भोजन के इन नियमों का पालन कीजिए।
🌺 ऋषि चिंतन से 111🌺 Rishi chintan se 111🌺
*🥀//१५ मई २०२३ सोमवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष एकादशी२०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*भोजन के इन नियमों का*
*➖ पालन कीजिए। ➖*
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👉 भोजन यथासंभव नियत मात्रा में करना चाहिए । *स्वाद के कारण कभी ज्यादा और कभी कम खा लेना हानिकारक है ।* कुछ कम भोजन करने वाला सदा स्वस्थ रहता है ।
👉 भोजन का समय भी नियत रहना चाहिए । *हर समय मुँह चलाते रहना अथवा जब मिल गया तभी खा लेने की नीति गलत है ।* वृद्धावस्था में जब पाचन शक्ति निर्बल पड़ जाए तो २४ घंटे में एक बार भोजन करना बहुत ही हितकारी होता है ।
👉 *भोजन के समय मानसिक स्थिति भी प्रसन्न और शांत रहनी चाहिए ।* क्रोध, शोक, भय, उतावली में किया हुआ भोजन कभी ठीक तरह से नहीं पच सकता । हमारे प्राचीन आदर्श के अनुसार यदि भोजन को एकांत और पवित्र स्थान में भगवान का ध्यान करके किया जाए तो वह शारीरिक ही नहीं, मन और आत्मा के लिए भी कल्याणकारी होता है ।
👉 भोजन ताजा और थोड़ा गर्म होना चाहिए । वह अपेक्षाकृत शीघ्र पचता है । *बहुत अधिक गर्म भोजन अमाशय में श्लेष्मा को बढ़ाकर हानि पहुँचाता है ।* बासी भोजन भी वर्जित माना गया है ।
👉 *भोजन को खूब चबाकर खाना अत्यावश्यक है ।* जो लोग जल्दी के कारण या आदत पड़ जाने से भोजन को बहुत जल्दी गले के नीचे उतार लेते हैं, वे अवश्य कोष्ठबद्धता से पीड़ित रहते हैं ।
👉 भोजन में एक समय में अधिक प्रकार के भोज्य पदार्थों को सम्मिलित नहीं करना चाहिए । *एक बार में एक या दो चीज ही खाने की नीति सर्वोत्तम है ।* जो लोग एक साथ बहुत से शाक, अचार, रायता मिठाइयाँ, पापड़ भोजन में शामिल करना सौभाग्य या अमीरी का चिन्ह मानते हैं, वे बड़ी गलती करते हैं और बार-बार रोगी होते रहते हैं ।
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*स्वस्थ रहना है तो ये खाइए - पृष्ठ-२९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 112🌺 Rishi chintan se 112🌺
*🥀//१६ मई २०२३ मंगलवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष द्वादशी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖वास्तविक सौंदर्य➖*
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👉 *प्रकृति में किसी भी लक्ष्य की पूर्ति के लिए सभी साधन विद्यमान हैं ।* आपको बाह्य उपचारों की आवश्यकता नहीं है । आप जैसा भी काम करना चाहें उसके लिए सभी उपकरण एकत्रित कर सकते हैं । *भाँति-भाँति की जड़ी बूटियाँ, पौष्टिक पदार्थ, अमृतोपम दिव्य पदार्थ हमारे लिए संचित हैं ।* मिट्टी से लेकर धूप, जल, वायु, सूर्य-किरण इत्यादि तक को यह शक्ति दी गई है कि वे हमारे शरीर को सबल और स्वस्थ बना सकें ।
👉 *प्रकृति में वास्तविक सुंदरता है ।* आजकल की फैशन के मार से युक्त पुरुष या स्त्री को लोग सुंदर समझते हैं, उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते । यह मात्र भ्रम है । *वास्तविक सौंदर्य तो पूर्ण रूप से विकसित, परिपुष्ट स्वस्थ शरीर में है ।* प्रत्येक पुट्ठे और मांसपेशी में स्वाभाविक सौंदर्य है । *जिस युवक या युवती के शरीर में "लाल रक्त" प्रवाहित होता है, जिसके शरीर में "स्वाभाविक लालिमा" वर्तमान है, जिनका डीलडोल संतुलित है, न कोई अंग पतला है, न कोई मोटा, न बादी, न चर्बीयुक्त, न पेट ही बढ़ा हुआ है, नेत्र सुंदर और चमकदार हैं, त्वचा कोमल और लाल है, फेफड़े परिश्रम सहन कर लेते हैं और गहरी नींद और आराम देते हैं, स्वस्थ जल से (सोड़ा, लेमन, शराब, चाय, शरबत से नहीं ) जिनकी प्यास शांत हो जाती है, चूरन चटनी पर जिनकी जिह्वा नहीं लपालपाती, जिनके स्वभाव में न चिड़चिड़ापन है, न क्रोध, न उतावलापन, न उदासी या निरुत्साह--- ऐसे स्वस्थ मनुष्य को ही पूर्ण सुंदर कहना युक्तिसंगत है ।*
