💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 226💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐आरुणि उद्दालक की गुरु भक्ति💐💐*
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राजा जन्मेजय की नगरी में अयुद्धौम्य नामक प्रसिद्ध गुरु का आश्रम था इनका एक सबसे उत्तम शिष्य था आरुणी |
घटना कुछ ऐसी हैं, एक बार गाँव के पार मेड़ में दरार बन जाती हैं इससे पानी रिस- रिस खेतो में आने लगता हैं जिसे रोकना बहुत जरुरी हो जाता हैं क्यूंकि ऐसा ना करने पर खेतों में पानी घुसने का खतरा था | जब यह बात आश्रम तक पहुंची तब गुरु अयुद्धौम्य को गाँव की फसलों की चिंता होने लगती हैं | तब वे अपने शिष्य आरुणी को अपने पास बुलाते है समस्या के बारे में विस्तार से बताते हैं और आदेश देते हैं – पुत्र आरुणी इसी समय जाकर मेड़ से बहते पानी का कोई उपचार करो वरना पानी का बहाव बढ़ते ही मेड़ टूट भी सकता हैं और अगर ऐसा होता हैं वो सारी फसले नष्ट हो जायेंगी | गुरु की आज्ञा पाते ही आरुणी बिना कुछ सोचे अपने कार्य को पूरा करने लक्ष्य की तरफ चल पड़ता हैं | गाँव में पहुँचने पर आरुणी पूरी स्थिती समझता हैं और कई प्रकार से मेड़ से बहते पानी को रोकने का प्रयास करता हैं लेकिन पानी का बहाव अधिक होने पर दरार में लगी कोई भी सामग्री टिक नहीं पाती और पानी तेजी से खेतों के आने लगता हैं | तब आरुणी विचार करता हैं और उस मेड़ की दरार पर स्वयं लेट जाता हैं उसके ऐसा करते ही पानी खेतों में जाने से रुक जाता हैं | पानी बहुत ठंडा होने के कारणआरुणी को कम्पन्न महसूस होने लगता हैं लेकिन उसके लिए गुरु का आदेश सर्वोपरि हैं वो कितनी भी तकलीफ सह लेगा पर गुरु के आदेश की अवहेलना नहीं करेगा | आरुणी इसी तरह से सुबह से शाम तक मेड़ पर लेटा रहता हैं और पानी से खेतो की फसलों को बचाता हैं और पूरी श्रद्धा से अपने गुरु के आदेश का पालन करता हैं |
उधर आश्रम में गुरु अयुद्धौम्य बहुत चिंतित हैं | संध्या होने को हैं और आरुणी की कोई खबर नहीं,अब तक तो आरुणी को घर आ जाना था | इन्ही सब विचारों से घिरे अयुद्धौम्य सोच में बैठे हैं | तब ही दुसरे शिष्य गुरु अयुद्धौम्य के पास जाकर चिंता का कारण पूछते हैं | तब गुरु जी कहते हैं – पुत्रो मैंने सुबह आरुणी को मेड़ की दरार भरकर खेतों को पानी से बचाने के लिए भेजा था | उस बात को बहुत समय हो गया, अब तक तो आरुणी को आश्रम आ जाना चाहिये था | वो संध्या की प्रार्थना कभी नहीं छोड़ता,आज पहली बार वो उसमे उपस्थित नहीं हुआ | कहीं कोई चिंता का विषय तो नहीं हैं ? आरुणी किसी बड़ी परेशानी में तो नहीं | सभी चिंतित होकर मेड़ तक जाकर देखने का निर्णय लेते हैं | गुरु अयुद्धौम्य एवम कुछ शिष्य आरुणी को देखने आश्रम से निकल पड़ते हैं |
मेड़ के पास पहुंचकर गुरु अयुद्धौम्य जोर-जोर से आरुणी को पुकारते हैं | थोड़ी देर बाद आरुणी को गुरु जी की आवाज सुनाई देती हैं और वो जोर से उत्तर देता हैं – गुरु जी मैं यहाँ हूँ, मेड़ के उपर लेता हूँ |
सभी आरुणी की तरफ भागते हुये आते हैं और गुरु अयुद्धौम्य जल्दी से आरुणी को खड़ा करते हैं और सभी शिष्य मिलकर दरार को भरते हैं | गुरु जी आरुणी से पूछते हैं – पुत्र तुम इतनी भीषण ठण्ड में इस तरह पानी पर क्यूँ लेटे थे | तुम्हारा पूरा शरीर ठण्ड से नीला पड़ गया हैं | अगर अभी हम नहीं आते तो तुम मृत्यु के समीप ही थे | आरुणी सिर झुकाकर कहता हैं – क्षमा कीजिये गुरुवर, मैंने आप सभी को बहुत कष्ट दिया, किन्तु आपने मुझे पानी बंद करने भेजा था जिसे मैं अकेला कर नहीं पाया, तब एक ही उपाय था जो मैंने किया | गुरु ने कहा – तुम आश्रम आकर इसकी सुचना दे सकते थे | अपने प्राणों को इस तरह से संकट में क्यूँ डाला ? तब आरुणि कहता हैं – हे गुरुवर! आपका आदेश मेरे लिये सर्वोपरि हैं,आपकी चिंता मेरे लिए सबसे बड़ी हैं | अगर मैं आश्रम आता तो फसल का कई हिस्सा बरबाद हो गया होता और यह जानकर आपको