🌺 ऋषि चिंतन से 141🌺 Rishi chintan se 141🌺
*🥀//१४ जून २०२३ बुधवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्षएकादशी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*👉परंपराओं की तुलना में👈*
*〰️ विवेक को महत्व देंवे〰️*
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👉 सर्दियों की ऋतु में गरम कपड़े पहनना आवश्यक होता है पर गर्मियाँ आते ही ऊनी कपड़े पहनना छोड़कर हलके सूती वस्त्र पहने जाने लगते हैं। वर्षा ऋतु में छाता लेकर चलना आवश्यक हो जाता है, परंतु शीत ऋतु में इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। *स्वस्थ व्यक्ति को जो आहार दिया जाता है, वही आहार बीमार और व्यक्ति को दिया जाने लगे तो इससे उसका स्वास्थ्य लड़खड़ाने लगता है।* खुशहाली के दिनों में पैसा खर्च करना अनुपयुक्त नहीं होता, वैसा खर्च अकाल पड़ने या दुर्दिन आने पर अनुचित सिद्ध होता है। *समय के अनुसार रीति-नीति में, प्रचलन-रिवाजों में, प्रथा- परंपराओं में परिवर्तन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।*
👉 इन दिनों अपने समाज में कई परंपराएँ ऐसी हैं जिनका प्रचलन किसी देश-काल की स्थिति विशेष को दृष्टिगत रखते हुए किया गया था। उस समय उनकी उपयोगिता भी थी, परंतु आज वैसी स्थिति नहीं है, इसलिए वे परंपराएँ न केवल अपनी उपयोगिता खो चुकी हैं, वरन कुरीतियों के रूप में व्यक्ति तथा समाज की हानि भी कर रही हैं। *आवश्यकता इस बात की है कि उनमें समयानुसार परिवर्तन किया जाए, कुछ में संशोधन किया जाए तथा कुछ का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया जाए।*
👉 परंपराओं के प्रचलन की प्रसांगिकता और समय परिस्थिति विशेष की आवश्यकता को दृष्टिगत रखते हुए बाल विवाह को ही लिया जाए तो प्रतीत होगा कि यह परंपरा उस समय उपयोगी रही होगी जब शासक वर्ग नागरिकों की कुमारी कन्याओं का अपहरण कर उन्हें अपने हरम में डाल लेते थे । अपहरण कुमारी कन्याओं का किया जाता था, *इसलिए उचित समझा गया कि उनका विवाह छोटी आयु में ही कर दिया जाए। उस समय यह परंपरा समीचीन थी, परंतु आज न तो वैसी स्थिति है और न ही कोई किसी की जवान लड़की का अपहरण करता है।* कहीं कुछ ऐसा होता भी है तो उसे दंडनीय अपराध समझा जाता है और अपराधी को दंड दिया जाता है। *अस्तु अब बाल विवाह का कोई औचित्य नहीं है।*
👉 मृत्यु भोज की बड़ी-बड़ी दावतें देने का प्रचलन उस समय आरंभ हुआ होगा जब बार-बार अकाल पड़ते थे और अधिकांश लोगों को भूखे प्यासे रहना पड़ता था । तब भूतात्मा की शांति के लिए भूखे-प्यासों को भोजन कराकर पुण्य प्राप्त होने की बात सोची गई, किंतु आज यह परंपरा केवल नाते-रिश्तेदारों, पड़ोसियों और परिचितों, मित्रों को दावत खिला देने तक सीमित रह गई है । स्पष्ट है कि इस परंपरा का निर्वाह अब न तो खाने वाले के लिए उचित कहा जा सकता है और न ही खिलाने वाले के लिए कोई गौरव की बात है । *जिस घर में सदस्य को मरे हुए अभी पंद्रह दिन भी नहीं हुए हों वहाँ शोक संवेदना व्यक्त करने दिवंगत व्यक्ति के स्वजनों को सांत्वना देने के स्थान पर दावतें उड़ाने का क्या औचित्य हो सकता है ?*
