प्रेरणादायक कहानियां भाग 52 prernadayak kahaniyan part 52




💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 256 💮



*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐दामाद💐💐*

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"रेनू की शादी हुयें, पाँच साल हो गयें थें, उसके पति थोड़ा कम बोलतें थे पर बड़े सुशील और संस्कारी थें, माता_पिता जैंसे सास, ससुर और एक छोटी सी नंनद, और एक नन्ही सी परी, भरा पूरा परिवार था, दिन खुशी से बित रहा था,

आज रेनू बीतें दिनों को लेकर बैठी थी, कैंसे उसके पिताजी नें बिना माँगे 30 लाख रूपयें अपने दामाद के नाम कर दियें, जिससे उसकी बेटी खुश रहे, कैसे उसके माता_पिता ने बड़ी धूमधाम से उसकी शादी की, बहुत ही आनंदमय तरीके से रेनू का विवाह हुआ था,

खैर बात ये नही थी,बात तो ये थी की रेनू के बड़े भाई ने अपने माता_पिता को घर से निकाल दिया था।
क्यूँकी पैसें तो उनके पास बचें नही थें,जितने थें उन्होने रेनू की शादी में लगा दियें थें,फिर भला बच्चें माँ बाप को क्यूँ रखने लगें।रेनू के माता पिता एक मंदिर मे रूके थें।
रेनू आज उनसे मिल के आयी थी और बड़ी उदास रहने लगी थी।आखिर लड़की थी,अपने माता_पिता के लिए कैसे दुख नही होता,कितने नाजों से पाला था,उसके पिताजी ने बिल्कुल अपनी गुडिया बनाकर रखा था ।
आज वही माता पिता मंदिर के किसी कोने में भूखें प्यासें पड़ें थे।

रेनू अपने पति से बात करना चाहती थी।वो अपने माता पिता को घर ले आए,पर वहाँ हिम्मत नही कर पा रही थी,क्यूँकी उनके पति कम बोलते थे,अधिकतर चुप रहते थे।
जैंसे तैंसे रात हुई और रेनू के पति व पूरा परिवार खाने के टेबल पर बैठा था।
रेनू की ऑखे सहमी थी,उसने डरते हुये अपने पति से कहा-सुनिये जी-"भाईया_भाभी ने मम्मी पापा को घर से निकाल दिया हैं।वो मंदिर में पड़े है,आप कहें तो उनको घर ले आऊ"।

रेनू के पति ने कुछ नही कहा, और खाना खत्म कर के अपने कमरें में चला गया,सब लोग अभी तक खाना खा रहें थे,पर रेनू के मुख से एक निवाला भी नही उतरा था,उसे बस यही चिंता सता रही थी अब क्या होगा ?इन्होने भी कुछ नही कहा,रेनू रुहाँसी सी ऑख लिए सबको खाना परोस रही थी ।

थोड़ी देर बाद रेनू के पति कमरें से बाहर आए और रेनू के हाथ में नोटो का बंडल देते हुये कहा, इससे मम्मी, डैडी के लिए एक घर खरीद दो, और उनसे कहना,वो किसी बात की फ्रिक ना करें मैं हूं।
रेनू ने बात काटते हुये कहा,आपके पास इतने पैसे कहा से आए जी ??
रेनू के पति ने कहा,ये तुम्हारे पापा के दिये गये ही पैसे हैं।
मेरे नही थे,इसलिए मैंने हाथ तक नही लगाए।

 वैसे भी उन्होने ये पैसे मुजे जबरदस्ती दिये थे, शायद उनको पता था एक दिन ऐसा आयेगा। 

रेनू के सास_ससुर अपने बेटे को गर्व भरी नजरों से देखने लगें,और उनके बेटे ने भी उनसे पूछा-"अम्मा जी बाबूजी यही ठीक है ना"??