बहुत दुःख होता और मेरे कारण आपको मिला दुःख मेरे लिये मृत्यु के समान ही हैं | इसलिये मैंने मेड पर लेटकर पानी को रोकने का निर्णय लिया | आरुणि की ऐसी निष्ठा देख गुरु अयुद्धौम्य को गर्व महसूस होता हैं और वो आरुणि को आशीर्वाद देते हैं – पुत्र तुम्हारा नाम सदैव गुरु भक्ति के लिये जाना जायेगा |नवनीत युगों- युगों तक तुम्हे सुना एवम पढ़ा जायेगा और तुम्हारे द्वारा किये गये इस कार्य का बखान कर आने वाली पीढ़ी को गुरु भक्ति का पाठ सिखाया जायेगा | और इस तरह गुरु अयुद्धौम्य आरुणि को एक नया नाम उद्दालक देते हैं और उसे आशीर्वाद देते हैं कि तुम्हे बिना किसी अध्ययन के सारे वेदों का ज्ञान प्राप्त हो | इस तरह उसी दिन आरुणि की शिक्षा ख़त्म होती हैं और गुरु उन्हें अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने का आदेश देते हैं |
आरुणि का नाम उन्ही महान शिष्यों के साथ लिया जाता हैं जो गुरु आदेश को सर्वोपरि रखते हैं जिनमे एक नाम एकलव्य का भी हैं | यह दोनों ही नाम गर्व के साथ लिए जाते हैं |
*💐💐शिक्षा💐💐*
आज गुरु शिष्य की वो परंपरा विलुप्त हो चुकी हैं ऐसे में छात्रों को इसका ज्ञान केवल इन एतिहासिक कहानियों के जरिये मिलता है जो उनमे संस्कारों को पोषित करता हैं | अपनी आने वाली पीढ़ी को तकनीकी ज्ञान के साथ- साथ संस्कारिक भी बनाये जिसमे ऐसी कई रोचक कहानियाँ ही आपकी मदद करेंगी जिससे आने वाली पीढ़ी में सम्मान के भाव उत्पन्न होंगे और उनमें अपने से बड़े एवम अपने शिक्षको के प्रति आदर का भाव पनपेगा | अपने बच्चों को पर्याप्त समय दे उन्हें कहानियाँ सुनाये क्यूंकि यही एक ऐसी कला हैं जिसके जरिये आप अपने बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान दे सकते हैं और अपना मूल्यवान समय भी | साथ ही उनके ज्ञान को भी बढ़ा सकते हैं |
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*सदैव प्रसन्न रहिये।*
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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 227💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐मन चंगा तो कठौती में गंगा💐💐*
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यह कहानी एक ऐसे लड़के निखिलेश की हैं जिसे डांस का जूनून था, वो डांस के जरिये दुनियाँ को जीत लेना चाहता था, ये उसका जूनून था लेकिन दिल में कहीं बैठी एक आरजू भी थी, जो अक्सर ही उससे उसके प्यार के बारे में कहा करती थी | उसकी इच्छा थी, उसकी जीवन संगिनी एक गायिका हो, भले वो गायन में स्नातक ना हो, न ही उसका पेशा गायन हो, लेकिन वो उसके लिए गुनगुना सके, उसके लिए चार शब्द ही हो पर गा सके | वो अक्सर ही भीड़ में उस आवाज को तलाशता था | न जाने उसके दिल को कौन सी उस आवाज का इन्तजार था जो उसे इतने दिनों में कभी नहीं मिली थी |
वो डांस के साथ-साथ अपनी पढाई में भी बहुत अच्छा था इसलिए शहर के एक अच्छे कॉलेज में पढ़ रहा था | उसके पिता को उसका डांस बिल्कुल पसंद नहीं था क्यूंकि निखिलेश के डांस के कारण वो पिता का बिज़नेस में सहयोग नहीं कर पाता था | निखिलेश डांस में इतना ज्यादा घुस चूका था कि उसकी ख्याति भी शहर में एक अच्छे डांसर के रूप में होने लगी थी |
कॉलेज में अक्सर उसे गुनगुनाने की आवाज सुनाई देती थी जो उसके मन को विचलित कर देती थी | शायद यही वो आवाज थी जिसे वो ढूंढ रहा था | जब भी वो उस आवाज को सुनता, उसका पीछा करता लेकिन उसे कभी वो लड़की नहीं मिलती जिसकी वो आवाज थी | कई दिन बीत गये | उसे बिन देखे ही उस आवाज से प्यार होने लगा था | उसने अपने दिल ही दिल में उस आवाज के अनुरूप एक तस्वीर बना ली थी और अपने सपनों में उस तस्वीर से मोहब्बत करने लगा |