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*अवांछनीय प्रचलनों को उलटने की आवश्यकता पृष्ठ-४६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/5_7I5oMm_ks
🌺 ऋषि चिंतन से 142 🌺 Rishi chintan se 142 🌺
*🥀//१५ जून २०२३ गुरुवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्षद्वादशी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*इस पर आप विचार तो कीजिए*
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👉 *"दान" एक धार्मिक कृत्य है।* सभी धर्मग्रंथों और मनीषियों ने इसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की है। दूसरों की उन्नति के लिए, औरों के कष्ट निवारण के लिए कुछ त्याग किया जाना उदारतापूर्ण, सराहनीय तथा वंदनीय कहा जाना चाहिए। समाज में सभी तरह के लोग रहते है। अच्छी स्थिति वाले भी और गिरी हुई स्थिति वाले भी। *अच्छी स्थिति वाले अपने से निम्न व्यक्ति के लोगों को ऊंचा उठाने के लिए दान के रूप में सहयोग प्रस्तुत करें, इस उदार सामाजिकता को प्रोत्साहन देने के लिए ही "दान" को धर्म के दस लक्षणों में गिना गया हैं।* स्पष्ट रूप से गिरे हुओं को ऊपर उठाने के लिए उनकी किसी प्रकार भी सहायता करना दान का उद्देश्य हैं, पर जब इस उद्देश्य के विपरीत अमुक वंश या अमुक वेश के लोगों को उनकी पात्रता तथा चरित्र का ध्यान रखे बिना स्वर्ग प्राप्ति, पुण्य फल मिलने की आकांक्षा के आधार पर ही दान दिया जाने लगे तो *उससे किसी श्रेष्ठ उद्देश्य की पूर्ति होने के स्थान पर अनर्थ और हानि ही होती है।* कारण कि वंश या वेष को दान दिए जाने से संबंधित लोगों में-दान लेने वालों में निकम्मापन, निठल्लापन, आलस्य, अकर्मण्यता और दुर्गुण दुर्व्यसन ही पनपते हैं। *जब बिना श्रम किए मुफ्त की कमाई हाथ लगती है तो उसका सदुपयोग करने की आवश्यकता कहाँ से अनुभव होगी ?*
👉 जेवर बनवाने के प्रचलन को ही लिया जाए। *किसी समय संग्रहीत धन को सुरक्षित रखने के लिए बैंक जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। घर में धन रहने से चोरी का डर रहता था। इसलिए लोग अपनी संगृहीत कमाई को सोने-चाँदी के जेवर बनवाकर अपने साथ रखते थे और शरीर पर धारण किए रहते थे।* आज स्थिति भिन्न है। बैंकों के रूप में धन को सुरक्षित रहने की प्रथा प्रचलित है और उस पर ब्याज भी मिलता है, जबकि जेवर बनाने में टाँका, मजूरी, टूट-फूट आदि में कितनी ही रकम फालतू चली जाती हैं। साथ ही शत्रुता, ईर्ष्या, डकैती, हत्या जैसे खतरे भी जुड़े रहते हैं। *इस स्थिति में केवल परंपराओं का निर्वाह करने के लिए जेवर बनवाए और पहने जाते रहें तो इसमें कोई बुद्धिमत्ता की बात नहीं है।*
