मन के दास नहीं, स्वामी बनें ।
आप दृढ़ इच्छा कीजिए तो जो चाहोगे वही मिलेगा ।
सावधान ,धन ईमानदारी से ही कमाइए।
आत्मघाती अहंकार से बचिए ।
अशुभ नहीं , शुभ संकल्प जगाइए ।
🌺 ऋषि चिंतन से 96🌺 Rishi chintan se 96🌺
*🥀//३० अप्रैल २०२३ रविवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष दशमी२०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*मन के दास नहीं, स्वामी बनें*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *मनुष्य के शरीर में सभी कुछ महत्व का है,* और तो और नाखून, पंजे, उंगलियाँ और पाँव, हाथ तक बड़े उपयोगी हैं, *परंतु "मन" का महत्व सर्वाधिक है ।* इसकी विलक्षण शक्तियाँ हैं । मनुष्य का सुख-दु:ख बंधन और मोक्ष ये सभी *"मन"* के अधीन हैं । शास्त्रकार ने कहा है -- *"मनएव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयो:"*
अर्थात् मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण *"मन"* ही है । सांसारिक वैभव चाहिए उसको भी *"मन"* ही प्रदान करता है और परमसुख, मोक्ष चाहिए तो उसका प्रदाता भी *"मन"* ही है । *मनुष्य की सेवा में हर घड़ी "मन" ताबेदार सेवक की तरह तैयार खड़ा रहता है, वह कभी थकता नहीं ।* कभी वह रुकता नहीं, कभी वृद्ध नहीं होता, सतत उद्योग उसका स्वभाव है । इच्छाएँ करते रहना और उनकी पूर्ति के पीछे भागते-फिरने में ही उसे आनंद आता है । *"मन"* की सामर्थ्य अपार है, वह सब कुछ कर सकता है, *किंतु उसमें स्वेच्छाचारिता की बुराई भी है ।*
👉 *अनियंत्रित "मन" नकेल रहित ऊँट की तरह ही मनुष्य को पथभ्रष्ट करता और घर-- "जीवनलक्ष्य" की ओर ले जाने की अपेक्षा इंद्रिय सुखों के बीहड़ में ले जाकर किसी रोग-शोक, कलह- कुटिलता, कुसंग-कुमार्ग, कुटेव से टकराकर पटक देता है ।* मनुष्य का जन्म जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ था उसका स्मरण भी नहीं आता, उल्टे यह जीवन भी नारकीय बन जाता है ।
👉 *सारी सिद्धियों का मूल "मन" के संयम में है, परंतु वह केवल साधारण पुरुषार्थ से मिल जाने वाली नहीं ।* *"मन"* की साधना किसी भी पुरुषार्थ से, योग से बढ़कर है । इसीलिए शास्त्रकार ने कहा--
*"जगत् केन ? मनो ही येन"* अर्थात् *जिसने "मन" को जीत लिया उसने संसार को जीत लिया ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*मन की प्रचंड शक्ति और मनोविज्ञान पृष्ठ-६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/3z7Jf7O5UhQ
🌺 ऋषि चिंतन से 97🌺 Rishi chintan se 97🌺
*🥀//०१ मई २०२३ सोमवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष एकादशी२०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*👩🎤आप दृढ़ इच्छा कीजिए तो*
*➖जो चाहोगे वही मिलेगा➖*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *वस्तुतः हमें उतनी ही सफलताएँ या उपलब्धियाँ मिलती हैं, जितनी कि हम चाहते हैं ।* चाहने को तो लोग न जाने क्या-क्या चाहते, आकांक्षा और इच्छाएँ रखते हैं । पर वह चाहना और बात है तथा उनका फलित होना और बात । हम चाहते तो है हमारे पास खूब संपत्ति जमा हो पर सौ में से दस प्रतिशत भी हमारे मन में संपत्तिवान बनने की आकांक्षा नहीं होती । *हमें विश्वास नहीं होता कि हम भी संपत्तिशाली बन सकते हैं ।*