एक दिन उसे फिर से वही आवाज सुनाई दी | उसने भागकर देखा तो कॉलेज के बगीचे में दो लड़कियाँ बैठी थी | उसे आज वो लड़की दिख ही गई जिसकी आवाज उसके दिलों दिमाग में छाई हुई थी | वो दोनों बहने थी जो हमेशा ही साथ रहती थी | उन में से एक का नाम आभा और दूसरी का नाम प्रतिभा था | आभा स्वभाव से शांत थी अक्सर ही अपनी बहन के पीछे चुप सी खड़ी रहती थी | उसकी मुस्कान बहुत अच्छी थी वो दिल की जितनी साफ़ थी उसके चेहरे पर भी वही निर्मल भाव थे लेकिन वो दिखने बहुत साधारण थी और इसके विपरीत प्रतिभा आज के ज़माने की मॉडर्न लड़की थी जो बहुत बिंदास रहती थी, फैशनेबल कपड़े पहनती और घुमती फिरती एक जिंदादिल खुश मिजाज लड़की थी |
जब निखिलेश ने प्रतिभा को देखा तो उसकी आँखे थम गई | उस नशीली आवाज के पीछे ये सुंदर चेहरा देख निखिलेश सन्न सा रह गया और अपना सब कुछ उस पर लुटा बैठा | हर वक्त वो इस कोशिश में रहता कि कैसे भी प्रतिभा से उसकी बात हो इसके लिये उसने उसे फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भी भेजी | वो घंटो फेसबुक पर प्रतिभा से बाते करता, एक दोस्त की तरह उससे अपने सुख दुःख शेयर करता और दूसरी तरफ से भी उसे बहुत अच्छा रिस्पोंस मिल रहा था | निखिलेश की जिन्दगी का खालीपन भर गया था | उसे एक साथी की आदत सी होने लगी थी | जब तक वो दिन भर की बाते फेसबुक पर उससे शेयर नहीं करता, उसका दिन पूरा नहीं होता था | कई बार उसके असाइनमेंट पुरे नहीं होते और जब वो ये बात अपनी दोस्त को फेसबुक पर कहता, दुसरे दिन उसके नाम से कम्पलीट असाइनमेंट क्लास में जमा हो जाता था | इसके आलावा जब भी निखिलेश को पैसे की जरुरत होती, उसकी फ्रेंड अपनी स्कॉलरशिप के पैसे उसके अकाउंट में ट्रान्सफर कर देती | ऐसी कई बाते जो उसके कहते ही उसकी दोस्त पूरा कर देती थी | निखिलेश को यह अहसास हो गया था कि वो जितना प्रतिभा को पसंद करता हैं उतना ही प्रतिभा उसे | उसे यह भी यकीन हो गया था कि प्रतिभा जितनी मॉडर्न रहती हैं वास्तव में उतनी ही सरल और दिल से भोली हैं | शायद इसी एक बात में निखिलेश गलती कर रहा था क्यूंकि फेसबुक पर वो जिससे बाते कर रहा था वो प्रतिभा नहीं, आभा थी,जिसकी आवाज से, व्यवहार से, अपनेपन से, निखिलेश को प्यार था वो आभा थी | लेकिन निखिलेश का मन उस बाहरी सुन्दरता की तरफ आकर्षित था जिसका मन उतना सुंदर नहीं जितना उसका था जिस का चेहरा उतना सुंदर नहीं था | यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा | आभा और निखिलेश दोनों ही एक ग़लतफ़हमी के चलते एक दुसरे के बहुत करीब आ गये | निखिलेश के अहसासों में प्रतिभा का चेहरा और आभा की आवाज उसका सुंदर मन उसके विचार दिन प्रतिदिन गहरे होने लगे | और इसी तरह उसके डांस का जूनून भी बढ़ता गया क्यूंकि आभा जो कि उसके लिए प्रतिभा थी वो भी निखिलेश के डांस से बहुत प्यार करती थी | यहाँ तक की निखिलेश ने अपनी प्यार की बाते अपने दोस्तों से तक कह दी थी | सब उसे हमेशा बोलते थे कि वो बहुत लकी हैं क्यूंकि उसे प्रतिभा जैसी सुंदर और मॉडर्न लड़की में वो सब गुण मिले जिसे वो हमेशा चाहता था |
एक दिन उसने फैसला किया कि वो प्रतिभा से जाकर अपने दिल की बात कहेगा | और उसने वही किया | उस दिन वो बहुत अच्छे से रेडी हुआ और हाथों में गुलाब के फूलो का गुलदस्ता लेकर प्रतिभा से मिलने गया | प्रतिभा अपने दोस्तों के साथ बैठी थी और वही उसके साइड में आभा भी थी | निखिलेश उन दोनों की तरफ बढ़ रहा था जिसे देख आभा के दिल में अजीब सी बैचेनी थी क्यूंकि वो लोग आज तक रूबरू नहीं हुए थे पर कहीं ना कही उसे बहुत ख़ुशी भी हो रही थी | जैसे ही निखिलेश उन तक पहुंचा और उसने हाथों में गुलाब लेकर, घुटनों के बल बैठकर प्रतिभा को प्रपोज़ किया | यह देख आभा स्तब्ध रह गई और उसे सारी बाते समझ आ गई और वो चुपचाप वहाँ से चली गई |
