💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 251 💮
*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
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4 मई, 1919 को नीमच (जिला मंदसौर, म.प्र.) में जन्मे हरिभाऊ इतिहास, पुरातत्व एवं चित्रकला में विशेष रुचि होने के कारण अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर वे उज्जैन आ गये और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे वहां पर ही प्राध्यापक हो गये।
उज्जैन के पास दंतेवाड़ा ग्राम में हुई खुदाई के समय उन्होंने अत्यधिक श्रम किया। 1958 में वे एक बार रेल से यात्रा कर रहे थे कि मार्ग में उन्होंने कुछ गुफाओं और चट्टानों को देखा। साथ के यात्रियों से पूछने पर पता लगा कि यह भीमबेटका (भीम बैठका) नामक क्षेत्र है तथा यहां गुफा की दीवारों पर कुछ चित्र बने हैं; पर जंगली पशुओं के भय से लोग वहां नहीं जाते।
हरिभाऊ की आंखों में यह सुनकर चमक आ गयी। रेल कुछ देर बाद जब धीमी हुई, तो वे चलती गाड़ी से कूद गये और कई घंटे की चढ़ाई चढ़कर उन पहाडि़यों पर जा पहुंचे। वहां गुफाओं पर बने मानव और पशुओं के चित्रों को देखकर वे समझ गये कि ये लाखों वर्ष पूर्व यहां बसने वाले मानवों द्वारा बनाये गये हैं।
वे लगातार 15 वर्ष तक यहां आते रहे। इस प्रकार इन गुफा चित्रों से संसार का परिचय हुआ। इससे हरिभाऊ को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया।
एक बार वे लंदन के पुरातत्व संग्रहालय में शोध कर रहे थे। वहां उन्होंने सरस्वती की वह प्राचीन प्रतिमा देखी, जिसे धार की भोजशाला पर हमला कर मुस्लिमों ने तोड़ा था।
धार में ही जन्मे हरिभाऊ यह देखकर भावुक हो उठे। अगले दिन वे संग्रहालय में गये और प्रतिमा पर एक पुष्प चढ़ाकर वंदना करने लगे।
उनकी आंखों में आंसू देखकर संग्रहालय का प्रमुख बहुत प्रभावित हुआ। उसने हरिभाऊ को एक अल्मारी दिखाई, जिसमें अनेक अंग्रेज अधिकारियों की डायरियां रखीं थीं। इनमें वास्कोडिगामा की डायरी भी थी, जिसमें उसने स्पष्ट लिखा है कि वह मसालों के एक व्यापारी ‘चंदन’ के जलयान के पीछे चलकर भारत में कोचीन के तट पर आया। कैसी मूर्खता है कि इस पर भी इतिहासकार उस पुर्तगाली डाकू को भारत की खोज का श्रेय देते हैं।
एक बार हरिभाऊ एक हिन्दू सम्मेलन में भाग लेने के लिए सिंगापुर गये। वहां उनके होटल से समुद्र का मनमोहक दृश्य हर समय दिखाई देता था। चार अप्रैल, 1988 को जब वे निर्धारित समय पर सम्मेलन में नहीं पहुंचे, तो लोगों ने होटल जाकर देखा। हरिभाऊ बालकनी में एक कुर्सी पर बैठे थे। घुटनों पर रखे एक बड़े कागज पर अठखेलियां करते समुद्र का आधा चित्र बना था, हाथ की पेंसिल नीचे गिरी थी। इस प्रकार चित्र बनाते समय हुए भीषण हृदयाघात ने उस कला साधक के जीवन के चित्र को ही सम्पूर्ण कर दिया।
संघ के स्वयंसेवक होने के नाते वे सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय थे। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, म.प्र. के अध्यक्ष रहे। विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के बाद 1966 में प्रयाग में जब प्रथम 'विश्व हिन्दू सम्मेलन' हुआ, तो एकनाथ रानाडे ने उन्हें वहां प्रदर्शिनी बनाने तथा सज्जा करने के लिए भेजा।