👉 पानी में डूबते समय जैसे तीव्र आकांक्षा होती है कि हम बच जाएँ और तुरंत हाथ-पाँव मारने लगते हैं । अपने शरीर का दबाव और पानी की उछाल शक्ति की हड़बड़ी में ही सही संतुलन बिठाने लगते हैं और फलस्वरूप तैरने लगते हैं । *हम अमीर बनना चाहते हैं पर कभी हमारा जी अपने आस-पास की दरिद्रता से वैसा घुटता हुआ अनुभव नहीं करता जैसी घुटन पानी में डूबते समय होती है और हम छटपटाने लगते हैं ।*
👉 *इस तीव्र आकांक्षा के अभाव का भी कारण अपने आप के प्रति अविश्वास, अपने आपका अवमूल्यन, अपना मूल्य घटाकर देखने की कमजोरी ।* उदाहरण के लिए अधिकांश लोग अपनी दरिद्रता और गरीबी का कारण किस्मत और सितारों पर छोड़ देते हैं । *वे समझते हैं कि सुख-संपत्ति भाग्य का खेल है और इस कदर भाग्यवादी बन जाते हैं कि "अकर्मण्यता" और "किंकर्तव्यविमूढ़ता" उनकी नस-नस में बस जाती है ।* इस प्रकार अपने को भाग्य के अधीन समझने वालों या अयोग्य मानने वालों को *अपना मूल्यांकन करना कहाँ आता है ? उन्हें भविष्य की आशा ही कहाँ रहती है ?*
👉 *इसके विपरीत आत्मविश्वासी भाग्य को अपने पुरुषार्थ का दास समझता है ।* न्यू हैम्पशायर में डेनियल वेव्सटर को बड़ी मुश्किल से १५०० डालर का एक पद मिला था । इस नौकरी के लिए उसके पिता ने काफी पापड़ बेले और जब वे अपने लड़के को इस पद पर नियुक्ति दिलाने में सफल हो गए तो बहुत प्रसन्न हुए और डेनियल को बधाई भी दे डाली । बधाई के समय डेनियल ने बड़ी उदासीनता से कहा- *"यह मेरा लक्ष्य नहीं है और मैं इस पद पर थोड़े ही समय काम करूँगा ।* पिता ने नाराज हो कर कहा था-- *"तुम्हें कौन गवर्नर बना देगा ? तुम एक गरीब घर में पैदा हुए हो गरीब आदमी को अपने निर्वाह का साधन मिल जाने पर ही संतुष्ट हो जाना चाहिए ।* प्रत्युत्तर में डेनियल ने कहा - *"नहीं, मैं अपने आप को गरीब नहीं मानता हूँ । मुझे आशा है कि मैं इससे अच्छा काम कर सकता हूँ । मैं अदालतों में अपनी वाणी का प्रयोग करना चाहता हूँ न कि कलम का । मैं स्वयं काम करने वाला बनना चाहता हूँ, दूसरों को काम सिखाने वाला नहीं । और इसी आत्मविश्वास के बल पर डेनियल ने अपने सपनों को साकार कर दिखाया ।"*
👉 हम अपना मूल्यांकन करें तो हमारी प्रतिभा निश्चय का स्पर्श पाते ही जीवंत हो उठती है । *इस संसार में मनुष्य के लिए न तो कोई वस्तु या उपलब्धि अलभ्य है तथा न हीं कोई व्यक्ति किसी प्रकार अयोग्य ।* अयोग्यता है तो इतनी भर कि वह स्वयं अपने को उस उपलब्धि के योग्य अनुभव नहीं करता । *यदि अपनी क्षमताओं को पहचान कर उन का विकास किया जाए तथा आत्मीयता की संजीवनी द्वारा उन्हें जीवन्त बनाया जाए तो मनुष्य परमात्मा का राजकुमार कहलाने की स्थिति प्राप्त कर सकता है ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*प्रगति की प्रसन्नता की जड़ें अपने ही भीतर पृष्ठ-५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 98🌺 Rishi chintan se 98🌺
*🥀//०२ मई २०२३ मंगलवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष द्वादशी२०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*➖👉❗सावधान❗👈➖*
