ऋषि चिंतन से भाग 21

मानसिक आवेगों पर नियंत्रण कीजिये ।
कार्य पू्र्ण मनोयोग से करें।
आँख बंद कर विश्वास मत कीजिए ।
  अपना दृष्टिकोण सही रखिए ।
 यह उलटबांसी अच्छी नहीं है ।


🌺 ऋषि चिंतन से 101🌺 Rishi chintan se 101 🌺

*🥀//०५ मई २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष पूर्णिमा२०८०//*
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*👉आज ..........................*
   *🙏➖बुद्ध पूर्णिमा है➖🙏*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *🧑‍🎤सावधान➖➖➖........*
*〰️कार्य पू्र्ण मनोयोग से करें〰️*
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👉 आलस्य और प्रमाद के चंगुल में फँसा हुआ व्यक्ति अपनी तीन चौथाई शक्ति को नष्ट कर डालता है । *यदि "समय" और "श्रम" का अपव्यय रोका जा सके तो प्रतीत होगा कि क्रियाशक्ति कई गुना बढ़ गई ।* प्रमादवश आधे अधूरे मन से अन्यमनस्क रहकर उपेक्षा पूर्वक बेगार भुगतने की तरह काम किए जाते हैं । फलत: वे सभी काने, कुबड़े, त्रुटिपूर्ण एवं अस्त व्यस्त रहते हैं । *अधूरे शारीरिक और मानसिक श्रम से किए गए काम अपनी त्रुटिपूर्ण स्थिति के कारण ऐसे निराशाजनक रहते हैं कि उनकी अपेक्षा न करना अधिक उत्तम रहता है ।* उन्हीं कार्यों की प्रशंसा होती है, वे ही लाभदायक होते हैं, जिनमें तत्परता पूर्वक शारीरिक श्रम और तन्मयता पूर्वक मनोयोग लगाया जाता है । इसी रीति से किए गए काम कर्ता का गौरव बढ़ाते हैं और उसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य हथियाने का अवसर देते हैं । *प्रगतिशील मनुष्यों के समुन्नत बनने का यह क्रम रहा है, उन्होंने अपनी शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को अस्त व्यस्त होने से बचाया है ।* आलस्य प्रमाद की अर्ध-मृतक स्थिति में अपने को नहीं फँसने दिया है । *समझा जाता है कि आलस्य शरीरगत दोष या रोग है, पर वस्तुत: वह मन की तन्द्रित स्थिति है ।* शरीर पर मन का अधिकार है । मन के संकेतों पर ही उसकी समस्त गतिविधियाँ संचालित होती हैं । मन में उत्साह हो तो कोई कारण नहीं कि शरीर पर निष्क्रियता छाई रहे । *"आलस्य" और "प्रमाद" की जोड़ी साथ साथ चलती है ।* मन पर अवसाद छाया है तो शरीर में ही स्फूर्ति कैसे दृष्टिगोचर हो सकती है । कई बार रुग्ण और दुर्बल मनुष्य भी इतना काम कर गुजरते हैं कि आश्चर्य से दाँतो तले उंगली दबानी पड़ती है । *यह शरीर का नहीं, मन की उभरी हुई स्थिति का ही चमत्कार होता है ।* आद्य शंकराचार्य रुग्ण में रहते हुए भी 32 वर्ष जैसी स्वल्प आयु के मिलने पर भी इतना काम कर सके जितना दीर्घ जीवी मनुष्य कई जन्मों में भी नहीं कर सकते । *यह उनके शरीर का नहीं मन का ही कर्तृत्व था ।*
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*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-२८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/WCLawhRmzu8