थोड़ी देर तक सब शांत रहा और एक दम ही प्रतिभा जोर-जोर से हँसने लगी और उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर निखिलेश की बहुत हँसी उड़ाई और कहा कि तुम क्या सोचते हो, मेरे जैसी मॉडर्न लड़की एक नचैया से शादी करेगी ? मेरी पसंद तो एक पैसे वाला बिज़नेस मेन हैं और वो निखिलेश की बहुत बेज्जती की |निखिलेश अपने गुस्से को पीकर वहाँ से निकल गया | तब ही उसे आभा मिली, उसने निखिलेश से माफ़ी मांगी |उसे बताया कि फेसबुक पर वो जिससे बात करता था वो खुद आभा थी | यह सुनकर निखिलेश और गुस्सा हो जाता हैं और अपना पूरा फ्रस्टेशन आभा पर निकाल देता हैं |
इसके बाद निखिलेश सब छोड़ कर वहाँ से चला गया | वो अपनी बेज्जती भूल नहीं पाया और उसने अपना डांस भी छोड़ दिया | अपने पिता की इच्छानुसार बिज़नेस करने लगा | वो दिन रात बस काम करता | उसे बिज़नेस में बहुत सफलता मिली लेकिन हर रोज उसकी आँखों में वो एक दिन घूमता रहता | जब उसकी बेज्जती हुई थी | उसको सभी ऐशो आराम मिला लेकिन चैन नहीं, उसके चेहरे पर हँसी तब ही आती,जब उसे फेसबुक पर कही आभा की कोई बात याद आती थी |
दूसरी तरफ आभा भी उसे बहुत याद करती थी | एक दिन आभा को एक बहुत बड़े डांस काम्पटीशन के बारे में पता चला | वो चाहती थी कि इसमें निखिलेश हिस्सा ले लेकिन वो कैसे निखिलेश को इसके लिये मनाती ? उसे निखिलेश के बारे में बस इतना पता था कि वो अब टाउन में नही हैं और एक सफल बिज़नेस मैन बन गया हैं | आभा ये जानती थी कि निखिलेश कितना भी अमीर हो जाये,वो डांस के बिना खुश नहीं होगा और वो उसे ये ख़ुशी देकर अपने मन का बोझ कम करना चाहती थी | इसके लिये उसने निखिलेश का पता इन्टरनेट ने निकालकर उसे एक शुभचिन्तक जो कि निखिलेश के डांस का फेन हैं के तौर पर एक लैटर भेजा जिसमे डांस कॉम्पीटिशन का जिक्र था | (असल में निखिलेश के डांस को सभी इसी तरह से पसंद करते थे इसलिए निखिलेश को इस शुभचिंतक से कोई आश्चर्य नहीं था | ) निखिलेश डांस छोड़ चूका था उसने बस लैटर पढ़ा और रख दिया लेकिन आभा को पता था निखिलेश को कैसे मनाना हैं उसने कई लैटर और कई तस्वीरे भेजी जिसमे निखिलेश के डांस के प्रति प्यार का प्रमाण था जिसे देख निखिलेश का दिल पिघलने लगा और आभा ने जब तक यह सब किया जब तक के निखिलेश ना मान जाये और निखिलेश को मानना पड़ा |
निखिलेश में फॉर्म भरा और जमकर तैयारी भी की | उसके चेहरे पर शांति और ख़ुशी के भाव थे जिसे परिवार और ऑफिस एम्प्लोयी समझ रहे थे | वो दिन आ गया जब कॉम्पिटीशन था | निखिलेश ने बिलकुल तोडू परफॉरमेंस दी और वो जीत गया | जब उसे पुरुस्कार मिला तब सबसे आगे आभा खड़ी ताली बजा रही थी उसे देख निखिलेश के चेहरे पर वही गुस्से के भाव आ गये और वो वहां से निकल गया |
जब वो घर आया तो घर में उस शुभचिंतक ने फूल भेजकर उसका अभिवादन किया | साथ ही उसे एक लैटर भी लिखा जिसमे था कि आने वाले कुछ दिनों में उसे एक सरप्राइज मिलेगा |निखिलेश चौंक गया | उसे बार-बार उसी बात का ख्याल सताने लगा |
एक दिन शाम को घर लौटा तो घर पर प्रतिभा और उसके माता- पिता प्रतिभा के रिश्ते के लिए आये थे | असल में आभा ने प्रतिभा और निखिलेश की शादी के लिए अपने माता-पिता और प्रतिभा सभी को मना लिया था | आभा हर हाल में निखिलेश को खुश देखना चाहती थी इसलिये पहले उसने निखिलेश को वापस अपने डांस से मिलवाया और फिर निखिलेश को प्रतिभा से | निखिलेश कुछ देर सभी के साथ बैठा पर उसका मन नहीं लग रहा था | उसने कमरे में जाकर फ्रेश होने की इजाजत ली और वहां से अंदर चला गया |
अपने कमरे में बैठ निखिलेश सारी बाते सोच रहा था कि कैसे उसने एक आवाज सुनी, फिर उसकी बात आभा से हुई, वो कितना खुश था जब आभा हर परिस्थिती में उसके साथ ना होते हुए भी थी | लेकिन ये सब उस दिन खत्म हो गया जब ग़लतफ़हमी दूर हो गई | लेकिन फिर से उसे वही सब महसूस हुआ जब उसने उस शुभचिन्तक के लैटर को पढ़ा और उसकी बातों को माना | निखिलेश ने एक दम ही शुभचिंतक वाले लैटर निकाले और उसे असाइनमेंट की कॉपी से मैच किया उसे समझ आ गया कि इस सबके पीछे कौन हैं ? उसे सारी बाते समझ आ गई | और यह भी कि वो क्या चाहता हैं |