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*निरोग जीवन का राजमार्ग - पृष्ठ-०७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/p1Zh1LutEI8
🌺 ऋषि चिंतन से 113🌺 Rishi chintan se 113🌺
*🥀//१७ मई २०२३ बुधवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्षत्रयोदशी२०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖रोगों को आमंत्रण देती➖*
*😟➖चिंता➖😟*
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👉 *"चिंता" व्यक्ति के मस्तिष्क में निरुद्देश्य घूमते रहने वाले कुविचारों का चक्र है ।* यह चक्र जिस स्थान से आरंभ होता है, लौटकर फिर वहीं पर आ जाता है । किसी लक्ष्य पर केंद्रित रहने वाला सीधा विचार हमें रचनात्मक कार्य करने के लिए प्रेरित करता है, किंतु चक्र रूप धारण कर मस्तिष्क में फिर-फिर उसी स्थान पर लौट आने वाला विचार हमें अस्त-व्यस्त कर जाता है ।
👉 चिंतित रहने वाले व्यक्तियों में से किसी से बात करने का अवसर मिले तो हमें मालूम होगा कि उसे रात को नींद नहीं आती, भूख नहीं लगती, चित्त भी बड़ा अव्यवस्थित सा रहता है । बात-बात पर उसे गुस्सा आता है । उसके मुख से अक्सर सुनने में आता है *"क्या करें भाई अपनी जिंदगी तो बिल्कुल नीरस सी हो गई है, बहुत परेशान हूँ, मैं तो अपनी जिंदगी से ।*
👉 निश्चय ही ऐसा व्यक्ति धन-दौलत, मान-सम्मान के होते हुए भी अपने जीवन की सार्थकता अनुभव नहीं करता । *सार्थकता की यह चेतना व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है जिसके बिना जीवन नीरस हो जाता है ।* उसके जीने की प्रेरणा और शक्ति स्रोत सूख जाते हैं । जीवन को निरर्थक महसूस करने वाले व्यक्ति का मन कभी भी स्वस्थ और सुखी नहीं रह सकता । लक्ष्य की चेतना के लुप्त हो जाने से व्यक्ति जीवन के प्रति उदासीन होकर धीरे-धीरे मानसिक असंतुलन का शिकार हो जाता है ।
👉 *व्यर्थ की चिंताएँ मनुष्य के चित्त और शरीर दोनों के लिए कष्टप्रद और हानिकारक होती हैं ।* चिंताएँ मनुष्य में विकार उत्पन्न करती है जो कालांतर में शारीरिक रोग का भी रूप धारण कर लेते हैं । कभी-कभी यह विकार इतना उग्र रूप धारण कर लेते हैं कि मनुष्य पागलपन की स्थिति तक को पहुँच जाता है । *"पागलपन" मानसिक असंतुलन के सिवाय और कुछ नहीं होता ।*
👉 शारीरिक कष्ट भी व्यक्ति के मस्तिष्क की उपज होते हैं । मनोवैज्ञानिक चिकित्सा अनुसंधान के अनुसार रोगी के कष्टों की जड़ें उसके मस्तिष्क में होती है । *अवचेतन में समाया हुआ भय और उसमें बचपन से दबी हुई अतृप्त आकांक्षाएँ शारीरिक रोग और पीड़ा का रूप धारण कर लेती हैं ।* ऐसे रोगी को मनोवैज्ञानिक उपचार की आवश्यकता होती है । *काम करके ही व्यक्ति अपने को चिंताओं से मुक्त कर सकता है । सदा किसी न किसी काम में लगे रहने से मांसपेशियों का तनाव कम हो जाता है ।* किसी समस्या को तिल का ताड़ न बनाकर उस पर सहज भाव से विचार करने की आदत डाल लें तो बहुत सी व्यर्थ की बातों और चिंताओं की उलझन से बचा जा सकता है । *केवल रचनात्मक परिणाम निकालने वाली बातों पर विचार करके उन्हें कार्य का रूप दें ।*
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*प्रगति की-प्रसन्नता की जड़ें अपने ही भीतर - पृष्ठ-३०*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/0u1ZS6GkvH4
🌺 ऋषि चिंतन से 114🌺 Rishi chintan se 114🌺
*🥀//१८ मई २०२३ गुरुवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्षचतुर्दशी२०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*😄प्रसन्नता प्राप्ति का अद्भुत रहस्य*
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👉 *"प्रसन्नता" प्राप्ति का मुख्य रहस्य यह है कि जितने परिमाण में समाज की अंतरात्मा को हमारे कार्य प्रसन्न करेंगे उतनी ही प्रसन्नता का बोध हमें होगा ।* अपनी उत्कृष्ट कला, बुद्धि, कौशल या पुरुषार्थ परायणता से जब दूसरे लोग प्रसन्न होते हैं, तब हमें भी प्रसन्नता होती है । *"वास्तविक प्रसन्नता" का मूल रहस्य दूसरों की अंतरात्मा की प्रसन्नता में निहित है ।* परोपकारी एवं सेवाभावी सहज इसे प्राप्त करता रहता है ।