👉 *ब्याह शादियों के अवसर पर अपव्यय की जो कुरीति चल पड़ी है उसका तो कोई औचित्य ही समझ में नहीं आता।* दान दहेज से लेकर नेग जोग और धूम-धड़ाके से भेंट दावतों तक न जाने किन- किन मदों में विवाह के अवसर पर खर्च किया जाता है। न केवल विवाह के समय बल्कि विवाह के बाद भी त्योहारों तथा विशेष अवसरों पर कन्या वालों को वर पक्ष के यहाँ अनेकों उपहार भेजने पड़ते हैं। लड़की के बच्चा होने पर उसके यहाँ कोई मांगलिक कृत्य होने से लेकर परिवार में शोक होने तक न जाने कितनी बार भेंट- पूजा चढ़ानी पड़ती है और वह खर्च भी बहुत पड़ जाता है। *जो चीजें उपहार स्वरूप दी जाती हैं उनकी कोई विशेष उपयोगिता भी नहीं होती, इसलिए इस धन को एक प्रकार से व्यर्थ गया ही समझना चाहिए।* जिनकी आर्थिक स्थिति इस योग्य नहीं होती उनके लिए तो ये रीति-रिवाज भारी पड़ते ही हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति इन्हें निभाने योग्य होती है, वे भी निभाकर कोई विशेष प्रसन्न नहीं होते। सामाजिक प्रचलन होने के कारण लोग इन परंपराओं का पालन करते हैं पर उन्हें इससे कोई प्रसन्नता नहीं होती। *हमारा समाज जितना प्राचीन है। उतनी ही कुरीतियाँ और प्रथाएँ समाज में घर कर गई हैं, यह कहा जाए तो कोई अत्युक्ति पूर्ण नहीं है ।*
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*अवांछनीय प्रचलनों को उलटने की आवश्यकता पृष्ठ-४७*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/XT7z7pWQYg0
🌺 ऋषि चिंतन से 143🌺 Rishi chintan se 143 🌺
*🥀//१६ जून २०२३ शुक्रवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्षत्रयोदशी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*इस जल्दबाजी से क्या फायदा ?*
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👉 *"आतुरता" और "अधीरता" की बुराई मनुष्य को बुरी तरह परेशान करती है। प्रायः हमें हर बात में बहुत जल्दी रहती है, जिस कार्य में जितना समय एवं श्रम लगना आवश्यक है उतना नहीं लगाना चाहते, अभीष्ट आकांक्षा की सफलता तुर्त-फुर्त देखना चाहते हैं।* बरगद का पेड़ उगने से लेकर फलने-फूलने की स्थिति में पहुँचने के लिए कुछ समय चाहता है पर हथेली पर सरसों जमी देखने वाले बालकों को इसके लिए धैर्य कहाँ ? *यह आतुरता की बीमारी जन-समाज के मस्तिष्कों में बुरी तरह प्रवेश कर गई है और लोग अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसा रास्ता ढूँढ़ना चाहते हैं, जिससे आवश्यक प्रयत्न न करना पड़े और जादू की तरह उनकी मनोकामना तुरंत पूरी हो जाए।*
👉 राजमार्ग छोड़कर लोग पगडंडी तलाश करते हैं, फलस्वरूप वे काँटों में भटक जाते हैं। हथेली पर सरसों जम तो जाती है पर उस सरसों का तेल डिब्बे में कोई नहीं भर पाया। बाजीगर रेत का रुपया बनाते हैं पर उन रुपयों से जायदाद नहीं खरीद पाते। कागज का महल खड़ा तो किया जा सकता है पर उसमें निवास करते हुए जिंदगी काट लेने की इच्छा कौन पूरी कर पाता है ? *रेत की दीवार कतने दिन ठहरती है ?*