वो कमरे से बाहर आकर सबके बीच बैठा और उसने प्रतिभा के पिताजी के हाथ पकड़ कर कहा कि मैं शादी के लिये तैयार हूँ पर मेरी एक शर्त हैं ,मैं प्रतिभा से नहीं आभा से शादी करना चाहता हूँ | वो सभी को कहता हैं मैं भी औरों की तरह सुन्दरता में प्यार ढूढ़ रहा था ये भूलकर की मुझे जिस आवाज से प्यार था उसका चेहरा यह तय नहीं करता कि आवाज कितनी सुंदर हैं मेरे दिल को जिसने छुआ था असल में वो आभा ही थी | उसकी पूरी बाते सुन सभी की आँखे भर गई और निखिलेश और आभा एक हो गये |
आभा का मन बहुत साफ़ था इसलिए उसे उसका प्यार मिलता हैं और तभी तो हम कहते हैं मन चंगा तो कठौती में गंगा |
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*💐💐कहानी अनुभव की कंघी💐💐*
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रामधन नाम का एक पुराना व्यपारी था जो अपनी व्यापारी समझ के कारण दोनों हाथो से कमा रहा था | उसको कोई भी टक्कर नहीं दे सकता था | वो दूर-दूर से अनाज लाकर उसे शहर में बेचता था उसे बहुत सा लाभ होता था | वो अपनी इस कामयाबी से बहुत खुश था | इसलिये उसने सोचा व्यापार बढ़ाना चाहिये और उसने पड़ौसी राज्य में जाकर व्यापार करने की सोची |
दुसरे राज्य जाने के रास्ते का मानचित्र देखा गया जिसमे साफ-साफ था कि रास्ते में एक बहुत बड़ा मरुस्थल हैं | खबरों के अनुसार उस स्थान पर कई लुटेरे भी हैं | लेकिन बूढा व्यापारी कई सपने देख चूका था | उस पर दुसरे राज्य में जाकर धन कमाने की इच्छा प्रबल थी | उसने अपने कई किसान साथियों को लेकर प्रस्थान करने की ठान ली | बैलगाड़ियाँ तैयार की और उस पर अनाज लादा |इतना सारा माल था जैसे कोई राजा की शाही सवारी हो |
बूढ़े राम धन की टोली में कई लोग थे जिसमे जवान युवक भी थे और वृद्ध अनुभवी लोग,जो बरसो से राम धन के साथ काम कर रहे थे | जवानो के अनुसार अगर इस टोली का नेत्रत्व कोई नव युवक करता तो अच्छा होता क्यंकि यह वृद्ध रामधन तो धीरे-धीरे जायेगा और पता नही उस मरुस्थल में क्या-क्या देखना पड़ेगा |
तब कुछ नौ जवानो ने मिलकर अपनी अलग टोली बना ली और स्वयम का माल ले जाकर दुसरे राज्य में जाकर व्यापार करने की ठानी | रामधन को उसके चहेते लोगो ने इस बात की सुचना दी | तब राम धन ने कोई गंभीर प्रतिक्रिया नहीं दिखाई उसने कहा भाई सबको अपना फैसला लेने का हक़ हैं | अगर वो मेरे इस काम को छोड़ अपना शुरू करना चाहते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं हैं | और भी जो उनके साथ जाना चाहता हो जा सकता हैं |
अब दो अलग व्यापारियों की टोली बन चुकी थी जिसमे एक का नेत्रत्व वृद्ध रामधन कर रहे थे और दुसरे का नेत्रत्व नव युवक गणपत कर रहे थे | दोनों की टोली में वृद्ध एवम नौ जवान दोनों सवार थे |
सफ़र शुरू हुआ | रामधन और गणपत अपनी अपनी टोली लेकर चल पड़े | थोड़ी दूर सब साथ –साथ ही चल रहे थे कि जवानो की टोली तेजी से आगे निकल पड़ी और रामधन और उनके साथी पीछे रह गये | रामधन की टोली के नौजवान इस धीमी गति से बिलकुल खुश नहीं थे और बार-बार रामधन को कौस रहे थे,कहते कि वो नौ जवानो की टोली तो कब की नगर की सीमा लाँघ चुकी होगी और कुछ ही दिनों में मरुस्थल भी पार कर लेगी | और हम सभी इस बूढ़े के कारण भूखे मर जायेंगे |
धीरे-धीरे रामधन की टोली नगर की सीमा पार करके मरुस्थल के समीप पहुँच जाती हैं |तब रामधन सभी से कहते हैं यह मरुस्थल बहुत लंबा हैं और इसमें दूर दूर तक पानी की एक बूंद भी नहीं मिलेगी, इसलिये जितना हो सके पानी भर लो | और सबसे अहम् यह मरुस्थल लुटेरे और डाकुओं से भरा हुआ हैं इसलिये हमें यहाँ का सफ़र बिना रुके करना होगा | साथ ही हर समय चौकन्ना रहना होगा |
उन्हें मरुस्थल के पहले तक बहुत से पानी के गड्ढे मिल जाते हैं जिससे वे बहुत सारा पानी संग्रह कर लेते हैं | तब उन में से एक पूछता हैं कि इस रास्ते में पहले से ही इतने पानी के गड्ढे हैं,हमें एक भी गड्ढा तैयार नहीं करना पड़ा | तब रामधन मूंछो पर ताव देकर बोलते हैं इसलिए तो मैंने नव जवानों की उस टोली को आगे जाने दिया | यह सभी उन लोगो ने खुद के लिए तैयार किया होगा जिसका लाभ हम सभी को मिल रहा हैं | यह सुनकर कर टोली के विरोधी साथी खिजवा जाते हैं | और अन्य, रामधन के अनुभव की प्रशंसा करने लगते हैं | सभी रामधन के कहे अनुसार बंदोबस्त करके और आराम करके आगे बढ़ते हैं |
