💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 216 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
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एक शहर में लच्छू नामक एक ठग रहा करता था | वह बहुत चालाक ठग था, ठगी के नए नए तरीके अपनाये करता था |
एक दिन वह भेष बदल कर एक सेठ के पास गया | उसने सेठ को अत्यंत कीमती हीरे दिखाये उन हीरो को देखकर सेठ की आंखे फट गयी | उसने इतनी कीमती हीरे बहुत कम देखे थे |
लेकिन सेठ था, बहुत पारखी | उसने हीरो को उलट-पुलट करके देखा, गौर से परखा फिर वह लच्छू से बोला कि – ” यह हीरे नकली है |”
उसकी बात सुनकर ठग नाराज होता हुआ बोला की – ” हीरे असली है, संसार में इससे कीमती हीरे आपको कहीं नहीं मिलेंगे | आप की परख सही नहीं है |”
सेठ उसकी बात नहीं माना | ठग भी अपनी बात पर अड़ा रहा | दोनों में कुछ ही देर में तना-तनी हो गयी |
सेठ ने ताऊ में आकर ठग को अपने असली हीरे दिखा दिए बस फिर क्या था | ठग ने उसी समय योजना बना ली, कि किस प्रकार उन हीरो को पार करना है लेकिन सेठ भी कम चालाक नहीं था | उसने उन हीरो को फिर से छुपा दिया | ठग वहां से चल दिया |
अगले दिन लच्छू भेष बदलकर सेठ के पास पहुंचा | वह आवाज बदलकर सेठ से बोला – ” सेठजी! मैं आपको सावधान करने आया हूं |”
” लेकिन किसलिये |”
” आप के हीरे कल चोरी हो गये हैं |”
” कैसे ?”
” कल जो आदमी आपके पास आया था | वह मशहूर ठग लच्छू था |”
लच्छू का नाम सुनकर सेठ का तो दम ही निकल गया, फिर भी सवयं को संभालते हुए वह बोला – ” कैसे हो सकता है? मैंने अपने हीरो की पेटी तो संभाल कर रखी है |”
सेठ के इतना कहने पर ठग ने सेठ को एक पेटी दिखायी | यह पेटी सेठ के हीरो की पेटी से हूबहू मिलती थी | उसे देखकर सेठ के होश ही गुम हो गये |
यह खाली पेटी मुझे ठग ने दी है, और कहा है कि – ” सेठ को बता देना |”
सेठ के शरीर से पसीने छूटने लगे | वह लपककर भीतर गया तथा तुरंत ही अपनी असली हीरो की पेटी को संभाल कर लाया और ठग को बताया कि – “ देखो यह रही मेरी पेटी |”
लच्छू ठग ने उस पेटी को देखा | उसके बाद उसने अपनी पेटी को देखा और मन ही मन बोला कि ” कमाल है! यह दोनों आपस में कितनी मिलती हैं |” इतने में ठग ने चुपके से अपनी जेब में से एक चूहा निकाला और ऐसा उछाला की सेठ चौक पड़ा | पलक झपकते ही लच्छू ने वह हीरो की पेटी बदल दी | सेठ एक बार ठहर गया, फिर अपनी पेटी लेकर भीतर गया वापस आकर बोला – “ श्रीमान आप को ठग ने चकमा दे दिया है |”
इतना सुनकर वह बड़बड़ाता हुआ चला गया | अब वह बहुत प्रसन्न था, उसके पास लाखों रुपए के हीरे मौजूद थे | वह इन हीरो को लेकर एक दूसरे सुनार के पास गया | वह हमेशा उसी सुनार को अपना माल बेचा करता था | सुनार जानता था कि यह ठगी का माल भेजता है, इसी कारण वह लच्छू को रुपए का आधा देता था | कभी-कभी तो एक रुपये की पावली भी दे देता था |
सुनार ने उस दिन भी ऐसा ही किया | उसने हीरो के बहुत ही कम दाम लगाये, किन्तु इतने दामों में सौदा करने को ठग राजी नहीं हुआ | सुनार ने कुछ कम-ज्यादा किया; किंतु लच्छू फिर भी नहीं माना |
वह वहां से चला गया |
उन्हीं दिनों उस शहर में एक चोर आया हुआ था | उसे खबर मिली कि लच्छू ठग के पास बहुत से हीरे हैं | वह अपने धंधे में लच्छू का भी बाप था | वह चोरी की कला में उससे भी दो हाथ आगे था |