उसके अम्मा बाबूजी ने कहा बड़ा नेक ख्याल है बेटा नवनीत, हम तुम्हें बचपन से जानते हैं, "तुझे पता है, अगर बहू अपने माता_पिता को घर ले आयी, तो उनके माता पिता शर्म से सर नही उठा पायेंगे की बेटी के घर में रह रहें, और जी नही पाएगें इसलिए तुमने अलग घर दिलाने का फैसला किया हैं और रही बात इस दहेज के पैसे की,तो हमें कभी इसकी जरूरत नही पड़ी। क्यूँकी तुमने कभी हमें किसी चीज की कमी होने नही दी, खुश रहो बेटा" ये कहकर रेनू और उसके पति को छोड़ सब सोने चले गयें


रेनू के पति ने फिर कहा, अगर और तुम्हें पैसों की जरूरत हो तो मुझे बताना, और अपने माता_पिता को बिल्कुल मत बताना घर खरीदने को पैसे कहाँ से आए, कुछ भी बहाना कर देना, वरना वो अपने को दिल ही दिल में कोसते रहेंगें।

"चलो अच्छा"अब मैं सोने जा रहा,मुझे सुबह दफ्तर जाना हैं,-रेनू का पति कमरें में चला गया, और रेनू खुद को कोसने लगी, मन ही मन ना जाने उसने क्या_क्या सोच लिया था, मेरे पति ने दहेज के पैसें लिए है, क्या वो मदद नही करेंगे, करना ही पड़ेगा, वरना मैं भी उनके माँ_बाप की सेवा नही करूगी।

रेनू सब समझ चुकी थी, की उसके पति कम बोलते हैं, पर उससे ज्यादा कही समझतें हैं।

        रेनू उठी और अपने पति के पास गयी, माफी मांगने, उसने अपने पति से सब बता दिया। उसके पति ने कहा-कोई बात नही होता हैं, तुम्हारे जगह मैं भी होता तो यही सोचता। रेनू की खुशी का कोई ठिकाना नही था, एक तरफ उसके माँ_बाप की परेशानी दूर दूसरी तरफ, उसके पति ने माफ कर दिया

रेनू ने खुश और शरमाते हुये अपने पति से कहा,-मैं आपको गले लगा लूं ?
उसके पति ने हंसते हुये कहा-"मुझे अपने कपड़े गंदे नही करने" और दोनो हंसने लगें 😊😊
शायद रेनू को अपने कम बोलने वालें पति का ज्यादा प्यार समझ आ गया.....


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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 257 💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐कर्मो का फल💐💐*

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अपनी ज़िंदगी में बहुत से लोगों को बजुर्गों की सेवा करते और उनका आशीर्वाद लेते और फिर बजुर्गों के दिल से निकली दुआओं को फलते फूलते तो बहुत देखा लेकिन जो लोग बजुर्गों की सेवा तो क्या करनी उनको तंग करते हैं उनका क्या हाल होता है इस को घटित होते हुए भी बहुत करीब से देखा है।

कुछ दिन पहले की बात है मैं अपने भाई के घर यानी अपने मायके गयी।वहां अपनी मम्मी और भाभी के साथ बैठ कर बातें कर रही थी।कि बाहर की घण्टी बजी देखा तो एक औरत अंदर आयी बड़ी दीन हीन सी लग रही थी। सादे से कपड़े, कैंची चप्पल, मैं एक दम से तो उसको पहचान ही नही पायी। 
भाभी ने जब उसको पानी दिया तब मम्मी ने बताया कि ये नीलिमा है पहचाना नही तुमने?

मैं तो एक दम से हैरान ही रह गयी देख कर के ये वो ही नीलिमा भाभी है जिसके कभी शाही ठाठ हुआ करते थे।मेरी शादी से पहले नीलिमा भाभी का और हमारा परिवार एक ही गली में रहते थे। एक दूसरे के घर आना जाना भी था क्योंकि दूर की रिश्तेदारी भी थी। मेरी शादी के बाद मेरे दोनो भाईयों ने वो मोहल्ला छोड़ दिया और अपने अपने घर दूसरी जगह पर बना लिए। 