फिर तो ऐसे हर सम्मेलन में हरिभाऊ की उपस्थिति अनिवार्य हो गयी। इसके बाद वे विश्व के अनेक देशों में गये और वहां भारतीय संस्कृति, कला, इतिहास और ज्ञान-विज्ञान आदि पर व्याख्यान दिये। 1981 में ‘संस्कार भारती’ की स्थापना होने पर उन्हें उसका महामंत्री बनाया गया।
भारतीय सभ्यता न केवल लाखों वर्ष प्राचीन है, अपितु वह अत्यन्त समृद्ध भी रही है। इसे विश्व के सम्मुख लाने में जिन लोगों का विशेष योगदान रहा, उनमें श्री विष्णु श्रीधर (हरिभाऊ) वाकणकर का नाम उल्लेखनीय है
एक पानी की बोतल पर पड़े अनेकों गोलियों के निशान दिखे, नाइक गुलाब सिंह (वीर चक्र मरणोपरांत, 13 कुमाऊं रेजिमेंट) की थी ये पानी की बोतल। इसपर पड़े गोलियों के निशान शत्रु की फायरिंग का घनत्व बता थे। जो युद्ध की भीषणता को समझाने में पर्याप्त था।
नवंबर 1962 में लद्दाख में रेज़ांगला की लड़ाई में चीनी मशीन गन की स्थिति पर गुलाब सिंह ने सीधे हमला किया। इस लड़ाई में उस दिन अमर होने वाले 114 भारतीय सैनिकों में से एक नाइक गुलाब सिंह भी थे जो हरियाणा रेवाड़ी के मनेठी गाँव में पैदा हुए थे। इस टुकड़ी के 120 वीरों की वजह से ही आज लद्दाख भारत का हिस्सा बना हुआ है।
मेजर-जनरल इयान कार्डोज़ो अपनी पुस्तक "परम वीर, अवर हीरोज इन बैटल" में लिखते हैं:
जब रेज़ांग ला को बाद में बर्फ हटने के बाद फिर से देखा गया तो खाइयों में मृत जवान पाए गए जिनकी उँगलियाँ अभी भी अपने हथियारों के ट्रिगर पर थी ... इस कंपनी का हर एक आदमी कई गोलियों या छर्रों के घावों के साथ अपनी ट्रेंच में मृत पाया गया।
मोर्टार मैन के हाथ में अभी भी बम था। मेडिकल अर्दली के हाथों में एक सिरिंज और पट्टी थी जब चीनी गोली ने उसे मारा ...। सात मोर्टार को छोड़कर सभी को एक्टिव किया जा चुका था और बाकी सभी मोर्टार पिन निकाल दागे जाने के लिए तैयार थे।
यह संसार का सबसे भीषण लास्ट स्टैंड वारफेयर था जहाँ 120 वीरों ने वीरता से लड़ते हुए 1300 चीनी सैनिकों को मार डाला था और लद्दाख को चीन द्वारा कब्जाने के मसूबों पर पानी फेर दिया।
*ये तो आजादी के बाद कि घटना है, इसे भी बच्चों की इतिहास की किताब से गायब रखना कहाँ तक उचित है।*
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*💐💐दो दोस्त💐💐*
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किसी गाँव में दो दोस्त रहते थे। एक का नाम हीरा था और दूसरे का मोती. दोनों में गहरी दोस्ती थी और वे बचपन से ही खेलना-कूदना, पढना-लिखना हर काम साथ करते आ रहे थे।
जब वे बड़े हुए तो उनपर काम-धंधा ढूँढने का दबाव आने लगा. लोग ताने मारने लगे कि दोनों निठल्ले हैं और एक पैसा भी नही कमाते।
एक दिन दोनों ने विचार-विमर्श कर के शहर की ओर जाने का फैसला किया. अपने घर से रास्ते का खाना पीना ले कर दोनों भोर होते ही शहर की ओर चल पड़े।
शहर का रास्ता एक घने जंगल से हो कर गुजरता था. दोनों एक साथ अपनी मंजिल की ओर चले जा रहे थे. रास्ता लम्बा था सो उन्होंने एक पेड़ के नीचे विश्राम करने का फैसला किया. दोनों दोस्त विश्राम करने बैठे ही थे की इतने में एक साधु वहां पर भागता हुआ आया. साधु तेजी से हांफ रहा था और बेहद डरा हुआ था।
मोती ने साधु से उसके डरने का कारण पूछा।
साधु ने बताय कि-आगे के रास्ते में एक डायन है और उसे हरा कर आगे बढ़ना बहुत मुश्किल है, मेरी मानो तुम दोनों यहीं से वापस लौट जाओ।