🌺 ऋषि चिंतन से 102🌺 Rishi chintan se 102 🌺


*🥀//०६ मई २०२३ शनिवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष प्रतिपदा२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*मानसिक आवेगों पर नियंत्रण कीजिए*
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👉 *ईर्ष्या, द्वेष, शोक-संताप, क्रोध, आवेश, रोष की मानसिक उत्तेजना में मानसिक शक्ति का बुरी तरह विनाश होता है जो सृजनात्मक कार्यों में लगा दिए जाने पर असाधारण उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सकती थी ।* कहते हैं कि एक घंटे का क्रोध एक दिन के बुखार से अधिक शक्ति नष्ट करता है । कामुकता जैसी वासनाएँ मस्तिष्क को ऐसे चिंतन में उलझाये रहती हैं, जिसमें मिलता कुछ नहीं, गँवाना ही गँवाना हाथ लगता है । चिंता, निराशा, भय, आशंका जैसे थकान उत्पन्न करने वाले अवसाद और क्रोध, प्रतिशोध, द्वेष जैसे आवेश दोनों ही ज्वार-भाटों की तरह अवांछनीय उद्वेग उत्पन्न करते हैं । *इस जंजाल में मनुष्य को अपनी उस क्षमता को व्यर्थ नष्ट करना पड़ता है जो यदि सृजनात्मक दिशा में लगी होती तो चमत्कार उत्पन्न किया होता ।*
👉 प्रतिकूल परिस्थितियों में अवसाद और आवेश आता है, यह ठीक है, पर यह तो अनगढ़ स्थिति हुई । *परिष्कृत मन:स्थिति में इन आवेगों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है ।* उत्तेजना पर नियंत्रण प्राप्त करके उसे अर्ध उन्माद बनने से रोका जा सकता है । इस बचत को उस उपाय में लगाया जा सकता है जिससे प्रतिकूलताओं से जूझने के उपाय सोचने और उन्हें निरस्त करने के साधन जुटाना संभव हो सके । *उद्विग्न रहने से प्रतिकूलताएँ घटती नहीं, बढ़ती है ।* उत्तेजित मस्तिष्क निवारण का मार्ग नहीं खोज सकता वरन् हड़बड़ी में ऐसे कदम उठा लेता है जो नई विपत्ति खड़ी करते हैं और प्रतिकूलता की हानि कई गुनी बढ़ जाती है । *परिस्थिति जन्य प्रतिकूलता जितनी हानि नहीं पहुँचाती है उससे अधिक स्वनिर्मित उद्विग्नता के कारण उत्पन्न होती है ।* इस तथ्य को यदि समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि मनोनिग्रह की जीवन में कितनी बड़ी आवश्यकता है । *अनगढ़ मस्तिष्क इतनी अधिक विपत्ति उत्पन्न करता है कि जिसकी तुलना में परिस्थिति जन्य कठिनाइयों को स्वल्प ही कहा जा सकता है ।* मन की सूक्ष्म शरीर से साधना करके उन स्वनिर्मित असंतुलनों से बचा जा सकता है जो जीवन को संकटग्रस्त बनाने के बहुत बड़े कारण बने रहते हैं ।
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*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-२९*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/shUU29H2r7w

















🌺 ऋषि चिंतन से 103🌺 Rishi chintan se 103 🌺



*🥀//०७ मई २०२३ रविवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष द्वितीया२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *यह उलटबांसी अच्छी नहीं है*
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👉 *अभिभावक अपने बच्चों की मानसिक क्षमता-बुद्धिमत्ता के संबंध में चिंता व्यक्त करते रहते हैं ।* उसे घटाकर बताते हैं । अधिक तीव्र बुद्धि वालों से तुलना करते हैं और प्रकारांतर से वह अपने बालकों को मानसिक स्थिति में हेय सिद्ध करते रहते हैं । *यह भर्त्सना भले ही अपने बालक को अधिक बुद्धिमान होने की शुभकामना से प्रेरित होकर की गई हो पर उसका तरीका ऐसा होता है जिससे बच्चों के कोमल मन पर निराशा का दबाव पड़ता है और वह वस्तुतः मूर्ख व प्रमादी बनते चले जाते हैं ।* आत्म स्वीकृति को मन:शास्त्र में अत्यधिक माना गया है । यह उत्पन्न तो अपने द्वारा ही होती है, पर इसमें योगदान समीपवर्ती स्वजनों वह शुभचिंतकों का ही अधिक होता है । *यह है जिसे "स्वजनों" का "स्वजनों" पर अत्याचार कह सकते हैं ।*
👉 अक्सर माताएँ अपने बच्चों के बारे में, पत्नियाँ अपने पतियों के बारे में कमजोरी बीमारी आदि की बात कह कर चिंता व्यक्त करती रहती हैं और प्रकारांतर से अपने प्रिय पात्रों के स्वास्थ्य को अनजाने ही हानि पहुँचाती रहती हैं । मिलने वाले यदि कहें कि आप पहले से दुबले दिखाई दे रहे हैं तो यदि उनकी चिंता उथली व बनावटी भी है तो उसका बुरा प्रभाव संबंधित व्यक्ति पर पड़कर ही रहेगा और वह इन शुभचिंतकों के कथनानुसार उसी ढाँचे में ढलता चला जाएगा और अपेक्षाकृत अधिक जल्दी वास्तविक बुढ़ापे का शिकार बनकर रहेगा ।
👉 इस निषेधात्मक प्रभाव प्रक्षेपण की हानि को यदि समझा जा सकता होता और उसके स्थान पर विधेयात्मक प्रक्रिया अपनाई जा सकी होती तो निश्चय ही खाई खोदने के स्थान पर दीवार चुनने जैसा अंतर दिखाई पड़ता । खाई खोदने से समतल भूमि नीचे धसँती जाती है । इसके विपरीत चुनने या जमा करने से वही स्थान ऊँचा उठता चला जाता है । उपयोगी भी बनता है और दूर से दिखाई पड़ता है । *यदि शारीरिक स्वच्छता, मानसिक बुद्धिमत्ता, कामों की कुशलता, व्यक्तित्व की श्रेष्ठ्ता को ढूँढा जाए तो उसकी बड़ी मात्रा हर किसी में मिल सकती है । *स्वजनों में भी उसी पक्ष को यदि उत्साहवर्धक ढंग से कहते रहा जाए तो इसका प्रभाव बहुत ही उपयोगी होगा ।* इनमें न तो प्रवंचना मानना चाहिए और न.मिथ्याचार । प्रशंसा के योग्य प्रोत्साहित करने योग्य तत्व हर किसी में पाए जाते हैं, भले ही मात्रा की दृष्टि में न्यून ही क्यों न हों । छोटी सी बीमारी को निरस्त करने के लिए जब इतने प्रबल प्रयास किए जा सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि थोड़ी सी अच्छाई को प्रोत्साहित करने तथा सराहने में कोताही की जाए ।
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*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-३२*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/_tiz5OrXXhQ