नीलिमा की शादी  तो मेरे सामने ही हुई थी ।उसकी सास कितने चाव से बहु ले कर आई थी ।बेटे की शादी के कितने ही सपने देखे होंगे उसने।बहु के आने से ऐसा लग रहा था कि जैसे उसको जमाने भर की खुशियाँ मिल गयी हों। लेकिन ईशवर की मर्जी थी या शायद उसके भाग्य में ये खुशियां थोड़े दिन के लिए ही थी कि शादी के दो ही महीने बाद वो रात को सोई तो सुबह उठी ही नही। तब तो सबको लग रहा था कि बहु को बहुत दुख हुआ है सासु माँ के जाने का ,बहुत जोर जोर से रो रही थी।

लेकिन सास के जाते ही बहु ने अपने असली रंग दिखाने शुरू कर दिए। घर की मालकिन तो वो बन ही गयी थी लेकिन उसके अंदर जो गरूर था वो भी अब बाहर आने लगा। बात बात पर सब से लड़ पड़ती। ससुर का तो उसने जीना हराम कर दिया। वो बेचारे एक तो असमय जीवन साथी का बिछोह, ऊपर से बहु के जुल्म बुढ़ापे में सहने को मजबूर हो गए थे। एक समय पर बहुत खुशदिल इंसान अब बेचारे को देखकर ही तरस आता था। बहु ने घर के मालिक होते हुए भी उन्हें तीसरी मंजिल पर एक छोटे से कमरे में रहने को मजबूर कर दिया था। फिर येभी सुना कि बहु उन्हें पेटभर खाना भी नही देती और न ही उनके कपड़े धो कर देती है। बेचारे मैले कुचैले कपड़ों में कभी गली में आते तो ही दिखते लेकिन किसी से ज्यादा बात नही करते। जैसे ज़िन्दगी से रूष्ट हो गए हों।लेकिन बहु बिना बात के ही उन पर चिल्लाती रहती। कब तक सहते बेचारे। एक दिन वो भी चुपचाप चल दिये इस दुनिया को अलविदा कह कर।

नीलिमा को मेरी भाभी ओर मम्मी ने कुछ कपड़े और खाने पीने का समान दिया ।चाय पिलाई और वो चुपचाप चली गयी। जितनी देर वो बैठी एक अक्षर भी नही बोली उसने जितनी भी बात की इशारे से ही की नवनीत।

उसके जाने के बाद मम्मी ने बताया कि ससुर के जाने के कुछ समय बाद ही नीलिमा की उल्टी गिनती शुरू हो गयी। पहले तो उसके पति को बिज़नेस में घाटा पड़ गया और उस पर कर्जा चढ़ गया।और इसी के चलते उन्हें अपनी दुकान ओर मकान दोनो बेचने पड़े। पति ने कही नोकरी कर ली और किराये के घर मे आ गए।नीलिमा के तीन बेटे थे। बड़ा बेटा अभी कॉलेज में था और उससे छोटा बारहवीं कक्षा में कि एक दिन उसके पति अपने आफिस गए और अचानक से चक्कर आया और गिर गए और फिर उठे ही नही। मुसीबतों का जैसे उन पर पहाड़ टूट पड़ा। किसी तरह किसी पहचान वाले को बोल कर बड़े बेटे की पढ़ाई छुड़ा कर नोकरी लगवाई ओर फिर दूसरे बेटे को भी पढ़ाई छोड़नी पड़ी क्योंकि एक की तनख्वाह से घर का गुजारा ही नही हो रहा था तो पढ़ाई का खर्चा कैसे पूरा होता।

ओर एक दिन नीलिमा को इन्ही सब टेंशनो के चलते पैरालिसिस का अटैक आया। मायके वालों की मदद से दवाईयों ओर इलाज से वो थोड़ी बहुत ठीक तो हो गयी लेकिन उसकी जुबान चली गयी।

अब ये हाल है कि बेटे भी उसको नही पूछते ना ही कुछ खर्चादेते हैं।एक कमरे में अलग से रखा हुआ है जहां वोअकेली पड़ी रहती है। कभी कभी मेरे भाई के घर आ कर जरूरत का समान ले जाती है। वहां आने के लिए भी ऑटो वाले को समझाने के लिए घर से लिख कर ले आती है। मम्मी कहते कि जब रोती है तो सिर्फ आंसू ही बहते है क्योंकि आवाज तो भगवान ने छीन ही ली। 