*〰️धन ईमानदारी से ही कमाइए〰️*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 पैसे में रचनात्मक शक्ति है, उसके द्वारा कितने ही उपयोगी कार्य हो सकते हैं और सदुद्देश्यों की पूर्ति में सहायता मिल सकती है । *पर साथ ही यह भी नहीं भूल जाना चाहिए कि उसकी "मारक" शक्ति उससे भी बढ़ी-चढ़ी है ।*
👉 *"धन" का महत्व तभी है जब वह "नीतिपूर्वक" कमाया गया हो और सदुउद्देश्यों के लिए उचित मात्रा में खर्च किया गया हो ।* अनीति से कमाया तो जा सकता है, जिन लोगों के द्वारा वह कमाया गया है, जिन का शोषण या उत्पीड़न हुआ है, *उनका विक्षोभ सारी मानव सभ्यता के लिए घातक परिणाम उत्पन्न करता है ।* शोषित एवं उत्पीड़ित व्यक्ति जब यह देखते हैं कि उन्हें ठगा या सताया गया है और जिस ने सताया या ठगा है वह मौज कर रहा है , *तो उनका मन आस्तिकता एवं नैतिकता के प्रति विद्रोह भावना से भर जाता है ।*
👉 *यह विक्षोभ धर्म और ईश्वर पर से विश्वास डिगा सकता है और उसी स्थिति में पड़ा हुआ मनुष्य अपने ढंग से अपने से छोटों के साथ दुर्व्यवहार आरंभ कर सकता है । *इस प्रकार बुराई की बेल बढ़ती है और उसके विषैले फल संसार में अनेकों प्रकार के दुष्परिणाम पैदा करते हैं ।* इस प्रकार फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों का कोई परिणाम उस पर भी हो सकता है, *जिसने अनीति पूर्वक किसी का शोषण किया था ।*
👉 बुराई से केवल बुराई बढ़ती है । *"धन" यदि बुरे माध्यम से कमाया गया है तो उसका खर्च भी उचित रीति से नहीं हो सकता ।* जिसने पसीना बहा कर गाढ़ी कमाई से पैसा कमाया है उसे खर्च करते समय दरद लगेगा और बार-बार सोचेगा इसे किस कार्य के लिए कितनी मात्रा में खर्च करना उचित है ? *किंतु जिसने बिना परिश्रम, धूर्तता पूर्वक कमाया है,उसके लिए निरर्थक कामों में बहुत कुछ खरच कर डालना भी बुरा न लगेगा ।* सच बात तो यह है कि हराम की कमाई आडंबर बनाने, ढोंग रचने और विलासिता के प्रसाधन जमा करने में ही खर्च होती है । अनेकों व्यसन ऐसे लोगों के पीछे पड़ जाते हैं, जिनमें वह धन तो बर्बाद होता ही है, साथ ही शरीर और मन को अस्तव्यस्त कर देने वाली अनेकों बुराइयाँ भी अपने भीतर पैदा हो जाती हैं । जिनके कारण अनेकों विपत्तियों और व्यथाओं का सामना करना पड़ता है । *इस प्रकार वह अनुचित कमाई अपना क्षणिक चमत्कार दिखाकर अंततः मनुष्य के भविष्य को अंधकारमय बनाने वाली ही सिद्ध होती है ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*धन बल से मनुष्यता रौंदी न जाए पृष्ठ-३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
https://youtu.be/P7m4c0Ip8WE
🌺 ऋषि चिंतन से 99🌺 Rishi chintan se 99🌺
*🥀//०३ मई २०२३ बुधवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष त्रयोदशी२०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*आत्मघाती अहंकार से बचिए*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *"अहंकार" के कारण न केवल मनुष्य जाति हिंसा तथा विनाश का शिकार हुई है बल्कि उसके कारण मनुष्य का नैतिक पतन भी हुआ है ।* स्वार्थ, संकीर्णता, अनुदारता, लोभ, परस्वत्वापहरण जैसे दुर्गुणों का एकमात्र जनक भी *"अहंकार"* ही है
