ऋषि चिंतन से भाग 24



🌺 ऋषि चिंतन से 116🌺 Rishi chintan se 116🌺


*🥀//२० मई २०२३ शनिवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्ष प्रतिपदा२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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    *➖हम सुधरें तो जग सुधरे➖*
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👉 *शरीर और मन स्वस्थ रहे तो अभीष्ट समर्थता प्राप्त हो सकती है । *"चिंतन"* और *"चरित्र"* सही हो तो फिर सज्जनोचित व्यवहार भी बन पड़ता है, शिष्टाचार और मित्रता का सहयोगी क्षेत्र सुविस्तृत होता है, यह बड़ी उपलब्धियाँ हैं । *"हम सुधरें तो जग सुधरे" की उक्ति छोटी होते हुए भी अत्यंत मार्मिक और सारगर्भित है ।* दूसरों की सेवा सहायता करने में आरंभिक किंतु अत्यंत प्रभावी तरीका यह है कि जैसा दूसरों को देखना चाहते हैं वैसा स्वयं बनकर दिखाएँ । दूसरे अपनी इच्छा अनुसार बनें या ना बनें, चलें या न चलें, यह संदिग्ध है, क्योंकि सभी पर अपना प्रभाव अधिकार कहाँ है ? *पर अपना आपा तो पूर्णतया अपने अधिकार क्षेत्र में है ।* जब शरीर को इच्छा अनुसार चलाया जा सकता है, जब अपने पैसे को इच्छानुरूप खर्च किया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अपने स्वभाव और क्रियाकलापों को इस ढाँचे में न ढाला जा सके, जिसे शालीनता का प्रतीक-प्रतिनिधि कहा जा सके ।
👉 *श्रेष्ठ शुभारंभ अपने घर से ही किया जाना चाहिए ।* घर का दीपक जलता है तो आंगन से लेकर पड़ोस तक में प्रकाश फैलाता है । *दूसरों को प्रभावित करने, बदलने से पहले यदि उसी स्तर का स्वयं अपने को बना लिया जाए तो निश्चित रूप से आधी समस्या हल हो जाती है ।* अपनी और आँखें बंद रखी जाएँ और दूसरों को सुधारने समझाने के लिए निकल पड़ा जाए तो बात बनती नहीं, अभीष्ट सफलता मिलती नहीं । *विफलता की ऐसी निराशा भरी घड़ी आने से पूर्व अच्छा यह है कि कम से कम अपने को तो उस स्तर का बना ही लिया जाए जैसा कि अन्यान्य लोगों को देखना चाहते हैं ।*
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*समग्र स्वास्थ्य संवर्धन कैसे ? पृष्ठ-२७*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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🌺 ऋषि चिंतन से 117🌺 Rishi chintan se 117🌺