जिस मुँह से उसने ससुर को गालियां दी होंगी आज उसमे बोलने की शक्ति भी नही बची। सच मे  घर के बजुर्गों का दिल दुखाने वाला इन्सान कभी न कभी तो अपने कर्मो का भुगतान  अवश्य करता है ये तो आंखों से देख लिया ।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 258 💮



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*💐💐सेहत का रहस्य💐💐* 

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बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में शंकर नाम का एक वृद्ध व्यक्ति रहता था। उसकी उम्र अस्सी साल से भी ऊपर थी पर वो चालीस साल के व्यक्ति से भी स्वस्थ लगता था। लोग बार बार उससे उसकी सेहत का रहस्य जानना चाहते पर वो कभी कुछ नहीं बोलता था । एक दिन राजा को भी उसके बारे में पता चला और वो भी उसकी सेहत का रहस्य जाने के लिए उत्सुक हो गए। राजा ने अपने गुप्तचरों से शंकर पर नज़र रखने को कहा। गुप्तचर भेष बदल कर उस पर नज़र रखने लगे।

अगले दिन उन्होंने देखा की शंकर भोर में उठ कर कहीं जा रहा है , वे भी उसके पीछे लग गए। शंकर तेजी से चलता चला जा रहा था , मीलों चलने के बाद वो एक पहाड़ी पर चढ़ने लगा और अचानक ही गुप्तचरों की नज़रों से गायब हो गया। गुप्तचर वहीँ रुक उसका इंतज़ार करने लगे। कुछ देर बाद वो लौटा , उसने मुट्ठी में कुछ छोटे-छोटे फल पकड़ रखे थे और उन्हें खाता हुआ चला जा रहा था। गुप्तचरों ने अंदाज़ा लगाया कि हो न हो , शंकर इन्ही रहस्यमयी फलों को खाकर इतना स्वस्थ है।

अगले दिन दरबार में उन्होंने राजा को सारा किस्सा कह सुनाया। राजा ने उस पहाड़ी पर जाकर उन फलों का पता लगाने का आदेश दिया , पर बहुत खोज-बीन करने के बाद भी कोई ऐसा असाधारण फल वहां नहीं दिखा। अंततः थक-हार कर राजा शंकर को दरबार में हाज़िर करने का हुक्म दिया। राजा – शंकर , इस उम्र में भी तुम्हारी इतनी अच्छी सेहत देख कर हम प्रसन्न हैं , बताओ , तुम्हारी सेहत का रहस्य क्या है ?

शंकर कुछ देर सोचता रहा और फिर बोला , ” महाराज , मैं रोज पहाड़ी पर जाकर एक रहस्यमयी फल खाता हूँ , वही मेरी सेहत का रहस्य है। “ठीक है चलो हमें भी वहां ले चलो और दिखाओ वो कौन सा फल है। सभी लोग पहाड़ी की और चल दिए , वहां पहुँच कर शंकर उन्हें एक बेर के पेड़ के पास ले गया और उसके फलों को दिखाते हुए बोला, हुजूर , यही वो फल है जिसे मैं रोज खाता हूँ।

राजा क्रोधित होते हुए बोले , ” तुम हमें मूर्ख समझते हो , यह फल हर रोज हज़ारों लोग खाते हैं , पर सभी तुम्हारी तरह सेहतमंद क्यों नहीं हैं ?” शंकर विनम्रता से बोला , ” महाराज , हर रोज़ हजारों लोग जो फल खाते हैं वो बेर का फल होता है , पर मैं जो फल खाता हूँ वो सिर्फ बेर का फल नहीं होता …वो मेरी मेहनत का फल होता है। इसे खाने के लिए मैं रोज सुबह 10 मील पैदल चलता हूँ जिससे मेरे शरीर की अच्छी वर्जिश हो जाती है और सुबह की स्वच्छ हवा मेरे लिए जड़ी-बूटियों का काम करती है। बस यही मेरी सेहत का रहस्य है।