👉 *सुख-शांति के लक्ष्य तक धर्म और सदाचार के राजमार्ग पर चलते हुए पहुँच सकना ही संभव है।* यह रास्ता इतना सीधा है कि इनमें शार्टकट की, पगडंडी की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई । *हमारे तत्त्वदर्शी पूर्वपुरुषों ने मानव जीवन को सफलता, समृद्धि, प्रगति और शांति से परिपूर्ण कर देने वाला जो मार्ग सबसे सरल पाया, उसी राजपथ का नाम "धर्म" एवं "सदाचार" रखा । इस मार्ग के हर मील पर अधिकाधिक प्रफुल्लता भरा वातावरण मिलता है ।*
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*उतावली न करें, उद्विग्न न हों पृष्ठ-०३*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/s42aWxHdht8
🌺 ऋषि चिंतन से 144 🌺 Rishi chintan se 144 🌺
*🥀//१७ जून २०२३ शनिवार//🥀*
*//आषाढ़ कृष्णपक्षचतुर्दशी २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*बालसुलभ क्रीडाओं में मत उलझिए*
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👉 *मन की प्रसन्नता के लिए लोग विषय-वासनाओं पर ऐसे टूटते हैं जैसे मछली-आटा लगे हुए काँटे की नोंक को निगलती है।* कहा जाता है कि उससे मन का प्रसन्नता और स्फूर्ति बढ़ती है । चाय, सिगरेट, शराब, भाँग, गाँजा आदि पीने वाले अपनी आदत के समर्थन में यही बात कहते हैं। व्यभिचारी, वेश्यागामी और घृणित तरीकों से अपना जीवन-तत्त्व निचोड़ते रहने वाले व्यक्ति भी अपनी कुटेवों का समर्थन इसी आधार पर करते हैं। सिनेमा, ताश, शतरंज आदि व्यसनों के बारे में भी ऐसा ही कुछ कहा जाता है। *हो सकता है कि तत्काल कुछ देर के लिए इन कुटेवों-व्यसनों में फँसे लोगों को कुछ प्रसन्नता मिलती हो। पर धीरे-धीरे उनका धन, समय, स्वास्थ्य और चरित्र गिरता है।* उनकी स्थिति दिनोदिन खोखली होती जाती है।
👉 सम्मान प्राप्त करने के लिए लोग उद्धत तरीके काम में लाते हैं। *विवाह-शादियों में गाढ़ी कमाई के महत्त्वपूर्ण पैसों की होली इसलिए जलाई जाती है कि देखने वाले हमें अमीर समझें और अमीरों को जो सम्मान मिलता है, वह हमें भी मिले।* दहेज की हत्यारी कुप्रथा के पीछे आर्थिक कमाई का भाव उतना नहीं होता जितना कि अपनी नाक ऊँची करने का। *सोचा जाता है कि जिसे जितना अधिक दहेज मिलेगा, वह उतना ही बड़ा आदमी समझा जाएगा।* नेता बनने के लिए चुनाव में जीतने के लिए लोग कैसे कैसे घृणित हथकंडे काम में लाते हैं। *इसके मूल में यही प्रवृत्ति काम कर रही होती है कि हमारा व्यक्तित्व लोगों की आँखों में चमके।* अखबारों में झूठी नामवरी छपवाने के लिए कितने आतुर रहते हैं। *सोचने की बात है कि क्या कभी इन हथकंडों से किसी को स्थायी कीर्ति मिली है?* भीतरी महानता को बढ़ाए बिना क्या कभी कोई व्यक्ति स्थायी सम्मान का अधिकारी बन सका है ?