🌺 ऋषि चिंतन से 104🌺 Rishi chintan se 104🌺

*🥀//०८ मई २०२३ सोमवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष तृतीया२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*आँख बंद कर विश्वास मत कीजिए*
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👉 *कुछ व्यक्ति ऐसे भी पाए जाते हैं जिनका व्यवसाय ही दूसरों को डरा कर उनकी भयभीत मन:स्थिति का लाभ उठाना होता है ।* इस धंधे में ज्योतिषी लोग सबसे अग्रणी होते हैं । उनकी बात भूत-पलीतों की विद्या जानने का दावा करने वालों की भाँति है । इन लोगों के हथकंडे समझदार तो जानते हैं और उनसे बचते भी हैं, पर अपने देश की जनता का बहुत बड़ा भाग ऐसा है जो उन लोगों पर अपनी धर्मभीरुता और मूढ़ मान्यता के कारण सहज ही विश्वास कर लेता है । *ये लोग सामान्य सी बीमारियों एवं कठिनाइयों को ग्रह नक्षत्र एवं भूत-प्रेतों द्वारा धकेली बताकर उस विपत्ति ग्रस्त को और अधिक डरा देते हैं ।* कठिनाई से दु:खी और भय से आतंकित व्यक्ति दुहरे प्रहार से घबरा जाता है और उन्हीं लोगों से बचाव का उपाय पूछता है । उनका नपा तुला उत्तर एक ही होता है । कुपित ग्रह-नक्षत्र या भूत-पलीत को शांत करने के लिए तंत्र-मंत्र करना पड़ेगा, डरे-घबराए हुए लोग इस कुचक्र से अपनी जेब कटाते और मानसिक प्रहार से अपने व्यक्तित्व की जड़ें खोखली करते रहते हैं । आशंका और भय उनके स्वभाव का अंग बन जाता है जो आगे चलकर उन्हें किसी न किसी प्रकार त्रास ही देता रहता है । *इस प्रकार के मूर्खताजन्य आक्रमणों से आत्मरक्षा करना और अकारण अपने को आतंकित न होने देना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है ।*
👉 *ठीक इसी प्रकार चिकित्सकों में से भी एक ओझा वर्ग ऐसा पाया जाता है जो रोग की सामान्य सी व्यथा को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताता और प्राण संकट उत्पन्न होने जैसा खतरा जताता है ।* इस प्रकार आतंकित रोगी से चिकित्सा के नाम पर मोटी रकम ऐंठते रहना सरल पड़ता है । इस कुचक्र को भी ओझाओं और ज्योतिषियों की तरह ही भयानक मानना चाहिए और जहाँ ऐसी आशंका हो वहाँ दूर से ही झंनमस्कार श *रोगी तो समयानुसार अच्छे होते रहते हैं ।* केवल दवा दारू से ही बीमारियाँ अच्छी नहीं होती । *प्रकृति भी अपना कार्यक्रम बराबर जारी रखती है और बीमार अच्छे होते रहते हैं ।* रोगोपचार का जितना महत्व है उससे भी अधिक इस बात का महत्व है कि कहीं बीमारी ने रोगी का मनोबल तो नहीं तोड़ दिया । कष्ट-निवृत्ति, रोग-चिकित्सा, संकट मुक्ति, विपत्ति से सुरक्षा आदि के लिए प्रयत्न पुरुषार्थ किए ही जाने चाहिए, परंतु उन उपचारों में भयाक्रांत एवं चिंताग्रस्त बनाने वाली नई विपत्ति सिर पर न बैठे, इसका और भी अधिक ध्यान रखना चाहिए । *विपत्ति भी बीमारी की तरह ही समयानुसार टल जाती है किंतु उपाय उपचार के सिलसिले में यदि मनोबल गिरा लिया गया तो वह हानि उपचार लाभ की तुलना में अधिक भारी ही पड़ेगी ।*
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*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-३४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 105🌺 Rishi chintan se 105 🌺



