स्वस्थ रहना अपने हाथ में ही है
आप भी दीर्घायु प्राप्त कर सकते हैं
सामाजिक अपराधों के लिए हम भी परोक्ष रूप से जिम्मेदार
चित्त की एकाग्रता का विज्ञान
क्या आप अपनी बुद्धि तीक्ष्ण करना चाहते हैं
🌺 ऋषि चिंतन से 106🌺 Rishi chintan se 106 🌺
*🥀//१० मई २०२३ बुधवार //🥀*
*🍁ज्येष्ठ कृष्णपक्ष पंचमी २०८०🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*सामाजिक अपराधों*
*➖के लिए➖*
*हम भी परोक्ष रूप से जिम्मेदार*
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👉 *वस्तुतः अपराधों का क्रम न्यायसंहिता की परिधि की पहुँच से बहुत पहले प्रारंभ होता है ।* जिन कार्यों के लिए दंड संहिता में कोई व्यवस्था नहीं है, वे ही अपराधों के उद्गम केंद्र हैं । *"आलस्य-प्रमाद", "असंयम", "अशिष्टता", "उद्धत आचरण", "द्वेष-दुर्भाव", "कुदृष्टि-कुभाव", "कटु-भाषण" "अस्त-व्यस्तता", "नशा-पानी", "अस्वच्छता", "अनुशासनहीनता" जैसी अवांछनीयताएँ सरकारी अंकुश से भले ही मुक्त हैं, पर वस्तुत: अपराधों की कारणभूत उत्तेजनाएँ इन्हीं से पनपती, फैलती हैं ।* ये ही अवांछनीयताएँ बढ़कर विध्वंसक अपराधों-विभीषिकाओं का रूप ले लेती हैं । *नैतिक और नागरिक मर्यादाओं का निरंतर उल्लंघन तथा मानवीय संवेदनशीलता का नितांत अभाव ही अपराधियों का वास्तविक आधार और प्रेरणा केंद्र है क्योंकि ये ही आदमी को धीरे-धीरे खोखला, हीन और संकीर्ण बनाती है जिसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति अपराध करने और सहने के रूप में सामने आती है ।* जिन्हें स्तरहीनता, परपीड़न और मर्यादाहीनता में कोई संकोच नहीं होता, वे अनास्थावादी लोग ही अपराधी बनते, गुंडागर्दी अपनाते, आतंक उत्पन्न करते तथा चोरी-ठगी पर उतारू रहते हैं । यह अभ्यास उन्हें हत्या, बलात्कार जैसे नृशंस क्रूर कर्म में भी निर्लज्ज बनाए रहता है ।
👉 *अतः अपराधों की बाढ़ से बचने के लिए अनैतिकता के आरंभिक विकास पर दृष्टि डालनी चाहिए और उसे ही रोकने की व्यवस्था करनी चाहिए ।* भोग की निरंकुश भूख और मन की मनमानी उछल कूद को ही जिस समाज में स्वाभाविक मान लिया गया, वहाँ हिंसा, क्रूरता तथा अपराध अवश्यंभावी हैं । *अतः आवश्यकता आस्थाओं के परिष्कार की, अंतःकरण के उत्सर्ग की है ।* अंतः करण को सुसंस्कारित बनाने, *"अध्यात्म"* की प्राण प्रतिष्ठा का महत्व समझाने की है । कहने वाले कहते हैं कि *"अध्यात्म"* से क्या होगा ? उससे धन तो नहीं मिल जाएगा । *उन्हें स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि "अध्यात्म" से धन नहीं मानसिक वर्चस्, आत्मशांति आत्मसंतोष, वास्तविक आनंद मिलेगा, जो धन से भी अधिक महत्वपूर्ण है ।* साथ ही जो धन के संरक्षण सदुपयोग के लिए भी आवश्यक है । अराजकता-असामाजिकता की चपेट से धन भी नहीं बच पाता । सुख शांति तो उस स्थिति में कभी मिलती ही नहीं ।
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*विकृत चिंतन : रोग-शोक का मूलभूत कारण पृष्ठ-४८*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 107🌺 Rishi chintan se 107🌺
*🥀//११ मई २०२३ गुरुवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ कृष्णपक्ष षष्ठी २०८०🍁*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*आप भी दीर्घायु प्राप्त कर सकते हैं*