👉 परचे नकल करके या अन्य बुरे तरीकों को अपनाकर कई लोग परीक्षा में उत्तीर्ण हो रहे हैं, *पर उन्हें विद्या से प्राप्त होने वाली योग्यता कहाँ मिलती है ?* स्त्री, बच्चों और कर्मचारियों को डरा व धमकाकर या उनकी मजबूरियों से लाभ उठाकर उन्हें अपना वशवर्ती रखा जा सकता है, पर हृदय को जीत सकना बिना आत्म- त्याग के, बिना सच्चे प्रेम के एवं बिना सौजन्य के कहाँ उपलब्ध होता है ? *अनुचित सहायता से कई लोग उच्च पदों पर जा पहुँचते हैं पर उस पद की शोभा और सफलता उन कुपात्रों के द्वारा कहाँ बन पाती है?* सत्पात्रता का ही सदा महत्त्व रहा है और आगे भी रहेगा। *जालसाजी के आधार पर मिली हुई सफलताएँ कितने दिन ठहरती हैं और उनसे क्या कोई प्रयोजन सिद्ध होता है ?*
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*उतावली न करें, उद्विग्न न हों पृष्ठ-०६*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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https://youtu.be/XT7z7pWQYg0
🌺 ऋषि चिंतन से 145 🌺 Rishi chintan se 145 🌺
*🥀//१८ जून २०२३ रविवार//🥀*
*//आषाढ़कृष्णपक्षअमावस्या २०८०//*
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*‼ऋषि चिंतन‼*
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*सफलता आपको भी मिलेगी*
*➖🧑🎤थोड़ा धैर्य तो रखिए➖*
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👉 *"उन्नति" और "सफलता" के लिए हर व्यक्ति बुरी तरह लालायित रहता है।* उसको अभीष्ट मात्रा में इच्छित सफलता तुर्त-फुर्त नहीं मिल जाती तो अत्यंत निराश भी हो जाता है। लोग अनेक काम आरंभ करते हैं और सफलता में देर लगती देखकर उसे छोड़ बैठते हैं और फिर नया काम शुरू करते हैं। इस प्रकार अपना धन, समय और श्रम बरबाद करते रहते हैं। *लोगों में आरंभिक जोश बहुत होता हैं पर वे निराश भी उतनी ही जल्दी हो जाते हैं।* जंत्र-मंत्र की, साधु-संतों के आशीर्वाद की, देवताओं के वरदान की भी ऐसे ही लोग बहुत तलाश करते हैं, ताकि जल्द से जल्द उनका मनोरथ पूरा हो जाए।
👉 *हमें जानना चाहिए कि हर वस्तु "समयसाध्य" है और "श्रमसाध्य" भी।* कोई मार्ग ऐसा नहीं जिसमें रुकावटें और बाधाएँ न हों। उन्हें हटाने के लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा भी। *आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परिश्रमी और पुरुषार्थी को तो सफलता मिलती ही है और यदि न भी मिले तो उसकी प्रतिभा और क्षमता तो बढ़ती ही रहती है।* प्रयत्नशीलता से, पुरुषार्थ से, अध्यवसाय से व्यक्तित्व निखरता है और उसके आधार पर प्रगति की ऊँची मंजिल पर चढ़ सकना संभव हो जाता है ।
👉 *"धैर्य" और "दूरदर्शिता" हमें अपनानी चाहिए ।* सफलता और प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारा पूरा ध्यान अपने पुरुषार्थ पर रहे। *फल कब मिलेगा ? कितना मिलेगा ? कैसा मिलेगा ? इसका कुछ निश्चय नहीं।* यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है। छोटे काम में भी बहुत देर लग सकती है और बड़े काम भी संयोगवश जल्दी हो सकते हैं। *मनुष्य के हाथ में उसका प्रयत्न ही ईश्वर ने दिया है और फल का विधान अपने हाथ में रखा है।* हमें अपना काम करना चाहिए और ईश्वर का काम उसे करना चाहिए। *ईश्वर के काम पर हम कब्जा करें और अपना कर्त्तव्य ईश्वर से पालन कराने की इच्छा करें, तो यह अनधिकार चेष्टा ही होगी।*
👉 *फल की आतुरता प्रगति के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है ।* धैर्य और साहसपूर्वक अपना कर्तव्यपालन करते रहना और उचित मार्ग पर चलते रहना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है । जल्दबाजी में लाभ तो कुछ होता नहीं, उलटे सफलता का लक्ष्य दूर हट जाता है । *साथ ही ऐसे उलटे काम भी बन पड़ते हैं, जो असफलता से भी अधिक कष्टकारक परिणाम उत्पन्न करने वाले सिद्ध होते हैं ।*
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*उतावली न करें, उद्विग्न न हों पृष्ठ-०९*
*🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴*
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