*🥀//२१ मई २०२३ रविवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्ष द्वितीया२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*❗〰️हम उत्कृष्ट बनेंगे〰️❗*
  *➖दूसरों को श्रेष्ठ बनाएँगें➖*
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👉 *कहने को कोई कुछ भी कहता रहे, पर लोगों की जमी हुई मान्यता यह है कि "इन दिनों आदर्शों का परिपालन संभव नहीं है ।* उन्हें कहने-सुनने का मनोविनोद भर समझा जा सकता है । कथा श्रवण से स्वर्ग मिलने जैसी मूढ़मान्यताओं से ग्रसित तो कितने ही लोग होते हैं, पर उन भक्त-श्रोताओं में से कदाचित ही कोई ऐसे निकलते हैं जो आदर्शों को व्यवहार में उतारने के लिए आवश्यक साहस दिखा सकें । *जब उदाहरण ही दीख नहीं पड़ते तो कोई कैसे माने कि आदर्श का परिपालन व्यवहारिक एवं संभव भी है ।* यही एक चट्टान इतनी बड़ी है जिससे टकराकर सतह पर बहते हुए अनेक जलते दीपक बुझ जाते हैं । छोटी डोंगियाँ भी इन्हीं अवरोधों से टकराकर प्राय; डूबती देखी जाती हैं ।
 👉 *प्रामाणिक उदाहरणों के बिना लोगों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करना इन दिनों इसीलिए विशेष रूप से कठिन हो गया है कि निजी जीवन में उत्कृष्टता की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वाले उपदेष्टा ढूँढे नहीं मिलते ।* यदि उनका ऐसा अकाल न पड़ा होता तो, प्राचीन काल के धर्म-प्रचारकों की तरह इन दिनों भी समाज का उच्च स्तरीय निर्माण कर सकना संभव रहा होता, तब सतयुगी वातावरण सर्वत्र दिखाई देता । *उत्कृष्टता की पक्षधर भाव-चेतना भी एक प्रकार के कृषि कार्य एवं उद्यान आरोपण की तरह है उसके लिए सिंचाई तथा रखवाली की सुव्यवस्था रखने वाला जागरूक संरक्षक चाहिए ।* किसान या मालिक का स्वेद रिसन चल पाए बिना कोई फसल कभी फलती फूलती और कोठे भरने में समर्थ नहीं होती । *प्राचीन काल में लोकमानस का स्तर ऊँचा उठाए रहने में चिंतन, चरित्र, व्यवहार में शालीनता का गहरा पुट लगाए रहने में, धर्म प्रचारकों का जो पुरोहित वर्ग निरंतर कार्य संलग्न रहता था, उसका अब कहीं अता-पता भी नहीं दीख पड़ता .* ऐसी दशा में खेत उद्यानों को चौपट हुआ देखा जाता है तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है । *प्रचलित अवांछनीयताओं से अपने को मुक्त करना चाहिए । अभीष्ट सत्प्रवृत्तियों को अपने स्वभाव एवं अभ्यास में उतारना चाहिए । इतना बन पड़ने पर लोगों को यह कहने में ही हिचक लगेगी कि आदर्शवादिता का परिपालन असंभव या अ ।व्यावहारिक है ।अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पस्त-हिम्मत लोगों में नए उत्साह का संचार किया जा सकता है ।*
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*समग्र स्वास्थ्य संवर्धन कैसे ? पृष्ठ-३०*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/EQfZpqPmlLM











🌺 ऋषि चिंतन से 118🌺 Rishi chintan se 118🌺


*🥀--२२ मई सोमवार २०२३--🥀*
*💐ज्येष्ठ शुक्लपक्ष तृतीया२०८०💐*
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          *‼️ऋषि चिंतन‼️*
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    *आलस्य व प्रमाद घातक शत्रु*
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👉 *"आलस्य" मनुष्य का प्रथम शत्रु है।* शरीर को वह सजीव होते हुए भी निर्जीव स्तर का बनाकर रख देता है। *जब स्फूर्ति, उत्साह और परिश्रम को अपनाया ही न जाएगा, तो काया स्वयं ही दौड़ती और कुछ उपयोगी करती रह सके, ऐसा कहाँ बन पड़ेगा ?* सभी व्यक्ति न अपनी कमी खोज पाते हैं और न उसमें सुधार करने का कुछ प्रयास करते हैं। फलतः दिन ज्यों-त्यों करके गुजरते रहते हैं, शरीर यात्रा किसी प्रकार चलती रहती है, किंतु निरंतर श्रमरत न रहने की कुटेव उनके लिए कोई ऐसी उपलब्धि नहीं बुला सकती, जिसके आधार पर समुन्नत कहलाने का श्रेय मिल सके। 
👉 *जब "आलस्य" शरीर से आगे बढ़कर मन तक पर सवार हो जाता है, तब उसे "प्रमाद" कहते हैं।* प्रमादी को न अवगति अखरती है और न उन्नति के लिए उमंग उठती है। यथास्थिति बने रहने में ही उसका चिंतन सिकुड़ जाता है। न उसे सीखने की इच्छा होती है और न ऐसी योजना बनाने की जिसके आधार पर आज की तुलना में आने वाला अगला कल अधिक समर्थ और समुन्नत बन सके। *ऐसे लोगों को जब कभी दीनता-हीनता का आभास होता है तो किन्हीं अन्य को कारण मानकर उसी पर दोषारोपण करने लगते हैं। भाग्य, विधि-विधान, ईश्वर की इच्छा, समय का फेर, ग्रह नक्षत्र द्वारा उत्पन्न किए गए अवरोधों की बात सोचकर संतोष कर लिया जाता है।* बहुत हुआ तो शासन, समाज, वातावरण, कलियुग या किन्हीं व्यक्ति को दोषी मानकर उसके प्रति बैर भाव जमा लिया जाता है। *"आलसी" और "प्रमादी" प्रायः इसी अवसाद एवं अचिंत्य चिंतन में घिरे रहकर किसी प्रकार जिंदगी के दिन पूरे कर लेते हैं।*
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*व्यवस्था बुद्धि की गरिमा पृष्ठ - १८*
    *🍁पं. श्रीराम शर्मा, आचार्य🍁*
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https://youtu.be/9L5WgcASFY0