उसने सोचा कि किसी भी प्रकार इन हीरो को चुराना होगा | लच्छू भी बहुत होशियार था | अपने हीरो की सुरक्षा के लिए एक ठाकुर के डेरे में विश्राम किया | डेरा मजबूत लाल पत्थरों का बना हुआ था | उसकी दीवारें बहुत ऊंची थी | उसके अंदर घुसना सरल नहीं था |
हीरे चुराने के लिए चोर अपने घर से ठीक पौने बारह बजे निकला | उसने अपने साथ बड़ी-बड़ी बारह कीले तथा एक हथोड़ा लिया | कीले बहुत मजबूत थी | वह पत्थर के जोड़ों में आसानी से गड़ जाती थी |
थोड़ी देर बाद घड़ी ने बारह बजाये | इसके साथ ही डेरे के घंटे की टंकार शुरू हो गयी |
चोर ने हर टंकार के साथ दीवार में एक-एक कील गाड़नी शुरू कर दी और उन पर चढ़ता चला गया | बारह टकारों के साथ उसने बारह कीले गाढ़ दी | टंकार की आवाज में कीलें गाड़ने की आवाज किसी को भी सुनाई नहीं पड़ी | वह किलो पर चढ़कर डेरे के अंदर कूद गया |ठग भी कम चतुर नहीं था | वह हीरो की पेटी को अपने सिर के नीचे रखकर सो रहा था | जिससे कोई उसे निकाल ना सके |
सबसे पहले चोर ने ठग के कमरे का पता लगाया | इसके पश्चात वह खिड़की के रास्ते कमरे में घुसा |
चंद्रमा उग आया था | वह धीरे-धीरे आकाश की ओर बढ़ रहा था | चोर चंद्रमा की रोशनी में इंतजार कर रहा था, जिससे कमरे में उजाला हो सके |
थोड़ी देर बाद चंद्रमा खिड़की के पास आ गया | चोर ने उसके उजाले में हीरो की पेटी को देखा | पेटी को ठग ने अपनी गर्दन के नीचे दबा रखा था |
चोर मन-ही-मन बड़बड़ाया “ बड़ा ही उस्ताद है, लेकिन मैंने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली है | उसे बताता हूं |”
वह धीरे-धीरे ठग के पास गया | उसने एक बार फिर से चारों ओर देखा | वहां पर सन्नाटा छाया हुआ था | सिर्फ ठग के खर्राटों की आवाज गूंज रही थी |
चोर ने तुरंत ही इधर-उधर देखा | उसे वहां पर एक ईंट दिखी | ईट पर उसने चादर लपेट दी और उसे लेकर ठग के पास पहुंचा |
उसने अपनी जेब से तंबाकू की डिबिया निकाली | उसमें से थोड़ा सा तंबाकू निकालकर ठग की नाक के आगे रखा | ठग को तुरंत छीक आयी | छिक के साथ ही उसकी गर्दन ऊपर उठी | चोर ने तुरंत पेटी निकाल ली और उसकी जगह पर वह ईट लगा दी | फिर पलक झपकते ही वह वहां से चंपत हो गया |
सुबह जब ठग की आंख खुली तो, उसने अपनी हीरों की पेटी को वहां से गायब पाया | वह अपना सिर पकड़कर वहीं बैठ गया |
उधर जिस सुनार को वह ठग चोरी का माल बेचता था | उसने सोचा कि हीरे बहुत मूल्यवान है, हजारों को लेकर लाखों में बेच सकते हैं | इसलिए कुछ कम ज्यादा पैसों में ठग के साथ सौदा कर लेना चाहिए | इसलिए वह ठग के पास पहुंचा |
ठग सिर पकड़े बैठा था |
सुनार उस को नमस्कार करके बोला – “ वह हीरो की पेटी कहां है, मैं उसका और अधिक दाम देने को तैयार हूं, दोबारा हीरे देखना चाहता हूं |”
ठग भला क्या जवाब देता |
उसने सोचा कि अगर सुनार को पता चल गया कि मेरे हीरे चोर चुरा कर ले गया है, तो मेरी बहुत ही बेज्जती होगी | इसलिए अपनी इज्जत बचाने के लिए वह बोला – “ सेठ जी! उन हीरो को तो मैंने बेच दिया है |”
“ लेकिन किस भाव से बेचा है |”
“ जिस भाव से लाया था | उसी भाव में बेचा है, ना नफा और नहीं नुकसान |”
सुनार वहां से अपना सा मुंह लेकर चल दिया |