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👉 *व्यवसाय के अनुसार दीर्घजीवियों का वर्गीकरण करने पर पता चला कि "नौकरी पेशा" लोगों की अपेक्षा "स्वतंत्र व्यवसाय" में लगे लोग अधिक लंबी जिंदगी जीते हैं उन्हें मालिकों की खुशामद नहीं करनी पड़ती और ना उनकी डाँट डपट सहकर अपने को व्यग्र रखना पड़ता है ।* स्वतंत्र व्यवसाय करने के कारण लोगों को भले ही श्रम अधिक करना पड़ता हो, किंतु उन पर हीनता और खिन्नता का दबाव नहीं पड़ता । कई व्यक्ति ऐसे भी थे जो नौकरी करते थे और नौकरी के दिनों में प्रायः अस्वस्थ रहते थे । देखा गया कि रिटायर होने के बाद वे स्वस्थ रहने लगे । *उनके निरोग रहने का कारण यही था कि रिटायर होने के बाद उन्हें अपने पसंद की दिनचर्या बिताने और स्वतंत्र रूप से नई योजना बनाने का अवसर मिल गया ।*
👉 *इस सर्वेक्षण में एक बात स्पष्ट रुप से उभर कर आई, वह यह कि दीर्घायु प्राप्त करने के लिए अलमस्त प्रकृति का होना आवश्यक है ।* इसके बिना गहरी नींद नहीं आ सकती और जो शांति से निद्रा नहीं ले सकेंगे, उन्हें लंबी जिंदगी कैसे मिलेगी ? इसी प्रकार खाने और पचाने की संगति जिन्होंने अपना ली, उन्हीं को निरोग रहने का अवसर मिला है और वे ही अधिक दिन तक जीवित रह सके हैं । एक वृद्ध व्यक्ति ने पेट के सही रहने की बात पर हँसते हुए प्रकाश डाला और कहा- *"यह तो नितांत आसान है । बड़ी सरलता से कब्ज से बचा जा सकता है । भूख से कम खाया जाए तो न किसी को कब्ज रह सकता है और न ही डॉक्टर की शरण में जाने की जरूरत पड़ती है ।"*
👉 आस्था भी व्यक्ति को दीर्घायुष्य प्रदान करने में सक्षम और समर्थ आधार है । *हेफेकुक ने कहा - "मैंने ईश्वर पर सच्चे मन से विश्वास किया है और माना है कि वह आड़े वक्त में निश्चित रूप से सहायता करता है । भावी जीवन के लिए निश्चिंतता की स्थिति मैंने इसी विश्वास के आधार पर प्राप्त की और निश्चिंत रहा ।* जेम्स हेनरी ब्रंट का कथन है - *"कि वह एक धार्मिक व्यक्ति है । विश्वास की दृष्टि से नहीं, आचरण की दृष्टि से भी उसने धर्म का पालन किया । धार्मिक मान्यताओं ने उसे पाप पंक में गिरने का अवसर ही नहीं दिया ।*
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*चिरयौवन का रहस्योद्घाटन- पृष्ठ-७*
*🪴➖ब्रह्मवर्चस➖🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 108🌺 Rishi chintan se 108 🌺
*🥀//१२ मई २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष सप्तमी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*स्वस्थ रहना अपने हाथ में ही है*
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👉 यूनान के प्राचीन चिकित्सा शास्त्री और संत इब्नेसिया से किसी ने पूछा - *"कि मृत्यु पर्यंत युवा और स्वस्थ रहने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?* इब्नेसिया ने जो उत्तर दिया वह बहुत ही साधारण था । उन्होंने कहा - *"आजीवन युवा और स्वस्थ रहने के लिए किसी कठिन या विशेष उपाय की आवश्यकता नहीं है । आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी भूलों को सुधार लें और भ्रांतियों से छुटकारा पा लें । क्या है वे भूलें जो असमय ही बुढ़ापा ला देती हैं और क्या है वे भ्रांतियाँ जो रोग और बीमारियों को निमंत्रण देती है ?* इसका उत्तर भी साधारण सा ही है - *"मनुष्य अपने आहार-विहार और आचार-विचार को न जाने क्यों इतना बिगाड़ लेता है कि स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो जाता है ?* वस्तुतः किसी को स्वस्थ रहने के लिए डॉक्टरों से सलाह लेने और मल्टी विटामिन, टानिकों के सेवन करने की आवश्यकता ही नहीं है, *डॉक्टर की सलाह और औषधियों का सेवन तो तब आवश्यक है जब बीमार पड़ा जाए ।* प्रश्न उठता है कि *बीमार हुआ ही क्यों जाए ?* स्वस्थ रहना जब अपने हाथ की बात है तो बीमार होना भी अपनी ही इच्छा पर निर्भर है । चाहें तो स्वस्थ रहें चाहें तो बीमार पड़ें ।