*🥀//०९ मई २०२३ मंगलवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ कृष्णपक्ष चतुर्थी२०८०🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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   *अपना दृष्टिकोण सही रखिए*
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👉 *दृष्टिकोण की विकृतियाँ हमें अकारण उलझनों में पटकती और खिन्न रहने के लिए विवश करती हैं ।* हम गरीब हैं या अमीर इसका निर्णय दूसरों के साथ तुलना करने में ही होता है । जब अपने को अमीरों की तुलना में तोला जाता है तो हल्के पड़ते हैं और गरीब लगते हैं । *पर यदि अपने से दरिद्रों के साथ तुलना प्रारंभ करें तो प्रतीत होगा कि वर्तमान स्थिति भी कम सौभाग्यशाली नहीं है ।* यदि हम अपनी असफलताओं की सूची बनाएँ तो प्रतीत होगा कि पग-पग पर हार होती ही है, ठोकरें लगी है और पराभव का बार-बार मुँह देखना पड़ा है । *किंतु यदि सफलताओं की दूसरी सूची तैयार की जा सके तो प्रतीत होगा कि सौभाग्य ने कितना साथ दिया है और ईश्वर के अनुग्रह से समय-समय पर मिलती रही सफलताओं का कितना अधिक अवसर मिलता रहा है ।* सुख-दु:ख, सफलता-असफलता, लाभ-हानि, के उभयपक्षीय अवसर नित्य ही सामने आते हैं । *इनमें हम जिन्हें महत्व देते हैं, वे ही सामने खड़े हो जाते हैं ।* सौभाग्यों और दुर्भाग्यों में से जिन्हें भी गिनना चाहें, उन्हीं की भरमार दिखाई देगी ।
👉 संसार में न कोई पूर्ण सुखी है और न दु:खी । मिश्रित जीवनक्रम ही हर किसी के सामने रहता है । रात-दिन मिलकर ही समय-चक्र घूमता है । नमक और शक्कर के मिले-जुले स्वाद ही सरस लगते हैं । ताने और बाने से मिलकर कपड़ा बुना जाता है । जन्म और मरण के चक्र पर ही जीवन की धुरी घूमती है । एक की हानि दूसरे का लाभ बनती है । *दुनिया हमारे लिए ही नहीं बनी है । अपनी इच्छा अनुसार ही सब कुछ होता रहे ऐसा संभव नहीं ।* संसार में फैली हुई बुराइयों को ही देखते रहने के स्थान पर यदि अच्छाइयों पर भी दृष्टि डाली जाए तो संतुलन बना रह सकता है । *अपने साथ अपकार करने वालों की सूची के साथ-साथ यदि उपकारों को भी गिन लिया जाए तो खिन्नता का आधा भाग प्रसन्नता के अधिकार में चला जाएगा ।* निकट भविष्य में विपत्ति की आशंका करते रहने से मन भारी रहता है । *यदि उज्ज्वल भविष्य की आशा संजोने लगें तो इतने भर से आँखों पर छाया हुआ निराशा का अंधेरा हट सकता है और सुखद संभावना की कल्पना से नई ज्योति चमक सकती है ।*
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*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-३८*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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