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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐खाटू श्याम जी💐💐*
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श्याम बाबा की पूरी कहानी महाभारत से शुरू होती है। आपको बता दें कि पहले खाटू श्याम जी का नाम बर्बरीक था। वे बलवान गदाधारी भीम और नाग कन्या मौरवी के पुत्र थे। बचपन से ही उनमें वीर योद्धा बनने के सभी गुण थे। उन्होंने युद्ध करने की कला अपनी मां और श्रीकृष्ण से सीखी थी। उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या करके तीन बाण प्राप्त किए। ये तीनों बाण उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने के लिए काफी थे। एक बार जब उन्हें पता चला कि कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध होने वाला है,तो उन्होंने भी युद्ध में शामिल होने की इच्छा जताई। इसके लिए जब वे अपनी मां के पास आशीर्वाद लेने पहुंचे तो उन्होंने हारे हुए पक्ष की ओर से युद्ध लड़ने का वचन दिया।
जब उन्हें बर्बरीक के इस वचन का पता चला तो वे ब्राह्मण का रूप धारण कर उनका मजाक उड़ाने लगे और कहने लगे कि वे तीन बाण से क्या युद्ध लड़ेंगे। तब बर्बरीक ने कहा कि उनका एक बाण ही शत्रु सेना को मारने के लिए काफी है,ऐसे में अगर उन्होंने तीन तीरों का इस्तेमाल किया तो ब्रह्मांड का विनाश हो जाएगा। ये जानकर भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को चुनौती दी कि पीपल के इन सभी पत्तों को वेधकर बताओ। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की। उनकी परीक्षा लेने के लिए श्रीकृष्ण ने एक पत्ती अपने पैरों के नीचे दबा ली। बर्बरीक ने एक बाण से सभी पत्तियों पर निशान कर दिए और श्रीकृष्ण के पैरों के पास चक्कर लगाने लगे और श्रीकृष्ण से कहा कि एक पत्ता आपके पैर के नीचे दबा हुआ है,अपने पैर हटा लीजिए वरना आपके पैरों पर चोट लग जाएगी।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि वे युद्ध में किसकी तरफ से शामिल होंगे। बर्बरीक ने जवाब दिया कि जो पक्ष हारेगा वे उनकी तरफ से युद्ध लड़ेंगे। श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि युद्ध में हार तो कौरवों की होनी है, ऐसे में अगर बर्बरीक ने उनके साथ यद्ध लड़ा तो गलत परिणाम सामने आ सकते हैं। उन्होंने बर्बरीक को रोकने के लिए उनसे दान की मांग व्यक्त की। दान में उन्होंने बर्बरीक का सिर मांगा। बर्बरीक ने कहा कि मैं दान जरूर दूंगा। उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों में अपना सिर काट कर रख दिया और उनसे आखिरी इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वे महाभारत का युद्ध अंत तक अपनी आंखों से देखना चाहते हैं। श्रीकृष्ण ने उनकी इच्छा स्वीकार करते हुए बर्बरीक के सिर को युद्ध वाली जगह पर एक पहाड़ी के ऊपर रख दिया जहां से बर्बरीक ने अपनी आंखों से अंत तक महाभारत युद्ध देखा। युद्ध के बाद पांडव लड़ने लगे कि युद्ध में जीत का श्रेय किसको जाता है। तब बर्बरीक ने कहा कि श्रीकृष्ण के कारण वे युद्ध जीते हैं। श्रीकृष्ण बर्बरीक के इस बलिदान से बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें कलयुग में श्याम के नाम से पूजे जाने का अनमोल वचन दिया..!!