आगे बढ़ते हुए राम धन सभी को आगाह कर देता हैं कि अब हम सभी मरुस्थल में प्रवेश करने वाले हैं | जहाँ ना तो पानी मिलेगा, ना खाने को फल और ना ही ठहरने का स्थान और यह बहुत लम्बा भी हैं | हमें कई दिन भी लग सकते हैं | सभी रामधन की बात में हामी मिलाते हुए उसके पीछे हो लेते हैं |
अब वे सभी मरुस्थल में प्रवेश कर चुके थे | नवनीत जहाँ बहुत ज्यादा गर्मी थी जैसे अलाव लिये चल रहे हो |आगे चलते-चलते उन्हें सामने से कुछ लोग आते दिखाई देते हैं | वे सभी रामधन को प्रणाम करते हैं और हाल चाल पूछते हैं | उन में से एक कहता हैं आप सभी व्यापारी लगते हो, काफी दूर से चले आ रहे हो, अगर कोई सेवा का अवसर देंगे तो हम सभी तत्पर हैं | उसकी बाते सुन रामधन हाथ जोड़कर कह देता हैं कि भाई हम सभी भले चंगे हैं, तुम्हारा धन्यवाद जो तुम सभी ने इतना सोचा | और वे अपने साथियों को लेकर आगे बढ़ जाते हैं | आगे बढ़ते ही टोली के कुछ नव युवक फिर से रामधन को कौसने लगते हैं कि जब वे लोग हमारी सहायता कर रहे हैं तो इस वृद्ध रामधन को क्या परेशानी हैं ?
कुछ दूर चलने के बाद फिर से कुछ लोग सामने से आते दिखाई देते हैं जिनके वस्त्र गिले थे और वे रामधन और उसके साथियों को कहते हैं कि आप सभी राहगीर लगते हो और इस मरुस्थल के सफर से थके लग रहे हो | अगर आप चाहो तो हम आपको पास के एक जंगल में ले चलते हैं | जहाँ बहुत पानी और खाने को फल हैं | साथ ही अभी वहाँ पर तेज बारिश भी हो रही हैं | उसी में हम सभी भीग गये थे | अगर आप सभी चाहे तो अपना सारा पानी फेक कर जंगल से नया पानी भर ले और पेट भर खाकर आराम कर ले | लेकिन रामधन साफ़ ना बोल कर अपने साथियों से जल्दी चलने को कह देते हैं |
अब टोली के कई नौ जवानो को रामधन पर बहुत गुस्सा आता हैं और वे उसके समीप आकर अपना सारा गुस्सा निकाल देते हैं और पूछते हैं कि क्यूँ वे उन भले लोगो की बात नहीं सुन रहे और क्यूँ हम सभी पर जुल्म कर रहे हैं | तब रामधन मुस्कुराते हुए कहते हैं कि वे सभी लुटेरे हैं और हमसे अपना पानी फिकवा कर हमें निसहाय करके लुट लेना चाहते हैं और हमें यही मरने छोड़ देना चाहते हैं | तब वे नव युवक गुस्से में दांत पिसते हुये कहते हैं कि सेठ जी तुम्हे ऐसा क्यूँ लगता हैं ? तब रामधन कहते हैं कि तुम खुद देखो, इस मरुस्थल में कितनी गर्मी हैं, क्या यहाँ आसपास कोई जंगल हो भी सकता हैं ,यहाँ की भूमि इतनी सुखी हैं कि दूर दूर तक बारिश ना होने का संकेत देती हैं | यहाँ एक परिंदे का घौसला तक नहीं तो फल फुल कैसे हो सकते हैं | और जरा निगाह उठाकर ऊपर देखो दूर-दूर तक कोई बारिश के बादल नहीं हैं, नवनीत ना ही हवा में बारिश की ठंडक हैं, ना ही गीली मिटटी की खुशबु,तो कैसे उन लोगो की बातों पर यकीन किया जा सकता हैं ? मेरी बात मानो कुछ भी हो जाये अपना पानी मत फेंकना और ना ही कहीं भी रुकना |
कुछ देर आगे चलने के बाद उन्हें रास्ते में कई नरकंकाल और टूटी फूटी बैलगाड़ी मिलती हैं | वे सभी कंकाल गणपत की टोली के लोगो के थे | उन में से एक भी नहीं बचा था | उनकी ऐसी दशा देख सभी रोने लगते हैं क्यूंकि वे सभी उन्ही के साथी थे | तब रामधन कहते हैं कि जरुर इन लोगो ने तुम्हारे जैसे ही इन लुटेरो को अपना साथी समझा होगा और इसका परिणाम यह हुआ, आज उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा | रामधन सभी को ढाढस बंधाते हुये कहते हैं हम सभी को भी यहाँ से जल्दी निकलना होगा क्यूंकि वे सभी लुटेरे अभी भी हमारे पीछे हैं | प्रार्थना करो कि हम सभी सही सलामत यहाँ से निकल जाये |
*💐💐शिक्षा :💐💐*