राजा शंकर की बात समझ चुके थे , उन्होंने शंकर को स्वर्ण मुद्राएं देते हुए सम्मानित किया। और अपनी प्रजा को भी शारीरिक श्रम करने की नसीहत दी।

*💐💐शिक्षा💐💐*:-

मित्रों, आज टेक्नोलॉजी ने हमारी ज़िन्दगी बिलकुल आसान बना दी है , पहले हमें छोटे -बड़े सभी कामों के लिए घर से निकलना ही पड़ता था , पर आज हम Internet के माध्यम से घर बैठे-बैठे ही सारे काम कर लेते हैं। ऐसे में जो थोड़ा बहुत Physical Activity के मौके होते थे वो भी खत्म होते जा रहे हैं , और इसका असर हमारी सेहत पर भी साफ़ देखा जा सकता है। WHO के मुताबिक , आज दुनिया में 20 साल से ऊपर के 35% लोग Overweight हैं और 11 % Obese हैं। ऐसे में ज़रूरी हो जाता है कि हम अपनी सेहत का ध्यान रखें और रोज़-मर्रा के जीवन में शारीरक श्रम को महत्त्व दे।।

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💮 प्रेरणादायक कहानियां prernadayak kahaniyan 259  💮


*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*


*💐💐दुश्मन का स्वार्थ लें डूबा💐💐*


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एक पर्वत के समीप बिल में मंदविष नामक एक बूढा सांप रहता था। 
अपनी जवानी में वह बड़ा रौबीला सांप था। जब वह लहराकर चलता तो बिजली-सी कौंध जाती थी पर बुढापा तो बडे-बडों का तेज़ हर लेता हैं।

बुढापे की मार से मंदविष का शरीर कमज़ोर पड गया था। उसके विषदंत हिलने लगें थे और फुफकारते हुए दम फूल जाता था। जो चूहे उसके साए से भी दूर भागते थे, वे अब उसके शरीर को फांदकर उसे चिढाते हुए निकल जाते। पेट भरने के लिए चूहों के भी लाले पड़ गए थे।

मंदविष इसी उधेडबुन में लगा रहता कि किस प्रकार आराम से भोजन का स्थाई प्रबंध किया जाए। एक दिन उसे एक उपाय सूझा और उसे आजमाने के लिए वह दादुर सरोवर के किनारे जा पहुंचा। 

दादुर सरोवर में मेढकों की भरमार थी। वहां उन्हीं का राज था। मंदविष वहां इधर-उधर घूमने लगा। तभी उसे एक पत्थर पर मेढकों का राजा बैठा नज़र आया। मंदविष ने उसे नमस्कार किया “महाराज की जय हो।”

मेंढक राज चौंका “तुम! तुम तो हमारे बैरी हो। मेरी जय का नारा क्यों लगा रहे हो?”

मंदविष विनम्र स्वर में बोला “हे राजन, वे पुरानी बातें हैं। अब तो मैं आप मेढकों की सेवा करके पापों को धोना चाहता हूं। श्राप से मुक्ति चाहता हूं। ऐसा ही मेरे नागगुरु का आदेश हैं।”

मेंढक राज ने पूछा “उन्होंने ऐसा विचित्र आदेश क्यों दिया?”

मंदविष ने मनगढंत कहानी सुनाई-
“राजन्, एक दिन मैं एक उद्यान में घूम रहा था। वहां कुछ मानव बच्चे खेल रहे थे। गलती से एक बच्चे का पैर मुझ पर पड़ गया और बचाव स्वाभववश मैंने उसे काटा और वह बच्चा मर गया। मुझे सपने में भगवान् श्रीकॄष्ण नजर आए और श्राप दिया कि मैं वर्ष समाप्त होते ही पत्थर का हो जाऊंगा। मेरे गुरुदेव ने कहा कि बालक की मॄत्यु का कारण बन मैंने कॄष्णजी को रुष्ट कर दिया हैं, क्योंकि बालक कॄष्ण का ही रुप होते हैं।