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*🌳🦚 आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐न्याय प्रिय राजा 💐💐*
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एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य शनि देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ व स्तुति करता था।
एक दिन शनि देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा -- "राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं। बोलो तुम्हारी कोई इच्छा है?"
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला -- "भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ है आपकी कृपा से राज्य में सब प्रकार से सुख-शान्ति है। फिर भी मेरी एक ही इच्छा है कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है" -- ऐसा कहते हुए शनि देव ने राजा को समझाया। परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा।
आखिरकार भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा और वे बोले -- "ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।"
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और भगवान को धन्यवाद दिया। अगले दिन सारे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देंगे। दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते में एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड दिखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस और भागने लगे। तभी ज्ञानी राजा ने सबको सतर्क किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे, क्योंकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो, इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।
परन्तु लोभ-लालच के वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे के सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि और चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट लें, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेंगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे। कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस बार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस और भागने लगे और चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपने घर की ओर चलने लगे। उनके मन में विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है। चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिलें न मिलें, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेंगे। इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया। अब तो प्रजा जनों में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस और भागने लगे।
वे भी दूसरों की तरह सिक्कों की गठरीयां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की
ओर चल दिये। अब केवल राजा ओर रानी ही शेष रह गये थे। राजा रानी से कहने लगे --
"देखो कितने लोभी हैं ये लोग। भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं। भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज है..?"
सही बात है -- रानी ने राजा कि बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे कुछ दूर चलने पर राजा ओर रानी ने देखा कि सप्तरंगी आभा बिखेरता हुआ हीरों का एक पहाड़ है। अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण में वह भी दौड पड़ी और हीरों कि गठरी बनाने लगी । फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये, परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि और विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।
वहाँ सचमुच भगवान खड़े उनका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये और पूछा -- "कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन । मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।" राजा ने शर्म और आत्मग्लानि से अपना सर झुका दिया।
तब भगवान ने राजा को समझाया --
"राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!"