इतना कह कर साधु अपने रास्ते को लौट गया।
हीरा और मोती साधु की बातों को सुन कर असमंजस में पड़ गए. दोनों आगे जाने से डर रहे थे। दोनों के मन में घर लौटने जाने का विचार आया, लेकिन लोगों के ताने सुनने के डर से उन्होंने आगे बढ़ने का निश्चेय किया।
आगे का रास्ता और भी घना था और वे दोनों बहुत डरे हुए भी थे. कुछ दूर और चलने के बाद उन्हें एक बड़ा सा थैला पड़ा हुआ दिखाई दिया. दोनों दोस्त डरते हुए उस थैले के पास पहुंचे।
उसके अन्दर उन्हें कुछ चमकता हुआ नज़र आया. खोल कर देखा तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना ही न रहा. उस थैले में बहुत सारे सोने के सिक्के थे. सिक्के इतने अधिक थे कि दोनों की ज़िंदगी आसानी से पूरे ऐश-ओ-आराम से कट सकती थी. दोनों ख़ुशी से झूम रहे थे, उन्हें अपने आगे बढ़ने के फैसले पर गर्व हो रहा था।
साथ ही वे उस साधु का मजाक उड़ा रहे थे कि वह कितना मूर्ख था जो आगे जाने से डर गया।
अब दोनों दोस्तों ने आपस में धन बांटने और साथ ही भोजन करने का निश्चेय किया।
दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए. हीरा ने मोती से कहा कि वह आस-पास के किसी कुएं से पानी लेकर आये, ताकि भोजन आराम से किया जा सके।मोती पानी लेने के लिए चल पड़ा।
मोती रास्ते में चलते-चलते सोच रहा था कि अगर वो सारे सिक्के उसके हो जाएं तो वो और उसका परिवार हमेशा राजा की तरह रहेगा. मोती के मन में लालच आ चुका था।
वह अपने दोस्त को जान से मर डालने की योजना बनाने लगा. पानी भरते समय उसे कुंए के पास उसे एक धारदार हथियार मिला।उसने सोचा की वो इस हथियार से अपने दोस्त को मार देगा और गाँव में कहेगा की रास्ते में डाकुओं ने उन पर हमला किया था. मोती मन ही मन अपनी योजना पर खुश हो रहा था।
वह पानी लेकर वापस पहुंचा और मौका देखते ही हीरा पर पीछे से वार कर दिया. देखते-देखते हीरा वहीं ढेर हो गया।
मोती अपना सामान और सोने के सिक्कों से भरा थैला लेकर वहां से वापस भागा।
कुछ एक घंटे चलने के बाद वह एक जगह रुका। दोपहर हो चुकी थी और उसे बड़ी जोर की भूख लग आई थी. उसने अपनी पोटली खोली और बड़े चाव से खाना-खाने लगा।
लेकिन ये क्या ? थोड़ा खाना खाते ही मोती के मुँह से खून आने आने लगा और वो तड़पने लगा।
उसे एहसास हो चुका था कि जब वह पानी लेने गया था तभी हीरा ने उसके खाने में कोई जहरीली जंगली बूटी मिला दी थी. कुछ ही देर में उसकी भी तड़प-तड़प कर मृत्यु हो गयी।
अब दोनों दोस्त मृत पड़े थे और वो थैला यानी माया रूपी डायन जस का तस पड़ा हुआ था।
जी हाँ दोस्तों उस साधु ने एकदम ठीक कहा था कि आगे डायन है. वो सिक्कों से भरा थैला उन दोनों दोस्तों के लिए डायन ही साबित हुआ. ना वो डायन रूपी थैला वहां होता न उनके मन में लालच आता और ना वे एक दूसरे की जाना लेते।
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दोस्तों! यही जीवन का सच भी है. हम माया यानी धन-दौलत-सम्पदा एकत्रित करने में इतना उलझ जाते हैं कि अपने रिश्ते-नातों तक को भुला देते हैं. माया रूपी डायन आज हर घर में बैठी है. इसी माया के चक्कर में इंसान हैवान बन बैठा है. हमें इस प्रेरक कहानी से ये सीख लेनी चाहिए की हमें कभी भी पैसे को ज़रुरत से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए और अपनी दोस्ती… अपने रिश्तों के बीच में इसको कभी नहीं लाना चाहिए.
