकोप एक दो दिन से अधिक नहीं रहता *पर जिनमें उस तरह की क्षमता संचित नहीं है, उन्हें थोड़ी-थोड़ी विकृतियाँ मुद्दतों घेरे बैठी रहती हैं ।*
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*"आलस्य" छोड़िए-"परिश्रमी" बनिए पृष्ठ-५*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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