सार
जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से मेरी शरण में आते हैं, और
सर्व लौकिक सम्बंधों को छोड कर मुझको ही अपना मानते हैं वो ही मेरे प्रिय बनते है।
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*💐💐चतुर चिड़िया💐💐*
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एक दिन की बात है, एक चिड़िया आकाश में अपनी उड़ान भर रही होती है। रास्ते में उसे गरुड़ मिल जाता है। गरुड़ उस चिड़िया को खाने को दौड़ता है। चिड़िया उससे अपनी जान की भीख मांगती है। लेकिन गरुड़ उस पर रहम करने को तैयार नहीं होता। तब चिड़िया उसे बताती है कि मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं और उनके लालन पालन के लिए मेरा जीवित रहना जरूरी है। तब गरुड़ इस पर चिड़िया के सामने एक शर्त रखता है कि मेरे साथ दौड़ लगाओ और अगर तुमने मुझे हरा दिया तो मैं तुम्हारी जान बख्श दूंगा और तुम्हें यहां से जाने दूंगा।
गरुड़ इस बात को जानता था कि चिड़िया का उसे दौड़ में हराना असंभव है। इसलिए उसके सामने इतनी कठिन शर्त रख देता है। चिड़िया के पास इस दौड़ के लिए हां करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचता। लेकिन चिड़िया को इस बात का अंदाजा था कि गरुड़ को दौड़ में हराना नामुमकिन है लेकिन फिर भी वह इस दौड़ के लिए हां कर देती है। पर वह गरुड़ से कहती है कि जब तक ये दौड़ ख़त्म नहीं होता वह उसे नहीं मरेगा। गरुड़ इस बात पर राजी हो जाता है।
दौड़ शुरू होती है चिड़िया फट से जाकर गरुड़ के सिर पर बैठ जाती है और जैसे ही गरुड़ दौड़ के आखिरी स्थान पर पहुंचता है चिड़िया फट से उड़ कर लाइन के पार पहुंच जाती है और जीत जाती है। गरुड़ उसकी चतुरता से प्रसन्न हो जाता है और उसको जिंदा छोड़ देता है। चिड़िया तुरंत ही वहां से उड़ जाती है और अपने रास्ते चल देती है।
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कठिन परिस्थितियों में हालातों पर रोना नहीं चाहिए बल्कि समझदारी और चतुरता के साथ मुसीबत का सामना करना चाहिए। विरोधी या कार्य आपकी क्षमता से ज्यादा मजबूत हो तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पहले से ही हार मान कर बैठ जाएं बल्कि समझदारी और धैर्य से बैठ कर समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए। अपने ऊपर विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी भी हालत में जीत सकते हैं।
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एक बार एक गांव में एक सज्जन पुरूष रहते थे, वे बहुत ही दयालू तथा हृदय ग्राही थे, किसी को भी कभी अपशब्द नहीं कहते थे। जो भी उनके घर आता वे अच्छे से उसका आथित्य सत्कार करते। लोग उनसे सलाह मशविरा लेने आया जाया करते थे।
एक बार एक कैदी जेल से भाग जाता है, पुलिस उसके पीछे लगी रहती है। वह जब गांव के बीच पहुंचता है तो उसे एक घर का दरवाजा खुला दिखता है। वह घर उसी सज्जन पुरूष का था। वह बिना इजाजत के अन्दर प्रवेश करता है।
जैसे ही वह कैदी अन्दर पहुचता है तो वह सज्जन पुरूष बड़ी सौम्यता से कहते है, आइए महाराज आपका स्वागत है। उसे आराम से बिठाता है और कहता है कि तुम कौन हो और कहां से आ रहे हो। वह कैदी कहता है कि मैं रास्ता भटक गया हूं, क्या आप मुझे आज रात रहने की जगह दे सकते हैं। आपका बडा एहसान होगा।
वह पुरूष कहता है- क्यों नहीं आप आराम से यहां रहिए, आप नहा लिजिए मैं आपके लिये खाने सोने की व्यवस्था करता हूं। जब तक वह कैदी नहाता है तब तक वह सज्जन पुरूष उसके लिए सब व्यवस्था करता है। खाने के बाद सब सो जाते हैं। लेकिन उसकी नियत खराब हो जाती है और वह वहां से सोने की चीजें चुरा लेता है और फिर भाग जाता है।
रास्ते में पुलिस उसे पकड़ लेती है। और जब पूछताछ करती है तो वह कहता है कि मैंने उस सज्जन पुरूष के यहां से यह चुराया है। उस कैदी को उस पुरूष के सामने लाया जाता है। लेकिन वह पुरूष कहता है कि यह सोने की वस्तु मैंने ही इसे दान में दी है।
उस कैदी की आंखें खुल जाती है और उस पुरूष से माफी मांगता है। और कहता है कि जब भी तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो तो मांग लेना चाहिए ना की चुराना।
*💐शिक्षा :-💐*
इसीलिये कहा गया है कि विश्वास रखो तो सब कुछ सही हो जाता है।
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