और हमारे पूर्वज भी तो कह गए हैं-
माया के चक्कर में दोनों गए, न माया मिली न राम
इसलिए हमें हमेशा माया के लोभ व धन के लालच से बचना चाहिए और ज्यादा ना सही पर कुछ समय भगवान् की अराधना में ज़रूर लगाना चाहुए।
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शाम का धुंधलका बढ़ रहा था तकरीबन सात बज चुके थे बिरजू पैदल अपने कंधे पर अपना मिस्त्री का समान उठा अपने घर की और बढ़ रहा था पेशे से एक मकान बनाने वाला मिस्त्री है बिरजू जोकि रोज चौंक पर जाकर सुबह खड़ा होकर काम करवाने वाले मालिकों की राह तकता था यही उसकी पारिवारिक रोजी रोटी कमाने का एकमात्र साधन है ।
बीते दो दिनों से वह एक बंगले की रिपेयरिंग का काम कर रहा था वही अपना काम निपटाकर वह वापस पैदल घर की और बढ़ रहा था कि अचानक हलवाई की दुकान पर नजरें पड़ते ही उसे अपनी पत्नी सुधा की बात याद आई सुधा ने दो दिनों पहले ही उसे कहा था परसों अपनी दोनों बेटियों का जन्मदिन है भूल मत जाना उनके लिए कुछ मीठा लेते हुए आना ...आज के काम की दिहाड़ी पूरे साढ़े चार सौ रूपए मिली थी उसे साथ में उसके काम से खुश होकर बंगले की मालकिन ने एक चाकलेट का पैकेट भी पकड़ा दिया था क्योंकि सुबह ही काम करते हुए उन्होंने उससे पूछा था घर में कौन कौन है आपके भैया ...तब बिरजू ने मालकिन को बताया था कि उसके अलावा उसकी पत्नी सुधा और दो बेटियां हैं आस्था और आराध्या और आज बडी बेटी का जन्मदिन भी है ...तो आते वक्त उन्होंने बिरजू को चाकलेट का पैकेट दिया था दोनों बच्चियों के लिए...
सेठजी... ढाई सौ ग्राम रसगुल्ले तोल देना... कंधे से समान उतारते हुए बिरजू बोला और पेंट के अंदर की चोर जेब से रूपये निकालकर उसने हलवाई की ओर बढ़ा दिए ।
हाथ में मिठाई आते ही उसे ऐसा लगा कि जैसे उसने आस्था और आराध्या की लाखों रुपए वाली खुशी खरीद ली हो दोनों को रसगुल्ले बहुत पसंद है मन ही मन मुस्कुराते हुए बिरजू तेजी से कदम बढ़ाने लगा उसे घर जाने की जल्दी जो थी क्योंकि उसकी बेटी का जन्मदिन जो था की अचानक एक गारमेंट की दुकान देखकर उसके कदम रुक से गए फिर सहसा ही उसे याद आया जिस घर में वो मिस्त्री का काम करके लौटा है।
वहां बंगले मालिक के बच्चे भी तकरीबन उसकी बेटियों की उम्र के ही थे बंगले मालिक के बच्चों ने कितने मंहगे कपड़े पहने हुए थे और हां दोनों बच्चों के पास मोबाइल भी था वो भी अलग-अलग बड़े वाला ...और वो दोनों बात बात पर माम डांड जाने क्या क्या कहकर साहब मैडम को बुला रहे थे कितनी अच्छी किस्मत है उनकी अच्छा बड़ा घर ...नये नये बढ़िया कपड़े बड़ा टीवी मोबाइल और भी जाने क्या क्या था और एक में ... क्या दे पाया अबतक अपने बच्चों को यही सोचते हुए उसकी आंखें भीग गई और मन कुंठित हो गया वह उदास सा हो गया था।
आस्था के पास ले देकर एक ही अच्छा सूट सलवार है जिसे वो हर त्यौहार पर पहन लेती है और फिर बक्से में रख देती है अगली बार के लिए ...