👉 *संपन्नता व्यक्ति की "श्रमशीलता" और "पुरुषार्थ" का पुरस्कार है, इसलिए वह सम्माननीय है, परंतु "अहंकार" उसे अपना लक्ष्य बना लेता है ।* संपन्न होना इसलिए भी आवश्यक है उसके बल पर जीवन यापन का क्रम सुख सुविधा पूर्वक चलाया जा सके । यद्यपि आध्यात्मिक जीवन दर्शन की प्रेरणा तो यह है कि मनुष्य अपनी आवश्यकताएँ अनिवार्य स्तर तक ही सीमित रखें और उन्हें पूरा करने के बाद बचा समय व श्रम मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने में लगाये । फिर भी सुख सुविधाओं के साधनों को एक सीमा तक छूट दी जा सकती है *लेकिन उनकी आकांक्षा जब इस भावना से प्रेरित होकर बढ़ने लगती है कि हमें दूसरों की तुलना में संपन्न दिखाई देना है, तो वह भावना "लोभ" के अंतर्गत आ जाती है जिसकी कोई सीमा नहीं है ।* लोभ की सीमा इसलिए नहीं है कि दस व्यक्तियों की तुलना में संपन्न होने के बाद व्यक्ति को दिखाई देने लगता है कि सौ दूसरे व्यक्ति उससे ज्यादा संपन्न है, उसको कसक होती है और वह उन सौ व्यक्तियों से भी आगे निकल जाना चाहता है ।
👉 *"अहंकार" सदैव दूसरों को मापदंड बनाकर चलता है ।* दूसरों से तुलना कर अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने की प्रवृत्ति का नाम ही *"अहंकार"* है । भले ही फिर कोई सिद्ध कर पाए या न कर पाए सिद्ध करने की चेष्टा में लगा रहे । *अपनी जिन मौलिक विशेषताओं पर गर्व किया जा सकता है, वे "अहंकार" से भिन्न है क्योंकि अपने आप पर गर्व करना तथा उन विशेषताओं की दूसरों के साथ तुलना न करना व्यक्तियों में संतोष, शीलता और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करता है ।* जबकि लोग अपनी उपलब्धियों को दूसरों से बढ़-चढ़कर बताते हैं तो उनमें अहंकार की भावना ही 😢काम करती है ।
👉 *अहंकार ही प्रत्येक देश और घर में दु:खों का मूल कारण है ।* परिवार में भी अहंकार के कारण क्लेश, कलह और विग्रह का वातावरण बनता है । पति अपने को पत्नी से श्रेष्ठ समझता है इसलिए वह तरह-तरह से उस पर अपना प्रभुत्व जमाता है । पत्नी का स्वभाव यदि समझौता वादी हुआ तो वह पति के अहंकार को किसी प्रकार निबाह ले । *लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह पति के अहंकार पूर्ण दावे को पचा लेगी ।* पत्नी भी यदि अपने. अहम के प्रति उतनी सजग, आग्रहशील रही तो नित्य का क्लेश परिवार के वातावरण को नर्क बना डालेगा ।
👉 दूसरे कई दुर्गुण ऐसे हो सकते हैं जो लोगों को समीप ला सकते हैं । शराबी, शराबी के साथ चोर, चोर के साथ दो आवारापन चं व्यक्ति एक दूसरे के मित्र हो सकते हैं, *यह भी देखने में आता है कि दो समान स्वभाव के दुर्गुणी व्यक्ति एक दूसरे के अच्छे मित्र बन जाते हैं, परंतु किन्हीं व्यक्तियों में सभी सद्गुण हों, किंतु उनमें "अहंकार" का एक ही दुर्गुण हो तो फिर कभी एक दूसरे के समीप नहीं जाएँगे । अधिकांश सद्गुणी व्यक्तियों में जिनमें कोई दुर्गुण होता है उनमें पहला नंबर "अहंकार" ही होता है । इसीलिए दुष्ट दुर्जनों की अपेक्षा सज्जन प्रकृति के व्यक्ति ज्यादा असंगठित रहते हैं ।*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-१३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
🌺 ऋषि चिंतन से 100🌺 Rishi chintan se 100 🌺
*🥀//०४ मई २०२३ गुरुवार//🥀*