🌺 ऋषि चिंतन से 119🌺 Rishi chintan se 119🌺


*🥀//२३ मई २०२३ मंगलवार//🥀*
*//ज्येष्ठ शुक्लपक्ष चतुर्थी२०८०//*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*➖निरर्थक मृगतृष्णा में न पड़ें➖*
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👉 जिन सिद्धियों के लिए लोग लालायित रहते हैं और अपनी व्यक्तिगत इच्छा और अभिलाषा के लिए उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं । उसके संबंध में आइए सार्वजनिक हित की दृष्टि से, बड़े दृष्टिकोण से विचार करें *कि यदि सिद्धियाँ सर्वसुलभ हो जाँय तो संसार में सुविधा की वृद्धि होगी या असुविधा की ?* 
👉 मान लीजिए कि अपने जीवन की अवधि लोगों को मालूम हो जाय, यह पता लग जाय कि हमारी मृत्यु कब ? किस दिन ? किस प्रकार होगी ? *तो उस मनुष्य का जीवन बड़ा विचित्र हो जाएगा ।* अमुक दिन मरूँगा, इससे पहले नहीं मर सकता, यह निश्चित हो जाने पर वह बड़ी से बड़ी दुर्घटना करने के लिये, किसी से लड़ने मरने के लिए तैयार हो जाएगा । *मृत्यु के डर से लोग आगा-पीछा सोचते हैं और संघर्ष में पड़ने से बचते रहते हैं, पर जो मरने से निधड़क हो गया हो उसे बड़े से बड़ा उत्पात करने में कुछ भय न होगा ।* दूसरी बात यह भी है कि जिसे मालूम है कि मेरी मृत्यु के समय में केवल इतना समय रहा है, वह सांसारिक काम धंधों से उदास होकर बैठ जाएगा । मृत्यु के शोक में बहुत पहले से डूब जाएगा । अपने दीर्घ जीवन की आशा से लोग धन-वैभव एकत्रित करते हैं । वह उसके मरने पर विधवा तथा बच्चों के काम आती है । *जिसे मालूम है कि मुझे सिर्फ आठ महीने जीना है वह संपत्ति संचय न करेगा, जो होगी उसे भी खर्च कर देगा ।* इस प्रकार एक नहीं हजारों प्रकार की कठिनाइयाँ बढ़ जाएंगी । 
👉 मान लीजिए कि व्यापार की तेजी मंदी का लोगों को पता चल जाय *तो व्यापार का कारोबार ही ठप्प हो जाएगा ।* जब लोगों को यह मालूम हो जाए कि अब तेजी आने वाली है तो पहले से ही लोग चीजों को रोक लेंगे और लोगों को वह वस्तु मिलना कठिन हो जाएगी । इसी प्रकार यह मालूम हो जाए कि यह चीज मंदी होने वाली है तो उसे बेचना तो सब चाहेंगे, लेना कोई नहीं । *सब लोगों को तेजी मंदी का पता चलने लगे तब तो व्यापार नाम की कोई वस्तु ही न रह जाएगी ।*
👉 *परमात्मा अपनी दुनिया को उलट-पुलट करना नहीं चाहता । इसलिए उसने तेजी-मंदी का सच्चा ज्ञान किसी ज्योतिषी, सटोरिये या सिद्ध को नहीं दिया है ।* 
👉 इस प्रकार जितनी भी सिद्धियाँ हैं वे यद्यपि आकर्षक दीखती हैं, पर अंततः मनुष्य जाति के लिए घोर हानिकारक ही सिद्ध होंगी । *इसलिये परमात्मा ने उन्हें सर्व साधारण के लिये सुलभ नहीं किया है ।* जिन्हें वे सिद्धियाँ मिलती हैं वे वही लोग होते हैं जो पूर्ण परमात्म तत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं और विश्व व्यवस्था में गड़बड़ करने के लिए उनका प्रयोग नहीं करते । *इसलिये सिद्धियों के फेर में न पड़कर हमें स्वाभाविक सत्य, प्रेम, न्यायमय जीवन बिताना चाहिये । यही जीवन की सबसे बड़ी सफलता और परम सिद्धि है ।*
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*योग के नाम पर मायाचार पृष्ठ-४६*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/RBFc0IToF_Y