कहते अनुभव की कंघी जब काम आती हैं जब सर पर कोई बाल नहीं बचता अर्थात अनुभव उम्र बीतने और जीवन जीने के बाद ही मिलता हैं | अनुभव कभी भी पूर्वजो की जागीर में नहीं मिलता | जैसे इस कहानी में नव जवानो में जोश तो बहुत था लेकिन अनुभव की कंघी नहीं थी जो कि रामधन के पास थी जिसका उसने सही समय पर इस्तेमाल किया और विपत्ति से सभी को निकाल कर ले गया |शिक्षा यही हैं कि किसी काम को करने के लिये जोश के साथ अनुभव होना भी अत्यंत आवश्यक हैं |
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एक बार एक ग्वालन दूध बेच रही थी और सबको दूध नाप नाप कर दे रही थी। उसी समय एक नौजवान दूध लेने आया तो ग्वालन ने बिना नापे ही उस नौजवान का बर्तन दूध से भर दिया।
वहीं थोड़ी दूर पर एक साधु हाथ में माला लेकर मनको को गिन गिन कर माला फेर रहा था। तभी उसकी नजर ग्वालन पर पड़ी और उसने ये सब देखा और पास ही बैठे व्यक्ति से सारी बात बताकर इसका कारण पूछा।
उस व्यक्ति ने बताया कि जिस नौजवान को उस ग्वालन ने बिना नाप के दूध दिया है वह उस नौजवान से प्रेम करती है। इसलिए उसने उसे बिना नाप के दूध दे दिया। यह बात साधु के दिल को छू गयी और उसने सोचा कि एक दूध बेचने वाली ग्वालन जिससे प्रेम करती है तो उसका हिसाब नहीं रखती और मैं अपने जिस ईश्वर से प्रेम करता हूँ, उसके लिए सुबह से शाम तक मनके गिनगिन कर माला फेरता हूँ। मुझसे तो अच्छी यह ग्वालन ही है और उसने माला तोड़कर फेंक दिया।
*💐💐शिक्षा:-💐💐*
जीवन भी ऐसा ही है। जहाँ प्रेम होता है वहाँ हिसाब किताब नहीं होता है, और जहाँ हिसाब किताब होता है वहाँ प्रेम नहीं होता है, सिर्फ व्यापार होता है।
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एक राजा था जिसका नाम रामधन था उनके जीवन में सभी सुख थे | राज्य का काम काज भी ऐशो आराम से चल रहे था | राजा के नैतिक गुणों के कारण प्रजा भी बहुत प्रसन्न थी | और जिस राज्य में प्रजा खुश रहती हैं वहाँ की आर्थिक व्यवस्था भी दुरुस्त होती हैं इस प्रकार हर क्षेत्र में राज्य का प्रवाह अच्छा था |
इतने सुखों के बाद भी राजा दुखी था क्यूंकि उसकी कोई संतान नहीं थी यह गम राजा को अंदर ही अंदर सताता रहता था | प्रजा को भी इस बात का बहुत दुःख था | वर्षों के बाद राजा की यह मुराद पूरी हुई और उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई | पुरे नगर में कई दिनों तक जश्न मना | नागरिकों को राज महल में दावत दी गई | राजा की इस ख़ुशी में प्रजा भी झूम रही थी |
समय बितता जा रहा था राज कुमार का नाम नंदनसिंह रखा गया | पूजा पाठ एवम इन्तजार के बाद राजा को सन्तान प्राप्त हुई थी इसलिये उसे बड़े लाड़ प्यार से रखा जाता था लेकिन अति किसी बात की अच्छी नहीं होती अधिक लाड़ ने नंदन सिंह को बहुत बिगाड़ दिया था | बचपन में तो नंदन की सभी बाते दिल को लुभाती थी पर बड़े होते होते यही बाते बत्तमीजी लगने लगती हैं | नंदन बहुत ज्यादा जिद्दी हो गया था उसके मन में अहंकार आ गया था वो चाहता था कि प्रजा सदैव उसकी जय जयकार करे उसकी प्रशंसा करें | उसकी बात ना सुनने पर वो कोलाहल मचा देता था | बैचारे सैनिको को तो वो पैर की जुती ही समझता था | आये दिन उसका प्रकोप प्रजा पर उतरने लगा था | वो खुद को भगवान के समान पूजता देखना चाहता था | आयु तो बहुत कम थी लेकिन अहम् कई गुना बढ़ चूका था |
नन्दन के इस व्यवहार से सभी बहुत दुखी थे | प्रजा आये दिन दरबार में नन्दन की शिकायत लेकर आती थी जिसके कारण राजा का सिर लज्जा से झुक जाता था | यह एक गंभीर विषय बन चूका था |
एक दिन राजा ने सभी खास दरबारियों एवम मंत्रियों की सभा बुलवाई और उनसे अपने दिल की बात कही कि वे राज कुमार के इस व्यवहार से अत्यंत दुखी हैं , राज कुमार इस राज्य का भविष्य हैं अगर उनका व्यवहार यही रहा तो राज्य की खुशहाली चंद दिनों में ही जाती रहेगी | दरबारी राजा को सांत्वना देते हैं और कहते हैं कि आप हिम्मत रखे वरना प्रजा निसहाय हो जायेगी | मंत्री ने सुझाव दिया कि राजकुमार को एक उचित मार्गदर्शन एवम सामान्य जीवन के अनुभव की जरुरत हैं | आप उन्हें गुरु राधागुप्त के आश्र भेज दीजिये सुना हैं,वहाँ से जानवर भी इंसान बनकर निकलता हैं | यह बात राजा को पसंद आई और उसने नन्दन को गुरु जी के आश्रम भेजा |