बहुत गिड़गिड़ाने पर गुरुजी ने श्राप मुक्ति का उपाय बताया। उपाय यह हैं कि मैं वर्ष के अंत तक मेढकों को पीठ पर बैठाकर सैर कराऊं।”

मंदविष कि बात सुनकर मेंढक राज चकित रह गया। सांप की पीठ पर सवारी करने का आज तक किस मेढक को श्रैय प्राप्त हुआ? 
उसने सोचा कि यह तो एक अनोखा काम होगा। 

मेंढक राज सरोवर में कूद गया और सारे मेढकों को इकट्ठा कर मंदविष की बात सुनाई। सभी मेंढक भौंचक्के रह गए।

एक बूढा मेंढक बोला 
“मेंढक एक सर्प की संवारे करें। यह एक अदभुत बात होगी। हम लोग संसार में सबसे श्रेष्ठ मेढक माने जाएंगे।”

एक सांप की पीठ पर बैठकर सैर करने के लालच ने सभी मेंढकों की अक्ल पर पर्दा डाल दिया था। सभी ने ‘हां’ में ‘हां’ मिलाई। मेंढक राज ने बाहर आकर मंदविष से कहा “सर्प, हम तुम्हारी सहायता करने के लिए तैयार हैं।”

बस फिर क्या था। आठ-दस मेढक मंदविष की पीठ पर सवार हो गए और निकली सवारी। सबसे आगे राजा बैठा था। मंदविष ने इधर-उधर सैर कराकर उन्हे सरोवर तट पर उतार दिया।

मेढक मंदविष के कहने पर उसके सिर पर से होते हुए आगे उतरे। मंदविष सबसे पीछे वाले मेढक को गप्प खा गया। 
अब तो रोज यही क्रम चलने लगा। रोज मंदविष की पीठ पर मेढकों की सवारी निकलती और सबसे पीछे उतरने वाले को वह खा जाता।

एक दिन एक दूसरे सर्प ने मंदविष को मेढकों को ढोते देख लिया। बाद में उसने मंदविष को बहुत धिक्कारा “अरे! क्यों सर्प जाति की नाक कटवा रहा हैं?”

मंदविष ने उत्तर दिया “समय पड़ने पर नीति से काम लेना पडता हैं। 
अच्छे-बुरे का मेरे सामने सवाल नहीं हैं। कहते हैं कि मुसीबत के समय गधे को भी बाप बनाना पडे तो बनाओ।”

मंदविष के दिन मज़े से कटने लगें। वह पीछे वाले वाले मेंढक को इस सफाई से खा जाता, कि किसी को पता न लगता। मेंढक अपनी गिनती करना तो जानते नहीं थे, जो गिनती द्वारा माजरा समझ लेते।

एक दिन मेंढक राज बोला “मुझे ऐसा लग र्हा हैं कि सरोवर में मेढक पहले से कम हो गए हैं। पता नहीं क्या बात हैं?”

मंदविष ने कहा “हे राजन, सर्प की सवारी करने वाले महान मेढक राजा के रुप में आपकी ख्याति दूर-दूर तक पहुंच रही हैं। 
यहां के बहुत से मेढक आपका यश फैलाने दूसरे सरोवरों, तलों व झीलों में जा रहें हैं।”

मेंढक राज की गर्व से छाती फूल गई। अब उसे सरोवर में मेंढकों के कम होने का भी ग़म नहीं था। जितने मेढक कम होते जाते, वह यह सोचकर उतना ही प्रसन्न होता कि सारे संसार में उसका झंडा गड़ रहा हैं।

आख़िर वह दिन भी आया, जब सारे मेंढक समाप्त हो गए। केवल मेंढक राज अकेला रह गया। उसने स्वयं को अकेले मंदविष की पीठ पर बैठा पाया तो उसने मंदविष से पूछा “लगता हैं सरोवर में मैं अकेला रह गया हूं। मैं अकेला कैसे रहूंगा?”