🌺 ऋषि चिंतन से 120🌺 Rishi chintan se 120 🌺


*🥀//२४ मई २०२३ बुधवार//🥀*
*🍁ज्येष्ठ शुक्लपक्ष पंचमी २०८०🍁*
                  
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            *‼ऋषि चिंतन‼*
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*भोजन शरीर को पोषण देने के लिए है*
*इंद्रियों को तृप्त करने के लिए नहीं है*
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👉 *आज के मनुष्य का अनेक प्रकार के मेवे-मिष्ठान्नों, मिर्च-मसालों, अचार-चटनियों, मांस एवं तरकारियों से युक्त चटपटा भोजन आयु की क्षीणता का एक विशेष कारण है ।* पूड़ी, कचोरी, डबल रोटी बिस्किट न जाने क्या क्या बताएं हम ठूँस-ठूँसकर गले तक भर लेते हैं फिर चूरन चाटते और गोलियां खाते फिरते हैं । *अति भोजन रोगों की वृद्धि करने वाला, आयु को क्षीण करने वाला, नरक में पहुंचाने वाला, पाप कराने वाला और निंदा कराने वाला है, इससे काम, क्रोध, रोग आदि और भी प्रबल होते हैं ।* स्वप्नदोष अधिकांश रूप से अधिक भोजन के कारण हुआ करता है और अकाल मृत्यु का कारण बनता है ।
👉 एक बार ईरान के किसी सम्राट ने एक अनुभवी वैद्यशास्त्री से प्रश्न किया - *" दिन रात में मनुष्य को कितना खाना चाहिए ?"* उत्तर मिला - *"१०० ड्राम (अर्थात 39 तोला) ।* फिर पूछा - *"इतने से क्या होगा?"* वैद्य ने उत्तर दिया - *"शरीर पोषण के निमित्त यह यथेष्ट है, इसके पश्चात जो कुछ भक्षण किया जाता है, वह केवल अनावश्यक बोझ उठाए फिरना, पेट को फुलाकर औषधालय बना लेना N आयु खोना है।* अधिक खाना मानो अपनी आयु का एक-एक दिन कम करना है तथा अकाल मृत्यु के मुख में कूदना है । *मिताहारी पुरुष ही दीर्घ जीवी हो सकते हैं ।* 
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*दीर्घ जीवन के रहस्य पृष्ठ-१४*
     *🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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