अगले दिन राजा अपने पुत्र के साथ गुरु जी के आश्रम पहुँचे | राजा ने गुरु राधा गुप्त के साथ अकेले में बात की और नन्दन के विषय में सारी बाते कही | गुरु जी ने राजा को आश्वस्त किया कि वे जब अपने पुत्र से मिलेंगे तब उन्हें गर्व महसूस होगा | गुरु जी के ऐसे शब्द सुनकर राजा को शांति महसूस हुई और वे सहर्ष अपने पुत्र को आश्रम में छोड़ कर राज महल लौट गये |
अगले दिन सुबह गुरु के खास चेले द्वारा नंदन को भिक्षा मांग कर खाने को कहा गया जिसे सुनकर नंदन ने साफ़ इनकार कर दिया | चेले ने उसे कह दिया कि अगर पेट भरना हैं तो भिक्षा मांगनी होगी और भिक्षा का समय शाम तक ही हैं अन्यथा भूखा रहना पड़ेगा | नंदन ने अपनी अकड़ में चेले की बात नहीं मानी और शाम होते होते उसे भूख लगने लगी लेकिन उसे खाने को नहीं मिला | दुसरे दिन उसने भिक्षा मांगना शुरू किया | शुरुवात में उसके बोल के कारण उसे कोई भिक्षा नहीं देता था लेकिन गुरुकुल में सभी के साथ बैठने पर उसे आधा पेट भोजन मिल जाता था | धीरे-धीरे उसे मीठे बोल का महत्व समझ आने लगा और करीब एक महीने बाद नंदन को भर पेट भोजन मिला जिसके बाद उसके व्यवहार में बहुत से परिवर्तन आये |
इसी तरह गुरुकुल के सभी नियमों ने राजकुमार में बहुत से परिवर्तन किये जिसे राधा गुप्त जी भी समझ रहे थे एक दिन राधा गुप्त जी ने नंदन को अपने साथ सुबह सवेरे सैर पर चलने कहा |दोनों सैर पर निकल गये रास्ते भर बहुत बाते की | गुरु जी ने नंदन से कहा कि तुम बहुत बुद्धिमान हो और तुममे बहुत अधिक उर्जा हैं जिसका तुम्हे सही दिशा मे उपयोग करना आना चाहिये | दोनों चलते-चलते एक सुंदर बाग़ में पहुँच गये | जहाँ बहुत सुंदर-सुंदर फूल थे जिनसे बाग़ महक रहा था | गुरु जी ने नंदन को बाग़ से पूजा के लिये गुलाब के फुल तोड़ने कहा | नंदन झट से सुंदर-सुंदर गुलाब तोड़ लाया और अपने गुरु के सामने रख दिये | अब गुरु जी ने उसे नीम के पत्ते तोड़कर लाने कहा | नंदन वो भी ले आया | अब गुरु जी ने उसे एक गुलाब सूंघने दिया और कहा बताओ कैसा लगता हैं नंदन ने गुलाब सुंघा और गुलाब की बहुत तारीफ की | फिर गुरु जी उसे नीम के पत्ते चखकर उसके बारे में कहने को कहा | जैसे ही नंदन ने नीम के पत्ते खाये उसका मुंह कड़वा हो गया और उसने उसकी बहुत निंदा की | और जतर क़तर पीने का पानी ढूंढने लगा |
नन्दन की यह दशा देख गुरु जी मुस्कुरा रहे थे | पानी पिने के बाद नंदन को राहत मिली फिर उसने गुरु जी से हँसने का कारण पूछा | तब गुरु जी ने उससे कहा कि जब तुमने गुलाब का फुल सुंघा तो तुम्हे उसकी खुशबू बहुत अच्छी लगी और तुमने उसकी तारीफ की लेकिन जब तुमने नीम की पत्तियाँ खाई तो तुम्हे वो कड़वी लगी और तुमने उसे थूक दिया और उसकी निंदा भी की | गुरु जी से नन्दन को समझाया जिस प्रकार तुम्हे जो अच्छा लगता हैं तुम उसकी तारीफ करते हो उसी प्रकार प्रजा भी जिसमे गुण होते हैं उसकी प्रशंसा करती हैं अगर तुम उनके साथ दुर्व्यवहार करोगे और उनसे प्रशंसा की उम्मीद करोगे तो वे यह कभी दिल से नही कर पायेंगे | इस प्रकार जहाँ गुण होते हैं वहाँ प्रशंसा होती हैं |
नंदन को सभी बाते विस्तार से समझ आ जाती हैं और वो अपने महल लौट जाता हैं | नंदन में बहुत परिवर्तन आता हैं और वो बाद में एक सफल राजा बनता हैं |
*💐💐शिक्षा💐💐*
गुरु की सीख ने नंदन का जीवन ही बदल दिया वो एक क्रूर राज कुमार से एक न्याय प्रिय दयालु राजा बन गया |इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती हैं कि हममे गुण होंगे तो लोग हमें हमेशा पसंद करेंगे लेकिन अगर हम अवगुणी हैं तो हमें प्रशंसा कभी नहीं मिल सकती |
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