तो वहीं आराध्या कभी कभी जिद कर जाती है नए कपङो की ....छोटी है ना अभी उसे अभी समझ नहीं है ।
उसने मन ही मन पक्का किया कि कैसे भी जोङ तोङ और मेहनत से रूपए बचाकर वो अपनी दोनों बेटियों को नए कपड़े तो दिलाने ही है अभी मेरी और सुधा की तो चल ही रही है उसने तो शुरू से ही मेरे साथ निभाया है। कभी कोई शिकवा शिकायत नहीं की। उन्हीं दो पुरानी साड़ियों में ही खुश रहती है मेरी तरह ...ले देकर उसके पास भी वही पुरानी पेंट कमीज है जो एकबार एक फ्लैट में काम करते हुए खुशी से फ्लैट मालिक ने उसे दी थी मगर मेरी बेटियां ... आखिर उन्हें दे क्या पाता हूं कभी दिन त्योहार पर नये कपड़े नहीं लेकर दे पाया अबतक ...आज मेरी बेटी का जन्मदिन है आज भी ...
उसकी मिठाई खरीदने की खुशी दूर उङ चुकी थी।
सोचते सोचते बिरजू घर आ पहुंचा दरवाजे पर कदमों की आहट से रोज की भांति सुधा तुरंत बाहर निकल आई थी और रोज की ही भांति एक आत्मीय मुस्कान के साथ उसने बिरजू का मुस्कुराते हुए स्वागत किया नवनीत।
बिरजू ने पूछा ही था की आस्था और आराध्या के बारे में कि भीतर से दोनो पापाजी पापाजी कहते हुए सामने आ खङी हो गई और उसे स्नेह पूर्वक पकड़ कर अंदर ले आई आस्था जहां दौड़कर पानी लाई थी प्लेट में सजाकर तो वहीं आराध्या तो लिपट ही गई थी उससे... अचानक बिरजू की आंखों मे आज दोपहर का दृश्य तैर गया।
जब वह उस बंगले की मालकिन के यहां दीवार रिपेयरिंग कर रहा था तो मैडम ने अपनी बेटी को एक कप चाय बनाने के लिए कहा था क्योंकि उनका सिर दर्द कर रहा था लेकिन उनकी बेटी भिनभिनाती पैर पटकती सोफे पे पसर गई थी टीवी के सामने ये कहके कि उसका पसंदीदा सीरियल आ रहा है तुम खुद बना लो।
ये सब स्मरण होते ही बिरजू के मन से सारी कुंठा हवा हो गई उसने मिठाई का पैकेट आस्था को थमाया और आराध्या को चाकलेट का और आस्था आराध्या को चूमते हुए कहा जन्मदिन की शुभकामनाएं बेटा ईश्वर तुम्हें हमेशा खुश रखे।
अपनी पसंदीदा मिठाई चाकलेट पाकर दोनों बेटियों खुशी से चहकने लगी ये देखकर बिरजू और उसकी पत्नी सुधा भी मुस्कराने लगे बिरजू के मन में आ रही कुंठा ने अब अपनी जगह संतुष्टि को दे दी थी वो समझ गया था कि
संस्कार और अपनापन ही असली धन है जो उसके पास एक परिवार के रूप में भरपूर मौजूद है।।
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उस दिन शाम का वक्त था ... ...
लम शम 7 बजे के करीब मेरे घर का किवाड़ किसी ने खट खटाया.... मैं दिया अगरबत्ती कर रही थी......सब्जी रसोई में कटी छिलि पड़ी थी।बाहर खेल रही मेरी बेटी को मैने आवाज दी तनु दरवाजा खोलो..