👉 *सद्भावनाएँ ही प्रसन्नता की जननी है ।* आंतरिक पवित्रता, निर्मलता और स्वच्छता से प्रसन्नता सहज रूप में आती है । *महापुरुषों की सतत् प्रसन्नता का कारण उनकी आंतरिक पवित्रता एवं शुद्धता है । उनकी निर्मल हँसी से दु:खी एवं क्लेश युक्त व्यक्ति प्रसन्न हुए बिना नहीं रहते ।* उनके आसपास का वातावरण भी वैसा बना रहता है । इसलिए प्रसन्नता प्राप्ति के उद्देश्य की पूर्ति तभी हो सकती है जब अपना अंतर स्वच्छ से स्वच्छतर बनता जाएगा । *जब अपने आंतरिक क्षेत्र में घृणा, अनुदारता, स्वार्थपरता के आवरण हटेंगे और सबके लिए प्रेम, उदारता, सद्भाव उत्पन्न होंगे तो प्रसन्नता की संभावना भी निकटस्थ होती जाएगी ।*
👉 गुण दोष से रहित मनुष्य मिलना दुर्लभ है । *प्रत्येक मनुष्य में दीपक के प्रकाश और छाया की तरह गुण-दोष विद्यमान हैं ।* छाया का अस्तित्व भी प्रकाश के साथ साथ हैं । छाया दोष मनुष्य के साथ है । *अतः किसी के गुण दोषों से प्रभावित न होकर सबका आदर करने पर प्रसन्नता मिल सकती है ।* प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए उदार बनना चाहिए । सबसे हृदय खोलकर मिलना, सभी का स्वागत मुस्कान से करें । *मुस्कान अपनी ही दुर्भावनाओं को मिटाती है ।*
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*प्रगति की-प्रसन्नता की जड़ें अपने ही भीतर - पृष्ठ-५७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/n2gj-IeKUuc
🌺 ऋषि चिंतन से 115🌺 Rishi chintan se 115🌺
*🥀//१९ मई २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//ज्येष्ठ कृष्णपक्ष अमावस्या२०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*"निद्रा" - एक अद्भुत जीवनी शक्ति*
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👉 *शरीर विज्ञानियों का कथन है कि स्वस्थ रहने के लिए विश्राम का एक महत्वपूर्ण माध्यम है "निद्रा"।* प्रत्येक व्यक्ति की नींद की आवश्यकता अलग-अलग होती है । कई व्यक्ति ३ से ४ घंटे की नींद में ही पूर्ण विश्राम ले लेते हैं । बहुत से लोग ८-१० घंटे सोने पर भी पर्याप्त विश्राम नहीं ले पाते । निद्रा का समय व्यक्ति विशेष को अपनी आवश्यकता अनुसार दिनचर्या में समाविष्ट करना चाहिए । *प्रातःकाल सूर्योदय से दो-तीन घंटे पूर्व तक निद्रा पूरी हो जाए, समय का निर्धारण इस प्रकार किया जाए ।* प्रातः जल्दी उठना और रात्रि को जल्दी सो जाना उत्तम स्वास्थ्य एवं स्वस्थ मस्तिष्क के लिए सर्वोत्तम माना गया है । महापुरुष, विचारक लेखक, मनीषी और योगी प्रातः ३-४ बजे उठ जाते हैं, और पूरे दिन स्फूर्तिवान प्रसन्नोचित एवं सक्रिय रहते हैं । *सूर्योदय से दो-तीन घंटे पूर्व का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है ।* यह समय आध्यात्मिक साधना हेतु सर्वश्रेष्ठ होता है । अंतरिक्ष ब्रह्मांड की आध्यात्मिक एवं वैचारिक शक्तियाँ पृथ्वी के निवासियों को इस समय विशिष्ट अनुदान देती हैं । हिमालय के योगी अपनी श्रेष्ठ एवं सशक्त विचार और प्राणशक्ति को जन कल्याण के लिए संप्रेषित करते हैं । ब्रह्म मुहूर्त के समय सात्विक भाव, विचार एवं कर्मों में एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है । यदि आलस्य-प्रमाद वश प्रातः जल्दी न उठा गया तो फिर बाद में तो और भी सुस्ती उदासी आती है । *दिव्य प्राणशक्ति प्रवाह के तुरंत पश्चात् तमस् आता है । यह एक आध्यात्मिक तथ्य है ।*
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*प्रगति की-प्रसन्नता की जड़ें अपने ही भीतर - पृष्ठ-३५*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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