*//वैशाखशुक्लपक्ष चतुर्दशी२०८०//*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
*‼ऋषि चिंतन‼*
➖➖➖➖‼️➖➖➖➖
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
*❌➖अशुभ नहीं➖❌*
*✅---शुभ संकल्प जगाइए---✅*
〰️〰️〰️➖🌹➖〰️〰️〰️
👉 *दुर्बल मन:स्थिति के लोग प्रायः अशुभ भविष्य की कल्पनाएँ करते रहते हैं ।* विपत्ति की, असफलता की आशंकाएँ ही उनके मन पर छाई रहती हैं । वे ऐसे कारणों को ढूँढते और तर्कों को गढ़ते हैं, जो भविष्य में किसी संकट के आगमन की पुष्टि कर सकें । *बिगड़ी हुई तस्वीरों में मित्रों की आकृति शत्रु जैसी गढ़ दी जाती हैं । दूसरों की सामान्य गतिविधियों में भी षड्यंत्रों का जाल बिछा हुआ दिखाई देता है ।* यह अशुभ कल्पना चित्र किसी भयंकर दैत्य-दानव से कम नहीं होते । कल्पित भूतों को आमंत्रित करके कितने ही व्यक्ति स्व संकेतों के आधार पर बीमार पड़ते, डरते, घबराते और जान गँवाते देखे जाते हैं । विपत्ति की संभावना उन्हें दिन रात डराती रहती है । ऐसे मनुष्य भय से काँपते, खिन्न रहते और सदा निराशा में डूबे ही दिखाई पड़ते हैं । *ऐसी मन:स्थिति अपने आप में एक विपत्ति है । वास्तविक विपत्ति आने पर जितनी क्षति हो सकती थी उससे भी कई गुना हानि इस अशुभ चिंतन की आदत से होती है ।* ऐसा व्यक्ति अपनी बहुमूल्य चिंतन क्षमता का बहुत बड़ा भाग इसी भट्टी में झोंकता, जलाता रहता है ।
👉 *इस स्थिति को बदल सकता पूर्णतया अपने हाथ की बात है ।* कल्पनाएँ अपनी की गढ़ी हुई होती हैं । उन्हें अपने ही चिंतन, तर्क और अनुमान के सहारे ही तो खड़ा किया जाता है । *मस्तिष्क को चिंतन की विधेयात्मक धारा अपनाने के लिए यदि प्रशिक्षित किया जा सके तो उसने भर से समृद्धि, सफलता, प्रसन्नता एवं उज्जवल भविष्य की उत्साह भरी आशा का आनंद लिया जा सकता है ।* आँखों में चमकने वाली आशा, साहस बढ़ाती और उपयोगी पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरणा देती है । *निराशा में नष्ट होने वाली शक्ति को आशा भरी सृजनात्मक स्थिति में प्रयुक्त किया जा सके तो इतने भर से मनोबल बढ़ने लगेगा और उस अभिवृद्धि से सहज ही ऐसी क्षमता विकसित हो सकेगी जिसके सहारे सचमुच ही उज्जवल भविष्य का सृजन हो सके ।*
👉 सूक्ष्म शरीर की, मन मस्तिष्क की सृजनात्मक शक्ति को विकसित करने की चेष्टा को एक महत्वपूर्ण साधना कहा जा सकता है । उसके अनगढ़ होने का प्रतिफल ही हमें इस अत्यंत उपयोगी उपकरण के अनुदानों से वंचित किए रहता है । *इस दिशा में थोड़ा ध्यान दिया जाए, मस्तिष्क को अशुभ चिंतन से विरत करके विधेयात्मक दिशा अपनाने के लिए सहमत, अभ्यस्त किया जा सके तो यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि ही कही जाएगी ।* संसार में सफलता संपन्न महामानवों ने सबसे प्रथम अपने चिंतन को परिष्कृत किया है । इसी आधार पर उनकी गतिविधियांँ सुधरी । *चिंतन और कर्तृत्व इन्हीं दो पैरों के सहारे मनुष्य आगे बढ़ता है ।* यदि वे विकृत स्तर के हों तो प्रगति पतन की दिशा में होगी और स्थिति दु:खद एवं निराशाजनक बनती चली जाएगी ।
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖
*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-२५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
➖➖➖➖🪴➖➖➖➖