देखो तो कोन है...मगर आजकल के बच्चे सुनते कहा है। मैं ध्यान से पूजा भी नहीं कर पाई की बार बार खट खटाने के साथ साथ अभी तो आवाज भी आने लगी,भाभी दरवाजा खोलो.....भाभी दरवाजा खोलो ...मैं बाहर गई दरवाजा खोला और देखा ...की कोई मेली कुचेली सी महिला खड़ी है।उसने मेरे पांव छुए और मेरे पांव में पड़ कर रोने लगी। भाभी आप घर पर चलो न मेरा ससुर मुझे मार रहा है। चूंकि मैं थोड़ी पढ़ी लिखी और महिलाओं की हितेषी रही हूं मेरी इसी आदत ने बेचारी ने के मन में सहानुभूति का बीज बो दिया।
मैने कहा पागल है क्या ससुर भी कोई मारता है क्या?
मै अवाक रह गई।
वैसे मैं उसे पहचानती थी मगर जानती नही थी।
उसका नाम तो दुर्गा था लेकिन गांव में उसे सभी दरगली दरगली कहते थे। मैने उस से पूछा की क्या हुआ है तुझे क्यों मारा बता तो सही ... बस उसने ऐसे ही बात टालते हुए कहा कि मेरे काम न करने की वजह से मुझे मारा ।
मैने कहा कोई न खा पीकर मस्त रह.... और तू अंदर आ तेरे लिए अच्छी सी चाय बनाती हु।
वो अंदर आई डरी सहमी ....
मेरी आवाज बहुत ही रौबदार है . ... इसीलिए अधिकांशत लोग मुझसे बात करने से हिचकिचाते है। मैने उसे चाय पिलाई ,खाना खिलाया फिर वो थोड़ी हल्का महसूस करने लगी।
फिर वो मूड सही करके चली गई।
पर मैं रातभर सो न सकी ... सोचती रही की ऐसे कैसे कोई भी अपनी बहु पर हाथ उठा देता है।
थोड़े दिनों में खेतो में कटाई गुड़ाई का काम आ गया .. मेरे जहन में @दरगली का चेहरा आया,मैने उसे काम पर बुला दिया। अब वो मुझसे घुलने मिलने लगी। बाते करने लगी ... बातो बातों में मुझे पता चला की उसकी बचपन मे ही शादी हुई थी महज 7 साल की उम्र में ...तब से को ससुराल में ही है। इसके 2 बच्चे है।
थोड़े दिनों के बाद उसने काम पर आना अचानक बंद कर दिया ।
उसका पति विदेश में था।
फिर मैने उसके बारे में पूछना शुरू किया किसी ने ढंग से बताया नही ।
फिर पता चला की उसका अबॉर्शन कराया है।
मै सोच मैं पड गई की उसका पति यह है नही अबॉर्शन कैसे करवाया होगा?
कुछ दिनों में हैंडपंप पर पानी भरती दूर से नजर आई.. मैं भाग के उसके पास गई मैंने कहा की।क्या हुआ है.. तेरी तबियत तो ठीक है.. उसने कहा हां। चूंकि मैं किसी की निजी जिंदगी में झांकना काम पसंद करती हु इसीलिए मैने कुछ नही पूछा बस उसे कुछ पैसे दिए और चली गई।
फिर एक दिन वो खुद आई की और बोली... भाभी मेरा अबॉर्शन करवाया है।मेरी सास ने ... और वो बच्चा मेरे ससुर का था.....
मै हक्की बकी रह गई ... ये क्या?
उसका ससुर पंच पंचायती में साफा पहन कर घूमता है,बड़े बड़े पंचों में नाम हैं और ये क्या?
फिर मैने उससे पूंछा की कब से है ये सब ... उसने कहा कि मेरे दो बच्चे भी।मेरे ससुर के ही है... और सास भी कुछ नही।कहती
और घर में सभी को पता है....