👉 *खानपान का असंयम, दिनचर्या की अनियमितता, श्रम-विश्राम का असंतुलन और कृत्रिम अप्राकृतिक जीवन ही वे कारण हैं, जो मनुष्य के स्वास्थ्य को चौपट करते हैं ।* अन्यथा खानपान में सादगी और संयम रखा जाए, नियमित दिनचर्या बनाकर रहा जाए, पर्याप्त श्रम और पर्याप्त विश्राम किया जाए तो शरीर यंत्र के किसी कलपुर्जे को बिगड़ने गड़बड़ाने की स्थिति ही नहीं आती और लंबे समय तक स्वस्थ, निरोग और शक्तिशाली रहा जा सकता है । कहा जा सकता है कि बुढ़ापा तो अनिवार्य है वह तो आना ही है, उसे रोका नहीं जा सकता । वह *"कहावत"* पुरानी हो चली जिसमें कहा जाता था कि *"जवानी वह देखी जो जाकर के नहीं आती और बुढ़ापा वह देखा जो आकर के नहीं जाता ।"* हाल ही में हुई वैज्ञानिक शोधों के निष्कर्ष को दृष्टिगत रखते हुए इस कहावत में यदि कोई संशोधन करना पड़े तो वह इस प्रकार होगा कि *"जवानी वह देखी जो आने पर भगा दी जाती और बुढ़ापा वह होता जो न आने पर बुलाया जाता ।"*
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*चिरयौवन का रहस्योद्घाटन- पृष्ठ२०*
*🪴➖ब्रह्मवर्चस➖🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 109🌺 Rishi chintan se 109 🌺
*🥀//१३ मई २०२३ शनिवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष अष्टमी२०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*चित्त की एकाग्रता का विज्ञान*
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👉 *मन का स्वभाव है कि वह किसी बात पर अधिक समय स्थिर नहीं रहता और उचटकर बार-बार इधर-उधर उड़ता है ।* आप.किसी बात को. सोचना चाहते हैं, किंतु मन उस पर नहीं जमता । ऐसी दशा में उस चिंतनीय विषय का कोई ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो सकेगा । इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होने पर उत्तम मस्तिष्क वाले भी उतना काम नहीं कर सकते जितना कि साधारण मस्तिष्क के, *किंतु स्थिर चित्त वाले कर सकते हैं ।* कोई मनुष्य कितना ही चतुर क्यों न हो, यदि उसके मन को उचटने की आदत है और इच्छित विषय में एकाग्र नहीं होता, तो उसकी चतुरता किसी काम न आवेगी और उसके निर्णय अपूर्ण एवं असंतोषजनक होंगे ।
👉 *"चित्त" की एकाग्रता का संबंध "रुचि" से है ।* रूखे और अरुचिकर विषयों में मन नहीं लगता और वहाँ से बार-बार उचटता है । इसलिए जिस विषय पर मन लगता है, *उसे रुचिकर बनाना चाहिए ।* विद्यार्थियों को ज्यामेट्री और गणित के विषय रूखे जान पड़ते हैं, किंतु जिन विषयों में सरलता होती है उन्हें खूब दिलचस्पी के साथ पढ़ते हैं । यहाँ यह न सोचना चाहिए कि अमुक विषय सरस है और अमुक नीरस। *संसार में कोई भी बात नीरस नहीं है ।* केवल मन को उनके अनुकूल बनाने की योग्यता में अंतर है । एक राज कर्मचारी के लिए खाट बुनने का काम कुछ भी दिलचस्पी का नहीं है, किंतु जिन्हें इसमें रुचि होती है, वे चारपाई बुनने में बड़ी खूबसूरत फूल-पत्तियाँ निकालकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं । *"दु:ख", पीड़ित होना और "मृत्यु", साधारणतः ये बड़े नीरस और अरुचि के विषय हैं, पर कितने ही लोगों को इसमें आनंद आता है ।* तपस्वी लोग भूखे, प्यासे निर्जन स्थानों पर रहते हैं ।शीत, धूप के कष्ट सहते हैं , *यह सब उनकी "रुचि" के अनुकूल होता है, इसलिए उस दशा में भी प्रसन्नता ही रहती है ।