मंदविष मुस्कुराया “राजन, आप चिन्ता न करें। मैं आपका अकेलापन भी दूर कर दूंगा।”

ऐसा कहते हुए मंदविष ने मेंढक राज को भी गप्प से निगल लिया और वहीं भेजा जहां सरोवर के सारे मेढक पहुंचा दिए गए थे।

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चाहे व्यापार हो या नौकरी घर में भी समय देना जरूरी है 
नेहा हर रात इंतज़ार करती कि कब मोहन घर लौटे और कब वो उसे अपने पूरे दिन के किस्से सुनाए।

अभी पिछले बुधवार ही तो उसे 'स्टार परफ़ॉर्मर ऑफ़ द मंथ' का अवॉर्ड मिला था जिसकी मोहन को अभी तक ख़बर ना थी। होती भी कैसे? देर रात को घर आते ही वह चुपचाप खाना खा कर सो जाता था।

"सुनो, तुम्हें पता है मेरे साथ हाल ही में क्या हुआ...
"मैं कल पक्का सुनूँगा। आज बहुत थक गया हूँ।"
"तुम्हारा तो अब ये डेली का नाटक हो गया है। ऐसा भी क्या काम करना कि ख़ुद की बीवी के लिए ही टाइम ना निकाल पाओ?"

"नेहा मैं ये सब हमारे लिए ही तो करता हूँ ना। तुम ऐसे गुस्सा क्यों हो रही हो?"

"तुम सो जाओ...मोहन मेरे लिए अपना काम मत छोड़ो," इतना कह कर नेहा ने अपना मुँह चादर से छुपा लिया।

अगली सुबह जब नेहा की नींद खुली तो उसने अपने बिस्तर का दूसरा हिस्सा खाली पाया।

"आज मोहन समय से पहले ही ऑफ़िस चला गया! अपने काम से ही शादी कर लेनी चाहिए उसे," उसने सोचा।
नेहा ने आँखें मलकर नींद खोली ही थी कि सामने से मोहन को हाथ में चाय का कप ले कर आते हुए देखा। आश्चर्य से बड़ी-बड़ी आँखों से वह कुछ पूछती कि उससे पहले मोहन ने बोलना शुरू कर दिया।

"हाँ तो तुम कल कुछ कह रही थी। क्या हुआ था तुम्हारे साथ?"
"तुम आज ऑफ़िस नहीं गए?

"नहीं तो। मैंने ऑफ़िस की ड्यूटी से कुछ दिन का ब्रेक लिया है ताकि तुम्हारे साथ अपने पति होने ड्यूटी पूरी कर सकूँ। इसीलिए इतने समय से ओवरनाइट करके सारे काम पहले ही ख़त्म कर लिए।"

नेहाअब कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थी। वह बस चुपचाप यही सोचे जा रही थी कि कैसे ज़रा सी नासमझी और रिश्ते में आई शांति की वज़ह से ना जाने कितनी ग़लतफ़हमियाँ पैदा हो जाती हैं। उसकी आँखों से आते आँसूओं को जैसे ही मोहन ने देखा, उसने वहीं पास रखी टेबल पर चाय का कप रखा और नेहा को सीने से लगा लिया।
नेहा फूट-फूट कर रोने लगी...

"अच्छा, आई एम सॉरी,"मोहन ने नेहा के आँसू पोंछते हुए कहा, "मैंने ना तुम्हारे बैग में वो 'स्टार परफॉर्म' वाली ट्रॉफ़ी कल रात को ही देख ली थी एंड आई एम वेरी प्राउड ऑफ यू। बस मैं एक बार सब कुछ तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं मोहन ने नेहा का माथा चूमते कहा ...मोहन का ऐसा प्यार देखकर नेहा मुसकुरा दी ओर फिर चाय की चुस्कियो के साथ शांति तोड़ते दोनों एक दूसरे से प्यार भरी बातों मे खो गये ...।।

*💐💐शिक्षा💐💐*

दोस्तों यही तो प्यार ...एक रिश्ता ...रिश्ता साझेदारी का ..कुछ रुठना मनाना ....कुछ नोकझोक ...पहले प्यार से गुस्सा करना ओर फिर मान जाना .. या मना लेना ।अपना समय सभी को देना चाहिए ताकि परिवार का स्नेह एक दूसरे के प्रति कभी खत्म ही ना हो।

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