मेरा पति इकलौता होने के नाते समाज को कुछ पता न चले इसीलिए मेरा पति घर नहीं रहता,क्योंकि उसका खून खोलता है।और सामाजिक स्तर पर नाम होने के कारण कोई कुछ नहि कहता।
मैने सुना तब से मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए।और अंदर ही अंदर एक निर्णय लेने की कोशिश की ....की काश में इस इंसान के मुंह पर कालिख पोत कर इसे जिस हथाई पर ये पंचायती करता है, उसी नीम के पेड़ पर बांध उल्टा लटका पाती... और इसे लाठियो की।मार से सबक।सीखा पाती।
दरगली तो आज भी सामान्य है लेकिन मैं अभी तक नही हो पाई हु...........
की ऐसे लोगों को पंच पंचायती के नाम पर किसी और के जीवन का फैसला लेने का अधिकार किसने दिया।
हथाई पर जाजम के ऊपर सभी स्वच्छ है... लेकिन थोड़ा सा उठा कर देखो उस जाजम को ... बहुत ही कम लोग होते है उस पर बैठने लायक बाकी सब ... सिर्फ समाज के घातक दुश्मन भरे पड़े है।
🖋️🖋️कंचन राठौड़ (लेखिका)
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*💐💐पत्नी💐💐*
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किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गयी ! वह बड़बड़ाते हुए घर से बाहर निकला! सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा। पता नहीं,समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा,सुकून से रहने नहीं देती!
नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर,चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया!
तभी पीछे से एक आवाज सुनाई दी इतनी सर्दी में घर से बाहर चाय पी रहे हो?
गर्दन घुमा कर देखा तो पीछे के स्टूल पर बैठे एक बुजुर्ग थे।
आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं बाबा.... बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा :- मैं निपट अकेला,न कोई गृहस्थी,न साथी,तुम तो शादीशुदा लगते हो बेटा"।
पत्नी घर में जीने नहीं देती बाबा !! हर समय चिकचिक..., बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ। जिंदगी नरक बना कर रख दी है।
बुजुर्ग : पत्नी जीने नहीं देती?
बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है।आठ बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए। जब ज़िंदा थी,कभी कद्र नहीं की,आज कम्बख़्त चली गयी तो भुलाई नहीं जाती,घर काटने को दौडता है। बच्चे अपने अपने काम में मस्त, आलीशान घर,धन-दौलत सब है..., पर उसके बिना कुछ मज़ा नहीं। यूँ ही कभी कहीं,कभी कहीं,भटकता रहता हूँ! कुछ अच्छा नहीं लगता, उसके जाने के बाद पता चला, वह धड़कन थी! मेरे जीवन की ही नहीं, मेरे घर की भी। सब बेजान हो गया है... लेकिन नवनीत तुम तो समझदार हो बेटा, जाओ !! अपनी जिंदगी खुशी से जी लो। वरना बाद में पछताते रहोगे, मेरी तरह। बुज़ुर्ग की आँखों में दर्द और आंसुओं का समंदर भी।
चाय वाले को पैसे दिए। नज़र भर बुज़ुर्ग को देखा,एक मिनट गंवाए बिना घर की ओर मुड़ गया...।
उसे दूर से ही देख लिया था, डबडबाई आँखो से निहार रही पत्नी,चिंतित दरवाजे पर ही ख़डी थी....कहाँ चले गए थे? जैकेट भी नहीं पहना, ठण्ड लग जाएगी तो ?, तुम भी तो "बिना स्वेटर के दरवाजे पर खड़ी हो!" कुछ यूँ, दोनों ने आँखों से,एक दूसरे के प्यार को पढ़ लिया था!
कई बार हम लोग भी अपने जीवन में इसी तरह की गलतियां कर बैठते है। सिर्फ पत्नी ही नही,माँ-बाप, चाचा-ताऊ,भाई-बहिन या अज़ीज़ दोस्तोँ के साथ ऐसा क्रोध कर देते है जो सिर्फ हम को ही नही,उनको भी कष्ट देता है।
*💐💐शिक्षा💐💐*
छोटा सा जीवन है दोस्तो!! कहीं क्षमा करके कहीं क्षमा मांगकर हँस कर गुजार दे।जिंदगी के सफर मे गुजर जाते है जो मकाम,वो फिर नही आते।
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