* धर्मनिष्ठ लोग यथा हरिश्चंद्र, शिबि, दधीचि, मोरध्वज, हकीकतराय, बंदा बैरागी आदि की तरह प्राणांतक कष्ट सहते हैं । *देशभक्त लोग फाँसी के फंदों को हँसते हुए चूमते हैं ।* उन्हें यह दशा वैसी दु:खदायी प्रतीत नहीं होती, जैसी हमें प्रतीत होती है । सैनिक रणक्षेत्र में मजबूत मृत्यु के साथ खेलता है, शरीर पर घाव सहता है, *पर उस काम में भी दिलचस्पी होती है ।* तात्पर्य यह है कि कोई भी कार्य और विषय ऐसा नहीं है, जो नीरस कहा जाए और सब लोगों को वह अरुचिकर हो । *भेद केवल इतना ही है कि एक ने जिस बात में दिलचस्पी पैदा कर ली है वह उसमें बहुत प्रसन्नता के साथ लगा रहता है और मन को एकाग्र रखता है । दूसरे मनुष्य को यदि उसमें रुचि नहीं है, तो वही उसके मन उचटने का कारण है।*
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*"बुद्धि" बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि - पृष्ठ-११*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 110🌺 Rishi chintan se 110 🌺
*🥀//१४ मई २०२३ रविवार//🥀*
*//➖ज्येष्ठ कृष्णपक्ष ➖//*
*❗नवमी/ दशमी २०८०❗*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*👉क्या आप................*
*अपनी बुद्धि तीक्ष्ण करना चाहते हैं*
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👉 *किसी विषय पर मन को लगा देने में एक कुशल सेनापति की सी योग्यता चाहिए ।* वह अपनी सेना को सब ओर के खतरों से बचाता हुआ एक निश्चित मार्ग से ले जाता है । वह अपनी सेना को शत्रु के सारे मोर्चों पर नहीं फैला देता, *वरन् एक मजबूत मोर्चे पर ताकत के साथ चढ़ाई करता है ।* मन को सब ओर से रोकना कठिन है, वह इस तरह एकाग्र नहीं किया जा सकता । *एकाग्रता का मार्ग तो यह है कि किसी एक बात में रुचि उत्पन्न कर ली जाए ।* जब सुआ पिंजरे में से उड़ जाता है, तो आकाश में चारों ओर जाल तानकर उसे नहीं पकड़ा जाता, वरन् उसके आगे दाना डाला जाता है, जिसकी ओर आकर्षित होकर वह अपने पूर्व स्थान पर आ जावे ।
👉 *"एकाग्रता" से कार्य शक्ति को बड़ी उत्तेजना मिलती है, कमजोर मस्तिष्क को भी एकाग्रता की प्रेरणा अद्भुत प्रतिभा संपन्न बना देती है । एक नदी दो सौ गज चौड़ी और पाँच गज गहरी बह रही है । यदि उस की चौड़ाई दस गज कर दी जावे तो निश्चय है कि गहराई पहले की अपेक्षा बहुत अधिक हो जाएगी और पानी के बहाव का वेग पहले की अपेक्षा कई गुना अधिक हो जावेगा । *महर्षि पतंजलि ने योग साधना का सारा रहस्य एकाग्रता को ही बताया है । वे चित्तवृत्तियों के निरोध को ही योग कहते हैं ।* *(योगश्चित्तवृत्ति निरोध:)* वैसे तो सब प्रकार की उन्नतियों का मूलमंत्र एकाग्रता है, *पर मानसिक शक्तियों का विकास करने और बुद्धि बढ़ाने के लिए तो उससे बढ़कर दूसरा उपाय है ही नहीं ।* मस्तिष्क निर्बल है, अविकसित है, मेधा शक्ति न्यून है तो कुछ परवाह मत कीजिए । यदि रस्सी की रगड़ से पत्थर की शिला पर निशान बन जाता है तो अल्प बुद्धि वाले बुद्धिमान क्यों नहीं बन सकते ? *जिस डाली पर बैठना, उसे ही काटना, जिसकी ऐसी मोटी बुद्धि थी, वह वज्र मूर्ख कहलाने वाला यदि संस्कृत का धुरंधर विद्वान और अद्वितीय कवि बन सकता है, तो कोई कारण नहीं कि वे लोग जो अपने को मंदबुद्धि कहते हैं, आगे चलकर प्रतिभाशाली विद्वान न बन सकें ।*
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*बुद्धि बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि - पृष्ठ-१२*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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